मुंबई सेंट्रल स्टेशन पर शाम के छह बज रहे थे। भीड़ का तांता लगा हुआ था—हर तरफ़ लोग, हर तरफ़ शोर।
अजय अपने मोबाइल की स्क्रीन पर नज़रें गड़ाए खड़ा था, उसकी उंगलियाँ एड्रेस टाइप करते-करते काँप रही थीं।
अमरावती के सुकून भरे माहौल से आया यह लड़का मुंबई की इस हलचल में खुद को खोया हुआ महसूस कर रहा था।
उसने गहरी साँस ली और अपने बड़े भाई निखिल का नंबर डायल किया।
फोन घंटी बजी। एक बार। दो बार। तीन बार। फिर एक खुरदरी, थकी हुई आवाज़ आई—”हाँ अजय, बोल। कहाँ है तू?”
“भैया, मैं स्टेशन पर हूँ। आपने जो एड्रेस भेजा था, वो मिल गया है, लेकिन यहाँ से कैसे आऊँ? थोड़ा कन्फ्यूज़ हूँ।”
लाइन के दूसरी तरफ़ से एक तेज़, कर्कश आवाज़ आई—”तुम्हें क्या चाहिए मुझसे? मैं काम कर रही हूँ! तुम हमेशा मुझे नीचा दिखाने की कोशिश करते हो!” यह दिव्या की आवाज़ थी, गुस्से और दर्द से भरी।
निखिल ने फोन पर ही जवाब दिया, “अरे रुको, मैं बात कर रहा हूँ। तुम हमेशा ड्रामा क्यों करती हो?” फिर अजय से बोला, “हाँ, तू वहीं रह। मैं तुझे लोकेशन भेजता हूँ। ऑटो पकड़ के आ जा।”
अजय ने भौंहें सिकोड़ीं। पृष्ठभूमि में दिव्या की आवाज़ अब और तेज़ हो गई थी—”ड्रामा? मैं ड्रामा कर रही हूँ? तुम्हें कभी फुर्सत नहीं है! बस ऑफिस, ऑफिस! मैं तुम्हारे लिए क्या हूँ—एक नौकरानी?” फिर एक दरवाज़े के ज़ोर से बंद होने की आवाज़ आई।
अजय का दिल धड़क गया। उसने फोन रखा और एक ऑटो पकड़ा। उसके मन में हज़ार सवाल थे—भैया और भाभी में क्या हो रहा है? वो इतना गुस्सा क्यों हैं?
विरार के एक छोटे से इलाके में निखिल का फ्लैट था। तीसरी मंज़िल पर, एक साधारण सी बिल्डिंग में। अजय ने घंटी बजाई और कुछ पल इंतज़ार किया। अंदर से आवाज़ें आ रही थीं—धीमी, दबी हुई, जैसे कोई रो रहा हो।
दरवाज़ा खुला।
दिव्या सामने खड़ी थी। उसने हल्का गुलाबी, चमकीला सिल्क का गाउन पहना हुआ था जो उसके शरीर से इस तरह चिपका हुआ था जैसे उसकी दूसरी त्वचा हो।
गाउन का ऊपरी हिस्सा इतना पतला था कि उसके स्तनों की बनावट साफ़ दिख रही थी, और उनके ऊपर के निप्पल—दो छोटे, उभरे हुए कली—कपड़े के ऊपर से ही सख्त होकर खड़े थे।
उसकी लंबी, काले बाल कंधों पर बिखरे हुए थे, और आँखें लाल थीं—जैसे अभी-अभी आँसू बहाए हों। उसके चेहरे पर एक गहरी उदासी थी, लेकिन उसने मुस्कुराने की कोशिश की।
“आ जाओ अजय,” उसने हल्की, थकी हुई आवाज़ में कहा। “बहुत दिनों बाद आए हो। अंदर आओ।”
अजय ने नज़रें झुकाईं और अंदर कदम रखा। उसने देखा कि निखिल सोफे पर बैठा लैपटॉप पर काम कर रहा था, उसका चेहरा तनाव से लाल था। उसकी आँखों में गुस्सा और थकान दोनों थे।
“अरे आ गया तू?” निखिल ने बिना सिर उठाए कहा। “ठीक है, मैं ऑफिस जा रहा हूँ। तू अपना सामान रख ले। दिव्या, खाना रख देना। मैं शाम तक आऊँगा।”
उसने जैकेट उठाई और बाहर निकलते हुए दिव्या की तरफ़ देखा—एक तिरस्कार भरी नज़र। “और हाँ, आज मुझे परेशान मत करना। मीटिंग है।”
दिव्या ने कोई जवाब नहीं दिया। बस उसकी आँखों में आँसू आ गए। निखिल ने दरवाज़ा ज़ोर से बंद किया और चला गया।
अजय ने गहरी साँस ली। उसने अपना बैग एक कोने में रखा और दिव्या की तरफ़ देखा। वह वहीं खड़ी थी, उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
अजय ने फ्रेश होकर वापस आया। दिव्या ने उसके लिए खाना लगा दिया था—गरम रोटियाँ, मसालेदार सब्ज़ी, और दाल। उसने अजय को बैठने का इशारा किया और खुद उसके सामने बैठ गई।
अजय ने खाना खाते हुए उसे देखा। वह चुप थी, उसकी नज़रें नीचे थीं। उसके हाथ काँप रहे थे।
“भाभी,” अजय ने धीरे से कहा, “मैंने फोन पर सुना… तुम दोनों में क्या हो रहा है? सब ठीक तो है?”
दिव्या ने सिर हिलाया। “कुछ नहीं, अजय। तुम खाना खाओ। ये सब मत पूछो।”
“नहीं भाभी,” अजय ने ज़ोर देकर कहा, “मैं तुम्हें जानता हूँ। तुम उदास हो। और भैया… वो तो हमेशा से ऐसे थे, लेकिन आज कुछ और है। मैंने तुम्हें चिल्लाते सुना। बताओ, क्या हुआ है?”
दिव्या की आँखों से आँसू बहने लगे। वह रोती रही, और अजय चुपचाप उसके सामने बैठा रहा। फिर उसने उठकर उसके पास आकर उसका हाथ पकड़ा।
“बताओ, भाभी। मुझसे कुछ छिपाने की ज़रूरत नहीं। तुम मुझ पर भरोसा कर सकती हो।”
दिव्या ने गहरी साँस ली और रुँधे गले से बोली, “अजय, तुम्हारा भाई… निखिल… वो बदल गया है। पहले वो इतना प्यार करता था। हम अमरावती में साथ रहते थे, तो सब ठीक था।
लेकिन जब से मुंबई आए हैं, वो सिर्फ़ ऑफिस, ऑफिस। मैं उसके लिए एक फ़र्नीचर हूँ।”
उसने आगे कहा, “हमारी शादी को तीन साल हो गए। पहले साल तो ठीक था। लेकिन अब… वो घर आता है तो सिर्फ़ सोने के लिए।
मैं उससे बात करना चाहती हूँ, लेकिन वो कहता है ‘थका हूँ’। मैं उसके लिए खाना बनाती हूँ, वो नहीं खाता। मैं उसके साथ समय बिताना चाहती हूँ, वो कहता है ‘काम है’।”
अजय चुप रहा। उसकी उंगलियाँ दिव्या के हाथों को सहला रही थीं।
“और…” दिव्या हिचकिचाई, उसकी आवाज़ और धीमी हो गई, “हमारा… शारीरिक रिश्ता… वो भी लगभग खत्म हो गया है।
पिछले छह महीने में सिर्फ़ दो बार… और वो भी बिना किसी प्यार के जैसे किसी ने जबरदस्ती करने को कहा हो, जैसे बस एक काम… और फिर वो पलट कर सो जाता है। मैं उसे छूना चाहती हूँ, तो वो मुझे दूर धकेल देता है। मैं उसके करीब आना चाहती हूँ, तो वो कहता है ‘जगह दो’।”
अजय की आँखें चौड़ी हो गईं। “क्या?… ये सच है? भैया ऐसा बर्ताव करते हैं?”
दिव्या ने सिर हिलाया। “मैं अकेली हूँ, अजय। बहुत अकेली।”
अजय ने उसका हाथ छोड़ा और खड़ा हो गया। “मैं भैया से बात करूँगा। ये सब ठीक नहीं है, आप परेशान मत हो।”
“नहीं!” दिव्या ने उसकी बाँह पकड़ ली, उसकी आँखों में डर था। “प्लीज़ अजय, नहीं। अगर तुमने उसे बताया, तो वो और गुस्सा हो जाएगा। वो मुझ पर चिल्लाएगा, मुझे और नीचा दिखाएगा।
मैं बर्दाश्त नहीं कर सकती। प्लीज़, मेरी बात मान लो। यहाँ सब कुछ खराब हो जाएगा।”
उसकी आँखों में एक ऐसी मिन्नत थी कि अजय रुक गया। वह वापस बैठ गया, उसका चेहरा उदास था।
दिव्या अब पूरी तरह से रो रही थी। उसके आँसू बह रहे थे, उसका शरीर काँप रहा था। उसने अजय को जकड़ लिया—एक गहरा, लाचार आलिंगन।
उसके स्तन अजय की छाती से दब रहे थे, और उसके निप्पल उसकी मांसपेशियों से रगड़ खा रहे थे। उसकी गर्म साँसें अजय की गर्दन पर पड़ रही थीं।
अजय ने पहले तो उसे छोड़ने की कोशिश की। उसने उसके कंधों को पकड़ा और धीरे से पीछे हटाना चाहा। “भाभी… ।”
लेकिन दिव्या ने और ज़ोर से पकड़ लिया। उसकी बाँहें अजय की कमर के चारों ओर जकड़ गईं, और उसने अपना चेहरा उसकी छाती पर रख दिया।
“बस… कुछ पल और,” उसने फुसफुसाया, उसकी आवाज़ में एक गहरी, दबी हुई भूख थी। “बहुत दिनों बाद किसी ने मेरी बात सुनी है। मैं अच्छा महसूस कर रही हूँ। किसी ने मुझे गले लगाया है। किसी ने मुझे महसूस किया है। बस… कुछ पल और रहने दो।”
अजय का शरीर तन गया। उसकी पैंट में एक हलचल हुई—एक अनैच्छिक प्रतिक्रिया। उसकी साँसें तेज़ हो गईं, और उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। वह इस भावना से लड़ना चाहता था, लेकिन उसका शरीर उसकी बात नहीं मान रहा था।
दिव्या ने महसूस किया। वह पीछे हटी और नीचे देखा। उसके होठों पर एक शरारती, गीली मुस्कान आ गई। उसकी आँखों में एक चमक थी—एक ऐसी चमक जो महीनों की भूख को दर्शाती थी।
“अजय… तुम…”
“माफ़ करना भाभी,” अजय ने शर्मिंदा होकर कहा, उसका चेहरा लाल हो गया था। “मैं… ये… मैं नहीं चाहता था। ये… ये गलत है।”
लेकिन दिव्या ने उसका हाथ पकड़ा और अपनी पीठ पर रख दिया। उसकी आँखों में कोई शर्म नहीं थी, सिर्फ़ एक गहरी, जंगली भूख थी।
“डरो मत,” उसने धीरे से कहा, उसकी आवाज़ में एक गहरी, दबी हुई कामुकता थी। “मैं जानती हूँ तुम क्या महसूस कर रहे हो। और मैं भी वही महसूस कर रही हूँ। बहुत दिनों से… बहुत दिनों से किसी ने मुझे छुआ नहीं है। किसी ने मुझे देखा नहीं है।”
उसने अजय का हाथ अपनी पीठ पर दबाया, उसकी उंगलियों को अपनी रीढ़ की हड्डी के साथ नीचे सरकाते हुए। उसका शरीर गर्म था, और उसके गाउन के पतले कपड़े के नीचे उसकी त्वचा जल रही थी।
अजय की साँसें तेज़ हो गईं। वह जानता था कि ये गलत है। ये उसकी भाभी थी, उसके भाई की पत्नी। लेकिन उसका शरीर उसकी बात नहीं मान रहा था। उसकी पैंट में उसका लंड सख्त हो चुका था, और वह उसे छिपा नहीं सकता था।
दिव्या ने उसकी आँखों में देखा—उसकी आँखों में एक गहरी, जंगली चमक थी। फिर उसने धीरे से अपने होंठों को अजय के होंठों पर रख दिया।
पहला चुंबन हल्का था—एक कोमल, पूछताछ भरा स्पर्श। लेकिन फिर दिव्या ने और जोर से दबाया, उसकी जीभ ने अजय के होंठों को चीरते हुए अंदर घुसने की कोशिश की।
अजय ने पहले तो विरोध किया, लेकिन फिर उसने भी आत्मसमर्पण कर दिया। उसकी बाँहें दिव्या के चारों ओर जकड़ गईं, और उसने उसे और करीब खींच लिया।
उनके होंठ एक-दूसरे से चिपक गए। उनकी जीभें एक-दूसरे से लड़ रही थीं—जैसे एक जंगली, बेलगाम चुंबन। दिव्या के हाथ अजय के बालों में उलझ गए, और उसने उसे और जोर से दबाया।
अजय के हाथ उसकी पीठ पर सरकने लगे—पहले ऊपर, फिर नीचे। उसकी उंगलियाँ उसकी रीढ़ की हड्डी के साथ-साथ चल रही थीं, और हर स्पर्श के साथ दिव्या का शरीर काँप रहा था।
फिर अजय का हाथ उसके कूल्हों तक पहुँचा। उसने झिझकते हुए उसके नितंबों को छुआ—पहले हल्के से, फिर जोर से दबाया। दिव्या के मुँह से एक हल्की कराह निकली—”आह्ह..स्स।”
अजय ने उसके नितंबों को दोनों हाथों से पकड़ा और जोर से दबाया। उसकी उंगलियाँ उसके मांस में धँस गईं, और दिव्या ने अपना सिर पीछे झुका लिया, उसकी गर्दन को खुला छोड़ दिया। अजय ने मौका नहीं गँवाया।
उसने अपने होंठों को उसकी गर्दन पर रख दिया—पहले हल्के से चूमा, फिर जोर से दबाया, फिर अपनी जीभ से उसकी त्वचा को सहलाया।
दिव्या कराह रही थी—”आह्ह..स्सस्सस्स…ओह्ह..अजय..।”
अजय ने उसकी गर्दन को चूमते हुए अपना हाथ उसके गाउन के ऊपरी हिस्से पर रखा। उसने धीरे से कपड़े को नीचे खींचा, और दिव्या के स्तन बाहर निकल आए—बड़े, गोल, और उनके ऊपर दो गहरे भूरे निप्पल, पहले से ही सख्त और उभरे हुए। अजय ने अपना मुँह उन पर रख दिया।
उसने पहले एक निप्पल को अपने होंठों में लिया और धीरे से चूसा। दिव्या चीख पड़ी—”ओह्ह..हाँ..बस ऐसे ही..” उसके नाखून अजय की पीठ पर गड़ गए, और उसने उसका सिर और जोर से दबाया।
अजय ने उसके स्तन को चूसा—पहले धीरे, फिर तेज़। उसकी जीभ निप्पल के चारों ओर घूम रही थी, और उसके दाँत हल्के से उसे दबा रहे थे। दिव्या का शरीर झटके से हिल रहा था, और उसकी कराहें पूरे कमरे में गूँज रही थीं।
“इसे भी लो..,” उसने फुसफुसाया।
अजय ने दूसरे स्तन को भी वही सुख दिया। उसने उसे अपने मुँह में लिया और चूसा, जबकि उसका हाथ पहले स्तन को मसल रहा था। दिव्या पागल हो रही थी—उसकी साँसें तेज़ थीं, उसका शरीर जल रहा था, और उसकी चूत गीली हो चुकी थी।
अजय ने उसे धीरे से सोफे पर धकेल दिया। दिव्या पीठ के बल गिरी, उसके बाल सोफे के कुशन पर बिखर गए। उसकी आँखों में एक जंगली चमक थी—एक ऐसी भूख जो महीनों से दबी हुई थी।
उसके स्तन खुले हुए थे, उसके निप्पल सख्त और लाल थे, और उसका गाउन उसकी कमर के चारों ओर इकट्ठा हो गया था।
अजय ने उसके पैरों को पकड़ा और चौड़ा किया। उसकी पैंटी—एक पतली, सफ़ेद, लेस वाली—पहले से ही गीली थी। उसके बीच का हिस्सा भीगा हुआ था, और उसकी चूत के होंठ कपड़े के ऊपर से ही दिख रहे थे।
अजय ने उसकी पैंटी को पकड़ा और धीरे से नीचे खींचा। दिव्या ने अपने कूल्हों को ऊपर उठाया, और पैंटी उसके पैरों से निकल गई। वह पूरी तरह से नंगी थी—उसकी चूत साफ़ और चिकनी थी, उसके होंठ गुलाबी और चमकीले थे, और उनके बीच से नमी टपक रही थी।
अजय ने अपना सिर उसके पैरों के बीच झुकाया। उसने पहले अपनी जीभ से उसकी जाँघों के अंदरूनी हिस्से को चाटा—धीरे-धीरे, गोल-गोल। दिव्या का शरीर काँप रहा था, और उसकी साँसें तेज़ हो गई थीं।
फिर उसने अपनी जीभ को उसकी चूत के होंठों पर रखा। पहले हल्के से, फिर जोर से। उसने उसकी दरार को चाटा—ऊपर से नीचे, नीचे से ऊपर। दिव्या कराह उठी—”आह्ह..अजय..स्सस्स..मम्ममम्म…!”
अजय ने अपनी जीभ को उसकी चूत के अंदर डाल दिया। उसकी जीभ उसकी गीली, गर्म दीवारों को सहला रही थी, और दिव्या पागल हो रही थी। उसने अजय का सिर पकड़ा और उसे और गहरा धकेल दिया।
“थोडा और अन्दर..आह्ह..,” वह चिल्लाई।
अजय ने अपनी जीभ को और अंदर डाला और तेज़ी से हिलाने लगा। उसकी जीभ उसकी चूत के अंदर अंदर-बाहर जा रही थी, और दिव्या की कराहें अब चीखों में बदल रही थीं।
“अह्ह्ह! हाँ..हां..बस ऐसे ही..आहह..! मैं… मैं छुटने वाली हूँ!”
अजय ने अपनी जीभ को उसकी क्लिटोरिस पर घुमाया—गोल-गोल, पहले धीरे, फिर तेज़। उसकी जीभ की नोक उस छोटी, सख्त मणि को सहला रही थी, और दिव्या का शरीर झटके से हिल रहा था।
“आह्ह्ह! हाँ..बस वही पर ..हाँ..स्स..स्स्स..हाय..मम्म..!” वह चीखी।
अजय ने उसकी चूत के होंठों को अपने होठों से दबाया और एक लंबी, गहरी साँस ली, जैसे वह उसकी खुशबू और स्वाद को पी रहा हो। फिर उसने अपनी जीभ को उसके अंदर डाला—पूरी तरह से—और ऊपर-नीचे हिलाने लगा।
दिव्या की आँखें घूम गईं। उसके पैर अजय के कंधों पर जकड़ गए, और उसने उसे और करीब खींच लिया। “मैं… मैं छुट रही हूँ… अजय… आआ..आ.आहह हह…!”
उसका शरीर एक लंबे, गहरे झटके में काँपा। उसकी चूत की दीवारें सिकुड़ गईं, और एक गर्म तरल अजय के मुँह में बह गया। उसने उसे पी लिया—हर एक बूँद—जैसे कोई प्यासा पानी पीता है।
दिव्या सोफे पर ढह गई, उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं। उसकी आँखें आधी बंद थीं, और उसके चेहरे पर एक संतुष्ट, नशीली मुस्कान थी।
अजय खड़ा हो गया। उसकी पैंट में उसका लंड इतना सख्त हो चुका था कि दर्द हो रहा था। उसने अपनी बेल्ट खोली और पैंट को नीचे सरका दिया। उसका लंड बाहर निकला—एक लंबा, मोटा, नौ इंच का कड़क डंडा, जिसकी नसें उभरी हुई थीं और सिरा लाल और चमकीला था। वह सख्त और तैयार था।
दिव्या ने उसे देखा तो उसकी आँखें चौड़ी हो गईं। वह धीरे से उठी और घुटनों के बल सोफे पर आ गई। उसने अपना हाथ बढ़ाया और उसके लंड को छुआ—पहले डरते-डरते, फिर जोर से पकड़ लिया। उसकी उंगलियाँ उसकी लंबाई और मोटाई को महसूस कर रही थीं।
“इतना बड़ा…” उसने फुसफुसाया, उसकी आवाज़ में विस्मय और भूख दोनों थी। “इतना लंबा… इतना मोटा… मैंने कभी इतना बड़ा नहीं देखा।”
उसने अपना मुँह खोला और उसके लौड़े के सिरे को अपने होठों में ले लिया। पहले धीरे-धीरे, चूसते हुए, जैसे कोई मीठा फल चूसता है। उसकी जीभ उसके सिरे को सहला रही थी, और उसके होंठ उसे दबा रहे थे।
फिर उसने और थोडा और अंदर तक लिया—उसका पूरा सिरा उसके मुँह में समा गया, और उसकी जीभ उसकी नसों को सहला रही थी। अजय ने कराहते हुए उसके बालों को पकड़ा।
“हाँ… भाभी… ऐसे ही… और अंदर लो।”
दिव्या ने तेजी बढ़ा दी। उसने अपना सिर ऊपर-नीचे हिलाना शुरू किया, उसके लंड को अपने मुँह में अंदर-बाहर करते हुए। उसकी लार उसके लौड़े पर बह रही थी, जिससे वह चिकना और चमकीला हो गया था। वह एक प्यासी कुतिया की तरह उसे चूस रही थी—बेताब, भूखी, बेलगाम।
अजय ने उसके सिर को और नीचे दबाया—धीरे-धीरे, लेकिन मजबूती से। उसका लिंग उसके गले में और गहरा घुसता जा रहा था। दिव्या की आँखों से पानी निकल आया, लेकिन उसने विरोध नहीं किया। उसने अपने गले की मांसपेशियों को ढीला छोड़ दिया और उसे और अंदर ले लिया।
अजय ने उसके मुँह में धीरे-धीरे हिलना शुरू किया—पहले धीमी गति से, फिर तेज़। उसका लिंग उसके गले के अंदर जा रहा था और बाहर आ रहा था, और दिव्या हर बार उसे और अन्दर तक ले रही थी।
पाँच मिनट तक यह सिलसिला चला। दिव्या का मुँह भरा हुआ था, उसकी लार टपक रही थी, और उसकी आँखों में एक पागलपन भरी चमक थी।
उसकी जीभ उसके लिंग के हर इंच को सहला रही थी, और उसके होंठ उसे इतनी मजबूती से दबा रहे थे जैसे वह कभी छोड़ना नहीं चाहती।
“हाँ… भाभी… ऐसे ही,” अजय ने कराहते हुए कहा। “तुम बहुत अच्छी हो… बहुत अच्छी।”
दिव्या ने और तेज़ी बढाई। उसका सिर ऊपर-नीचे हो रहा था, उसकी जीभ उसके लिंग के चारों ओर घूम रही थी, और उसके होंठ उसे चूस रहे थे। वह एक मशीन की तरह काम कर रही थी—बेरहम, बेलगाम, बेताब।
छह मिनट बाद, अजय ने उसका सिर पीछे खींचा। उसका लिंग उसके मुँह से बाहर निकला, चिकना और चमकीला, उसकी लार से भीगा हुआ। दिव्या ने गहरी साँस ली, उसकी आँखों में अभी भी वही जंगली चमक थी।
अजय ने उसे सोफे पर उठा लिया। उसने उसके पैरों को पकड़ा और चौड़ा किया, और अपने लिंग को उसकी चूत के सामने ला दिया। वह अभी भी गीली थी—उसके ऑर्गेज़म का तरल उसकी जाँघों पर बह रहा था, और उसकी चूत के होंठ चमकीले और खुले हुए थे।
उसने एक ही धक्के में अपना पूरा नौ इंच का लिंग उसके अंदर धकेल दिया।
दिव्या चीख पड़ी—”अह्ह्ह्ह्ह्ह!” उसकी चीख़ में दर्द और सुख दोनों थे। उसके नाखून अजय की पीठ पर गड़ गए, और उसने उसे और करीब खींच लिया। “मर गई!..हाय..इतने अन्दर तक!… मैं… मैं इसे महसूस कर सकती हूँ… मेरे पेट में!”
अजय ने हिलना शुरू किया—एक मशीन के जैसे तेज़, जंगली, बेरहम। उसका लिंग उसकी चूत में अंदर-बाहर जा रहा था, और हर बार वह उसकी गहराइयों को छू रहा था। दिव्या का शरीर हर धक्के के साथ हिल रहा था, उसके स्तन ऊपर-नीचे उछल रहे थे, और उसकी चीखें पूरे कमरे में गूँज रही थीं।
“हाँ! हाँ! और जोर से! मुझे चोदो! मुझे चोदो!” वह चिल्लाई।
अजय ने और तेज़ी बढाई। उसकी गति अब एक पागल जानवर की तरह थी। सोफे की स्प्रिंग्स चरमरा रही थीं, और दिव्या की चीखें अब शब्दों में बदल रही थीं—”अजय! अजय! मैं… मैं फिर से…!”
अजय ने झुककर उसके स्तनों को चूसना शुरू किया। उसने एक निप्पल को अपने दाँतों से दबाया और खींचा, जबकि उसका हाथ दूसरे स्तन को मसल रहा था। उसकी जीभ निप्पल के चारों ओर घूम रही थी, और उसके दाँत हल्के से उसे दबा रहे थे।
दिव्या पागल हो रही थी। उसने अजय के बालों को पकड़ा और उसका चेहरा अपने स्तनों पर और जोर से दबाया। “हाँ… चूसो… मेरे स्तनों को चूसो… मुझे और दो!”
अजय ने उसके स्तनों को चूसते हुए अपनी गति और तेज़ कर दी। उसका लिंग उसकी चूत में जा रहा था और आ रहा था, और हर बार वह उसकी गहराइयों को छू रहा था।
दिव्या का दूसरा ऑर्गेज़म उसे तोड़ गया—उसका शरीर काँपा, उसकी चूत की दीवारें अजय के लिंग के चारों ओर सिकुड़ गईं, और वह चीखती रही—अजय के होठों के नीचे।
लेकिन अजय नहीं रुका। वह उसे चोदता रहा। उसने दिव्या के होठों को अपने होठों से दबाया और उसे जोर से चूमा। उसकी जीभ उसके मुँह में घुस गई, और दिव्या ने उसे चूसा। उनकी जीभें एक-दूसरे से लड़ रही थीं, और उनकी साँसें एक हो गई थीं।
दस मिनट तक यह सिलसिला चला। अजय ने उसे हर पोज़ीशन में चोदा—पहले सोफे पर, फिर उसे उठाकर दीवार के सहारे, फिर वापस सोफे पर। दिव्या का शरीर उसके हाथों में एक गुड़िया की तरह था, और वह उसे जैसे चाहे वैसे झुका रहा था।
आखिरकार, अजय ने अपना लिंग बाहर निकाला। वह अभी भी सख्त था, और उसके सिरे से वीर्य की एक बूँद टपक रही थी। उसने दिव्या का मुँह खोला और अपना लिंग उसके अंदर डाल दिया।
“चूसो,” उसने हुक्म दिया, उसकी आवाज़ में एक गहरी, जंगली गुर्राहट थी।
दिव्या ने बिना किसी हिचकिचाहट के उसे चूसना शुरू किया। उसकी जीभ उसके लिंग के सिरे को सहला रही थी, और उसके हाथ उसके अंडकोषों को मसल रहे थे। उसने अपना सिर ऊपर-नीचे किया, तेज़ी से, बेताबी से।
अजय ने कराहते हुए उसके मुँह में वीर्य छोड़ दिया—गर्म, गाढ़ा, धार-धार करके। दिव्या ने उसे पी लिया—हर एक बूँद—और फिर अपनी जीभ से उसके लिंग को साफ कर दिया। उसने उसे तब तक चूसा जब तक वह पूरी तरह से साफ नहीं हो गया।
जबरदस्त चुदाई के बाद , वे दोनों सोफे पर नग्न बैठे थे। दिव्या का सिर अजय के कंधे पर था, और उसके हाथ उसकी छाती को सहला रहे थे। कमरे में सिर्फ़ उनकी साँसों की आवाज़ थी—धीमी, शांत, और संतुष्ट।
दिव्या ने गहरी साँस ली और धीरे से बोली, उसकी आवाज़ में एक गहरी शांति थी, “अजय… ये जो हुआ… ये हमारे बीच का रहस्य है। किसी को नहीं पता चलना चाहिए। निखिल को… किसी को नहीं।”
अजय ने उसकी ठुड्डी पकड़ी और उसकी आँखों में देखा। उसकी आँखों में एक गहरी समझ थी—एक ऐसा वादा जो कभी नहीं टूटेगा। “मैं समझ गया, भाभी। किसी को नहीं पता चलेगा। ये हमारा राज़ है। हमेशा के लिए।”
दिव्या ने सिर हिलाया और उसके होठों पर एक हल्की मुस्कान आ गई। “अच्छा। क्योंकि अगर निखिल को पता चला… तो हम दोनों बर्बाद हो जाएँगे। यहाँ सब कुछ खत्म हो जाएगा।”
अजय ने उसे और करीब खींच लिया, उसकी बाँहें उसके चारों ओर जकड़ गईं। “चिंता मत करो। ये हमारा राज़ है। हमेशा के लिए। मैं किसी को नहीं बताऊँगा।”
दिव्या ने अपना सिर उसकी छाती पर रख दिया और आँखें बंद कर लीं। उसके चेहरे पर एक गहरी, शांत संतुष्टि थी—एक ऐसी तृप्ति जो उसे महीनों बाद मिली थी। उसके होठों पर एक हल्की मुस्कान थी, और उसकी साँसें धीमी और गहरी हो गई थीं।
वे दोनों वहीं बैठे रहे—नग्न, संतुष्ट, और एक ऐसे रहस्य में बंधे हुए जो कभी किसी को नहीं बताया जाएगा।