निशा शर्मा, अभी-अभी अठारह की हुई थी, लेकिन उसके कूल्हे और चेहरे की मासूमियत ये झूठ बोलती थी कि वो अभी भी एक किशोरी है।
गोरी-चिट्टी, थोड़ी पतली काया, और उस पर वो छोटे-मध्यम स्तन, जो अक्सर उसके टी-शर्ट के नीचे से एक छोटी सी डलाल की तरह उभरते रहते थे।
उसके गोल कटोरे जैसे कूल्हे उसकी कमर के नीचे एक आकर्षक घाटी बनाते थे, और वो अपनी चूत को हमेशा मुलायम और चिकनी रखती थी,
शायद यह एक अचेतन तैयारी थी उस जवानी की, जो अब उसके अंदर जाग रही थी। वो प्रसाद और गीता शर्मा की इकलौती संतान थी,
और इसी वजह से घर में उस पर हर समय नजर रखी जाती थी।
उसके पिता, प्रसाद शर्मा, उसी कॉलेज में स्पोर्ट्स टीचर थे जहाँ निशा पढ़ती थी।
48 की उम्र में भी वो एक हट्टा-कट्टा, चौड़े कंधों वाला आदमी था, जिसकी 56 इंच की छाती और कसी हुई बाहों का हर कोई कायल था।
स्पोर्ट्स टीचर होने का फायदा था कि उसका शरीर उम्र के अनुसार बिल्कुल भी ढीला नहीं पड़ा था।
कॉलेज की लड़कियाँ और यहाँ तक कि महिला टीचर्स भी उस पर लाइन मारते हुए उसे घूरती रहती थीं, लेकिन प्रसाद अपने सख्त और थोड़े पुराने विचारों वाले अनुशासित इंसान थे।
उसे औरतों के छोटे कपड़े पहनने और आज़ादी से घूमने से चिढ़ थी, और शायद इसीलिए उसके घर का माहौल हमेशा किसी ट्रेनिंग कैंप जैसा रहता था।
लेकिन निशा उसकी लाडली बेटी थी। अगर वो किसी ड्रेस की ज़िद करती, तो प्रसाद उसे मना नहीं कर पाता था।
उसकी एक ही बेटी थी, उसकी हर ख्वाहिश पूरी करना उसकी फ़र्ज़ बनता था।
निशा के लिए भी उसके पापा एक हीरो थे। उसे पता था कि कॉलेज में हर लड़की उन्हें किस नजर से देखती है।
शुरुआत में उसकी सहेलियाँ जब उसके पापा के बारे में गंदे मज़ाक करती थीं, तो निशा को बुरा लगता था।
पर दोस्ती की दुनिया में ये सब चलता है, इसलिए वो चुप रहती।
पर जैसे-जैसे वो बड़ी होती गई और उसकी जवानी फूटने लगी, उसकी सहेलियों के मज़ाक भी और भड़काऊ होते गए। अब वो खुलेआम उसके सामने अपनी ख्वाहिशें ज़ाहिर करती थीं।
“अरे निशा, कल रात तो तेरे पापा को सोच-सोच कर मेरी चूत में आग लग गई थी,” उसकी एक सहेली रिया ने ठहाका लगाते हुए कहा था।
दूसरी ने शर्त लगाई, “चलो बताओ, तुम्हारे पापा का लंड कितना होगा? मैं दांव लगाती हूँ 8 इंच से ज़्यादा होगा!”
वे जान-बूझकर स्पोर्ट्स पीरियड में प्रसाद के सामने झुककर अपनी चूचियाँ दिखाती या फिर जानबूझकर उनसे टकरा जातीं, बस उसके पैंट में बने तंबू को देखने के लिए।
प्रसाद शर्मा शर्मिंदा होकर बाथरूम की तरफ भागते, और ये सब निशा की आँखों के सामने होता था।
शुरुआत में तो निशा इन्हें मज़ाक ही समझती थी, पर अब उसके अपने दिमाग में भी विचार आने लगे थे।
उसकी सहेलियों की बातें उसके दिल में बीज बो रही थीं।
धीरे-धीरे, रात को अकेले में, जब वो अपनी चिकनी चूत को सहलाती, तो उसके ख्यालों में उसके पापा का कसा हुआ शरीर और वो चौड़ी छाती घूमने लगती।
वो अपनी उंगलियों को अपने दरार पर रखकर उसे उत्तेजित करती, और अपने पापा के बारे में सोचकर झड़ने की कोशिश करती।
प्रसाद के सख्त स्वभाव की वजह से निशा का कोई बॉयफ्रेंड नहीं बन पाया था। वो हमेशा डरती रहती कि कहीं उसके पिता को पता न चल जाए।
उसके 18वें जन्मदिन पर, जब उसने घर पर ही पार्टी रखी थी, तो उसकी सहेलियाँ उसे उपहार में सेक्स टॉयज़ देकर गई थीं।
“अरे बाहर तो बॉयफ्रेंड से चुदवाके वर्जिनिटी तोड़ना तुझसे हो नहीं रहा,” उन्होंने चुटकी ली थी, “इसलिए घर पर ही इन से अपनी आग बुझा लिया कर!”
उस रात से निशा की दुनिया बदल गई। वो रोज़ रात उस वाइब्रेटर का इस्तेमाल करने लगी। शुरू-शुरू में वो शर्माती थी, पर जल्द ही उसे मज़ा आने लगा।
वो वाइब्रेटर को अपनी चूत की फांकों पर रखती और उसकी कंपन से पूरे शरीर में एक सिहरन दौड़ जाती।
उसकी साँसें तेज़ हो जातीं और वो अपने पापा के बारे में ही सोचती।
उनकी मर्दाना गंध, उनकी वो मजबूत बाहें, और उनका वो सख्त, अनुशासित चेहरा… जो शायद सिर्फ़ उसके लिए ही कुछ नरम था।
और फिर एक रात ऐसी आई, जिसने सब कुछ पलटकर रख दिया।
निशा को प्यास लगी थी और वो पानी पीने के लिए किचन की तरफ गई।
आधी रात का सन्नाटा पूरे घर में छाया हुआ था। जैसे ही वो अपने कमरे से बाहर निकली, उसे कुछ कराहने की, हाँफने की आवाज़ें सुनाई दीं।
वो आवाज़ें उसके मम्मी-पापा के बेडरूम से आ रही थीं।
उसके दिमाग में पहले तो डर आया, कि कहीं उन्हें कुछ हुआ तो नहीं। वो धीरे-धीरे उस दरवाज़े की तरफ गई।
दरवाज़ा पूरी तरह से बंद नहीं था, एक छोटी सी दरार थी।
उसने उस दरार से अंदर झाँका।
जो नज़ारा उसने देखा, उससे उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं और उसके पूरे बदन में बिजली सी दौड़ गई।
दीवार के पास लगे हुए डिम लाइट में, उसके पिता प्रसाद का पूरा नंगा जिस्म पसीने से चमक रहा था।
उनकी वो मजबूत पीठ, जिस पर मांसपेशियाँ इस कदर उभरी हुई थीं, मानो कोई मूर्तिकार ने धीरे-धीरे उन्हें तराशा हो।
उनकी चौड़ी छाती हाँफते हुए ऊपर-नीचे हो रही थी। और उनकी गोद में, उनकी हरकतों का केंद्र, वो चीज़ थी जिसके बारे में निशा और उसकी सहेलियाँ हफ्तों से कयास लगा रही थीं।
प्रसाद का 9 इंच लंबा और 3 इंच से भी ज़्यादा मोटा लंड, एक लोहे की रॉड की तरह कड़क और फूला हुआ था।
उस पर नसें साफ दिखाई दे रही थीं, जो उसकी गर्मी और ताकत की गवाह दे रही थीं।
वो भयानक हथियार अभी उसकी माँ गीता की चूत में धँसा हुआ था और बेतहाशा गति से अंदर-बाहर हो रहा था।
गीता की हालत तो और भी बेकाबू थी। वो कुतिया की मुद्रा में, अपनी गांड को बुलंद किए हुए थी।
उसका मुँह तकिए में दबा हुआ था, शायद इसलिए कि उसकी चीख़ें पूरे घर में न गूंजें।
पर वो दबी हुई कराहें, “आँह… उईई… मार डाला प्रसाद… आहह…” की आवाज़ें दरवाज़ की दरार से निशा के कानों तक पहुँच रही थीं।
प्रसाद, गीता की कमर को कसकर पकड़े हुए थे, और अपने कूल्हों की पूरी ताक़त से वो धक्के मार रहे थे।
उनके लंड का गीता की चूत में प्रवेश और बाहर निकलना, “पच… पच… पच… पच” की तेज़, गीली आवाज़ बना रहा था।
कभी-कभी, वो रुककर गीता की चिकनी गोल गांड पर एक तड़ातड़ झापड़ लगाते, जिससे गीता का शरीर एकदम से कांप उठता और उसकी कराह और भी तेज़ हो जाती।
बाहर, दरवाज़ के पीछे खड़ी निशा की हालत खराब हो चुकी थी। उसके पैरों तले ज़मीन खिसक रही थी।
उसका एक हाथ, उसे खुद भी पता नहीं कब, उसकी नाइटी के नीचे से उसकी पैंटी में समा गया था।
उसकी चूत पहले से ही बहुत गीली थी, और जैसे ही उसकी उंगलियाँ अपनी चिकनी दरार पर छुईं, तो उसके मुँह से एक हल्की सिसकारी निकल गई।
वो अपनी चूत को मसलने लगी, पहले धीरे-धीरे, फिर अपने पिता की चुदाई की रफ़्तार के साथ ही तेज़ी से।
उसकी टाँगें कांपने लगी थीं। अंदर का नज़ारा उसे बेहोश करने वाला था।
उसका हीरो, उसके सख्त पिता, एक जानवर की तरह उसकी माँ को चोद रहा था, और यह नज़ारा उसे इतना उत्तेजित कर रहा था कि उसका बस चले तो वो दरवाज़ा तोड़कर अंदर घुस जाए।
अंदर, चुदाई अपने चरम पर थी। बिस्तर का सिरा ज़ोर-ज़ोर से दीवार से टकरा रहा था, “धम-धम-धम”, और गीता की चीखें भी अब तकिए में दबकर भी ज़ोर से आ रही थीं।
प्रसाद के होंठों से भी गहरी, सिसकियों भरी आवाज़ें निकल रही थीं।
“ले… ले साली… आज तेरी चूत की आग बुझा देंगे… ले मेरा पूरा लंड… आहहह…”
और फिर अचानक, प्रसाद ने एक ज़बरदस्त धक्का मारा। वो गीता की चूत के अंदर ही झड़ने लगे।
“आ..आ..आहा..हाहाहा… माँ… गीता… मैं छूट रहा हूँ…” उनकी आवाज़ थकी-हारी और संतुष्ट थी।
बिल्कुल उसी पल, बाहर दरवाज़ के पीछे खड़ी निशा का भी शरीर एक दबी हुई चीख के साथ झड़ गया।
उसकी आँखें बंद हो गईं और उसके पूरे शरीर में ऐसी सिहरन दौड़ गई, जैसी उसने अपनी ज़िंदगी में पहले कभी महसूस नहीं की थी।
वो दरवाज़े से चिपकी रही, उसकी साँसें रुकी हुई थीं।
अंदर, प्रसाद ने अपना लंड गीता की चूत से ज़ोर से बाहर निकाला। “फच्च!” की एक गीली, तेज़ आवाज़ हुई।
इसी आवाज़ से निशा की तंद्रा टूटी और उसकी आँखें खुल गईं। उसने देखा कि प्रसाद का वो विशाल लंड, अब गीता की चूत के रस से लथपथ, थकान से लटक रहा था।
निशा को अपनी हालत का एहसास हुआ। वो तुरंत पीछे हटी और जान से भागती हुई अपने कमरे में दौड़ गई।
वो अपने बिस्तर पर गिर पड़ी, उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। उसने अपनी पैंटी को महसूस किया, जो उसके पानी से पूरी तरह भीग चुकी थी।
उसने अभी तक जितनी भी बार वाइब्रेटर से या उंगली से झड़ी थी, यह उन सबसे कहीं ज़्यादा तीव्र था।
उसने आज अपने मम्मी-पापा को चोदते हुए देखा था।
खासकर, उसने अपने पापा के उस लंड को आज पहली बार अपनी आँखों से देखा था, जिसके बारे में वो इतने सालों से सिर्फ़ कल्पना ही करती रही थी।
खुशी से उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान आ गई। वो अपने बिस्तर पर कूद पड़ी।
सोने से पहले, उसने आँखें बंद की और फिर से उस नज़ारे को याद किया।
उसके पिता का वो पसीने से चमकता शरीर, उनका वो मोटा लंड, और उनकी वो आवाज़… उसका हाथ फिर से अपने नीचे चला गया।
इस बार धीरे-धीरे, उसने अपनी चूत को सहलाया, उस झटके को याद करते हुए, और थोड़ी ही देर में वो एक बार फिर झड़ गई।
वो नज़ारा अब उसकी ज़िंदगी में हमेशा के लिए उसके दिमाग में छप गया था।