पिछले भाग में हमने देखा की कैसे रामसिंह ने अपनी लाडली बेटी गौरी की चूत का पहली बार मज़ा लिया..और गौरी के माँ के मना करने के बावजूद उसकी चूत में ही झड गया ..अगर आपने वो भाग नहीं पढ़ा है तो यंहा शाही राजपुताना परिवार का वासना का खेल – ७ क्लिक करके पढ़ सकते है. अब आगे …
“नहीं! निकालो उसे!” गौरी की माँ चिल्लाई। वह सोफे से उछलकर खड़ी हो गई थी। उसके चेहरे पर भय और क्रोध था। वह तेजी से बिस्तर के पास आई और राम सिंह के पसीने से तर, लाल हो चुके नितंब पर जोरदार थप्पड़ मारा। थप! की आवाज़ कमरे में गूंजी।
“अइय्यो!” राम सिंह ने चिल्लाते हुए अपना सिर घुमाया।
“क्या हुआ है आपको? क्या आप एक बार भी अपनी पत्नी की बात नहीं सुन सकते?” गौरी की माँ गुस्से से तमतमा रही थी। “यह कोई मजाक नहीं है! यह हमारे खानदान की योजना है! गर्भ सुमेर का होना चाहिए!”
राम सिंह ने हांफते हुए, अपना लौड़ा गौरी की चूत से बाहर निकाल लिया। “माफ… माफ करना,” उसने अपनी पत्नी से कहा, उसकी आँखों में पश्चाताप था।
“मैं… मैं बहक गया था। यह हमारे परिवार की एक महत्वपूर्ण परंपरा है, बेटी को पिता का आशीर्वाद देना… मैं संयम नहीं रख पाया।”
जैसे ही उसने अपना लौड़ा बाहर निकाला, राम सिंह के गाढ़े, सफेद वीर्य की एक धार गौरी की लाल-भूरी चूत से बाहर निकलकर उसकी जांघों और बिस्तर पर फैलने लगी। यह दृश्य बहुत ही स्पष्ट था—उसके अंदर बहुत सारा वीर्य था।
“है भगवान!” गौरी की माँ ने कहा। कोई और बहस या डांट-डपट नहीं की। अब समय कार्यवाही का था।
वह तुरंत बिस्तर पर चढ़ गई और गौरी की टाँगों के बीच में घुस गई। “शांत लेटी रह, लाडो। जरा भी हिलना मत,” उसने आदेश दिया।
फिर वह झुकी और अपना मुँह गौरी की चूत के ऊपर ले आई। उसने अपनी जीभ का इस्तेमाल करते हुए, गौरी की चूत के द्वार से बह रहे गाढ़े वीर्य को चाटना शुरू कर दिया। वह बहुत ही कुशल और तेज थी, एक माँ की कोमलता के साथ राजपूती औरत का अनुभव मिला हुआ।
उसने अपनी जीभ की नोक से गौरी की चूत की फांक में घुसकर अंदर जमे हुए वीर्य को बाहर निकाला।
“माँ….. अजीब लग रहा है,” गौरी ने फुसफुसाया, उसकी आँखें आधी बंद थीं।
“चुप रह,” उसकी माँ ने कहा, अपना काम जारी रखते हुए। जब जीभ से काम नहीं चला, तो उसने अपनी दो उंगलियाँ गौरी की चूत में डाल दीं।
वहाँ अंदर गर्मी और नमी थी, और राम सिंह के वीर्य की गाढ़ी परत। उसने अपनी उंगलियों को मोड़ा, खोजा, और फिर धीरे से बाहर खींचा, जिससे अंदर का अधिकांश वीर्य बाहर निकल आया, जिसे उसने तुरंत अपने मुँह से चाट लिया।
उसने यह प्रक्रिया तब तक दोहराई, जब तक कि गौरी की चूत से कोई और तरल बाहर नहीं आया, केवल उसका अपना प्राकृतिक रस बचा रहा। अंत में, संतुष्ट होकर, वह पीछे हट गई और अपनी बेटी की तरफ देखा। गौरी की चूत अब साफ थी, हालाँकि थोड़ी सूजी हुई और लाल थी।
“बस,” गौरी की माँ ने कहा, अपने होंठ पोंछते हुए। “अब खतरा टल गया है।”
“हाहाहा! क्या मज़ा आया!” राम सिंह ने जोरदार ठहाका लगाया, अपनी बेटी की चुदाई के बाद की थकान और संतुष्टि से भरा हुआ। वह सोफे पर पीछे की ओर झुक गया, उसकी नंगी छाती पसीने से चमक रही थी। “बेटी, तेरी चूत तो सचमुच कमाल की है। पिता होने का सुख तो अलग ही है।”
गौरी भी बिस्तर पर लेटी-लेटी मुस्कुरा रही थी, उसके शरीर में एक गहरी, थकी हुई शांति थी। उसकी चूत अब साफ थी, लेकिन अंदर एक गुदगुदी, भरी हुई अनुभूति अभी भी बाकी थी। “धन्यवाद, बाबूसा,” उसने शर्माते हुए कहा।
गौरी की माँ, जो अभी-अभी गौरी की चूत चाटकर साफ करके अपना मुँह पोंछ रही थी, ने गंभीर होकर कहा, “अच्छा, अब बता बेटा, उस ठाकुराइन के बारे में पूरी बात। तूने कहा था कि वो खुद अपने सामने भी तुम दोनों को चोदने को कहती है? यह कैसे हुआ? शुरू से सब कुछ बता।”
गौरी ने सुमेर के साथ की पहली रात और गांड की चुदाई और कैसे वो बाल बाल बची अपनी नादानी का भंडाफोड़ होते होते ..जब उसने बेझिझक खुद के ही गांड का मल के मिश्रण से भरा सुमेर का लंड मज़े से चाट चाट कर साफ किया था,..
उसने ये भी बताया की कैसे ठकुरायन ने सुमेर को आदेश दिए है की वो कही भी, और किसी भी वक़्त, किसीके भी सामने उसे चोद सकता है,.. और फिर कैसे गौरी ने ठकुरायन को चुदते हुए उसे अब चुनौती दे दी है.
यह सुनकर राम सिंह उछलकर सोफे पर बैठ गया, जो दूसरे राउंड के लिए अपने लौड़े को हाथ से मल-मल कर फिर से तैयार कर रहा था। उसकी आँखें चौड़ी हो गई थीं।
“तो ये बात है!” उसने कहा, उसकी आवाज़ में हैरानी और सम्मान का मिश्रण था। “इसका मतलब साफ है, गौरी की माँ। ठाकुराइन भी वही चाल चल रही है जो हम चल रहे हैं।
वो भी अपने बेटे को हमारी बेटी के जरिए बाँधना चाहती है, लेकिन उसका तरीका… उसका तरीका तो हमसे भी ज्यादा बेशर्म और सीधा है!”
“तो अब क्या करें बाबूसा?” गौरी ने बीच में सवाल किया, अपने पिता की तरफ देखते हुए।
गौरी की माँ, जो अपनी चिकनी, गीली चूत को धीरे-धीरे मसल रही थी, बोली, “हाँ, अब क्या करें? हम तो सोचते थे कि सुमेर को अपनी परंपरा में शामिल करके, उसी के जरिए अपनी परिस्थिति सुधारेंगे।
पर यहाँ तो पता चलता है कि ठाकुराइन तो पहुँची हुई रांड मालूम होती है। वो तो खेल के नियम हमसे भी बेहतर जानती है।”
राम सिंह ने गौरी की तरफ देखा और उसे हाथ के इशारे से अपने पास बुलाया। उसने अपने उभरे हुए, फिर से तन चुके लौड़े की तरफ इशारा किया, जो उसकी जांघों पर सीधा खड़ा था।
“उस रंडी को मैं ठीक कर दूँगा,” उसने दावे के साथ कहा। “हम अपनी रणनीति में ज्यादा बदलाव नहीं करेंगे। गौरी की माँ, तुम जमाई राजा पर अपनी चूत का जादू चलाओ।
पहले हम सुमेर को हमारे पारिवारिक सुख में शामिल कर लें। सुमेर और गौरी के यहाँ से जाने से पहले, हम चारों का एक चुदाई का कार्यक्रम हो जाना चाहिए। एक ऐसी रात, जो उसे वो कभी नहीं भूल सकता।”
पॉप! की गीली आवाज़ के साथ, गौरी ने अपने मुँह से अपने पिता का लौड़ा निकाला, जिसे वह अब तक चूस रही थी। उसकी आँखें चमक उठीं। “सच, बाबूसा? हम चारों? एक साथ?”
“हाँ, मेरी बच्ची!” राम सिंह ने गौरी के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा। “तुझे मुँह-चुदाई के बारे में सीखना था ना? असली तरीका?”
“हाँ, बाबूसा!” गौरी उत्साहित होकर बोली, उसकी आँखें चौड़ी हो गईं।
“ठीक है, बेटा। गौरी की माँ, ज़रा दिखाओ अपनी लाडली को, कि कैसे एक आदमी का लौड़ा पूरा का पूरा गले में उतारा जाता है।”
गौरी की माँ मुस्कुराई और राम सिंह के पास आकर घुटनों के बल बैठ गई।
अब तक राम सिंह का लौड़ा फिर से पूरी तरह तनकर खड़ा हो चुका था, उसकी नसें उभरी हुई थीं और सिर का सिरा बैंगनी रंग का हो रहा था। दोनों माँ-बेटी राम सिंह के सामने घुटनों के बल बैठी थीं, जैसे कोई पवित्र पाठ सीखने आई हों।
राम सिंह कुर्सी पर पीछे झुककर बैठा, उस मातृत्व और कामुकता के मिले-जुले नज़ारे को देख रहा था। एक माँ अपनी बेटी को जीवन का वो पाठ पढ़ा रही थी, जो किताबों में कहीं नहीं लिखा होता।
“देख, बेटी,” गौरी की माँ ने कोमल, शिक्षक जैसी आवाज़ में कहा। “इसको पूरा गले में उतारने के लिए, सबसे पहले अपने मुँह को पूरा खोलना होता है। जैसे कि तुझे जम्हाई आ रही हो। करो, आ… आ…”
गौरी ने अपना मुँह पूरा खोल दिया, जैसे कोई डॉक्टर उसका गला देख रहा हो। “आ… आ…”
“शाबाश!” उसकी माँ ने प्रोत्साहित किया। “बिल्कुल सही। अब अपनी जीभ को पूरा बाहर निकालो। पूरी तरह। ताकि वो लौड़े के रास्ते में रुकावट न बने।”
गौरी ने अपना मुँह खुला रखा और अपनी गुलाबी जीभ को पूरी तरह बाहर निकाल लिया। उसने अपनी माँ की तरफ देखा, इशारे से पूछते हुए कि क्या वह सही कर रही है।
“बिल्कुल सही, बेटी! बस ऐसे ही,” गौरी की माँ ने मुस्कुराते हुए कहा। फिर उसने खुद अपना मुँह पूरा खोला, अपनी जीभ बाहर निकाली, और राम सिंह के लौड़े की तरफ बढ़ी।
उसने कोई जल्दबाजी नहीं की। पहले उसने अपनी जीभ के फ्लैट हिस्से से लौड़े के नीचे के हिस्से, उसकी गोटियों तक को चाटा। फिर, एक तरल, निपुण गति से, उसने लौड़े के सिर को अपने होठों के बीच लिया और धीरे-धीरे अपना मुँह आगे बढ़ाया।
गौरी हैरानी से देख रही थी। उसकी माँ के होठ राम सिंह के लौड़े के ऊपरी हिस्से, उसकी कमर से चिपक गए, और निचले होठ उसकी गोटियों को छूने लगे। राम सिंह का मोटा, लंबा लौड़ा धीरे-धीरे उसके मुँह में गायब होता गया, जब तक कि उसकी नाक राम सिंह के पेट के निचले हिस्से से नहीं टकरा गई।
राम सिंह का पूरा लौड़ा उसके मुँह और गले में समा गया था।
राम सिंह की आँखें सुकून से बंद हो गईं। एक गहरी, संतुष्ट कराह निकली। “हम्म्म…”
गौरी की आँखें फैल गईं। “वाह, माँ!” उसने सहज प्रशंसा में कहा। “आप तो इसमें माहिर हो! पूरा का पूरा अन्दर चला गया!”
गौरी ने अपनी माँ की तारीफ करते हुए कहा, उसकी आँखों में प्रशंसा और थोड़ी सी ईर्ष्या भी थी। “इतना बड़ा लौड़ा पूरा का पूरा… आपके गले में चला गया!”
गौरी की माँ ने धीरे से राम सिंह का लौड़ा अपने मुँह से निकाला, एक लंबी लार की लकीर उसके होठों और लौड़े के बीच खिंचती रही। उसने अपनी बेटी की तरफ देखकर मुस्कुराया। “अब तू कोशिश कर, बेटी। वैसा ही करना जैसा मैंने तुझे दिखाया।”
गौरी ने हाँ में सिर हिलाया, वो थोड़ी घबराई हुई थी लेकिन उत्सुक भी।
वह आगे बढ़ी और राम सिंह के लौड़े को अपने हाथ में लेकर, उसके सिर को अपने होठों से छुआ।
फिर उसने अपना मुँह खोला और धीरे-धीरे उसे अंदर लेना शुरू किया। लेकिन जैसे ही लौड़ा उसके गले के पिछले हिस्से को छूने लगा, उसका शरीर एक झटके के साथ अकड़ गया।
“उल्ल्ल्फ्फ!” गौरी ने घुटन भरी आवाज़ निकालते हुए तुरंत अपना सिर पीछे खींच लिया। लार टपकाते हुए, खाँसते हुए, उसने कहा, “नहीं… मैं नहीं कर पा रही… यह पूरा गले में नहीं उतर रहा… मैं सांस नहीं ले पा रही थी!”
गौरी की माँ ने उसके कंधे पर हाथ रखा। “घबराओ मत, बेटी। तू वही प्रक्रिया करना जो मैंने तुझे बताई। बाकी का काम करने में तेरे बाबूसा तेरी मदद करेंगे।”
“मदद?” गौरी ने आँसू पोंछते हुए पूछा, उसका गला जल रहा था। “कैसे?”
राम सिंह ने, जो अब तक चुपचाप यह सब देख रहा था, बोला, “मैं तेरे मुँह में अपना लौड़ा धकेलूँगा, बेटी। जब तू अपनी तरफ से पूरा प्रयास करेगी, तब मैं तेरे सिर को पकड़कर आखिरी धक्का दूँगा। इससे यह पूरा का पूरा तेरे गले के अंदर चला जाएगा।”
गौरी की आँखें डर से चौड़ी हो गईं। “क्या… क्या दर्द होगा?”
गौरी की माँ ने कोमलता से कहा, “हर चीज़ का पहली बार दर्द होता है, बेटी। पहली बार चूत चोदने में दर्द हुआ था न? पहली बार गांड मारने में दर्द हुआ था न? फिर आनंद आया। यह भी ऐसा ही है। पहले दर्द, फिर मज़ा।”
गौरी ने एक गहरी सांस ली, अपने डर पर काबू पाते हुए। उसने फिर से हाँ में सिर हिलाया। “ठीक है। मैं कोशिश करती हूँ।”
वह फिर से आगे बढ़ी। इस बार उसने पहले से ज्यादा विश्वास के साथ राम सिंह के लौड़े को अपने मुँह में लिया और चूसना शुरू किया।
जब वह आधे रास्ते तक पहुँची, तो राम सिंह और गौरी की माँ ने एक-दूसरे की तरफ देखा। एक बिना कहे समझौता हुआ। अब आगे का कदम उठाने का समय था।
राम सिंह ने धीरे से गौरी के पीछे से उसके लंबे, खुले बालों को अपनी मुट्ठी में इकट्ठा किये, उसे एक मजबूत, नियंत्रित पकड़ दी। यह पकड़ सख्त थी लेकिन दर्द नहीं दे रही थी—बस उसके सिर को स्थिर रखने के लिए।
“तैयार हो जाओ, बेटी,” राम सिंह ने कहा, और फिर उसने गौरी के सिर को अपने लौड़े की तरफ जोर से धकेल दिया।
गक्क!
एक गहरी, गीली आवाज़ कमरे में गूंजी। गौरी का शरीर तन गया। उसने तुरंत अपने हाथों से राम सिंह की जांघों को पकड़ लिया और अपने आप को पीछे खींचने की कोशिश करने लगी। “नहीं! नहीं! नहीं! रुको!” उसकी आवाज़ दबी हुई और घबराई हुई थी।
“रुक जा, बेटी! छोड़ मत!” गौरी की माँ ने कहा। वह तेजी से आगे बढ़ी और गौरी के हाथों को राम सिंह की जांघों से अलग किया, जिससे वह और पीछे न खींच सके। फिर गौरी की माँ ने अपना हाथ राम सिंह के हाथ के ऊपर, गौरी के सिर के पीछे रख दिया, उसे और दबाव देते हुए।
उसने राम सिंह की तरफ देखा और आँख से इशारा किया। एक और धक्का। एक साथ।
राम सिंह ने सिर हिलाया। गौरी की माँ ने धीरे से गिनती शुरू की, उसकी आवाज़ दृढ़ थी। “एक… दो…”
गौरी उनकी पकड़ में तड़प रही थी, उसकी आँखें डर से फैल गई थीं।
“…तीन!”
“तीन” कहते ही, दोनों माँ-बाप ने एक साथ जोर लगाया। गौरी की माँ ने गौरी के सिर को नीचे धकेला, और राम सिंह ने अपनी कमर आगे की ओर झटकी, अपना लौड़ा गौरी के गले की गहराई में धकेल दिया।
गक्ख्ह्ह्स्स्स्श्श्…
यह आवाज़ लंबी, गहरी और घुटन भरी थी। गौरी का सिर अब पूरी तरह से राम सिंह की जांघों के बीच दब गया था, उसकी नाक उसके पेट के निचले हिस्से से दबी हुई थी।
गौरी ने बाहर निकलने के लिए संघर्ष करना शुरू कर दिया। उसका चेहरा लाल होने लगा, फिर बैंगनी रंग का। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे, उसकी आँखें डरावनी लग रही थीं, जैसे वो अपनी जगह से बाहर निकल आएँगी।
राम सिंह का आठ इंच लंबा और तीन इंच मोटा लौड़ा पूरी तरह से गौरी के मुँह और गले में गायब हो गया था, ठीक उसकी माँ की तरह।
उन्होंने तीन सेकंड तक गौरी को इसी दबाव में रखा। फिर, गौरी की माँ के इशारे पर, दोनों ने एक साथ दबाव छोड़ दिया।
गौरी ने खुद को पीछे खींच लिया, एक लंबी, हांफती हुई सांस के साथ। हा-आ-आ-आह! उसके मुँह और नाक से लार और बलगम की धाराएँ बह रही थीं।
उसका पूरा चेहरा लाल, सूजा हुआ और आँसुओं से भीगा हुआ था। वह हांफ रही थी, जैसे किसी ने उसे पानी में डुबोकर निकाला हो।
“लो हो गया! बधाई हो, मेरी प्यारी!” गौरी की माँ ने गर्व से कहा, अपनी बेटी के गाल को थपथपाते हुए।
राम सिंह ने आगे बढ़कर गौरी के पसीने से तर माथे को चूमा, अपने फिसलन भरे लौड़े को तेजी से मलते हुए। “बहुत अच्छा किया, मेरी प्यारी,” उसने कहा, उसकी आवाज़ में सच्चा गर्व था।
गौरी, जो अभी भी हांफ रही थी और उसका लाल, रोता हुआ चेहरा था, एक उपलब्धि भरी मुस्कान देने की कोशिश कर रही थी। यह मुस्कान टेढ़ी-मेढ़ी थी, लेकिन असली थी।
राम सिंह ने पूछा, “क्या अब तू तैयार है, मेरी प्यारी? अब तेरे मुँह की तेज चुदाई शुरू करें? शुरू कर दें?”
गौरी ने अपना सिर ऊपर-नीचे हिलाया, उसी मुस्कान और उसी लाल, सूजे हुए चेहरे के साथ। हाँ..।
राम सिंह बिस्तर पर लेट गया। उसने गौरी के सिर को फिर से अपने लौड़े के ऊपर खींचा और गौरी की माँ से कहा, “इसके हाथ पीछे से पकड़ लो, ताकि मैं लगातार इसका सिर चोद सकूँ।”
गौरी की माँ ने चिंतित होकर कहा, “धीरे से करना, यह इसकी पहली बार है…”
लेकिन गौरी ने उसे काट दिया, अपनी घुटी हुई, कर्कश आवाज़ में। “नहीं माँ… मैं कर सकती हूँ।”
“ये हे मेरी बहादुर बेटी!” राम सिंह ने गर्व से कहा।
तीनों ने फिर से अपनी स्थिति बनाई। गौरी घुटनों के बल बैठी, राम सिंह बिस्तर पर लेटा, और गौरी की माँ ने गौरी के हाथ उसकी पीठ के पीछे पकड़ लिए।
इस बार, राम सिंह ने कोई दया नहीं दिखाई। उसने गौरी के बालों को अपनी मुट्ठी में कसकर पकड़ लिया, और गौरी की माँ ने उसके हाथों को मजबूती से पीछे पकड़ रखा था।
फिर, एक ही तेज झटके में, राम सिंह ने अपना पूरा लौड़ा गौरी के गले में धकेल दिया, और पिस्टन की गति से चोदना शुरू कर दिया।
गक! गक! गक! गक!
आवाज़ें तेज और नियमित हो गईं, कमरे में गूंजने लगीं। गौरी का सिर आगे-पीछे हिल रहा था, उसके गले से घुटन और गड़गड़ाहट की आवाज़ें निकल रही थीं।
उसकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे, लार उसकी ठुड्डी और छाती पर टपक रही थी। लेकिन वह संघर्ष नहीं कर रही थी। वह सह रही थी।
लगभग पाँच मिनट तक यह चलता रहा। राम सिंह की सांसें तेज हो गईं, उसकी चुदाई की गति अनियमित होने लगी। “में झड़ने वाला हूँ बेटा… गले में ही निगल लेना!” उसने गुर्राते हुए कहा।
और फिर उसने तेज़ पिचकारी मारी। एक गहरे, कंपकंपी देने वाले झटके के साथ, उसने गौरी के गले की गहराई में अपना गाढ़ा, गर्म वीर्य फेंक दिया।
गौरी के शरीर में एक झटका लहर दौड़ गई, लेकिन उसने निगल लिया। एक बार, दो बार, तीन बार—वह राम सिंह के वीर्य के हर झटके को अपने गले के नीचे उतारती गई।
अंत में, राम सिंह ने आराम किया, अपना लौड़ा बाहर निकाला, और गौरी को छोड़ दिया।
गौरी पीछे की ओर गिर गई, हांफते हुए, खाँसते हुए। हक-हक-हक! उसका सिर लाल और सूजा हुआ था, उसकी आँखें लाल थीं और उनमें आँसू भरे हुए थे। लार और वीर्य की एक पतली धार उसके होठों से बह रही थी।
“वाह! क्या चुदाई थी!” राम सिंह ने संतुष्टि से कहा, अपने लौड़े को साफ करते हुए।
“अब तू हमेशा सुमेर को खुश रख सकती है, बेटा,” गौरी की माँ ने कहा, अपनी बेटी के पसीने से तर माथे पर हाथ फेरते हुए।
गौरी ने, खाँसते हुए और उसी सूजे हुए चेहरे और लाल आँखों के साथ, मुस्कुराकर हाँ में सिर हिलाया।