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गरीबी का सौदा cuckold बन के किया – १

तपती हुई दोपहर थी, जब आसमान से आग बरस रही थी और ज़मीन के सीने से उठती धूल हर उम्मीद को धुंधला कर देती थी। खेतों में दरारें पड़ चुकी थीं, मानो धरती का शरीर भी इस गर्मी से फटने लगा हो। उन्हीं दरारों के बीच, बीस बीघा की अपनी पुश्तैनी ज़मीन पर, रमेश पसीने से लथपथ फावड़ा चला रहा था।

बत्तीस साल का यह किसान दुबला था, लेकिन उसका शरीर मेहनत से गढ़ा हुआ था—कमर झुकी हुई, बाजूओं की नसें तनाव से उभरी हुईं, और धूप से जली हुई त्वचा पर पसीने की मोटी धारियाँ। उसकी आँखों में एक ऐसी थकान थी जो सिर्फ गरीबी ही दे सकती है, वो थकान जो नींद से नहीं, बल्कि हार से आती है।

रमेश सीधा-साधा, ईमानदार और मेहनती था। उसकी पूरी दुनिया सिर्फ उसके ये खेत और उसकी पत्नी, मीरा, तक सीमित थी। और आज, उसी दुनिया के टूटने का डर उसे अंदर ही अंदर खाए जा रहा था।

तभी खेत की मेड़ पर एक परछाई उभरी। रमेश ने मुड़कर देखा। मीरा सिर पर पल्लू रखे, उसके लिए रोटियाँ और छाछ लेकर आ रही थी। अट्ठाईस साल की मीरा की खूबसूरती ऐसी थी कि इस दरिद्रता और फटे-पुराने कपड़ों के बावजूद छुपती नहीं थी। एक साधारण सी फीकी सूती साड़ी में भी उसके शरीर का आकर्षण ऐसा था कि देखने वाले की नज़रें ठहर जाएं।

वह गाँव की सबसे खूबसूरत औरत थी, और यह बात हर कोई जानता था। उसका साँवला लेकिन बेदाग निखरता हुआ रंग, ऐसा लगता था जैसे किसी ने बादाम को घिसकर चेहरे पर लगा दिया हो। बड़ी-बड़ी काली आँखें, जिनमें एक अजीब सी मासूमियत और गहराई थी, और माथे पर सजी लाल बिंदी उस चेहरे पर एक तिलिस्म सा जादू भर देती थी।

साड़ी उसके गठीले और भरे हुए बदन पर ऐसी लिपटी रहती थी कि उसकी छातियों के भारी दूध के भरे हुए निप्पलों का आकार झलक जाता, और कमर से नीचे उसकी गोल-मटोल गांड के मटके जैसे आकार साफ़ दिखाई देते। चलते समय उसकी जांघों के बीच साड़ी का कपड़ा रगड़ खाता, और रमेश को अक्सर लगता कि उसकी पत्नी की चूत के होंठ भी उसी लय में हिल रहे होंगे।

मीरा रमेश से बहुत प्यार करती थी। वह जानती थी कि उसका पति दिन-रात एक करके सिर्फ दो वक्त की रोटी का इंतज़ाम कर पाता है, लेकिन उसने कभी शिकायत नहीं की थी। उसका प्यार उसकी मुस्कान में था, उसके हाथों के स्पर्श में। मीरा पास आकर अपने पल्लू से रमेश के माथे का पसीना पोंछा। उसकी उंगलियाँ नर्म थीं, स्पर्श में एक ऐसी कोमलता कि रमेश की पलकें झुक गईं।

“थोड़ी देर छाँव में बैठ जाओ जी, जान निकालोगे क्या अपनी?”

उसकी आवाज़ में वो मिठास और फिक्र थी, जो रमेश के दिन भर की थकान मिटा देती थी। लेकिन आज वह थकान नहीं मिटी। रमेश ने हल्का सा मुस्कुरा कर रोटियाँ ले लीं, लेकिन उसकी मुस्कान आँखों तक नहीं पहुँची।

उसके दिमाग में वो कागज़ घूम रहा था जो सुबह डाकिया उसके हाथ में थमा कर गया था। एक सफेद लिफाफा, जिस पर बैंक का नाम छपा था। उसने अभी तक मीरा को नहीं दिखाया था। नहीं दिखा पाया था।

शाम को जब वे दोनों अपनी कच्ची ईंटों और टिन की छत वाले छोटे से घर में लौटे, तो रमेश एक कोने में ज़मीन पर बैठ गया, जैसे उसकी टूटी हुई रीढ़ की हड्डी ने आखिरकार काम करना बंद कर दिया हो। लालटेन की पीली रोशनी में उसके हाथ फिर से उस लिफाफे की तरफ बढ़े। उसने कागज़ निकाला।

उसके हाथ काँप रहे थे। “दो लाख रुपये”। बैंक ने साफ लिख दिया था कि अगर एक हफ्ते के भीतर कर्ज़ नहीं चुकाया गया, तो यह पुश्तैनी घर और बची-खुची ज़मीन नीलाम कर दी जाएगी। दो लाख रुपये। यह आंकड़ा उसकी आँखों के सामने नाचता रहा।

इस गरीब किसान के लिए यह आसमान से तारे तोड़ लाने जैसा था। रमेश को लगा जैसे किसी ने उसका गला घोंट दिया हो, साँस अटक गई हो। एक मर्द होने का गुरूर, अपनी पत्नी को एक सुरक्षित छत देने का एहसास—सब कुछ पल भर में मिट्टी में मिल गया था। उसकी मर्दानगी और उसकी लाचारी उसे अंदर ही अंदर दीमक की तरह खा रही थी, और वह बस देखता रह गया।

इस गाँव में एक ही इंसान था जो रमेश की इस मुसीबत को चुटकियों में सुलझा सकता था, लेकिन वह इंसान रमेश के लिए यमराज से कम नहीं था—विक्रम।

विक्रम गाँव के ज़मींदार का पच्चीस साल का इकलौता बेटा था। शहर से पढ़ा-लिखा, डिग्री लेकर लौटा था, लेकिन गाँव में वह अपनी दबंगई और अय्याशी के लिए ही मशहूर था। वह जवान था, और उसका शरीर जिम में कसरत करके किसी सांड की तरह गठीला और चौड़ा हो चुका था।

उसकी छाती चौड़ी, बाजूओं पर उभरी हुई नसें, और एक ऐसी मुस्कान जो हमेशा उसके होठों पर खेलती रहती—जो दरअसल मुस्कान नहीं, बल्कि एक अहंकार भरी छिछोरी मज़ाक थी। उसके पास अंधा पैसा था, महंगी गाड़ियाँ थीं, और एक ऐसा अक्खड़पन था जो किसी को भी अपने जूते की नोंक पर रखता था। रमेश की विक्रम से कोई दुश्मनी नहीं थी, लेकिन एक ऐसी खामोश घुटन थी जिसे वो हर दिन महसूस करता था। वह घुटन थी विक्रम की नज़रों की।

जब भी मीरा गाँव के कुएँ पर पानी भरने जाती या बाज़ार से सामान लेकर गुज़रती, विक्रम की हवस भरी नज़रें हमेशा उसके शरीर का मुआयना करती थीं। वो सरेआम, अपनी बुलेट पर टँगा रहकर, मीरा के जिस्म को ऐसे घूरता था जैसे वह कोई बिकाऊ चीज़ हो, एक मांस का लोथड़ा जिसे खरीदा जा सकता है।

रमेश ने कई बार विक्रम को अपनी महंगी बुलेट पर बैठकर मीरा को कनखियों से देखते हुए पकड़ा था। विक्रम की आँखों में जो नंगापन और वासना थी, वो रमेश के खून को खौला देती थी। वह देखता कि विक्रम की नज़रें मीरा के भरे हुए स्तनों पर टिक जातीं, फिर नीचे सरककर उसकी गांड के उभार को निहारतीं, और एक बेहूदा, गंदी मुस्कान उसके होठों पर फैल जाती।

लेकिन अपनी हैसियत, अपने कर्ज़ और ज़मींदार के खौफ के आगे रमेश हमेशा खून का घूँट पीकर रह जाता था। वह मुड़ जाता, अपनी शर्म और बेबसी को पेट के अंदर धकेल देता। आज वही बेबसी उसे खा रही थी।

रात गहरी हो चुकी थी। मीरा चटाई पर सो रही थी, एक पतली सी चादर ओढ़े। रमेश की आँखों में नींद नहीं थी। वह अपनी सोती हुई खूबसूरत पत्नी को देखता रहा। चाँद की रोशनी खिड़की से आकर उसके चेहरे पर पड़ रही थी, उसके होठों पर, उसकी लम्बी पलकों पर।

अगर ज़मीन गई, तो वे सड़क पर आ जाएंगे। यह छत चली जाएगी। दाने-दाने को मोहताज़ हो जाएंगे। मीरा… उसकी मीरा, जिसकी खूबसूरती पर उसे नाज़ था, वो भीख माँगती हुई सड़कों पर नज़र आएगी।

या फिर… रमेश के दिमाग में एक विचार आया, एक ऐसा खौफनाक और घिनौना विचार जिसने खुद उसे भी अंदर तक कंपा दिया। उसने अपनी आँखें मूँद लीं, जैसे उस विचार को वापस धकेलना चाहता हो। लेकिन वह विचार वहीं रहा, बैठ गया, जड़ जमा ली। उसने अपनी आत्मा को मार डालने का फैसला कर लिया था। एक मर्द के तौर पर, एक पति के तौर पर जो कुछ भी बचा था, उसे मार डालने का।

अगली शाम, जब सूरज ढल चुका था और अंधेरा गाँव को निगलने लगा था, रमेश भारी कदमों से विक्रम की बड़ी हवेली के बाहर खड़ा था। हवेली का लाल रंग का ऊँचा दरवाज़ा उसे एक दानव का मुँह लग रहा था। उसका स्वाभिमान, उसकी इज़्ज़त सब उसके पैरों तले कुचले जा चुके थे। उसने साँस ली, और अंदर दाखिल हो गया।

हवेली के पीछे दालान में विक्रम आराम कुर्सी पर लेटा था। उसने सफेद रंग का महीन कुर्ता और पजामा पहना हुआ था, और उसके सामने टेबल पर महंगी विदेशी शराब की बोतल खुली थी। रमेश को दालान में खड़ा देखकर विक्रम ने अपनी सिगरेट का धुआँ हवा में छोड़ा और तिरछी नज़रों से उसे घूरा, जैसे कोई कीड़ा अचानक उसकी ज़मीन पर आ गया हो।

“अरे रमेश? आज ज़मींदार की ड्योढ़ी पर कैसे रास्ता भूल गया तू?”

विक्रम की आवाज़ में वो चुभता हुआ मज़ाक था जो गरीब की मजबूरी का मज़ाक उड़ाता है, उसे और छोटा करता है।

रमेश के पैर काँप रहे थे। उसने हिम्मत जुटाई, अपनी मुट्ठियाँ भींचीं जिससे उसके नाखून हथेलियों में घुस गए, और सिर झुका कर खड़ा हो गया।

“छोटे ठाकुर… एक बहुत बड़ी मुसीबत में हूँ। बैंक का नोटिस आया है। घर और ज़मीन छिनने वाले हैं। मुझे… मुझे दो लाख रुपये का कर्ज़ चाहिए।”

रमेश की आवाज़ लड़खड़ा रही थी, हर शब्द उसके गले से एक काँटे की तरह निकल रहा था।

विक्रम ज़ोर से हँस पड़ा, एक ठंडी, बेरहम हँसी। वह अपनी कुर्सी से उठा और रमेश के चारों तरफ ऐसे घूमने लगा जैसे कोई शिकारी अपने शिकार को तौलता है, उसकी कमज़ोरी को नापता है।

“दो लाख? और मैं तुझे क्यों दूँ? क्या गिरवी रखेगा तू मेरे पास? तेरे उस टूटे-फूटे घर और बंजर ज़मीन की तो कोई औकात ही नहीं है। तू जानता है मैं दो लाख में क्या-क्या खरीद सकता हूँ?”

रमेश ने एक लंबी साँस ली, जैसे डूबता हुआ आखिरी हवा का झोंका ले रहा हो। उसका गला सूख रहा था। उसने विक्रम की आँखों में सीधा देखा, उस दरिंदगी से भरी आँखों में, जो हमेशा मीरा को नोंचती रहती थीं।

“मेरे पास ज़मीन के अलावा भी एक चीज़ है ठाकुर… जिसे आप बहुत शिद्दत से चाहते हैं।”

विक्रम के कदम रुक गए। उसने अपनी आँखें सिकुड़ीं। एक पल के लिए उसके चेहरे पर मज़ाक का भाव गायब हो गया।

“क्या बक रहा है तू?”

“मैं अंधा नहीं हूँ छोटे ठाकुर। मैंने देखा है आप मेरी पत्नी मीरा को किस नज़र से देखते हैं। आप उसे चाहते हैं न? उसके जिस्म को? उसकी देह को?”

रमेश की आवाज़ में एक अजीब सी रुखाई आ गई थी, जैसे वह किसी और की बात कर रहा हो।

“मुझे दो लाख रुपये दे दीजिए… और उसके बदले, एक रात के लिए… मेरी पत्नी आपकी।”

वहाँ एक ऐसा सन्नाटा छा गया जिसे सिर्फ विक्रम के भारी साँसों की आवाज़ तोड़ रही थी। हवा में शराब की महक और सिगरेट के धुएँ के बीच यह प्रस्ताव एक ज़हरीली लकीर की तरह खिंच गया। विक्रम की आँखें फटी की फटी रह गईं

उसे अपने कानों पर यकीन नहीं हो रहा था कि यह सीधा-साधा, हमेशा सिर झुकाकर चलने वाला किसान, अपनी इज़्ज़त का ऐसा सौदा कर रहा है। एक पल के लिए तो उसे लगा कि रमेश ने शराब पी रखी है, या पागल हो गया है। लेकिन रमेश की आँखों में वह टूटा हुआ, निराशापूर्ण सच उसे दिखाई दे रहा था। यह कोई मज़ाक नहीं था। यह एक बेबस आदमी की आखिरी हलचल थी।

“क्या कह रहा है मादरचोद?”

विक्रम की आवाज़ में एक अजीब सी गुर्राहट थी, लेकिन उसके चेहरे पर हैरानी के साथ-साथ एक दरिंदगी भरी खुशी भी तैरने लगी थी। उसकी आँखों की चमक बढ़ गई, जैसे किसी शिकारी को अपना शिकार कमज़ोर पड़ता दिखाई दे।

“तू अपनी लुगाई बेचेगा? उस मलाई जैसी औरत को… उस मीरा को… तू मेरे बिस्तर पर भेजेगा?”

उसने ‘मीरा’ नाम को जानबूझकर धीरे-धीरे बोला, जैसे उस नाम का स्वाद ले रहा हो, उसकी कल्पना में मीरा का वह गठीला शरीर, उसकी भरी हुई छातियाँ, उसकी गोल गांड तैरने लगी।

रमेश की आँखों से आँसू छलक पड़े, गर्म और अपमान से भरे हुए आँसू। लेकिन उसने अपने आपको समेटा, अपनी बात पूरी की। उसकी आवाज़ काँप रही थी, लेकिन दृढ़ थी।

“हाँ… लेकिन मेरी दो शर्तें हैं। पहली, वो यह सब अपनी मर्ज़ी से करेगी। अगर वो मना कर दे, तो सौदा रद्द। और दूसरी…”

रमेश ने एक गहरी साँस ली, जैसे अपने आप को तैयार कर रहा हो,

“…जब वो आपके पास होगी, तो मैं वहीं रहूँगा। कमरे में। मैं अपनी आँखों के सामने सब होते देखूँगा, ताकि मुझे यकीन रहे कि उसके साथ कोई ज़बरदस्ती नहीं हो रही।”

यह सुनकर विक्रम का मुँह खुला का खुला रह गया। उसने रमेश को ऊपर से नीचे तक देखा, जैसे कोई पागल, कोई भूत देख रहा हो। उसे रमेश पर तरस नहीं, बल्कि एक अजीब सा पागलपन महसूस हुआ। एक पति खुद अपनी औरत को उसके पास लाएगा और सामने बैठकर तमाशा देखेगा?

यह विचार ही इतना विकृत, इतना गन्दा था कि विक्रम के अंदर का जानवर खुशी से झूम उठा। उसकी कल्पना में एक तस्वीर उभरने लगी—मीरा उसकी बाँहों में, रमेश एक कोने में बैठा उन्हें देख रहा है, उसकी आँखों में लाचारी के आँसू।

यह तस्वीर उसे और भी उत्तेजित कर रही थी। उसकी नज़र नीचे गई, अपनी पजामे के सामने के हिस्से पर, जहाँ उसका लंड अब खड़ा होने लगा था, उत्तेजना से सख्त और भारी।

“तुझ जैसा हरामी मैंने आज तक नहीं देखा रमेश,”

विक्रम ने अपना शराब का गिलास उठाते हुए कहा, एक लम्बा घूँट लिया। उसकी आँखें चमक रही थीं।

“तू तो सीधा साधा दिखता है, लेकिन अंदर से तू कितना गिरा हुआ है… अपनी ही बीवी को बेचने पर तुला हुआ।”

उसने मज़ाक उड़ाया, लेकिन उसकी आवाज़ में वासना की एक गर्म लहर दौड़ गई।

“ठीक है। तेरा सौदा मंज़ूर है। मेरी तरफ से कल की रात तय है। शहर के बाहर वाले मेरे फार्महाउस पर ले आना उसे। वहाँ कोई नहीं आता। अगर उसने मुझे खुश कर दिया, अगर उसकी चूत ने मेरे लंड को ठीक से चूस लिया, उसकी गांड ने मेरा मन बहलाया, तो दो लाख तेरे।

लेकिन अगर उसने वहाँ नाटक किया या रोना-धोना मचाया, अगर उसने अपने चूत के होंठ बंद कर लिए, तो मैं तुझे और तेरी उस खूबसूरत रांड को इसी गाँव में सरेआम ज़लील करूँगा। तुझे पता है मैं क्या कर सकता हूँ।”

रमेश ने कोई जवाब नहीं दिया। वह बस सिर झुकाए खड़ा रहा। उसने खुद को एक व्यापारी समझ लिया था, जिसने अपना सबसे कीमती सामान बेच दिया था। वह वहाँ से बिना कुछ बोले पलट गया, उसके कदम लड़खड़ा रहे थे।

जब वह अपने घर की तरफ लौट रहा था, तो उसे महसूस हो रहा था जैसे वह कोई इंसान नहीं, बल्कि एक चलता-फिरता मुर्दा है। उसकी आत्मा उसी दालान में छूट गई थी, विक्रम के उन गन्दे शब्दों के साथ। हवा में ठंडक थी, लेकिन उसके शरीर से पसीना बह रहा था—डर का पसीना, शर्म का पसीना।

घर पहुँचते ही रमेश का शरीर टूट गया। वह सीधा दरवाज़े के पास ज़मीन पर गिर पड़ा और फफक-फफक कर रोने लगा। यह रोना चिल्लाहट नहीं था, बल्कि एक गहरी, अन्दरूनी चीख थी जो उसके गले से टूट-टूट कर निकल रही थी। उसने अपना माथा ज़मीन से टकराया, जैसे अपने ही फैसले से सज़ा दे रहा हो।

मीरा घबरा कर रसोई से बाहर आई। उसने रमेश को इस तरह ज़मीन पर माथा टेक कर रोते हुए पहले कभी नहीं देखा था। उसका दिल धक से रह गया।

“क्या हुआ जी? तुम ऐसे क्यों रो रहे हो? क्या कहा बैंक वालों ने?”

मीरा ने घुटनों के बल बैठकर रमेश का सिर अपने सीने से लगा लिया। उसके स्तनों का नर्म आग्रह रमेश के गाल से छू रहा था, लेकिन आज उस स्पर्श में कोई सुकून नहीं था, बल्कि एक कसक थी।

रमेश ने रोते हुए अपनी जेब से वह मुड़ा हुआ नोटिस निकाला और मीरा के सामने फेंक दिया, जैसे कोई ज़हरीला साँप फेंक रहा हो।

“हम सब हार गए मीरा… हमारा घर छिन जाएगा। हम सड़क पर आ जाएंगे। दो लाख… यह रकम हम कहाँ से लाएँगे?”

मीरा ने नोटिस उठाया, उसकी आँखें तेज़ी से शब्दों पर दौड़ीं। उसका चेहरा फीका पड़ गया। लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। वह औरत थी, और औरतें टूटती नहीं, वह सहती हैं।

“तो हम मेहनत करेंगे, कहीं और मज़दूरी कर लेंगे। गाँव छोड़कर शहर चले जाएंगे। तुम ऐसे हिम्मत मत हारो,”

मीरा ने उसे सांत्वना देने की कोशिश की, उसके बाल सहलाते हुए।

“नहीं मीरा…”

रमेश ने अचानक उसे खुद से दूर किया, एक ज़ोरदार झटके के साथ। उसने मीरा की आँखों में देखा। उसकी आँखों में एक ऐसी लाचारी थी जो मीरा को डरा रही थी, एक ऐसा अपराधबोध जो उसे चीर रहा था।

“मैंने एक सौदा कर लिया है। घर बच जाएगा। कर्ज़ उतर जाएगा।”

“कैसा सौदा?”

मीरा के दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं। उसकी साँसें छोटी होने लगीं। रमेश के चेहरे पर वह भाव, वह टूटन… यह कोई अच्छा सौदा नहीं हो सकता था।

रमेश ने अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा छुपा लिया, जैसे खुद को शर्म से छुपाना चाहता हो। और फिर, रोते हुए, काँपती आवाज़ में, टुकड़े-टुकड़े करके, उसने विक्रम के साथ हुए उस खौफनाक सौदे की एक-एक बात मीरा को बता दी। कैसे उसने दो लाख के लिए अपनी पत्नी को एक रात के लिए विक्रम के हवाले करने का वचन दिया था।

कैसे विक्रम ने उसकी शर्तें मान ली थीं। कैसे कल रात फार्महाउस पर जाना है। और सबसे बढ़कर, कैसे वह खुद वहाँ मौजूद रहेगा, देखने के लिए।
कमरे का सन्नाटा जैसे मीरा के कानों को चीरने लगा। लालटेन की लौ स्थिर होकर जल रही थी, लेकिन मीरा की दुनिया अँधेरे में डूब गई।

उसे लगा जैसे किसी ने उसके सिर पर भारी पत्थर मार दिया हो, उसकी खोपड़ी चटक गई हो। वह सुन्न होकर रमेश को देखती रही। कुछ पलों के लिए उसके दिमाग ने काम करना बंद कर दिया। शब्द उसके कानों में घुस रहे थे, लेकिन उनका मतलब नहीं बन रहा था। बेच दिया? मुझे? एक रात के लिए? विक्रम के पास? और तुम… तुम वहाँ बैठे रहोगे?

“तुम… तुमने क्या किया?” मीरा की आवाज़ फुसफुसाहट से ज़्यादा नहीं थी, एक सिसकी की तरह।

“मुझे माफ कर दो मीरा! मैं नामर्द हूँ! मैं तुम्हें और इस घर को नहीं बचा सकता। मैं जानता हूँ विक्रम जानवर है, लेकिन हमारे पास कोई और रास्ता नहीं है…”

रमेश उसके पैरों में गिरकर गिड़गिड़ाने लगा, उसने मीरा के पैर पकड़ लिए।

“वो तुम्हें देखता है मीरा, हमेशा से देखता आया है। उसकी नज़रें तुम्हारे उपर टिकी रहती हैं। आज… आज उसकी ख्वाहिश पूरी होगी। बस एक रात… बस एक रात के बाद हम आज़ाद हो जाएँगे।”

मीरा अचानक झटके से पीछे हटी, जैसे किसी जलते हुए कोयले को छू लिया हो। उसकी आँखों से आँसुओं का सैलाब फूट पड़ा, लेकिन यह आँसू दुख के नहीं, गुस्से और अपमान के थे।

“तुमने मेरी कीमत लगा दी? दो लाख? तुमने मुझे एक बाज़ारू औरत समझ लिया जो तुम मुझे उस दरिंदे के बिस्तर पर भेज रहे हो? मैं तुम्हारी पत्नी हूँ रमेश! कोई बिकाउ रंडी नहीं!

उसका शरीर अपमान और गुस्से से काँप रहा था। जिस विक्रम की गंदी नज़रों से बचने के लिए वो हमेशा अपना पल्लू सँभाल कर चलती थी, आज उसका अपना पति उसे उसी के सामने नंगा होने के लिए कह रहा था।

उसे खुद पर और अपने इस गंदे नसीब पर घिन आ रही थी। वह चिल्लाना चाहती थी, रमेश के गाल पर थप्पड़ जड़ना चाहती थी, लेकिन उसके हाथ सुन्न पड़ गए थे। वह बस देखती रही—अपने पति को, जो एक भिखारी की तरह उसके पैरों में पड़ा था, और उस कमरे को, जो अब एक कैदखाना लग रहा था।

लेकिन जैसे-जैसे रात गहरी होती गई, और रमेश का रोना थमकर एक सुनसान खामोशी में बदल गया, मीरा का गुस्सा भी धीरे-धीरे बुझने लगा। उसकी जगह एक खौफनाक, बर्फीली सच्चाई ने ले ली।

वह चारों तरफ देखने लगी—टिन की जर्जर छत, कच्ची दीवारों पर लगी दरारें, कोने में पड़ा मिट्टी का एक बर्तन। यही उनका घर था। यही उनकी दुनिया थी। और अगर यह भी चला गया, तो वे सचमुच सड़क पर आ जाएंगे। रमेश एक कोने में बैठा शून्य में घूर रहा था, उसकी आँखें सूजी हुई और खोई हुई थीं।

वह आदमी, जो उसके लिए भगवान था, जिसकी मेहनत पर उसे नाज़ था, आज पूरी तरह टूट चुका था। उसकी मर्दानगी का मलबा उसके चेहरे पर बिखरा पड़ा था।

मीरा जानती थी कि अगर उसने विक्रम के पास जाने से मना कर दिया, तो रमेश यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाएगा। वह या तो खुदकुशी कर लेगा, या फिर पागल हो जाएगा। और फिर… उनका घर, उनकी इज़्ज़त, उनका वजूद सब नीलाम हो जाएगा।

विक्रम जैसा शख्स क्या कर सकता है, यह वह अच्छी तरह जानती थी। उसकी नज़रों में जो वासना थी, वह सिर्फ देखने तक सीमित नहीं रह सकती थी। अगर वह मना करती, तो वह उन्हें तबाह करने से बाज़ नहीं आता। यह सौदा, चाहे जितना घिनौना हो, एक तरह से उनकी रक्षा ही थी—एक सीमित, निर्धारित बलिदान के बदले उनका भविष्य बच जाएगा।

मीरा ने अपने आँसू पोछे। उसने एक लम्बी, काँपती हुई साँस ली। उसने खुद को एक झटके में उस एहसास से अलग कर लिया कि वो एक इंसान है, जिसकी भावनाएँ हैं, जिसका अपना शरीर है। उसने अपने मन को पत्थर बना लिया। उसने अपने दिल की आवाज़ को दबा दिया।

यह सिर्फ एक रात की बात है… सिर्फ पैसों के लिए… इस शरीर की कोई असली कीमत नहीं है। यह सिर्फ मांस है, हड्डियाँ हैं। एक रात के बाद, सब कुछ वापस पहले जैसा हो जाएगा।

उसने खुद को समझाया, बार-बार, जैसे कोई मंत्र पढ़ रही हो।

वह धीरे से उठी। उसके कदम भारी थे, लेकिन स्थिर। वह रमेश के पास जाकर उसके कंधे पर हाथ रखा। उसका स्पर्श ठंडा था, भावनाहीन।
रमेश ने डरते हुए सिर उठाया, जैसे कोई डरा हुआ कुत्ता हो। उसकी आँखों में पूछताछ थी, और एक गहरा शर्मिंदगी से भरा डर।

“ठीक है,”

मीरा की आवाज़ में एक अजीब सी खामोशी और बर्फ जैसी ठंडक थी। उसने अपनी भावनाओं का गला घोंट दिया था। आवाज़ बिल्कुल सपाट, बिना किसी लहर के।

“हमारा घर नीलाम नहीं होगा रमेश। मैं कल रात उस विक्रम के पास जाने को तैयार हूँ।”

रमेश की साँस रुक गई। उसकी आँखों में राहत की एक झलक दौड़ गई, लेकिन तुरंत ही उसे एक भयानक अपराधबोध ने घेर लिया। वह कुछ बोलना चाहता था, शायद ‘नहीं’ कहना चाहता था, लेकिन शब्द उसके गले में अटक गए।

मीरा ने उसकी तरफ देखा, और उसकी आँखों में वह सब कुछ मर चुका था जो एक पत्नी में होता है—प्यार, विश्वास, समर्पण।

“लेकिन याद रखना…” उसने धीरे से कहा, हर शब्द साफ और तीखा। “…उस फार्महाउस की चौखट पार करने के बाद, तुम्हारी वो मीरा हमेशा के लिए बदल जाएगी। जो वापस आएगी, वह शायद कुछ और होगी। तुम्हारी पत्नी नहीं।”

यह कहकर मीरा मुड़ी और अंधेरे में चली गई, उस कोने की तरफ जहाँ वह सोती थी। रमेश ज़मीन पर ही बैठा रह गया, उसके कानों में मीरा के शब्दों की गूँज सुनाई दे रही थी—’बदल जाएगी’। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं। एक आखिरी, गहरी पीड़ा ने उसकी छाती को भेदा। फिर एक खालीपन आ गया। सौदा हो चुका था। सब कुछ तय हो चुका था।

कल रात विक्रम का वह फार्महाउस एक ऐसे खेल का गवाह बनने वाला था, जो रमेश और मीरा की ज़िंदगी, उनके रिश्ते, और उनके शरीरों को हमेशा के लिए बदल कर रख देगा।

सूरज ढल चुका था और गाँव के कच्चे रास्तों पर रात का गहरा, खौफनाक सन्नाटा पसरने लगा था। रमेश और मीरा अपने कच्चे घर के दरवाज़े पर खड़े थे, दोनों की शक्लें उतरी हुई, जैसे फाँसी के तख्ते की तरफ जा रहे हों। रमेश के पास ना तो कोई अपनी सवारी थी और ना ही इतने पैसे कि वह शहर तक जाने के लिए कोई ताँगा या ऑटो कर सके।

एक गरीब किसान, जिसके सिर पर दो लाख का कर्ज़ हो, उसकी हैसियत ही क्या थी? उसकी जेब में सिर्फ वह दो लाख का सौदा था, जो उसकी आत्मा से ज़्यादा भारी पड़ रहा था। दोनों चुपचाप खड़े थे। मीरा ने एक साधारण सी सूती साड़ी पहनी थी, बिना किसी श्रृंगार के, बिना किसी चूड़ी या बिंदी के। वह बस ज़मीन को घूर रही थी, जैसे अपनी किस्मत को कोस रही हो, या फिर अपने अंदर के सारे भाव मार रही हो।

तभी गाँव की कच्ची सड़क पर धूल उड़ाती हुई एक चमचमाती काले रंग की suv आकर रुकी। गाड़ी की तेज़ हेडलाइट की रोशनी ने रमेश के कच्चे मकान और उसकी गरीबी को पूरी तरह बेनकाब कर दिया, जैसे उसकी नंगी पीठ पर कोई तेज़ रोशनी डाल दी गई हो। शीशा नीचे हुआ और ड्राइविंग सीट पर बैठा विक्रम नज़र आया। उसने काले रंग का रेशमी कुर्ता पहन रखा था, और उसकी आँखों में एक अजीब सी दरिंदगी भरी चमक थी, जैसे कोई शिकारी अपने शिकार को देखकर मन ही मन उछल रहा हो।

“चल बैठो,” विक्रम ने गुर्राते हुए कहा, उसकी आवाज़ में एक अहंकारी बेसब्राहट थी।

रमेश ने भारी कदमों से आगे बढ़कर पीछे का दरवाज़ा खोला और मीरा को बैठने का इशारा किया। लेकिन तभी विक्रम की कड़कती हुई आवाज़ आई, जो हवा में एक चाबुक की तरह चली।

“रुक साले! पीछे क्या बारात में जा रहा है?”

विक्रम ने एक घिनौनी मुस्कान के साथ कहा, उसने रमेश की तरफ देखा, उसकी आँखों में तिरछापन था।

“तू पीछे बैठ रमेश। और अपनी इस लुगाई को आगे, मेरी बगल वाली सीट पर बैठा।”

रमेश के पैर वहीं जम गए। उसने पलटकर विक्रम को देखा, एक पल के लिए उसकी आँखों में विरोध की एक चिंगारी दहक उठी। लेकिन विक्रम की आँखों का खौफ और दो लाख रुपये का वो कर्ज़ उसे अंदर तक खा गया। उसकी मर्दानगी ने आत्मसमर्पण कर दिया।

रमेश ने बिना कुछ बोले अपनी नज़रें झुका लीं और खुद पीछे बैठ गया। मीरा का शरीर काँप रहा था, जैसे पाले में ठिठुर रही हो। वह धीरे से आगे वाली सीट पर जाकर बैठ गई, उसने दरवाज़े से अपना शरीर चिपका लिया, जितना हो सके उतना दूर।

गाड़ी का दरवाज़ा बंद होते ही एसी की ठंडी हवा ने उन्हें घेर लिया, लेकिन रमेश का पसीना नहीं सूख रहा था। विक्रम ने गाड़ी गियर में डाली और गाड़ी गाँव के कच्चे रास्तों से होते हुए शहर की तरफ दौड़ पड़ी। गाड़ी की रोशनी में सड़क के किनारे के पेड़ दानवों की तरह झोंके खाते दिख रहे थे।

गाड़ी अभी कुछ ही दूर गई थी कि विक्रम ने स्टीयरिंग से अपना बायाँ हाथ हटाया और बिना किसी झिझक के, सीधे मीरा की जांघ पर रख दिया। मीरा के मुँह से अचानक एक सिसकी निकल गई और उसका पूरा शरीर पत्थर की तरह अकड़ गया। उसने सिकुड़ कर दरवाज़े की तरफ खिसकने की कोशिश की, लेकिन विक्रम ने अपनी मज़बूत उँगलियों से उसकी सूती साड़ी के ऊपर से ही उसकी जांघ के मांस को कसकर दबा दिया, उसे अपनी ओर खींचा।

“कहाँ भाग रही है? अब तो तू मेरी है,” विक्रम ने फुसफुसाते हुए कहा, उसकी साँसें गर्म थीं और आवाज़ में एक जानवरों वाली खुशी थी। “तेरे नामर्द पति ने तुझे बेच दिया है। अब हम मज़े करेंगे!।”

पीछे बैठा रमेश यह सब देख रहा था। विक्रम का चौड़ा, बालों वाला हाथ उसकी पत्नी की जांघों को बेरहमी से टटोल रहा था और मसल रहा था। रमेश के सीने में ऐसा लगा जैसे किसी ने खौलता हुआ सीसा उतार दिया हो। उसकी मुट्ठियाँ इस कदर भिंच गईं कि नाखूनों से हथेलियों में खून रिसने लगा। वह अपनी ही पत्नी को अपने सामने सरेआम बेइज़्ज़त होते देख रहा था और कुछ नहीं कर पा रहा था।

एक नामर्द होने का यह एहसास उसे अंदर से चीर रहा था। वह चाहता था कि विक्रम का गला दबा दे, लेकिन अगली ही पल उसे बैंक का वह नीला कागज़ याद आ गया। ‘अगर मैंने कुछ किया, तो कल सुबह हम सड़क पर होंगे।’ रमेश ने खून का घूँट पी लिया और अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं। उसने खुद को याद दिलाया कि यह सब दो लाख रुपये के लिए है। बस दो लाख।

करीब आधे घंटे बाद, गाड़ी शहर से दूर एक सुनसान इलाके में विक्रम के आलीशान फार्महाउस के अंदर रुकी। वह एक बड़ा सा कोठी जैसा मकान था, जिसके बगीचे में फव्वारे चल रहे थे और बाहर दो-तीन और गाड़ियाँ खड़ी थीं। लेकिन अंदर एक सन्नाटा था।

अंदर पहुँचते ही एक बड़े से हॉल में, जिसकी दीवारों पर महंगी पेंटिंग्स लटकी थीं, विक्रम ने अपनी जेब से पाँच-पाँच सौ के नोटों की दो मोटी गड्डियाँ निकालीं। उसने उन्हें ज़ोर से रमेश के मुँह की तरफ फेंका। गड्डियाँ रमेश के सीने से टकरा कर ज़मीन पर बिखर गईं, कुछ नोट उसके पैरों के पास आ गिरे।

“पूरे दो लाख हैं,”

विक्रम ने बेशर्मी से मुस्कुराते हुए कहा, उसने अपनी बाँहें फैला लीं, जैसे कोई राजा दान दे रहा हो।

“गिन ले मादरचोद। आज से तेरा और उस बैंक का हिसाब बराबर। तेरी ज़मीन बच गई।”

रमेश के हाथ काँपे। ज़मीन पर पड़े उन कड़क नोटों को देखकर उसका स्वाभिमान रो पड़ा। उसने धीरे से घुटनों के बल झुककर उन नोटों को उठाया, एक-एक करके। जब पैसों ने उसकी हथेलियों को छुआ, तो उसके सीने में एक अजीब सी हलचल हुई।

एक तरफ जहाँ उसकी आत्मा शर्म से मर रही थी, वहीं दूसरी तरफ उसके दिमाग के एक अंधेरे कोने में एक भयानक, स्वार्थी राहत ने जन्म लिया—’घर बच गया। मीरा की ज़मीन बच गई।’ यह एहसास इतना घिनौना था कि रमेश को खुद से नफरत होने लगी, लेकिन उसने वो पैसे अपनी जेब में रख लिए। नोटों की मोटाई उसकी जेब को भर गई।

“अब तू जा कर उस अंधेरे कोने वाली कुर्सी पर बैठ जा भड़वे,”

विक्रम ने कमरे के एक कोने की तरफ इशारा करते हुए कहा, जहाँ एक सिंगल आर्मचेयर रखी थी। “और याद रहे, तेरी ज़बान से एक लफ्ज़ नहीं निकलना चाहिए। तू बस अपनी आँखों से देखेगा कि एक असली मर्द औरत को कैसे रखता है।”

रमेश भारी कदमों से जाकर उस कुर्सी पर बैठ गया, उसके हाथ में सस्ती व्हिस्की का एक टम्बलर था, जो की विक्रम ने दिया था, ताकि आनेवाला नज़ारा वो देख सके। कुर्सी ठंडी थी। उसने अपनी नज़रें ज़मीन पर गाड़ दीं, लेकिन उसका ध्यान पूरी तरह से कमरे के बीच में खड़ी मीरा पर था।

विक्रम मीरा के सामने खड़ा था। वह एक भारी-भरकम आदमी था, चौड़े कंधों वाला और मजबूत, एक कुरकुरे सफेद कुरते में जो उसकी छाती पर थोड़ा तन गया था। उसने रमेश की तरफ नहीं देखा। उसकी नज़र सिर्फ मीरा पर थी।

“उतार इसे,” विक्रम ने कहा।

उसकी आवाज़ भारी थी, गर्माहट से रहित, किसी रोमांटिक दिखावे से मुक्त। यह एक आदेश था।

मीरा की उँगलियाँ पल्लू से उलझ गईं। उसकी साँस अटक गई। उसने रमेश की तरफ देखा, झिझक का कोई संकेत ढूँढते हुए, लेकिन रमेश ने बस अपना गिलास उठाया, उसकी आँखें अंधेरी और अवर्णनीय। उसने मुश्किल से दिखाई देने वाला सिर हिलाकर हामी भरी। करो इसे।

मीरा ने रमेश की तरफ पीठ कर ली, विक्रम का सामना किया। उसने कमर पर बंधा गाँठ खोला। रेशमी कपड़ा उसकी जाँघों से फिसलकर उसके टखनों के आसपास इकट्ठा हो गया। वह उसमें से बाहर निकली, सिर्फ अपनी ब्लाउज़ और पेटीकोट में खड़ी रही। फिर, एक काँपते हाथ से, उसने ब्लाउज़ के बटन खोले। बटन एक के बाद एक खुले—क्लिक, क्लिक, क्लिक—जब तक कपड़ा खुल नहीं गया।

उसके स्तन बाहर आ गए, भारी और मुलायम, उसके निप्पल ठंडी हवा में तुरंत सख्त हो गए। वे छोटे, खड़े हुए थे, गहरे, गुलाबी रंग के एरोला उसके श्याम रंग की त्वचा पर चमक रहे थे। विक्रम की नज़र उन पर ठहर गई, एक पल के लिए, माल का आकलन करते हुए।

“नीचे भी,” उसने आदेश दिया।

मीरा ने पेटीकोट नीचे खींचा और उसमें से बाहर निकली। वह नंगी थी।

विक्रम आगे बढ़ा। उसने हाथ बढ़ाया, उसका बड़ा हाथ उसके पूरे स्तन को ढक गया, उसका अंगूठा संवेदनशील गाँठ पर फिरता हुआ। मीरा की साँस उखड़ गई, उसका सिर सहज रूप से पीछे की ओर झुक गया। यह प्यार का सहलाव नहीं था; यह दावा था। उसने धीरे से निचोड़ा, मजबूती जाँची, फिर छोड़ दिया।

“बिस्तर,” उसने कहा।

मीरा बिस्तर की ओर चली, लकड़ी का ढाँचा उसके वजन से चरचराया। वह पीठ के बल लेट गई, अपने पैर सहज रूप से फैलाते हुए खुद को स्थिति में लाई। उसकी जाँघें चिकनी थीं, उसके पैरों के उसकी चूत चिकनी थी, वहाँ की त्वचा चौंकाने वाली, जीवंत गुलाबी थी—उसकी जवानी और रमेश के साथ वर्षों की शादी के बावजूद उसकी अछूती प्रकृति का संकेत। उसकी भगोष्ठ गद्गदे थे, थोड़े से अलग हुए, प्रवेश की प्रत्याशा में रिसने वाले प्राकृतिक स्नेहन से चमक रहे थे।

विक्रम ने अपनी बेल्ट खोली। धातु की खनखनाहट शांत कमरे में जोर से गूँजी। उसने अपनी पतलून के बटन खोले और उन्हें अलग फेंक दिया, अपने बॉक्सर के साथ उनमें से बाहर निकला।

रमेश ने देखा, उसकी पकड़ अपने गिलास पर मजबूत हुई।

विक्रम का लंड बाहर आया। वो प्रभावशाली था—मोटा, नसों से भरा, और एक तीखे कोण पर उठा हुआ। यह आसानी से नौ इंच लंबा था, मांस का एक भारी, कठोर स्तंभ जो अपनी नब्ज से फड़क रहा था। डंडी गहरे रंग की थी, त्वचा मांसपेशियों पर तनी हुई, और शिश्नमुंड सूजा हुआ और बैंगनी था, चीरे से साफ प्री-कम की एक बूंद टपक रहा था। यह मोटा भी था—आसानी से 2.3 इंच मोटाई में, एक पर्याप्त परिधि जो उसे चौड़ा खींचने का वादा कर रही थी।

विक्रम ने मीरा को छेड़ा नहीं। उसने उसे चूमा नहीं। वह उसके फैले हुए पैरों के बीच आगे बढ़ा। मीरा के हाथों ने चादर को जकड़ लिया, उसके पोर सफेद हो गए। उसने ऊपर विक्रम की तरफ देखा, उसकी आँखें फैली हुई, डर और एक अजीब, विद्युत उत्सुकता के मिश्रण से भरी हुई।

“उसे देखो,” विक्रम ने कहा, उसकी आवाज़ खुरदरी। उसने रमेश की ओर इशारा किया।

मीरा ने सिर घुमाया। रमेश देख रहा था, उसका जबड़ा कसा हुआ, उसकी आँखें विक्रम के लंड पर टिकी हुईं जो उसके चूत के द्वार के ठीक ऊपर मंडरा रहा था।

विक्रम ने अपने लंड के शिश्नमुंड को मीरा की चूत की ओर मोड़ा। नोक, चौड़ी और फैली हुई, उसके गुलाबी भगोष्ठ से दब गई। मीरा ने अपने दाँतों के बीच से सिसकारी भरी, उसकी कूल्हे दबाव को पूरा करने के लिए थोड़े ऊपर उछले।

“ढीला छोड़,” विक्रम ने बड़बड़ाते हुए कहा। उसने समायोजन के लिए इंतज़ार नहीं किया। उसने आगे ज़ोरदार धक्का दिया।

फच्छ्ह्हह.!!!!!!!

प्रवेश गहरा और तत्काल था। उसकी पूरी मोटाई ने उसे खोल दिया, चूत की भित्ति की तंग, गुलाबी मांसपेशियों ने उसके डंडे को जकड़ लिया जैसे ही वह अंदर सरका। मीरा की आँखें चौड़ी होकर खुल गईं, उसका मुँह एक खामोश ‘ओ’ बना गया। एक तेज चीख उससे निकल गई, पूरी तरह से कराह नहीं, बल्कि भराव के झटके की एक साँस। विक्रम ने खुद को एक ही सहज, शक्तिशाली गति में जड़ तक धँसा दिया।

एक पल के लिए, वे स्थिर रहे। विक्रम के कूल्हे उसकी जघन हड्डी से दबे हुए थे, उसका लंड उसके अंदर गहराई तक धँसा हुआ। मीरा हर उभार, हर नस को महसूस कर सकती थी, जो उसे अंदर से खींच रही थी। उसे भरा हुआ, दावा किया हुआ, भरा हुआ महसूस हुआ।

फिर, विक्रम ने हिलना शुरू किया।

उसने लगभग अपन लंड पूरा पीछे खींचा, सिर्फ शिश्नमुंड अंदर छोड़कर, फिर से आगे धँस गया।

थप!!!!!

उसके श्रोणि का उसके मांस से टकराने की आवाज़ गीली और भारी थी। घर्षण तीव्र था। उसकी चूत की तंग दीवारें उसके मोटे डंडे पर सरक रही थीं, उनके शरीरों की गर्मी मिल रही थी।

“आआह्ह्ह!!!!…दर्द हो रहा है, मीरा..स्स्स्स!!!?” विक्रम ने पूछा, उसकी आवाज़ शांत, लगभग बातचीत जैसी, मानो वे मौसम की चर्चा कर रहे हों। उसने गति बढ़ाई, उसके कूल्हे लयबद्ध क्रूरता के साथ आगे हो रहे थे।

मीरा ने होंठ काटे, आँखों में आँसू उभरे। “थप!. थप!..थप!..नहीं,..थप…थप!..” उसने फुसफुसाया, उसकी आवाज़ काँप रही थी। “आआह्ह!…थप!..थप!..बस यह…थप!… यह बड़ा है…थप!…थप!..थप!..।”

विक्रम मुस्कुराया। उसने रमेश की तरफ देखा।

“थप!. थप!..थप!….ह्हह्म्म्म..सुना तुमने, रमेश..थप!. थप!..थप!..?” उसने पुकारकर कहा, उसकी आवाज़ में मज़ाक का स्वर था।

“थप!. थप!..थप!..मीरा को मेरा लंड..आआह्ह्ह्ह!!..थप!. थप!..थप!.. बड़ा लग रहा है….स्सस्सस्सस!!!.थप!. थप!..थप!.., तुम्हारा छोटा है क्या?…थप!. थप!..थप!..”

रमेश ने व्हिस्की का एक घूँट लिया, उसकी आँखें उनके शरीरों के जोड़ से कभी नहीं हटीं। उसने विक्रम के ताने को अनसुना कर दिया।

विक्रम हँसा, एक छोटी, कर्कश आवाज़। उसने अपनी गति बढ़ाई।

“थप!… थप!…. थप…!”

उसकी जघन हड्डी का मीरा की जघन हड्डी से टकराने की आवाज़, उनके जननांगों के आपस में रगड़ खाने की गीली चपचप आवाज़, बिस्तर के ढाँचे की चरचराहट।

मीरा का शरीर प्रारंभिक झटके के बावजूद प्रतिक्रिया करने लगा। उसके कूल्हे उसके धक्कों को पूरा करने के लिए उठे। उसके स्तन हर प्रहार के साथ उछले, निप्पल और सख्त हो गए। विक्रम का हाथ उसकी कमर को जकड़ गया, उसकी उँगलियाँ उसके मुलायम मांस में धँस गईं, जो दिनों तक रहने वाले निशान छोड़ गईं। वह उसे जोर से, गहरा, और निरंतर कुत्ते की तरह चोद रहा था।

“थप!. थप!..थप!..थप!. थप!..थप!..थप!. थप!..थप!..”

“उसे देखो..थप!. थप!..थप!..,” विक्रम ने फिर आदेश दिया, इतना झुक गया कि उसका पसीने से तर चेहरा उसके करीब आ गया।

“थप!. थप!..थप!..आआह्ह्ह्ह!!!….स्स्स्स!…थप!. थप!..थप!..अपने पति को देखो कि वह..थप!. थप!..थप!..आआह्ह्ह!!… तुम्हें दूसरे मर्द का लंड लेते हुए देख रहा है..थप!. थप!..थप!..स्सस्सस्स!!!।”

मीरा ने सिर घुमाया। रमेश देख रहा था, उसकी अभिव्यक्ति अवर्णनीय, लेकिन उसकी आँखें उत्तेजना और अपमान के जटिल मिश्रण से अंधेरी थीं। वह अपनी बीवी की चूत को विक्रम का लंड लेते हुए देख रहा था, खिंचाव, आक्रमण को महसूस कर रहा था। पृष्ठभूमि में आवाज लगातार चल रही थी..

“थप!. थप!..थप!..थप!. थप!..थप!..”

विक्रम ने मीरा के स्तन पकड़े, उन्हें बेरहमी से निचोड़ा, मुलायम मांस को मसला।

“थप!. थप!..थप!..तुझे अच्छा लग रहा है?”

उसने पूछा, और जोर से धकेलते हुए।

“तुझे अपना पति देखते हुए अच्छा लग रहा है..थप!. थप!..थप!..?”

मीरा कराह उठी, एक नीची, कंठीय आवाज़ जिसने उसे चौंका दिया। उसे “ना” कहना चाहिए था, पर वो चुप रही, वह एक मूक स्विकृती थी!।

विक्रम मुस्कुराया, एक शिकारी की मुस्कान।

“थप!. थप!..थप!..थप!. थप!..थप!..स्सस्सस्स!!!!….आआह्ह्ह्ह!!,,,वह देख रहा है…थप!. थप!..थप!..,”

उसने कहा।

“थप!. थप!..थप!..वह देख रहा है कि तेरी चूत कितनी तंग है..थप!. थप!..थप!..आह्ह!!!..स्सस्सस्स!!..। थप!. थप!..थप!..वह देख रहा है कि तेरी चूत कितनी गुलाबी है..थप!. थप!..थप!..हहाँ..स्स्स्स!!!..थप!. थप!..थप!..। उसे पता है कि तू इसी के लिए बनी है..थप!. थप!..थप!..।”

उसने कोण बदला, अपने कूल्हों को ऊपर की ओर झुकाया। इसने उसके लंड को और गहरा धकेल दिया, उसके अंदर एक जगह टकराई जिससे मीरा की उँगलियाँ मज़े की वजह से मुड़ गईं। उसने बिस्तर से अपनी पीठ मोड़ी, उसके हाथ अपने आप विक्रम के कंधों से चिपक गए, उसके नाखून उसकी त्वचा में धँस गए।

“आहह्हह! हाँम्मम्म!” वह चिल्लाई, उसकी आवाज़ अब जोर से थी, आनंद में खोई हुई।

विक्रम झुका, उसके कान की लोलकी को जोर से काटा।

“थप!. थप!..थप!..उसके लिए निकाल तेरा रस!…आआह्ह्ह्ह!!!….,” उसने उसके कान में गुर्राते हुए कहा। “तेरे पति को देखते हुए निकाल..थप!. थप!..थप!..।”

घर्षण तीव्र था, गर्मी तेजी से उसके निचले पेट में बन रही थी। विक्रम का लंड एक निरंतर पिस्टन था, उसे खींच रहा था, भर रहा था, उस पर दावा कर रहा था। मीरा ने अपने चरमोत्कर्ष के आने को महसूस किया, आनंद की एक ज्वारीय लहर उस पर टूट पड़ी। उसने आखिरी बार रमेश की तरफ देखा, उसकी आँखें धुँधली, चेहरा लाल, शरीर काँप रहा था।

“थप!. थप!..थप!..थप!. थप!..थप!..आआआह्ह्ह्हह्ह!…थप!. थप!..थप!..थप!. थप!..थप!..” वह चिल्लाई।

विक्रम ने गति धीमी नहीं की। उसने लंड चूत में और धँसा दिया, उसके कूल्हे धुंधले में चल रहे थे, उसका मोटा लंड उसकी तंग, गुलाबी योनि में जोर-जोर से घुसेड़ दिया। मीरा का शरीर अब पूरी तरह आत्मसमर्पण कर चुका था। वह चीख उठी,

“आ रहा है..आआअह्ह्ह्ह..आयी!!!”

विक्रम ने रुकना नहीं चाहा। उसने और तेज़ धक्के मारे, उसके कूल्हे एक धुँधले इंजन की तरह चल रहे थे।

“थप!. थप!..थप!..थप!. थप!..थप!..”

हर धक्के के साथ मीरा की चूत के भीतर एक गर्म, द्रव्यमय फैलाव होता, जो उसकी आंतरिक दीवारों को चौड़ा करके उसकी गहराई तक जाता।

“थप!. थप!..थप!….हाँ… इसी तरह… अपनी रंडी पत्नी को चुदते देख!… थप!. थप!..थप!….. आआअह्ह्ह्ह!!!!…देख तेरी रंडी कैसे हिल रही है मेरे नीचे!… थप!. थप!..थप!..!”

विक्रम हाँफते हुए बोला, उसकी नज़रें रमेश पर टिकी हुईं, जो अभी भी कोने में जड़ा हुआ था।

मीरा के भीतर एक ज्वालामुखी फट पड़ा। उसकी योनि की मांसपेशियाँ विक्रम के लंड को जकड़ते हुए तेज़ी से सिकुड़ने लगीं, एक के बाद एक ऐंठन। उसका सारा शरीर काँप उठा, उसकी आँखें पलकें झपकाते हुए पीछे की ओर घूम गईं। गर्म तरल की एक बाढ़ उसकी चूत से बाहर निकल पड़ी, विक्रम के लंड और उसकी जाँघों को भिगोते हुए।

“आहह्ह्ह!!!… … आहह्ह्ह्हह!!!!…” उसकी आवाज़ एक लंबी, टूटी हुई कराह में डूब गई।

यह देखकर विक्रम का खुद पर नियंत्रण टूट गया। उसने मीरा की कमर को और जोर से पकड़ा, उसे अपनी ओर खींचा और एक आखिरी, गहरा धक्का दिया।

“थाप्पप..!!!”

उसका लंड मीरा की योनि में पूरी तरह से समा गया, उसका शिश्नमुंड उसके गर्भाशय के मुहाने से टकराया।

“लो… ले ले मेरा माल, छिनाल!..आआआ!!!…”

विक्रम ने एक जानवरों जैसी गुर्राहट निकाली। उसका शरीर अकड़ गया, और गर्म, गाढ़ा वीर्य उसके लंड से फूटकर मीरा की गर्भाशय ग्रीवा में भरने लगा। मीरा को ऐसा लगा जैसे उसके अंदर गर्म सीसे की धारा बह रही हो। विक्रम लगातार हिलता रहा, अपना सारा तनाव, अपनी सारी वासना मीरा की तंग, अब नम चूत में उड़ेलते हुए।

धीरे-धीरे उसकी गति रुकी। उसका भारी शरीर मीरा के ऊपर ढह गया। सिर्फ उनकी भारी साँसों और बारिश की आवाज़ के अलावा कमरे में सन्नाटा छा गया।

कुछ क्षण बाद विक्रम धीरे से बाहर निकला।

“स्शह्र्र्रुल्ल्ल्प!!!!!”

उसका लंड, अब नरम होता हुआ, मीरा की फैली हुई, गुलाबी भगोष्ठ से बाहर आया। उसके वीर्य और मीरा के स्राव का मिश्रण उसकी चूत के होंठों से रिसकर उसकी जाँघों पर बहने लगा, चिपचिपी, सफेद धाराएँ बनाते हुए। उसकी चूत खुली हुई और सूजी हुई थी, आक्रमण की गवाही देती हुई।

मीरा वहीं पड़ी रही, उसकी छाती तेजी से उठ-गिर रही थी, पसीने से तरबतर शरीर पर विक्रम की पकड़ के निशान दिख रहे थे। उसे खालीपन महसूस हो रहा था, इस्तेमाल किया हुआ, और एक अजीब सी संतुष्टि भी।

विक्रम ने खुद को साफ किए बिना ही अपनी पैंट ऊपर चढ़ा ली और जिप बंद कर ली। उसने रमेश की तरफ देखा, जो अभी भी कुर्सी पर जड़ा हुआ था।

“सौदा पूरा हो गया। अब निकलो यहाँ से।”

रमेश धीरे से उठा। उसके पैर लड़खड़ा रहे थे। वह मीरा की तरफ देखना चाहता था, लेकिन उसकी हिम्मत नहीं हुई। मीरा ने खुद ही धीरे से उठकर अपनी साड़ी को समेटा और अपने शरीर पर लपेट लिया। उसने विक्रम की तरफ एक बार भी नहीं देखा। वह सीधे कमरे से बाहर निकल गई, एक दरवाज़े की तरफ जो शायद बाथरूम में जाता था।

विक्रम ने एक सिगरेट सुलगाई और रमेश को घूरते हुए कहा, “बाहर मेरा नौकर जीप निकाल कर खड़ा है, वो तुम दोनों को गाँव छोड़ देगा।”

रमेश ने कोई जवाब नहीं दिया। वह बस मुड़ा और उस दरवाज़े से बाहर निकल आया जहाँ मीरा गई थी। बाहर एक कोरिडोर में, एक बंद दरवाज़े के पीछे से पानी की आवाज़ आ रही थी। शॉवर चल रहा था। रमेश वहीं दीवार के सहारे खड़ा हो गया।

रमेश की आँखों में फिर से पानी आ गया। उसने अपनी जेब में हाथ डाला। नोटों की मोटाई ने उसे एक झटके में वापस वास्तविकता में ला दिया। उसका घर बच गया था। उसकी ज़मीन बच गई थी। यह एहसास उसके दिल पर एक पत्थर की तरह भारी था, लेकिन उसके चेहरे पर एक राहत की रेखा भी उभर आई। वह खुद से नफरत कर रहा था, लेकिन साथ ही, एक गहरी, शर्मनाक कृतज्ञता भी महसूस कर रहा था। वह गुनहगार था, लेकिन बच गया था।

कुछ देर बाद नल की आवाज़ बंद हुई। दरवाज़ा खुला और मीरा बाहर आई। उसने वही साड़ी पहन रखी थी, और उसके बाल गीले थे। उसकी आँखें लाल थीं, लेकिन सूखी। उसने रमेश की तरफ देखा भी नहीं। वह सीधे बाहर की तरफ चल दी।

बाहर, एक पुरानी जीप खड़ी थी और एक नौकर स्टेयरिंग के पास बैठा था। रमेश और मीरा पीछे की सीट पर बैठ गए। जीप ने गति पकड़ी और अंधेरी सड़क पर गाँव की तरफ चल पड़ी।

रास्ते भर एक भी शब्द नहीं बोला गया। मीरा खिड़की से बाहर का घना अंधेरा देख रही थी, और रमेश अपने हाथों को देख रहा था। हवा का शोर था, इंजन का गड़गड़ाहट था, लेकिन उनके बीच की खामोशी उस सबसे ज़्यादा डरावनी थी। आज रात उनके बीच एक दीवार खड़ी हो गई थी। एक ऐसी दीवार जो शायद कभी नहीं गिरने वाली थी।

जीप ने उन्हें उनके कच्चे घर के सामने छोड़ दिया। दरवाज़ा खोलते हुए रमेश ने मीरा की तरफ देखा, शायद कुछ कहना चाहता था—शायद ‘माफ़ करना’, शायद ‘शुक्रिया’। लेकिन मीरा अंदर चली गई, बिना उसकी तरफ देखे, बिना रुके।

रमेश ने दरवाज़ा बंद किया। अंदर लालटेन जलाई। मीरा पहले से ही अपनी चटाई पर लेट चुकी थी, चेहरा दीवार की तरफ किए हुए। रमेश ने लालटेन बुझाई और अपनी चटाई पर लेट गया।

अंधेरे में, उसकी जेब में पड़े नोट एक तपिश छोड़ रहे थे। दो लाख रुपये। उनकी ज़मीन बच गई थी। उनका घर बच गया था।

लेकिन आज रात, उस कमरे में, उस बिस्तर पर, रमेश की पत्नी मर चुकी थी। और जो वापस आई थी, वह शायद कुछ और ही थी।

To be continued . . .

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