निशा की ख्वाहिश, आखिरकार पापा ने पूरी की..पार्ट ४

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पिछले भाग में हमने देखा की कैसे प्रसाद निशा को पनिशमेंट देते देते अपनी हद खो बैठे और खुद अपनी बेटी निशा की चूत चाटने लगे, और कैसे खुद निशा ने चालाकी से भोलेपन का नाटक करते हुए , अपने पापा से मज़े लिए.. और अब वो निशा के बेडरूम में जा रहे थे ..अगर आपने वो पार्ट नहीं पढ़ा तो यंहा निशा की ख्वाहिश, आखिरकार पापा ने पूरी की..पार्ट ३ क्लिक करके पढ़ सकते है … अब आगे..

प्रसाद और निशा दोनों लिविंग रम से निशा के कमरे में आये,यह वही कमरा था जहाँ निशा के बचपन के खिलौने और यादें समाई हुई थीं।

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दीवार पर उसके कार्टून के पुराने, मुरझाए हुए पोस्टर लगे थे और एक कोने में उसका पुराना टेडी बियर पड़ा था, जिसकी एक आँख टूट गई थी।

पर आज, उस कमरे में एक नई ज़िंदगी की शुरुआत होने वाली थी, एक ऐसी ज़िंदगी जो नैतिकता के हर सिद्धांत को तार-तार कर देगी।

कमरे में पहुँचते ही, प्रसाद ने दरवाज़ा बंद कर दिया। ‘क्लिक’ की आवाज़ ने एक नई दुनिया की घोषणा की।

बिना एक पल गंवाए, उन्होंने अपने पजामे की नाड़ी खींची और अपना लंड, जो कैद से आज़ाद होने के लिए बेताब था, बाहर निकाल लिया।

वो एक हाथ से उसकी मालिश करने लगे, उसकी नाल मुँह की ओर इशारा करती हुई।

“लॉलीपॉप खाओगी बेटा?” उनकी आवाज़ में एक विचित्र, मासूमियत भरी बुराई थी, जैसे एक बाघ एक मुर्गिया को दाना खिला रहा हो।

निशा ने उनके मोटे, कड़क लंड को देखा, जो उनकी हथेली में एक जीवंत जानवर की तरह फड़फड़ा रहा था।

उसने घबराकर हाँ कह दी, पर उसकी आँखों में डर कम और जिज्ञासा ज़्यादा थी। “पर मुझे नहीं पता, कैसे करते है”।

प्रसाद मुस्कुराए, एक ऐसी मुस्कान जो अपने ही बेटी को निगल जाने वाली थी। “कोई बात नहीं, पापा सब सिखा देंगे। पापा अपनी गुड़िया को सब कुछ सिखायेंगे।”

वो अपना लंड लेकर निशा के मुँह के करीब पहुँचे, उसके चेहरे से निकलने वाली हल्की साँस उन्हें महसूस हुई। “जीभ निकालो।”

निशा ने डरते-डरते अपनी जीभ निकाली, एक छोटी, लाल, नाज़ुक चीज़, और अपने पापा को देखा।

प्रसाद ने अपनी छोटी सी बच्ची को देखा – उसकी बड़ी-बड़ी, काली आँखें जो अब वासना से भरी थीं, उसके गुलाबी, मुलायम होंठ, और उन होंठों से निकली हुई वह लाल, छोटी सी जीभ, जो एक निमंत्रण था।

“एक हाथ दो बेटा,” प्रसाद ने अपनी आवाज़ को और भी नर्म करते हुए कहा।

उन्होंने धीरे से निशा का एक हाथ पकड़ा और उसके छोटे से हाथ में अपना गर्म, मोटा लंड थमा दिया। निशा के हाथ में उनका लंड समाया नहीं जा रहा था।

उसके छोटे पंजे में, उसकी उँगलियाँ आधे लंड को ही पकड़ पा रही थीं। उसके लिए यह एक गर्म, जीवंत लकड़ी जैसा था, जो हर पल जीवन महसूस कर रही थी।

“दूसरे हाथ से भी पकड़ो बेटा,” प्रसाद ने हिदायत दी, अपनी बेटी की मासूमियत पर मुस्कुराते हुए। “जैसे तुम बचपन में दूध की बोतल पकड़ती थी ना, वैसे। पूरा पकड़ो।”

निशा ने दोनों हाथों से लंड पकड़ा और पूछा, उसकी आवाज़ में एक छोटी बच्ची की उत्सुकता थी, “ऐसे?”

“हाँ, बिल्कुल ठीक। अब… आ… करो… आ…आ…और जीभ निकालो।” निशा जीभ निकालते हुए बोली, “आ…आ..”

“हाँ, बिल्कुल सही! अब ना बेटा, अब ना इसको चाटो बेटा।

इसके टोपे के ऊपर से अपनी जीभ फिराओ बेटा, जैसे तुम लॉलीपॉप चाटती हो ना, वैसे…” वो उसे सिखा रहे थे, उसे भ्रष्ट कर रहे थे, और खुद इस कृत्य में आनंद महसूस कर रहे थे।

निशा ने वैसे ही अपनी जीभ से चाटना शुरू किया, जैसे उसने बचपन में लॉलीपॉप चाटे थे पर आज इस लॉलीपॉप का स्वाद कुछ और था।

यह नमकीन, कच्चा और बेहद मादक था। प्रसाद के लंड पर उसकी नाज़ुक जीभ और गुलाबी होंठ जैसे ही छुए, तो उनके मुँह से एक लंबी, कामुक सिसकारी निकल गई।

“स्सस्सस्स… हाँ… स्स…” उनकी आँखें बंद हो गईं, वो अपनी बेटी द्वारा किए जा रहे इस पाप को महसूस कर रहे थे।

“ऐसे पापा?” निशा ने अपनी आवाज़ को एक मासूम बच्ची की तरह रखते हुए पूछा, पर उसकी आँखों में चलायमान शैतानी थी।

“हाँ, शाबाश मेरी बच्ची!” प्रसाद ने कराहते हुए कहा। “वो थोडासा क्रीम था आगे… वो कैसा लगा मेरी गुड़िया को?”

निशा ने लंड को चाटते हुए ही उससे बात की, जैसे वह कोई आम बात कर रही हो। “थोड़ा नमकीन और मीठा था पापा… मुझे पसंद आया। बस इतना ही था क्या ?” उसने अपनी जिज्ञासा छुपाने की कोशिश नहीं की।

प्रसाद को उसकी बेशर्मी पर गर्व हुआ। “हम्म हम्म… हाँ… स्सस्स… बस ऐसी ही चाटती रहो बेटा, धीरे-धीरे ऊपर-नीचे करो। जब तुम ऐसा करोगी, तो फिर उसमें से ढेर सारा क्रीम आएगा।”

उन्होंने अपना हाथ उसके सिर पर रख दिया और धीरे से उसे अपनी ओर धकेलने लगे।

अगले दस मिनट तक कमरे में सिर्फ़ चाटने और चूसने की ‘चप-चप’ और ‘चुप-चुप’ की आवाज़ें गूंजती रहीं। निशा एक तेज़ चेला बनती जा रही थी।

वो अब सिर्फ़ टोपा ही नहीं, बल्कि पूरे लंड को अपनी जीभ से गीला कर रही थी। वक़्त-बे-वक़्त वो उसके अंडकोष को भी अपनी जीभ से छुआ देती, जिससे प्रसाद कांप उठते।

“कब आएगा क्रीम पापा?” निशा ने फिर से पूछा, अब उसकी आवाज़ में एक बेचैनी थी।

“अभी देता हूँ बेटा…” प्रसाद ने अपनी साँसों पर काबू खोते हुए कहा।

और फिर प्रसाद ने अपने दोनों हाथों से निशा के छोटे से सिर को पकड़ लिया। उनके हाथों में उसका सर एक छोटी सी गेंद जैसा महसूस हो रहा था, जिस पर वो पूरा अधिकार जमाना चाहते थे।

“अब अपना मुँह थोड़ा और ज़्यादा खोलकर रखना बेटा… फिर ढेर सारा क्रीम मिलेगा… ठीक है?” उनकी आवाज़ में अब एक आदेश था।

“ओके पापा…” निशा ने आज्ञाकारी होकर कहा, उसकी आँखों में उत्साह और एक अजीब सी भूख थी।

प्रसाद धीरे-धीरे अपना लंड निशा के मुँह में घुसाने लगे। जैसे ही उनका सुपारा उसकी गर्म, नम मुँह में गया, तो एक अलग ही सुख मिला। “अपनी जीभ बाहर निकालो बेटा!”

निशा मुँह खोले हुए जीभ बाहर कर ली, जिससे उसके मुँह में प्रसाद के लंड के लिए और जगह बन गई।

वो अंदर घुसता गया… “आआआह… स्सस्स…” पर तभी, “ग्गाक!” की आवाज़ आई। निशा की आँखों में पानी आ गया और वो रुक गई।

प्रसाद नीचे देखा। उनका लंड आधे से भी कम घुसा था। वो तुरंत अपना लंड बाहर निकाला, लेकिन उनके चेहरे पर चिंता नहीं, बल्कि एक अजीब सी संतुष्टि थी।

“तू ठीक है बेटा? लगी तो नहीं! तकलीफ़ हुई क्या?”

“नहीं पापा, कुछ नहीं हुआ,” निशा ने आँखें पोंछते हुए कहा, उसकी साँसें तेज़ थीं।

“ठीक है बेटा, अब मैं थोड़ा ज़ोर से आगे-पीछे होऊँगा, फिर ढेर सारा क्रीम मिलेगा… तुम तुरंत पी लेना, ठीक है?” उन्होंने अपने कृत्य को एक सबक के रूप में प्रस्तुत किया।

यह कहकर, वो फिर से निशा के मुँह में अपना लंड डालकर उसका मुँह चोदना शुरू कर दिया।

“ग्गाक… ग्गाक… ग्गाक…” की आवाज़ अब कमरे में हावी हो गई। प्रसाद अब रुक नहीं रहे थे।

वो अपनी कमर को धीरे-धीरे पेल रहे थे, हर धक्के के साथ अपना लंड उसके गले तक पहुँचा रहे थे।

निशा के आँसू अब तेज़ी से बह रहे थे, लार उसके मुँह के कोनों से टपक रही थी, पर वो नहीं रुकी। उसने अपने पिता की जाँघों को मज़बूती से पकड़ लिया था।

और अगले कुछ मिनट के बाद, प्रसाद के शरीर में एक कंपन आया।

वो कराहते हुए बोले, “अब आ रहा है बेटा… पी लो… अर्रे हाँ… पी लो मेरी रानी!” और उन्होंने ढेर सारा माल निशा के मुँह में ही झाड़ दिया।

निशा हक्की-बक्की सी रह गई। उसने सोचा नहीं था कि इतना कुछ बाहर आएगा। पर वो एक पल के लिए भी नहीं रुकी और सब कुछ बिना एक बूँद बर्बाद किए निगल गई।

“कैसा लगा मेरी गुड़िया?” प्रसाद ने हांफते हुए पूछा।

“यम्मी!” निशा ने अपने होंठों को चाटते हुए कहा और खुशी से प्रसाद को देखा। उसकी आँखों में जीत का भाव था।

“तो यहाँ थोड़ा लगकर इसे भी चाट लो,” प्रसाद बोले, अपना गीला लंड आगे करते हुए। निशा ने उसे फिर से चाट-चूसकर साफ़ कर दिया, बिना किसी झिझक के।

प्रसाद सोचने लगे, उनकी छोटी बेटी को कुछ भी नहीं पता है।

यह सिर्फ़ एक खेल है, जिसमें वो उसे सिखा रहे हैं।

पर उन्हें क्या पता… इतनी देर से निशा अपने पिता के इस बेटे को सिखाने वाले पैंतरे को कितना एन्जॉय कर रही थी और कितनी अच्छी तरह से वो उसे अपने वश में कर चुकी थी।

सारा वीर्य चाटने के बाद निशा ने अपने होंठों को जीभ से साफ़ किया और अपने पिता की तरफ़ देखा।

प्रसाद उसे एक अजीब सी नज़र से घूर रहे थे—एक ऐसी नज़र जिसमें तृप्ति के साथ-साथ एक भूख भी थी, जो अभी तक शांत नहीं हुई थी।

निशा ने अपनी आँखें नीचे की, एक शरारती, मासूम बच्चे की तरह जो कुछ माँगने के लिए ज़िद कर रहा हो।

“पापा,” उसने शिकायत की, अपनी आवाज़ में एक उदासी और तकलीफ़ घोली। “अब आप देखो ना वो रैशेस… थोड़ा दुःख रहा है यहाँ नीचे।”

उसने शर्माते हुए अपनी टांगें फैला दीं, एक ऐसा दृश्य प्रस्तुत किया जिससे कोई भी पुरुष पागल हो सकता था।

उसकी गुलाबी, गीली चूत उनके सामने थी, थोड़ी लाल और सूजी हुई उसकी पिटाई से, जिसे वो अपनी तकलीफ़ का कारण बता रही थी।

“बस देखो ना पापा, जलन हो रही है,” उसने ज़िद करते हुए कहा, एक छोटी बच्ची की तरह जिसे अपनी माँ का ध्यान चाहिए। “थोड़ा सा इलाज कर दो ना इसका।”

प्रसाद ने एक लंबी साँस ली। उनके मन में एक विचार आया—एक खतरनाक, लेकिन बहुत ही आकर्षक विचार।

वो जानते थे कि वो क्या करने जा रहे हैं, लेकिन उन्होंने अपने चेहरे पर चिंता का नाटक किया।

“अरे हाँ, मैं तो भूल ही गया!” प्रसाद ने अपने माथे पर हाथ मारा, जैसे वो वाकई एक लापरवाह पिता हों जो अपनी बेटी की बीमारी भूल गया हो।

“माफ़ करना बेटा, पापा को शर्म आनी चाहिए। तुम इतनी तकलीफ़ में हो और मैं… चलो, अभी देखता हूँ कि क्या करना है।”

वो झुककर ज़मीन पर लेट गए और निशा के पैरों के बीच अपनी जगह बना ली। उनका चेहरा अब उसकी चूत के बिल्कुल सामने था।

जैसे ही वो उसके क़रीब पहुँचे, उस गीली, गुलाबी चूत से आने वाली खुशबू ने उनके दिमाग पर हमला कर दिया।

यह वही खुशबू थी जिसने उन्हें पागल कर दिया था, और अब फिर से तनकर सलामी देने लगा।

प्रसाद ने अपनी साँसों पर क़ाबू किया, पर उनकी आँखें मस्त हो रही थीं। उन्होंने अपना चेहरा उसकी जाँघों से लगाया और एक गहरी साँस खींची।

“बेटा,” उन्होंने अपनी आवाज़ को एक विशेषज्ञ डॉक्टर की तरह बनाया, “मुझे लगता है कि तुम्हारी इस जलन और तकलीफ़ का कारण यह है कि यह रास्ता बहुत टाइट है। यह बहुत संकरा है।”

निशा ने घबराते हुए पूछा, “तो… तो क्या करें पापा?”

“इलाज है बेटा, एक ही इलाज,” प्रसाद ने धीरे से उसकी चूत की फांक पर अपनी उंगली फिराई।

“हमें इसे अंदर तक फैलाना पड़ेगा। जब यह एक बार फैल जाएगी, तो फिर कभी ऐसी जलन नहीं होगी। तुम्हारे पीरियड्स में भी दर्द कम हो जाएगा।

यह एक बहुत पुराना तरीका है, जो आम तौर पर शादी के बाद किया जाता है… पर चूँकि तुम्हें अभी बहुत तकलीफ़ हो रही है, हम अभी यह कर सकते हैं।”

निशा के चेहरे पर एक मिश्रित भाव था—डर और उत्सुकता। “क्या है वो इलाज पापा? वो कैसे फैलेगा?”

“यही जो मैंने अभी तुम्हें दिया था,” प्रसाद ने अपने खड़े लंड की ओर इशारा किया, अपनी आँखों में एक छुपी हुई लालच लेकर। “इसे अंदर डालकर। यह इसे फैला देगा।”

निशा की आँखें चौड़ी हो गईं। “अच्छा? अगर ऐसी बात है तो… please पापा, फैला दो ना इसे। Please।

मुझे पीरियड्स पर फ़्लो के वक़्त बहुत तकलीफ़ होती है। अगर यह दर्द कम कर दे, तो मैं तैयार हूँ।”

प्रसाद के अंदर का जानवर खुशी से नाच उठा। उन्होंने अपने चेहरे पर एक विनम्र मुस्कान रखा।

“हाँ, हाँ, ठीक है बेटा। ठीक है, हम इसे फैलाने की कोशिश करेंगे। पर मैं तुम्हें बता दूँ… इसमें शुरुआत में थोड़ी तकलीफ़ होगी। एक जैसे जलन होगी, शायद थोड़ा खून भी निकले।”

निशा ने डर से सिसक ली। “बाप रे! खून निकलेगा?”

“अरे, ज़्यादा नहीं, बस थोड़ा सा,” प्रसाद ने उसका हाथ थाम लिया, उसे यकीन दिलाते हुए।

“यह सिर्फ़ पहली बार होता है, जब यह फटता है। उसके बाद फिर कभी कोई जलन, या चुभने की तकलीफ़ नहीं होगी। और तुम्हारा पीरियड्स का दर्द भी गायब हो जाएगा।”

निशा ने अपने पापा की आँखों में देखा, ढूँढते हुए कि क्या वो सच बोल रहे हैं। प्रसाद ने बेईमानी से अपनी आँखों में विश्वास भर दिया।

“तो ठीक है फिर,” निशा ने एक गहरी साँस ली और अपनी आँखें बंद कर लीं, अपने आप को सौंपते हुए। “चलो करते हैं शुरू। मुझे तंग आ गयी हूँ, इस दर्द से।”

“ठीक है मेरी रानी,” प्रसाद ने कहा और धीरे-धीरे ऊपर उठकर उसके ऊपर आ गए।

उनका लंड अब पूरी तरह से तनकर तैयार था, उसकी चूत को भेदने के लिए। उन्होंने अपना सुपारा उसकी चूत के द्वार पर रखा।

“अपनी टांगें और फैला दो, बेटा,” उन्होंने कराहते हुए कहा। “और ज़ोर से मुझे पकड़ लो।”

प्रसाद ने अपना ९ इंच लंबा और ३ इंच मोटा, एकदम लोहे की तरह कड़क लंड निशा की उस छोटी सी, कोमल, गुलाबी वर्जिन चूत पर टिका दिया।

नज़ारा कुछ ऐसा था कि देखने वाला डर जाता। बस उसके लंड के सुपारे का साइज़ ही निशा की पूरी चूत के मुँह से कहीं बड़ा लग रहा था।

ऐसा लग रहा था मानो वो एक विशाल शिला है जो एक छोटे से फूल को चूर-चूर करने वाली है। प्रसाद का लंड निशा की टांगों को दो हिस्सों में बाँटने जैसा महसूस हो रहा था।

“तैयार हो बेटा?” प्रसाद ने निशा के कंधे को कसकर पकड़ते हुए पूछा। उनकी आँखों में एक अनुभवी शिकारी का भाव था।

किसी भी लड़की की पहली बार की छट-पटाहट का अहसास हर अनुभवी मर्द को होता है, और प्रसाद तो आज अपनी खुद की बेटी की कौमार्य तोड़ने जा रहे थे।

“ओफ्फो पापा… मैं तो कब से तैयार हूँ…” निशा ने उसी मासूमियत में कहा, जिसे उसने अपना हथियार बना रखा था।

“आप बेकार में ही इतना परेशान हो रहे हो… थोड़ा बहुत दर्द में तो सह सकती हूँ… और वैसे भी…”

और जैसे ही उसने बात करना शुरू किया, प्रसाद ने उसे बातों में उलझाए रखा और अचानक, बिल्कुल एक प्रोफेशनल डॉक्टर की तरह जो मरीज़ को बातों में उलझाकर चुपचाप इंजेक्शन लगा देता है,

उन्होंने अपनी कमर को झटका मारा। उनका मोटा, भारी लंड लगभग आधा एक ही झटके में निशा की चूत में घुस गया।

“आ…आ…आ!! मर गई! आ…आ! बहुत जल रहा है! आ…अ…अ!” निशा की आवाज़ चीख में बदल गई। वो तड़पने लगी।

“बहुत दुख रहा है पापा! आ…आ! निकालो! प्लीज़! मर गई!” निशा झटपटाने लगी, रोने लगी। वो अपने आपको छुड़ाने की कोशिश करने लगी, पर प्रसाद उसे जाने नहीं दे रहे थे।

“शश… बस बस… हो गया बेटा… हाँ… हो गया…” प्रसाद ने उसे कसकर पकड़ रखा था, अपना पूरा वज़न उसके ऊपर डालते हुए। “इधर देखो बेटा… मेरी तरफ देखो…”

उसने रोती हुई निशा की आँखों में देखकर कहा। निशा ने ठीक वैसा ही किया और रोते-सिसकते हुए अपने पापा की आँखों में देखने लगी।

उनकी आँखों में डर था, पर वो थोड़ा शांत हो गई। लेकिन तभी, प्रसाद ने एक और ज़ोर का झटका दिया।

फच्छ!!

उन्होंने पूरा लंड निशा की चूत को फाड़ते हुए अंदर घुसा दिया। निशा की कौमार्य का पर्दा एकदम टूट गया। प्रसाद ने लंड को वहीं दबाए रखा।

उनकी गोटियाँ निशा की चूत और गांड के छेद के बीच चिपक गई थीं। निशा की जाँघें खून से लथपथ हो चुकी थीं।

खून की एक धार उस फटी हुई चूत से बहकर उसकी गांड के छेद से होते हुए नीचे की ओर जा रही थी।

निशा की टांगें पूरी तरह से फैल गई थीं और अजीब तरह से फड़फड़ा रही थीं, मानो वो किसी तालाब में फंसी मछली हो।

प्रसाद का पूरा वज़न उन्हें और दबाकर ज़मीन की तरफ दबा रहा था। ऊपर दोनों के चेहरे एक-दूसरे को देख रहे थे।

प्रसाद विजयी मुस्कान के साथ निशा को देख रहे थे—एक ऐसा मुस्कान जिसमें एक बाप के प्यार और एक मर्द की जीत दोनों थे।

वहीं निशा, जो अपने पिता के ही कहने पर शांत होकर उन्हें देख रही थी। इस अचानक हमले के शॉक की वजह से उसका मुँह खुला का खुला रह गया था, पर चीख नहीं निकल पाई थी।

उसकी आँखें एकदम से बहुत बड़ी हो गई थीं। वो कुछ बोल नहीं पा रही थी। उसका पूरा चेहरा, शरीर काँप रहा था, मानो किसी ने उसके अंदर एक जलता हुआ खंजर घोंप दिया हो।

उसके हाथ, जो अब तक अपने पिता को कसकर पकड़े हुए थे, ढीले पड़कर नीचे ज़मीन पर गिर पड़े। मानो उसने हार मान ली हो। वो बुरी तरह से काँप रही थी, उसका शरीर अजीब तरह से झटके खा रहा था।

प्रसाद, जिसने अब तक अपनी बेटी को कसकर गले लगाकर पकड़ रखा था, ने तुरंत मौका देखकर अपने हाथ निकाले और निशा के ज़मीन पर पड़े नाज़ुक, छोटे हाथों को अपने पंजों में लॉक करके ज़मीन पर कसकर दबा दिए।

उन्होंने निशा से ज़रा भी नज़रें नहीं हटाईं। वो मुस्कुरा रहे थे—वह मुस्कान जो किसी भयानक शिक्षक की होती है जिसने अपना काम कर दिया हो।

जो पनिशमेंट वो अपनी बेटी को देना चाहते थे, उसका आधा हिस्सा पूरा हो चुका था। उनके चेहरे पर एक शिकारी का और कठोर शिक्षक का मिला-जुला गुस्सा और जीत का भाव था।

उन्होंने मुस्कुराते हुए अपने होंठों पर जीभ घुमाई। उनका चेहरा पसीने से लथपथ था, ठीक निशा की तरह।

वो दोनों एक-दूसरे को एकटक देख रहे थे। फर्क बस इतना था—निशा एक बेचारी बकरी की तरह रोते हुए अपने पिता को देख रही थी, और प्रसाद एक भूखे भेड़िए की तरह अपने शिकार को निचोड़ रहा था।

प्रसाद ने अपना लंड धीरे-धीरे बाहर निकाला, पर सिर्फ उतना ही जितनी ज़रूरत थी—लंड का सुपारा अंदर रहने तक। उनके लंड को बाहर निकालने के घर्षण से निशा को और दर्द हो रहा था।

“आह!… आ…आ…अ…अ!”

बहुत समय बाद उसकी आवाज़ निकली। तभी प्रसाद ने फिर से ज़ोर से निशा की आँखों में देखते हुए अपना पूरा लंड चूत में घुसा दिया।

फच्छ! की आवाज़ आई। जैसे ही यह हमला हुआ, निशा तेज़ी से कराहते हुए ऊपर उठने की कोशिश करने लगी।

“आ…अ…अ…आ… स्स…स…स…स…आआ…आ!!”

पर वो उठ नहीं पाई क्योंकि प्रसाद ने उसके हाथ ज़मीन पर दबाकर रखे थे। सिर्फ उसका सिर ज़मीन से उठ पाया।

उसकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे। निशा के खुले मुँह से ऊपर उठा हुआ सर देखकर प्रसाद ने अपना मुँह उसमें डाल दिया,

और निशा के सिर को फिर से ज़मीन पर टिका दिया और आँखें बंद करके निशा के नाज़ुक, गुलाबी होंठों को चाटने-चूसने के साथ-साथ काटने लगा।

वो किसी पागल कुत्ते की तरह उस पर टूट पड़ा था।

‘सर्प… सर्प…’ की आवाज़ें कमरे में गूँजने लगीं। और साथ ही नीचे उसका लंड बहुत तेज़ी से, अब पूरी तरह से अंदर-बाहर हो रहा था।

फच… फच… फच… की गूँजती हुई आवाज़ें और चाटने-चूसने की तीखी आवाज़ें मिलकर एक अजीब सा संगीत बना रही थीं।

प्रसाद को अब कोई परवाह नहीं थी, कि निशा को मज़ा आ रहा है या नहीं।

बहुत सालों बाद उसे इतनी जवान, चिकनी चूत और इतना नाज़ुक बदन नोचने को मिला था।

उसका लंड किसी मशीन के पिस्टन की तरह, बिना रुके, बिना थके, निशा की चूत को फाड़ता हुआ अंदर जा रहा था।

दोनों की जाँघें अब खून से लथपथ हो चुकी थीं, लेकिन इस जानवरों जैसी चुदाई में भी प्रसाद मज़ा लेना नहीं भूला था।

वो बीच-बीच में अचानक रुक जाता, जिससे निशा को लगता कि शायद सब खत्म हो गया, और फिर से पूरी ताक़त से, पिछली बार से भी ज़्यादा तेज़ी से निशा को चोदना शुरू कर देता।

हर धक्के के साथ निशा का शरीर नीचे दबता और वो सिसक उठती।

निशा अब पूरी तरह से बेजान सी चुद रही थी। शायद शुरू का तीव्र दर्द अब सुन्न हो चुका था।

उसकी टांगें पूरी तरह से फैल गई थीं, किसी मेढ़क की तरह, बिल्कुल असहाय।

उसे शायद प्रसाद के चाटने-चूसने वाले उस क्रूर किस की वजह से थोड़ा सा सुकून मिल रहा था, या फिर वो अपनी नियति को स्वीकार कर चुकी थी।

लगभग २० मिनट तक यह क्रूकता जारी रही। फिर एक तेज़ झटके के साथ, प्रसाद कराहते हुए बोला, “आ…आ…हा… हहह… आ…आ…!!”

उसने निशा की चूत की गहराइयों में अपना माल छोड़ दिया। वो झटके मार-मारकर, पूरी ताक़त के साथ अपना वीर्य उसके अंदर उंडेल रहा था।

और थोड़ी देर के लिए वो निशा के ऊपर थक कर ढेर हो गया।

निशा तेज़ दर्द और जलन से कब से बाहर आ चुकी थी, उसे अब बस एक खालीपन और भारीपन महसूस हो रहा था।

उसके पिता अभी भी उसकी चूत में लंड घुसाए हुए हाँफ रहे थे और उनका सिर उसकी चूचियों पर टिका हुआ था।

एक अजीब सी शांति थी। निशा ने अपने बेजान हाथों से, जैसे-तैसे, अपने पिता के बालों में प्यार से हाथ फेरा।

मानो वो कह रही हो कि जो करवाना था, वो उसके पिता से हो चुका है और उसमें वो सफल रही है।

“पापा… उठो…” निशा ने एक कमज़ोर आवाज़ में प्रसाद को उठाने की कोशिश की।

“हाँ? क्या?… हाँ हाँ… उठता हूँ…” प्रसाद जो लगभग सो ही गया था, उसके खुले मुँह से लार टपक रही थी।

उसने अपना चेहरा उठाया और लार पोंछी। उसका लंड अभी भी निशा की चूत में था।

हैरानी की बात ये थी कि वो अभी भी कड़क और तना हुआ था।

निशा प्यार से अपने पापा को देख रही थी, उसके चेहरे पर कोई नाराज़गी नहीं, बस एक विचित्र तृप्ति थी। “बाहर निकालो पापा अब…”

प्रसाद ने नीचे देखा। “हाँ… हाँ… निकालता हूँ…”

और उसने अपना लंड धीरे-धीरे बाहर निकालना शुरू किया।

निशा की चूत के ऊपर उसके पेट पर, प्रसाद के घुसे हुए लंड का उभार साफ़ दिख रहा था, जो उसके लंड को बाहर निकालने की वजह से गायब हो रहा था।

जैसे ही उसने अपना पूरा लंड बाहर निकाला, एक भयावह नज़ारा सामने आया।

उसका सफ़ेद माल, निशा के खून के साथ मिलकर, किसी बाढ़ की तरह निशा की खुली हुई चूत से बाहर आ रहा था और फर्श पर बह रहा था।

प्रसाद का लंड और उसकी गोटियाँ खून से लाल और सनी हुई थीं। निशा की जाँघें, उसकी गांड, और ठीक उसके नीचे—खून और प्रसाद के माल का वो गंदा मिश्रण फर्श पर फैल रहा था।

कमरे में उसकी कटी, गीली, और लोहे जैसी गंध फैल चुकी थी।

प्रसाद एकटक उस नज़ारे को देख रहा था। निशा की चूत पूरी तरह से सूजी हुई थी, पर खुली हुई थी। उस खुली हुई चूत में से थोड़ा सा अंदर का लाल मांस दिख रहा था।

निशा की टांगें एक ‘परफेक्ट स्प्लिट’ की तरह फैली हुई थीं, जैसे वो अपनी फटी चूत को छुपा नहीं रही थी और न ही छुपा पा रही थी।

वो वैसे ही पड़ी-पड़ी प्रसाद को प्यार से निहार रही थी। “शुक्रिया पापा…” उसने धीरे से कहा। “अब बिल्कुल दर्द नहीं हो रहा है… न ही कोई जलन है… और शायद अब कभी होगी।”

प्रसाद ने उसके बालों से पसीना साफ करते हुए कहा, “इसमें शुक्रिया कैसा बेटा? ये तो एक बाप का फ़र्ज़ था।”

“चलो अब उठो और नहाने चलते हैं,” प्रसाद ने अपना रुख बदलते हुए कहा। “वरना ये खून सूख जाएगा। बदन का तो साफ़ हो जाएगा, पर फर्श पर यह गंदगी हुई है, इसे जल्दी से साफ़ करना होगा।”

ये कहते हुए उसने निशा को हाथों से उठाने की कोशिश की। पर जैसे ही निशा ने खड़े होने की कोशिश की, वो लड़खड़ाकर गिर पड़ी।

प्रसाद ने तुरंत उसे पकड़ लिया। “अरे… अरे… आराम से बेटा!”

“पापा, मेरे पैरों को पास लाने में तकलीफ़ क्यों हो रही है?” निशा ने चिंतित होकर पूछा।

“अरे वो ठीक हो जाएंगे, बस अभी थोड़ी देर के लिए वो ऐसे हुए हैं,” प्रसाद ने उसे समझाया, एक कुशल डॉक्टर की तरह जो ऑपरेशन के बाद मरीज़ को डराता नहीं।

“पर खुशी की बात यह है कि मेरी बेटी अब एक ‘परफेक्ट स्प्लिट’ कर पाएगी! देखा,

तुम्हारी कितनी सारी परेशानियाँ एक झटके से दूर हो गईं? पता है, कॉलेज में बहुत कम ऐसे विद्यार्थी हैं जो स्प्लिट कर पाते हैं।”

“हाँ वो तो है पापा,” निशा ने मुस्कुराते हुए कहा, “स्पोर्ट्स टीचर की बेटी होने का अपना एक फायदा भी है।”

ये कहते हुए वो दोनों नंगे बाथरूम की तरफ चले गए। निशा बहुत धीरे-धीरे चल रही थी, क्योंकि उसके पैर एक-दूसरे से बहुत दूर-दूर थे।

उसकी चूत से अभी भी खून और प्रसाद का माल टपक रहा था और वो उसकी टांगों से होते हुए नीचे बह रहा था।

जाते-जाते निशा ने प्रसाद के खून से सने, लेकिन सख्त लंड को देखते हुए कहा, “ये हमेशा ऐसा ही रहता है क्या पापा?”

प्रसाद ने मुस्कुराते हुए कहा, “अरे नहीं… शायद उसमें अभी भी कुछ माल बाकी है, इसीलिए वो अभी भी खड़ा है।”

“तो फिर अब?” निशा ने भ्रम में पूछा।

“तो अब हम उसे बाथरूम में शांत करेंगे,” प्रसाद ने एक रहस्यमयी स्मित के साथ कहा, जैसे वो कोई बड़ी बात बता रहे हों।

“मेरे पास एक तरकीब है। इससे उसे शांति मिलेगी और तुम्हें भी कुछ नया सीखने को मिलेगा… जो तुम्हारे बॉडी के लिए अच्छा होगा।”

“ठीक है पापा,” निशा ने बिना किसी सवाल के कहा, उसके चेहरे पर भोलापन और विश्वास था।

ये कहते हुए प्रसाद लड़खड़ाती निशा को सहारा देते हुए धीरे-धीरे बाथरूम में ले गया और दरवाज़ा बंद कर दिया।

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