पिछले भाग में हमने देखा की कैसे गौरी का असली रंडी स्वभाव सुमेर के सामने उजागर होने से बाल बाल बचा…अगर आपने वो भाग नहीं पढ़ा तो यंहा शाही राजपुताना परिवार का वासना का खेल – ५ क्लिक कर के ज़रूर पढ़े , अब आगे ..
बाथरूम के दरवाज़े को बंद करते ही गौरी ने शीशे के सामने खड़े होकर एक लंबी, राहत भरी सांस छोड़ी। “फ्श्श्श्ह… बाल बाल बची!।”
उसने शीशे में अपनी तस्वीर देखी। उसके बाल बिखरे हुए थे, आई-लाइनर फैल गई थी, और उसके होंठ सूजे हुए थे—एक अच्छी तरह से चोदी गई औरत का चेहरा। लेकिन उसकी आँखों में जो भाव था, वो था डर और चालाकी का मिला-जुला रूप।
वो शावर के नीचे चली गई। गर्म पानी उसके थके हुए शरीर पर टपका, लेकिन उसकी टांगों के बीच की गर्मी अभी भी ठंडी नहीं पड़ी थी। उसकी गांड अभी भी एक खुले गुफा की तरह अनुभव हो रही थी।
सुमेर का गाढ़ा वीर्य और उसकी अपनी गंदगी का मिश्रण उसकी जांघों से होता हुआ नीचे बह रहा था। एक चिपचिपा, पीलापन लिए हुए रास्ता बना हुआ था जो उसके शरीर से निकल कर फर्श पर जा रहा था।
उसने अपना हाथ अपनी गांड के छेद पर रखा। वो गर्म और सूजा हुआ था। उसने थोड़ा और खोलकर देखा, जैसे यह सुनिश्चित करने के लिए कि वो सही काम कर रही है।
उसे अभी भी वो स्वाद महसूस हो रहा था—सुमेर के लौड़े का वो कड़वा, मिट्टी जैसा स्वाद जो उसकी जीभ पर अभी तक टिका हुआ था।
“मैं पागल हो गई थी,” उसने खुद को डांटा, अपने चेहरे पर पानी फेंकते हुए। “जब मैंने उस गंदे लंड को अपने मुँह में लिया, तो मैंने सोचा भी नहीं… बस उस पर टूट पड़ी।”
उसके दिमाग में वो पल ताज़ा था। सुमेर का वो हैरान भरा चेहरा। वो देख रहा था कि वो कितनी आसानी से उसकी गांड की गंदगी चाट रही थी। एक ‘नादान’ दुल्हन ऐसा कभी नहीं करती।
उसकी आँखों में वो भूख, वो लालच… वो सब कुछ था जो एक अनुभवी रांड में होता है। अगर वो वहाँ एक सेकंड भी ज़्यादा रुकती, तो शायद सुमेर को सब समझ आ जाता। उसका यह खेला गया ‘नादानपन’ उजागर हो जाता।
“पर बच गई,” उसने एक राहत की सांस ली, साबुन लगाकर अपनी चूचियों को मसलते हुए। “मैंने उसे बता दिया कि यह सब मेरे लिए नया है और मुझे मज़ा आ रहा है। वो मान गया।”
पानी उसके शरीर से टपकता हुआ नीचे गिर रहा था। वो अपनी चूत को साफ़ कर रही थी, जो अभी भी सुमेर के उस ज़बरदस्त धक्के से सूजी हुई थी। जैसे ही उसने अपनी उंगलियाँ अपनी चूत की फांकों के बीच घुमाई, एक सिहरन उसके पूरे शरीर में दौड़ गई।
उसके चेहरे पर एक गहरी, विकृत मुस्कान आ गई। वो अब कुंवारी नहीं थी। उसकी ‘कुंवारपन’ की परत, चाहे वो असली हो या न हो, आधिकारिक तौर पर टूट चुकी थी। और इसका मतलब था… कि वो अब अपने बापू, राम सिंह की हो चुकी थी।
उसे अपने पिता के वो शब्द याद आ गए, जो वो उसे रोज़ सुनाता था। बेटा, एक राजपूत स्त्री का शरीर केवल एक हथियार है। जब तक तू अपने पति के नीचे नहीं आ जाती, तब तक तू अपने पिता के लिए तैयार नहीं होती। पति तेरी चूत को खोलता है, और पिता उसे भोगता है।
गौरी के शरीर में एक अलग ही गर्मी दौड़ गई। वो सोचने लगी कि कैसे उसे अब सुमेर को अपने परिवार की उस ‘पवित्र’ परंपरा का हिस्सा बनने के लिए राज़ी करना है।
लेकिन गौरी को इसके पीछे की गहरी साज़िश का पता नहीं था। वो सोचती थी कि यह सिर्फ एक कामुक खेल है, एक राज़ जो उसके परिवार ने उसे सिखाया है।
हकीकत कहीं गहरी और काली थी।
यह शाही खानदानों की प्राचीन और कुख्यात रणनीति थी—सत्ता को कामुकता के ज़रिए नियंत्रित करने की कला।
सदियों से, राजपूत और राजघरानों की महिलाएं शासकों, सरदारों और धनी पुरुषों के बिस्तरों में घुसकर अपने परिवारों की सत्ता को मज़बूत करती थीं।
यह कोई नई बात नहीं थी; यह एक विज्ञान था जिसे हर राजकुमारी को जन्म से ही सिखाया जाता था।
उन्हें सिखाया जाता था कि कैसे एक पुरुष को अपनी चूत से बांधना है, कैसे उसे इतना पागल करना है कि वो अपनी जागीर, अपनी फ़ौज, अपना सब कुछ उनके कदमों में रख दे।
वो सभी महिलाएं, जो बाहर से देखने में पतिव्रता और साध्वी लगती थीं, अंदर से कामुक राक्षसियों की तरह प्रशिक्षित होती थीं। यह एक खेल था—राजनीति का खेल, जिसमें शरीर हथियार था और चुदाई रणनीति।
राम सिंह और उसकी पत्नी इसी पुरानी किताब को आज के ज़माने भी लागु कर रहे थे। वो जानते थे कि सुमेर सिर्फ एक इंसान नहीं, बल्कि एक चलता-फिरता साम्राज्य है।
उसके पास हज़ारों एकड़ ज़मीन, सियासी पहुँच और इलाक़े में अपूर्व आर्थिक शक्ति है। राम सिंह का अपना राजवंश खत्म होने के कगार पर था, उनका प्रभाव कम हो रहा था। उन्हें एक ऐसा वाहन चाहिए था जो उन्हें फिर से ऊपर उठा सके, और सुमेर वही वाहन था।
इसलिए उन्होंने गौरी को तैयार किया। उन्होंने उसे एक ‘संपत्ति’ की तरह ढाला, एक ‘परिसंपत्ति’ की तरह तैयार किया। गौरी को नहीं पता था कि वो एक साज़िश का हिस्सा है।
उसका छोटा दिमाग इतनी गहरी राजनीति और सत्ता के खेल को समझ नहीं सकता था। वो सिर्फ यह जानती थी कि उसके पापा ने उसे क्या सिखाया है—कैसे चूसना है, कैसे चुदवाना है, कैसे अपने आप को एक रांड की तरह पेश करना है।
और उसे यह सब पसंद भी था।
उसे लगता था कि वो अपने माता-पिता के आदेशों का पालन कर रही है, एक ‘काम को’ पूरा कर रही है। उसे लगता था कि यह सब मज़े के लिए है, एक खेल है।
उसे नहीं पता था कि वो एक कीचड़ में फंसी मछली है जिसे तैयार किया गया है ताकि वो एक विशाल मगरमच्छ को अपने जाल में फंसा सके।
राम सिंह और उसकी पत्नी कामयाब हो चुके थे।
उन्होंने एक सिंह के मुँह में अपना हाथ डाल दिया था और उसे बिना काटे ही अपना बना लिया था। सुमेर सोचता था कि उसने एक नादान, शर्मीली लड़की को अपनी रांड बनाया है, लेकिन हकीकत यह थी कि उस रांड ने उसे अपना कुत्ता बना लिया था।
गौरी की उस शर्म की परदे के पीछे छुपी वासना ने सुमेर को इतना भोग लिया था कि अब वो उसके बिना एक पल भी नहीं रह सकता था।
गौरी ने शावर का पानी बंद कर दिया। शांति फिर से काबू में आ गई। उसने टॉवल उठाया और अपने बदन को पोंछा। उसकी त्वचा अभी भी लाल थी, उस पर सुमेर के दांतों के निशान और उसकी मुट्ठी के निशान बने हुए थे।
उसने अपनी गांड को धीरे से पोंछा। वो अभी भी जल रही थी, एक याद दिलाते हुए कि आज उसने क्या झेला है। लेकिन वो दर्द अब उसे प्यारा लग रहा था। यह दर्द उसकी जीत का प्रमाण था।
उसने शीशे में खुद को दोबारा देखा। अब उसके चेहरे पर वो डर नहीं था। वहाँ एक नया आत्मविश्वास था। वो जानती थी कि वो सुमेर को पागल कर चुकी है। उसने अपने बालों को उलझाया नहीं, बल्कि उन्हें एक ऐसे अराजक तरीके से बिखेर दिया जो उसे और भी सेक्सी बना दे।
उसने अपने होंठों को थोड़ा और लाल किया, जैसे वो अभी-अभी चूसा गया हो।
“एकदम बढ़िया!,” उसने खुद से कहा।
उसका दिमाग अब अपने ‘अगले लक्ष्य’ की तरफ बढ़ रहा था। उसे पता था कि अब उसे क्या करना है। उसे सुमेर को यह महसूस कराना है कि वो उसकी है, पूरी तरह से।
और फिर, धीरे-धीरे, उसे उसे अपने परिवार के पास लाना होगा। उसे पता नहीं था कि वो इसे कैसे करेगी, लेकिन उसे भरोसा था कि जैसे ही उसने अपनी चूत का जादू दिखाया, सुमेर सब कुछ मान जाएगा।
उसने दरवाज़े की तरफ कदम बढ़ाया। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था, लेकिन उत्साह के मारे। वो एक शिकारी थी जो अपने शिकार को फाँस में फंसा चुकी थी और अब उसे काटने के लिए तैयार थी।
उसके चेहरे पर एक भोली, भगवान को डरने वाली बहू का मुखौटा था, लेकिन उसकी आँखों के पीछे एक ऐसी रांड छुपी थी जो अपने पिता की साज़िश को अंजाम देने के लिए किसी भी हद तक जा सकती थी।
बाथरूम का दरवाज़ा खुलते ही गौरी बाहर निकली। उसके बाल गीले थे और शरीर पर सिर्फ एक पतला सा टॉवल लिपटा हुआ था। उसकी आँखें बिस्तर पर टिकी थीं, जहाँ सुमेर बेफ़िक्र मुद्रा में सो रहा था।
वो सो चुका था—गहरी नींद में, उसका सांस खींचते हुए। उसका वो लौड़ा, जो पहले एक लोहे की रॉड की तरह खड़ा था, अब ढीला पड़ा हुआ था और उसकी जांघ पर पड़ा था।
गौरी के चेहरे पर एक हल्की सी निराशा और हैरानी थी। “बस हो गया?” उसने फुसफुसाया, एक ठठ्ठे की आवाज़ में। “इतनी जल्दी थक गए?”
उसकी चूत में अभी भी एक खुजली महसूस हो रही थी। वो उम्मीद कर रही थी कि वो बाहर आएगी और उसे फिर से अपना शिकार बनाएगी। लेकिन शायद उसका दिल भी उससे राहत महसूस कर रहा था।
उसने टॉवल फेंक दिया और बिस्तर पर चढ़ गई। उसने धीरे से सुमेर के पास जाकर उसकी गर्म सांसों को महसूस किया। वो उसकी बाँह के नीचे सरक गई और अपना सिर उसकी छाती पर टिका लिया।
उसकी गांड अभी भी दर्द कर रही थी, लेकिन वो उसके करीब जाकर सुकून महसूस कर रही थी।
अगले कुछ दिन हवेली में एक दूसरी ही दुनिया बन गई। वो वो हवेली नहीं रही जहाँ परंपराओं की दीवारें खड़ी थीं; वो एक वेश्यालय बन गई थी जहाँ वासना ही एकमात्र धर्म था।
सुमेर और गौरी ने चुदाई को अपनी दिनचर्या बना लिया था। वो सिर्फ रात को बिस्तर पर ही नहीं, बल्कि दिन में कहीं भी, कभी भी एक-दूसरे को खा जाते थे।
एक दोपहर की बात है। गौरी रसोईघर से फल का प्याला लेकर आ रही थी। सुमेर ने उसे गलियारे में रोक लिया। उसने प्याला उसके हाथ से छीनकर ज़मीन पर फेंक दिया—खट्टाहट! फल फर्श पर बिखर गए।
गौरी के हाथ से प्याला छूटते ही सुमेर ने उसे दीवार से चिपका लिया। उसने उसके घाघरे को उठाया और बिना किसी चेतावनी के अपना लौड़ा उसकी चूत में घुसेड़ दिया। गौरी ने सिसकी भरी।
उसकी पीठ ठंडी दीवार से सटी हुई थी और सामने सुमेर उसे ज़ोर-ज़ोर से धक्के दे रहा था। नौकर-चाकर वहाँ से गुज़र रहे थे, लेकिन सुमेर को फ़र्क नहीं पड़ता था। वो उसकी चूचियों को मसल रहा था और उसके कानों में कह रहा था, “ले साली, यह ले! मेरा लंड ले!”
दूसरे दिन शाम को। बड़ा दरबार हॉल। ठाकुराइन आराम कुर्सी पर बैठी थीं। सुमेर ने गौरी को वहीं, उसी हॉल के बीचों-बीच, गलीचे पर लिटा दिया। गौरी शर्म से पानी-पानी हो रही थी। उसने धीरे से कहा, “साहब, माँ यहाँ हैं… वो देख रही हैं…”
सुमेर ने अपना लौड़ा बाहर निकाला और उसके चेहरे पर मारा। “चुप कर! उन्हें कोई एतराज़ नहीं है।”
फिर उसने ठाकुराइन की तरफ देखा और बोला, “माँ, आप बता रही थीं ना कि हमें वारिस चाहिए? तो देखिए, मैं काम में लगा हूँ।”
ठाकुराइन ने अपनी चाय की चुस्की ली और ठंडे दिमाग से कहा, “हाँ बेटा, बिल्कुल। समय बर्बाद न करो। इसे चोदो, और जल्दी से बच्चा पैदा करो। अगर तुम्हें मेरे सामने चोदने में मज़ा आता है, तो चोदो। हमें फ़र्क नहीं पड़ता।”
गौरी को अपनी सास के इन शब्दों पर विश्वास नहीं हो रहा था। लेकिन सुमेर ने फिर से उसकी चूत में अपना लौड़ा ठूँस दिया, और गौरी की सिसकारियाँ दरबार में गूँजने लगीं।
एक बार तो बाग में। ठंडी हवा चल रही थी। सुमेर ने गौरी को एक बड़े पेड़ के सहारे खड़ा किया। उसने उसकी साड़ी को कमर से ऊपर उठा दिया। गौरी ने मना किया, “साहब, कोई देख लेगा। यहाँ बाग में माली काम कर रहे हैं।”
“देखने दो,” सुमेर ने कहा, उसकी गांड पर थप्पा मारते हुए। “माँ ने कहा है कि हमें कहीं भी, कभी भी चुदवाना चाहिए। जब तक हमें वारिस नहीं मिल जाता, हमें रुकना नहीं है।”
और फिर उसने उसे वहाँ खड़े-खड़े चोद डाला। गौरी के मुँह से आवाज़ निकलने से रोकने के लिए सुमेर ने उसके होंठों को अपने हाथ से दबा दिया। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन उसकी चूत पानी छोड़ रही थी।
छत पर भी वो दोनों सुरक्षित नहीं थे। चांदनी रात में, सुमेर ने गौरी को बालकनी की रेलिंग पर झुकाया। सुमेर ने पीछे से उसमें अपना लौड़ा पेल दिया। गौरी डर के मारे कांप रही थी कि कहीं वो नीचे न गिर जाए। लेकिन सुमेर उसे ऐसे चोद रहा था जैसे वो दुनिया का आखिरी चोदा जा रहा हो।
शुरू में गौरी को यह सब अजीब लगता था। वो हिचकिचाती थी। वो शर्मिंदा महसूस करती थी। लेकिन जब सुमेर ने उसे बताया कि यह सब ठाकुराइन के आदेश से हो रहा है, तो उसका डर गायब हो गया। उसे लगा कि शायद यह इस खानदान की परंपरा है—वारिस पैदा करने के लिए बेशर्मी ज़रूरी है।
लेकिन एक दिन, जब सुमेर ने उसे फिर से अपनी माँ के आदेश का हवाला देकर किचन के फर्श पर चोदा, तो गौरी के दिमाग में एक ख्याल आया। वो सुमेर की माँ, ठाकुराइन के बारे में सोचने लगी।
कोई भी माँ अपने बेटे से ऐसी बातें करती हैं क्या? ‘बेटा, जब तक बच्चा न हो, उसे कहीं भी चोदो। चाहे मेरे सामने ही क्यों न चोदो।’
गौरी को यह सब बहुत अजीब लगा। ठाकुराइन एक सियासी औरत थीं। वो जानती थीं कि क्या सही है और क्या गलत। फिर वो अपने बेटे और बहू को इतना खुला चोदते हुए कैसे देख सकती थीं?
गौरी को अपने अपने परिवार की याद आ गई। उसके माता-पिता ने उसे कैसे तैयार किया था। क्या ठाकुराइन भी… क्या वो भी उसी तरह की ‘प्रशिक्षित’ औरत हैं?
उसकी आँखों में एक चमक आई। उसे अपने अंदाज़े पर पूरा भरोसा था। वो जानती थी कि एक औरत कभी अपने बेटे को ऐसी आज़ादी नहीं दे सकती, जब तक कि वो खुद उस खेल का हिस्सा न हो।
ठाकुराइन की आँखों में वो वासना नहीं थी, लेकिन वो एक गहरी समझ थी। वो समझ रही थीं कि सुमेर क्या कर रहा है।
गौरी को अब एक बात साफ़ हो गई थी—उसने अपनी सास को पहचान लिया था। ठाकुराइन कोई आम माँ नहीं थीं; वो एक अनुभवी, खानदानी ‘रांड’ थीं, जिन्होंने शायद अपने समय में कई पुरुषों को अपनी चूत के जाल में फंसाया था।
लेकिन गौरी भी अब वहीं की चाल चलना जानती थी। वो जानती थी कि अपने पिता राम सिंह के लक्ष्य को आगे बढ़ाने के लिए, उसे सुमेर पर अपनी पकड़ मज़बूत करनी होगी और साथ ही उसे ठाकुराइन से भी निपटना होगा।
कोई भी माँ अपने बेटे को किसी और के हवाले आसानी से नहीं कर सकती, खासकर जब वो बेटा इतना बड़ा साम्राज्य हो। लेकिन गौरी ने तय कर लिया था—वो सुमेर का पूरा ध्यान अपनी ओर खींचेगी और अपनी मर्ज़ी का राजा बनाएगी।
एक दिन दोपहर का समय था। ठाकुराइन के हुक्मों के मुताबिक़, सुमेर ने गौरी को ऊपरी गलियारे में ही घेर लिया था। गौरी एक भारी लहंगे में थी, लेकिन अभी वो उसके कमर तक उठा हुआ था। सुमेर ने उसे खड़े होकर कुतिया बनने को कहा था।
गौरी ने अपने हाथ दीवार पर टिकाए और अपनी गांड को पीछे की तरफ उछाल दिया।
सुमेर पीछे खड़ा होकर उसकी चूत में लगातार धक्के मार रहा था। उसका मोटा लौड़ा गौरी की चूत की दीवारों को चीरता हुआ अंदर-बाहर जा रहा था। चूत से ‘फच्च-फच्च’ की आवाज़ आ रही थी।
गौरी की चूचियाँ लहंगे के ऊपर से बाहर निकल आई थीं और हवा में लटक रही थीं। सुमेर के हर ज़ोरदार धक्के के साथ वो चूचियाँ ज़ोर-ज़ोर से हिल रही थीं, मानो दो पके हुए आम पेड़ से टकरा रहे हों।
“आह्ह… साहब… धीरे… बहुत अन्दर तक जा रहा है,” गौरी नकली शर्म के साथ बोली।
“चुप रंडी, चुपचाप मज़ा ले,” सुमेर ने उसकी कमर पर ज़ोर से थप्पा मारा और और तेज़ी से चोदने लगा।
तभी गलियारे के एक सिरे से ठाकुराइन आती दिखाई दीं। उनके हाथ में एक चांदी की चायदानी थी। जैसे ही उन्होंने अपने बेटे को बहू को चोदते हुए देखा, उनके चेहरे पर एक संतुष्ट मुस्कान आ गई।
यही तो वही दृश्य था जो वो चाहती थीं—उनका बेटा अपनी ज़िम्मेदारी निभा रहा था। वो सुमेर की तरफ देखकर मुस्कुराईं, जैसे कह रही हों कि वो उनकी बात मान रहा है।
ठाकुराइन उनके पास से गुज़रने लगीं। सुमेर ने अपनी आँखें बंद कर लीं और चुदाई के मज़े में खो गया। गौरी ने ठाकुराइन को आते हुए देखा। उसके दिमाग में एक शैतानी तरकीब आयी। वो जानती थी कि इस वक़्त वो क्या करने वाली है।
जैसे ही ठाकुराइन उनके पास से गुज़र कर थोडा आगे बढ़ी, गौरी ने अपनी आवाज़ तेज़ कर दी। वो अब बस चुदवा नहीं रही थी, वो अपनी बात रख रही थी।
“हाँ साहब! चोदो मुझे! ज़ोर से चोदो!” गौरी ने ज़ोर से चीखा। “आह्ह! बस ऐसे ही पेलो… मैं आपको वारिस ज़रूर दूँगी!”
सुमेर को लगा वो सिर्फ चुदाई का मज़ा ले रही है, लेकिन गौरी के शब्दों में एक और मतलब छुपा था।
“हाँ मेरे राजा, जब हमारा बेटा होगा,” गौरी ने और ज़ोर से कहा, अपनी आवाज़ को ठाकुराइन तक पहुँचाने के लिए, “तो यह सारी परशानी खत्म हो जाएगी। और फिर… फिर हम दोनों, मैं और आप, अपने बेटे के साथ मिलकर इस पूरे हवेली पर राज करेंगे!”
यह सुनकर ठाकुराइन के क़दम अचानक थम गए। उनकी आँखें खुली की खुली रह गईं और उनका चेहरा क्रोध और हैरानी से लाल हो गया। वो घूमीं और पीछे मुड़कर देखा।
गलियारे में चुदाई जारी थी। सुमेर की आँखें बंद थीं, वो अपनी दुनिया में मस्त था, लेकिन गौरी उनकी आँखों में देख रही थी। उसके चेहरे पर एक शातिर, चालाक मुस्कान थी। वो अपनी सास को घूर रही थी। वो मुस्कुरा रही थी जैसे कह रही हो—”अब मैं यहाँ मालिक हूँ, तुम नहीं।”
गौरी के चेहरे पर वो ताकत झलक रहा थी। वो साफ़ बता रही थी कि अब सुमेर पर उसका हक़ है, और वो उसके बेटे के ज़रिए इस राजघराने की बागडोर अपने हाथ में ले लेगी।
ठाकुराइन का चेहरा बिगड़ गया। उन्होंने अपने जबड़े कस लिए और सुमेर को देखा, जो अभी भी बेवकूफ़ी से गौरी की चूत में लौड़ा पेल रहा था। उनके दिमाग में गालियों का दौर चल पड़ा।
‘कितने बेवकूफ़ होते हैं ये मर्द,’ उन्होंने सोचा, गुस्से से कांपते हुए। ‘ये नहीं समझते कि औरतें उन्हें कैसे इस्तेमाल करती हैं। ये सोचते हैं कि ये चोद रहे हैं, जबकि सच यह है कि इनकी आँखों में धूल झोंक रही हैं। मेरा बेटा… मेरा ही खून मेरे खिलाफ़ इस्तेमाल हो रहा है।’
फिर ठाकुराइन ने गौरी की तरफ तीखी, क्रोधित नज़र से देखा। लेकिन गौरी वहाँ टिकी हुई थी, सुमेर के हर धक्के के साथ आगे पीछे हो रही थी, लेकिन उसकी नज़र अभी भी उन पर जमी हुई थी। उसकी वो मुस्कान अभी भी वहीं थी—एक चुनौती। वो कह रही थी कि वो अब यहाँ काबिज़ हो चुकी है।
ठाकुराइन सामने की तरफ मुड़ीं। उनका गुस्सा चरम पर था। वो ज़ोर से क़दम रखते हुए, ताली बजाते हुए, गुस्से में लाल होते हुए वहाँ से चल दीं। उनके क़दमों की आवाज़ पूरी हवेली में गूँज रही थी।
उस दिन के बाद हवेली में हर जगह वासना का भूत घूमने लगा। ठाकुराइन के आदेश अब सुमेर के लिए कानून बन चुके थे, और वो उन्हें बिना सोचे-समझे मानता चला गया। चाहे दिन हो या रात, सुमेर का लौड़ा गौरी की चूत या गांड में ही घुसा रहता था।
खाने की मेज़ पर, जहाँ पहले शाही खाना परोसा जाता था, वहाँ अब गौरी की चूचियाँ और चूत रद्दी हो रही थीं। एक शाम सुमेर ने गौरी को खाने की थाली साइड में धकेल दी और उसे मेज़ पर चढ़ा लिया। उसने उसकी लहंगा की घेरबंद ऊपर उठाई और बिना किसी पूर्व-तैयारी के अपना पूरा लौड़ा उसकी चूत में पेल दिया।
“आआह्ह! साहब! वहाँ… वो दीवार… टकरा रही है!” गौरी चीख पड़ी, लेकिन उसकी आवाज़ में दर्द कम और एक जानबूझकर बढ़ाया हुआ जोश ज्यादा था।
सुमेर उसे ऐसे चोद रहा था जैसे वो एक कच्चे मांस के टुकड़े को कतर रहा हो। मेज़ के पैर ज़मीन पर खिंचाते हुए ‘खट्ट-खट्ट’ की आवाज़ कर रहे थे। सुमेर गौरी के बालों को अपनी मुट्ठी में जकड़कर उसका सर पीछे की तरफ खींच रहा था। “चुप कर रांड! ले मेरा लंड! तूने मुझे पागल कर दिया है!”
थोड़ी दूर, सोफे पर बैठी ठाकुराइन का चेहरा देखने लायक था। उन्होंने अपने हाथ में चाय की प्याली रखी थी, लेकिन उनकी उंगलियाँ कांप रही थीं। उन्होंने अपने बेटे को उस अवस्था में देखा—एक पशु की तरह, अपनी पत्नी को रौंदते हुए।
लेकिन उनका दर्द यह नहीं था कि सुमेर कितना बेशर्म है; दर्द इस बात का था कि सुमेर अब उनका नहीं रहा।
गौरी ने अपनी आँखें खोलीं और सीधे ठाकुराइन को देखा। उसके होंठों पर एक विजेता की मुस्कान थी। उसने जानबूझकर अपनी चूत की दीवारों को सुमेर के लौड़े पर दबाया और एक ज़बरदस्त सिसकारी निकाली—”आआअह्ह्ह! हाँ! साहब! और जोर से..आआह..हह! बस ऐसे ही! आप बहुत बड़े शेर हो!”
यह सुनकर ठाकुराइन का दिल खिन्न हो गया। यह चीख सिर्फ वासना नहीं थी; यह एक घोषणा थी। गौरी उन्हें बता रही थी कि अब सुमेर का लौड़ा और दिमाग दोनों उसी के कब्ज़े में हैं।
ठाकुराइन को अपनी गलती का एहसास हो रहा था। उन्होंने सोचा था कि एक नादान, चुदक्कड़ लड़की रखकर वो सुमेर को खुश रखेंगी और अपना साम्राज्य संभालेंगी। लेकिन उन्हें पता नहीं था कि वो लड़की खुद एक सांप थी, जो दूध पी-पीकर बड़ी हुई है।
उनके बेटे की अक्ल पर जो असर उन्होंने सालों में नहीं की, गौरी ने कुछ दिनों में कर दी।
‘यह लड़की मेरे बेटे को चोद नहीं रही, यह उसे खा रही है,’ ठाकुराइन ने सोचा, अपनी मुट्ठी कसते हुए। उन्हें अपने बेटे के लिए एक माँ के रूप में असुरक्षा महसूस हो रही थी। वो देख रही थीं कि कैसे सुमेर हर रात गौरी की चूत में अपना वीर्य उड़ेल रहा है और गौरी उसे अपने पैरों में रखकर अपनी बला दे रही है।
यह एक मनोवैज्ञानिक युद्ध था, जिसमें गौरी जीत रही थी। हर चुदाई का दृश्य ठाकुराइन के लिए एक तमाचा था। और सबसे बड़ी बात—सुमेर को इस बात का कोई अंदाज़ा तक नहीं था।
वो सोचता था कि वो एक शानदार जीवन जी रहा है, जबकि हकीकत यह थी कि वो दो माँ-बेटी जैसी शिकारियों के बीच फंसा हुआ एक मोहरा था।
कुछ दिन इसी तरह बीत गए। हवेली में चुदाई की गूँज और ठाकुराइन की चुप्पी एक-दूसरे को चुनौती दे रही थीं। फिर आया वो दिन जब रीति के अनुसार नवविवाहित जोड़े को दुल्हन के मायके जाना होता है।
सुबह होते ही हवेली के मुख्य द्वार पर एक शानदार कार खड़ी थी। सुमेर और गौरी तैयार होकर बाहर आए। सुमेर ने एक रॉयल सूट पहना था, जबकि गौरी एक भारी, सुनहरी जरी की चूड़ीदार साड़ी में कातिलाना खूबसूरत लग रही थी। उसकी आँखों में विजय का गर्व था।
ठाकुराइन दरवाज़े पर खड़ी थीं। उनका चेहरा उदास और चिंतित था। उनके चेहरे पर झुर्रियों का एक नया जाल पड़ गया था, जो उनके तनाव को बयान कर रहा था। उन्हें डर लग रहा था।
वो जानती थीं कि गौरी अपने मायके जाकर अपने माता-पिता के साथ मिलकर सुमेर को और भी अपने वश में कर लेगी। शायद वो उसे वहाँ राम सिंह के सामने भी चुदवाएगी… या शायद कुछ और बदतर।
“जाइए बेटा,” ठाकुराइन ने सुमेर के गले में बाहें डालकर कहा, उनकी आवाज़ में एक अजीब सी नर्मी थी, जो उनके अंदर के डर को छिपा रही थी। “हमारी चिंता मत करना। और… खुद का ख्याल रखना।”
सुमेर ने मुस्कुराकर उन्हें गले लगाया। “घबराओ मत माँ, मैं अपनी पत्नी के साथ ठीक हूँ। हम कुछ दिनों में लौट आएंगे।”
फिर सुमेर कार में बैठ गया। गौरी दरवाज़े पर रुकी हुई थी।
उसने अपनी झुकी हुई पलकें उठाईं और सीधे ठाकुराइन की आँखों में देखा। उसकी आँखों में कोई सम्मान या भय नहीं था, बल्कि एक गहरी, शातिर शरारत थी। उसके होंठों के कोनों पर वही चालाक मुस्कान बिजली की तरह फैल गई।
वो मुस्कान कह रही थी—”सुन लो बूढ़ी, अब मैं चली। तुम्हारा बेटा अब मेरा है, और जब मैं वापस आऊँगी, तो यह हवेली मेरे पैरों में होगी।”
ठाकुराइन का दिल एक बार फिर से धड़क उठा। उन्होंने देखा कि गौरी के चेहरे पर वो भोली बहू का मुखौटा एकदम गायब हो गया था। अब वो सामने जो खड़ी थी, वो एक ऐसी शिकारी थी जिसे अपना शिकार मिल चुका था।
ठाकुराइन के हाथ में जो चाय की प्याली थी, वो अब इतनी ठंडी हो चुकी थी जितनी उनकी आँखें। वो चाहती थीं कि वो उसे थप्पड़ मारें, उसे रोकें, लेकिन उनकी ज़बान पर शब्द नहीं आए। वो जानती थीं कि अगर अभी बवाल मचेगा, तो सुमेर का गुस्सा उन पर आएगा, न कि गौरी पर।
गौरी ने अपना सिर ऊपर उठाया और ठाकुराइन के सामने से गुज़रते हुए एक कदम आगे बढ़ाया। वो अपनी कमर को एक खास अंदाज़ में हिला रही थी, जैसे वो अपनी जवानी और अपनी चूत की ताकत का जलवा बिखेर रही हो।
उसकी चूड़ियाँ खनक रही थीं, लेकिन ठाकुराइन को लगा जैसे वो खनकने की आवाज़ उनकी हार का संगीत है।
गौरी कार के पास पहुँची। ड्राइवर ने उसके लिए दरवाज़ा खोला। उसने सीट पर बैठने से पहले एक आखिरी बार पीछे मुड़कर देखा। ठाकुराइन अभी भी वहीं खड़ी थीं, मूर्ति की तरह जमी हुई। गौरी ने एक हल्की सी आँख मारी और फिर कार के अंदर समा गई।
कार का इंजन गरज़ा। सुमेर ने गाड़ी की खिड़की से बाहर निकलकर अपनी माँ को विदा दी। उसका हाथ हवा में लहरा रहा था। “चलिए माँ! जल्दी मिलते हैं!”
ठाकुराइन ने भी हाथ हिलाया, लेकिन उनका चेहरा अब एक सूखी हुई पत्थर की तरह था। उन्हें लग रहा था जैसे उनका अपना खून उनसे छीना जा रहा हो। वो देख रही थीं कि कैसे कार धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।
फिर, एक पल आया जब कार मोड़ कर गली के कोने पर चली गई और फिर दृश्य से गायब हो गई। सिर्फ उसके पीछे उठती हुई धूल का गुबार और टायरों की आवाज़ बची थी।
ठाकुराइन अकेले खड़ी रह गईं। हवा उनके बालों को बिखेर रही थी। उनके सामने वही सूना दरवाज़ा था और पीछे वही खाली हवेली, जो अब उन्हें अपनी ही तरह बूढ़ी और असहाय लग रही थी।
उनकी आँखों के सामने गौरी की वो अंतिम मुस्कान तैर रही थी—एक ऐसी मुस्कान जो उन्हें आने वाले समय के तूफान की चेतावनी दे रही थी।
उन्हें पता था कि जब यह कार वापस लौटेगी, तो उसके साथ उनका बेटा भी वापस आएगा, लेकिन वो बेटा अब वही नहीं होगा जो आज था। वो पूरी तरह से गौरी का हो चुका होगा… और शायद, राम सिंह का भी।