पिछले भाग में हमने देखा की कैसे प्रसाद और निशा के बिच लिविंग रूम में एक असहज घटना घटी , और कैसे उस वजह से उन दोनों बाप बेटी को अपने अपने रूम में जाकर खुद को शांत करना पड़ा ,.. अगर आपने वो पार्ट नहीं पढ़ा है तो यंहा निशा की ख्वाहिश, आखिरकार पापा ने पूरी की..पार्ट २ क्लिक कर के ज़रूर पढ़े , असली रोमांच कहानी शुरू से पढने पर ही आता है ..अब आगे …
दोपहर के कांड के बाद, प्रसाद अपने बेडरूम में बेचैनी से टहल रहे थे। उनके मन में एक तूफ़ान आया हुआ था।
उन्हें अपनी ही करतूत पर घृणा हो रही थी।
वो एक पिता थे, एक इज़्ज़तदार इंसान, और अपनी ही बेटी के बारे में उन्होंने क्या सोचा था… और क्या किया था।
क्या हो गया मुझे? यह गलत था, बहुत गलत था।
उन्हें अपनी पत्नी गीता का चेहरा सामने आ गया। अगर गीता को इस बात का पता चला तो? वो उन्हें तलाक दे देगी, बिना कुछ सोचे-समझे।
और निशा? शायद वो शर्मिंदगी और डर के मारे उन्हें छोड़कर अपने मम्मी के साथ चली जाएगी। नहीं, वो ऐसा कभी नहीं होने दे सकते।
उन्हें निशा से बात करनी थी, बहुत ही प्यार और समझदारी से। उन्हें उसे समझाना था कि जो हुआ, एक गलती थी और यह बात उसकी मम्मी से कभी नहीं बतानी चाहिए।
उधर, निशा अपने कमरे में बिस्तर की चादर बदल रही थी। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक और शर्म का मेल था।
वो सोच रही थी कि आखिरकार उसे अपने पिता के लिए ये इतनी हवस क्यों है?
और उसके पापा, जो हमेशा इतने सख्त रहते हैं, वो उसके साथ उतने उत्तेजित क्यों हो गए? अगर ये गलत था, तो उन्होंने उसे रोका क्यों नहीं?
इसी सोच में उसके होठों पर एक शरारती, शर्मिंदा मुस्कान आ गई। शायद उन्हें भी मज़ा आ रहा था।
उसने सोचा, गलत है तो क्या हुआ? अगर उसके पापा ही उसे इतने पसंद करने लगे हैं, तो फिर इस बारे में बात करनी ही तो पड़ेगी।
आखिर, जो हुआ, वो दोनों मिलकर भूल नहीं सकते थे।
शाम को चार बजे के आसपास, दोनों अपने-अपने कमरों से बाहर निकले और लिविंग रूम में आकर बैठ गए।
हवा में एक अजीब सी खामोशी और असहजता थी। वे एक-दूसरे को चोरी-चोरी निहार रहे थे और जब भी नज़रें मिलतीं, तुरंत झुका लेते।
दोनों के मन में यही दुविधा थी कि पहले बात कौन करेगा।
इस बार भी, निशा ने एक ऐसा अवतार धारण किया था जो प्रसाद की बेचैनी और बढ़ा दे।
उसने एक बहुत छोटी स्कर्ट और ऊपर एक टाइट-फिटिंग शॉर्ट कॉटन टॉप पहना था। उसकी गोरी, मुलायम जाँघें स्कर्ट के ऊपर से साफ़ दिखाई दे रही थीं।
प्रसाद की नज़र जैसे ही उसकी टांगों पर पड़ी, उन्होंने अपनी आँखें एक पल के लिए बंद कर लीं। उनके मन में गुस्सा उमड़ आया।
यही वजह है! इसी छोटी कपड़ों की वजह से दोपहर में वो कांड हुआ! वो गुस्सा होकर निशा पर चिल्लाना चाहते थे, पर फिर उन्होंने खुद को रोक लिया।
अगर वो गुस्सा करेंगे, तो शायद निशा रोने लगेगी और डर के मारे सब कुछ अपनी मम्मी को बता देगी।
इसीलिए, उन्होंने बहुत ही कोमल आवाज़ में बात शुरू की, “बेटा, निशा… देखो, दोपहर जो हुआ, वो गलत हुआ। हमें ऐसा नहीं करना चाहिए था।”
निशा ने भी कहा, “हाँ पापा, मुझे भी अफ़सोस है। हमें ऐसा नहीं करना चाहिए था। अगर मैं वो चैनल बदल देती, तो शायद आपका वो… मेरा मतलब है… कि आगे कुछ न होता।”
प्रसाद ने अंदर ही अंदर राहत की साँस ली। अच्छा हुआ, निशा उस घटना का इल्ज़ाम टीवी शो पर ही डाल रही है।
वो बोले, “हाँ बेटा, मैं वही तो कहना चाहता था।
ये आजकल के टीवी शो और फिल्मों की वजह से बहुत नंगा दिखने का चलन बढ़ गया है, इसीलिए मैं तुम्हें ऐसे कपड़े पहनने से मना करता हूँ।”
“कैसे कपड़े पापा? अब इसमें कपड़ों का क्या दोष?” निशा ने सवालिया अंदाज़ में पूछा।
“अरे देखो ना… अभी भी तुम इतनी छोटी स्कर्ट पहन कर आई हो, सारी टाँगें दिख रही हैं तुम्हारी!” प्रसाद की आवाज़ में थोड़ा क्रोध घुल गया था।
“तो इससे क्या होता है पापा? ये आजकल फ़ैशन है।”
“छोड़ो उस बात को। तुम्हें क्या समझाऊँ… जाने दो। पर मैं यह कहना चाहता हूँ कि यह बात तुम अपनी मम्मी से मत कहना, बेटा।”
“हाँ पापा, पता है मुझे। नहीं बताऊँगी। यह बात हमारे बीच ही रहेगी।”
प्रसाद गहरी साँस छोड़ते हुए बोले, “शुक्र है।”
तभी निशा ने एक और बम फोड़ा। “वैसे पापा, एक और बात है जो मुझे आपको बतानी है।”
“हाँ, गुड़िया, बोलो।”
“मैंने कल रात जब पानी पीने किचन में आई थी, तब मुझे आपके बेडरूम से आवाज़ें आती सुनी थीं। मैं आपके कमरे के पास गई, तो दरवाज़ा थोड़ा खुला था। जब मैंने अंदर झाँककर देखा तो…”
“बस्स…!!” प्रसाद का पेट घूम गया। शर्म और गुस्से से उनका चेहरा लाल हो गया। “शर्म नहीं आती तुम्हें! अपने मम्मी-पापा को उस हालत में देखते हुए!”
“इसमें मेरी क्या गलती?” निशा के स्वर में एक अनोखी चुनौती थी, एक ऐसी बेशर्मी जिसने प्रसाद के पूरे शरीर में आग लगा दी।
उनकी आँखें लाल हो गईं और उनके हाथ मुट्ठियों में बंध गए। वो खड़े हो गए, अपनी पूरी छह फुट की ऊँचाई के साथ, और उनकी परछाई निशा पर एक तलवार की तरह गिरी।
“चुप! नालायक!” उनका गला फट गया। “कॉलेज जाते ही बहुत बिगड़ गई है तू! ये मत समझना कि पापा की पनिशमेंट सिर्फ़ डांट-फटकार है।”
उन्होंने अपनी उंगली उसकी तरफ उठाई। “चलो, इधर आओ!”
उस क्षण, निशा को डर भी लगा और एक अजीब सी उत्तेजना भी। यह वही पुराना नाटक था जिसे वो बचपन में कई बार देख चुकी थी। लेकिन आज हालात कुछ और थे।
आज वो एक औरत थी, जिसकी चूत अभी कुछ देर पहले तक उसी शख्स के बारे में सोचकर गीली हुई थी।
“सॉरी पापा,” उसने सिर झुकाते हुए कहा, लेकिन उसकी आँखों में एक चमक थी। “आगे से ऐसी बात आपके सामने नहीं करूँगी।”
“चुप! कहा ना, इधर आओ!” प्रसाद का स्वर कठोर था।
निशा धीरे-धीरे उठी और उनके पास गई। उसके दिल की धड़कनें इतनी तेज़ थीं कि वो सुनाई दे रही थीं। वो जानती थी कि अब क्या होने वाला है।
प्रसाद ने सोफे पर बैठे-बैठे अपनी जाँघें पटक दीं, एक ऐसा इशारा जो निशा ने अपने बचपन में गिनती से ज़्यादा बार देखा था। यह उसकी सज़ा का आह्वान था।
निशा ने एक गहरी साँस ली और फिर, जैसे कोई जादुई सपना देख रही हो, वो अपने पिता की गोद में झुक गई। उसने अपने पेट के बल उनकी मोटी, मज़बूत जाँघों पर लेट गई, अपने कूल्हों को हवा में उठाए हुए।
जैसे ही वो इस स्थिति में आई, उसकी छोटी सी स्कर्ट अपने आप ऊपर खिसक गई।
कपड़ा उसकी कमर के ऊपर सरक गया और उसकी गोरी, चिकनी गांड का एक बड़ा हिस्सा उजागर हो गया।
उसके कूल्हे मुलायम और गोल थे, और उन पर उसकी पिंक पैंटी की एक पतली सी धार नज़र आ रही थी।
प्रसाद की साँसें थम गईं। उनकी आँखें उस नज़ारे पर टिक गई थीं जो उन्होंने अभी तक सिर्फ़ कल्पनाओं में देखा था।
उनकी बेटी की नंगी, अछूती गांड उनकी गोद में थी, उनके हाथ की पहुँच में। उनका लंड, जो अभी-अभी शांत हुआ था, फिर से एक दरिंदे की तरह जाग उठा।
प्रसाद ने अपना सिर झटके से हिलाया, जैसे बुरे ख्यालों को उनसे दूर झटकना चाहते हों।
लेकिन उनकी आँखों के सामने जो नज़ारा था, वो किसी भी अच्छे ख्याल को ज़िंदा नहीं रहने देना चाहता था।
उनकी बेटी की गोल, गोरी गांड उनकी गोद में पड़ी थी, एक निमंत्रण की तरह।
और फिर उन्होंने अपना हाथ उठाया। “चाट!” एक ज़ोरदार थप्पड़ उसकी नर्म गांड पर पड़ा, जिसकी आवाज़ लिविंग रूम में गूंज गई।
निशा के मुँह से एक चीख निकली, “आआआहह!”
प्रसाद रुके नहीं।
“चाट!” फिर दूसरा, और पहले से भी ज़्यादा ज़ोर से। और फिर लगातार तीन-चार और थप्पड़ उसकी गांड पर बरसे।
उन तीन-चार चाटों में ही निशा की गोरी गांड पर उनकी मोटी उंगलियों के लाल निशान खिंच गए।
निशा रो रही थी, पर उसकी सिसकियों में एक अजीब सी मादकता थी।
प्रसाद हांफते हुए बोले, “और ऐसा करेगी? …चाट! … बोल! करेगी ऐसा!”
निशा कराहते हुए बोली, “आआआ… नहीं!.. आआ… नहीं पापा आह!… मत मारो… आआआ..!”
थोड़ी देर तक प्रसाद ने अपनी चाटें मारना जारी रखा, लेकिन थोड़ी ही देर में उनकी नज़र उस जगह पर पड़ी जहाँ से उन्हें ज़रूरत नहीं थी।
उन्होंने देखा कि निशा की गुलाबी चड्डी, उसकी चूत के हिस्से में, पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और उसकी चिपचिपी चूत से चिपकी हुई थी।
उसी वक्त, प्रसाद का लंड, जो अब तक पूरी तरह से तन चुका था, नीचे से उनके पजामे में से एक तम्बू की तरह ऊपर उठा हुआ था और निशा के पेट को चुभ रहा था।
निशा को अब पूरी तरह से समझ आ गया था कि उसका बाप, उसे सज़ा देने के बहाने, अभी अपना मज़ा ले रहा था। वो मन ही मन हँसी और दर्द का नाटक करने लगी।
प्रसाद ने अपना गुस्सा बढ़ाते हुए कहा, “और ये इतनी छोटी चड्डी क्यों पहनी है!? … क्या छिपा रही हो इससे? … कुछ भी तो नहीं! … चाट!”
यह कहते हुए, उन्होंने निशा की निकर को उसके कूल्हों के दोनों साइड से पकड़ा और ऊपर खींचने लगे। लेकिन जो हुआ, उससे उन्हें और भी मज़ा मिला।
निशा की निकर का पतला कपड़ा उसकी चूत की दरार में घुस गया और रगड़ खाने लगा। निशा को बहुत तेज़ दर्द हुआ और वो झटपटाकर चिल्लाने लगी।
“आह.. आह.. आह… पापा मर गई! … आह.. आह.. बहुत दुःख रहा है! … आह.. अ.. अ…”
प्रसाद डर गए। उन्हें लगा कि शायद उन्होंने कुछ ज़्यादा ही कर दिया है। उन्होंने निकर को छोड़ते हुए कहा, “सॉरी सॉरी… माफ़ करना बेटा? कहाँ लगी है?”
निशा रोते हुए बोली, “अंदर घुस गई है… निकालो न!”
प्रसाद ने उसके कूल्हों को फैलाकर देखा… और जो नज़ारा उन्होंने देखा, उससे उनके मुँह में अपने आप पानी आ गया।
उनकी बेटी की छोटी सी, गोरी, बिना बालों वाली, गुलाबी, वर्जिन चिकनी चूत उनके सामने थी, और उसके अंदर उसकी निकर फँसी हुई थी।
वो धीरे से अपना अंगूठा और एक उंगली उस पट्टी को बाहर निकालने के लिए चूत के होंठों को फैलाते हुए उसे पकड़ने लगे।
उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं, मानो निशा की चूत ने उन्हें वश में कर लिया हो। वो पागलों की तरह उस चूत को घूर रहे थे, उनके मुँह से पानी टपक पड़ा और निशा की जाँघ पर गिरा।
निशा समझ गई कि मामला अब पूरी तरह से उसके वश में है।
वो चिल्लाई, “निकालो न पापा… निकर निकालो… आह.. आह.. आह. स्सस्स… बहुत दुःख रहा है… पूरी निकालो…”
प्रसाद धुत कर बोले, “हाँ.. हाँ… निकालता हूँ बेटा… निकलता हूँ।”
उन्होंने उस पट्टी को खींचकर पूरी निकर को निशा के घुटनों के नीचे तक ला दिया। “अब बताओ कहाँ दुःख रहा है… कहीं चोट तो नहीं लग गई?”
निशा शरारत से बोली, “पता नहीं पापा… ज़रा आप देखो ना ठीक से।”
प्रसाद उसके कूल्हों को और ज़्यादा खोलकर उसकी चूत को देखने की कोशिश करने लगे।
“कहाँ… यहाँ से कुछ ठीक से पता नहीं चल पा रहा है।” वो अपनी उंगलियों से चूत को थोड़ा और खोलकर देखने लगे।
निशा बोली, “रुको मैं पलट जाती हूँ पापा… लगता है राशेश आ गए हैं… दुख रहा है।”
निशा उठकर पलटी और सोफे पर अपनी टाँगें फैला दीं – एक पैर सोफे की पिठ्ठी पर और दूसरा पैर ज़मीन की तरफ।
फिर उसने दोनों हाथों से अपनी चूत के होंठों को खोलकर अपने पापा को दिखाते हुए कहा, “अब देखो पापा कहाँ कुछ दिखता है क्या… ज़ख्म जैसा?”
प्रसाद सोफे के पास खड़ा, यह नज़ारा देखकर पागल हो रहा था।
उनकी बेटी की खूबसूरत गोरी टाँगें, उसकी जाँघों के बीच में उसकी गोरी, गुलाबी, चिकनी, छोटी सी चूत! वो एकटक देखते रह गए,
और अनायास ही उनके होंठों पर जीभ घूम गई। जैसे कोई लाजवाब, स्वादिष्ट चीज़ सामने आ गई हो।
वो तुरंत नीचे झुककर निशा की चूत के पास आ गए। उनका मुँह निशा की चूत के बिल्कुल करीब था।
चूत की मादक सुगंध उन्हें पागल कर रही थी। वो धीरे से एक उंगली से उसकी चूत की एक फांक को सहलाकर खोलकर देखने लगे।
“क्या यहाँ कुछ दुःख रहा है क्या?”
निशा सिसकारी, “स्सस्सस्स… आहह… स्सस्स… नहीं पापा…”
प्रसाद ने और उंगली ऊपर-नीचे करते हुए पूछा, “अब?”
निशा ने कहा, “स्सस्स… आआह… स्स नहीं पापा…”
निशा की चूत से साफ़-साफ़ पानी निकलना शुरू हो गया। थोड़ा पानी प्रसाद की उंगली पर लगा, जो वो अभी भी उसकी फांकों को छू रहा था।
वो तुरंत अपनी उंगली अपने मुँह में डालकर चूसने लगे। उसे वो कुंवारी चूत का स्वाद ऐसा लगा, जैसे किसी देवता को अमृत मिल गया हो।
वह स्वाद नमकीन, मीठा और बेहद मादक था, एक ऐसा स्वाद जिसे उन्होंने अपनी पत्नी गीता की चूत में भी कभी महसूस नहीं किया था।
और फिर सारी लाज-शर्म, सारे पितृ-धर्म, सब कुछ उड़ गया।
प्रसाद की जीभ तुरंत निकलकर लपलपाने लगी, किसी भूखे कुत्ते की तरह, जिसे हफ्तों से भोजन नहीं मिला हो।
वो नीचे झुककर अपना मुँह उस गुलाबी, गीली चूत पर लगा दिया और जीभ से उसकी फांकों को चाटने लगे।
“स्सस्स… आआआह… पापा!… क्या कर रहे हो आप!” निशा चिल्लाई, पर उसकी आवाज़ में दर्द कम और सुख ज़्यादा था।
उसने अपने हाथों से प्रसाद के सिर को अपनी चूत पर दबा दिया, जैसे वो उसे रोकना चाहती हो, पर असल में वो उसे और अंदर खींच रही थी।
प्रसाद को अब कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। उनके कानों में सिर्फ़ अपनी साँसों का गर्म हुआ शोर और अपनी बेटी की मादक सिसकियाँ गूँज रही थीं।
वो उसकी चूत को चाट रहे थे, चूस रहे थे, उसकी क्लिटोरिस को अपने दाँतों से हल्के-हल्के काट रहे थे।
यह एक ऐसा कृत्य था, जिसकी कल्पना भी उन्होंने अपने सबसे गंदे ख्वाबों में नहीं की थी, और अब वो उसे हकीकत में अंजाम दे रहे थे।
निशा की कमर अब अपने आप उठने-गिरने लगी थी। वो अपने पिता के मुँह को अपनी चूत पर घुमा रही थी।
उसके मुँह से लगातार जोश भरी आवाज़ें निकल रही थीं। “हाँ पापा… ऐसे ही… और ज़ोर से… आहहह… यही तो चाहिए था मुझे… आआआह…”
थोड़ी देर तक चूत चाटने के बाद, प्रसाद पीछे हटे।
उनकी दाढ़ी पर उनकी ही बेटी के चूत के रस चिपके हुए थे, एक मीठा और खट्टा स्वाद जो उन्हें शर्म और उत्तेजना दोनों दे रहा था।
निशा, जो अभी तक सुख के सागर में डूबी हुई थी, ने धीरे-धीरे अपने बदन को उठाया।
उसकी आँखें इशारे में थीं, उसके होंठ सिहकने लगे, एक ऐसी मासूमियत का नाटक करते हुए जिसके पीछे एक भूखी शिकारिन छिपी थी।
“क्या हुआ पापा? क्यों रुक गए?” उसने अपनी आवाज़ में एक झलक दर्द की घोली, पर उसकी पुतलियाँ चमक रही थीं।
“दर्द अभी भी है… और आपके चाटने से तो वो और भी कम हो रहा था।”
प्रसाद ने अपने मुँह को अपनी पीठ के कपड़े से पोंछा, जैसे वो अपने पाप के सबूत मिटा रहे हों।
उन्होंने उठकर खड़े होने का नाटक किया, पर उनका दिमाग तेज़ी से काम कर रहा था। यह जगह ठीक नहीं थी।
यह घर का केंद्र था, जहाँ गीता की यादें टंगी हुई थीं।
उन्हें एक नई जगह चाहिए थी, एक ऐसी जगह जहाँ वो अपनी पत्नी की छवि को धूमिल करके अपनी बेटी पर अपना अधिकार जमा सकें।
“बिल्कुल, बेटा,” उन्होंने कहा, अपनी आवाज़ को एक देखभाल करने वाले पिता के रूप में ढालते हुए।
“मैं हमेशा के लिए तुम्हारी चूत का दर्द कम करूँगा। पर अभी हम लिविंग रूम में हैं। कोई आ न जाए। हमें तुम्हारे कमरे में जाना चाहिए, जहाँ कोई तुम्हें देख न पाए।”
उनका तर्क समझदारी भरा लग रहा था, पर उनके अंदर का शैतान कुछ और ही सोच रहा था।
वो उस कमरे में जाना चाहते थे जहाँ निशा की मासूमियत की खुशबू अभी भी थी। वो उस मासूमियत को अपनी वासना से दागना चाहते थे।
निशा ने सिर हिलाया, एक ऐसे अभिनेत्री की तरह जो अपने भविष्य के दृश्य को जानती हो।
वो उठी और अपने कमरे की ओर चल दी, उसकी चूत से निकला पानी उसकी जाँघों को गीला करता हुआ एक निशान छोड़ रहा था।
प्रसाद उसके पीछे-पीछे चले, उनकी नज़रें उसकी लचकती गांड पर टिकी हुई थीं।