शाही राजपुताना परिवार का वासना का खेल – ७

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पिछले भाग में हमने देखा की कैसे सुमेर अपने माँ के आदेश पर हर वक़्त , हर जगह , किसीके भी सामने अपनी बीवी गौरी को चोद रहा था , यंहा तक की उसकी माँ के सामने भी ..अगर आपने वो भाग नहीं पढ़ा है तो यंहा शाही राजपुताना परिवार का वासना का खेल – ६ क्लिक करके पढ़ सकते है , अब आगे ..

रास्ते में सुमेर को अचानक एक चिंता सताने लगी। वो गौरी के कंधे पर हाथ रखकर बोला, “एक बात सुनो गौरी। जब हम तुम्हारे मायके जाएँ, तो वहाँ मेरी माँ के बारे में कुछ भी नहीं बताना।”

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गौरी ने उसकी तरफ भोले-भाले चेहरे से देखा। “क्यों साहब? माँ ने कुछ बुरा किया है क्या?”

“नहीं-नहीं, बुरा कुछ नहीं,” सुमेर समझाने लगा, पर उसकी आँखों में एक शर्म थी। “वो बस… वो बहुत आधुनिक सोच रखती हैं। तुम्हारे माता-पिता शायद उसे अजीब समझें। जब मैं तुम्हें चोद रहा हूँ और वो सामने से देख रही हैं… यह बात शायद उन्हें ठीक न लगे। रिश्तेदारों को पता चला तो बदनामी होगी।”

गौरी ने अपना सिर हिलाते हुए कहा, “ठीक है साहब, मैं कुछ नहीं बताउंगी।” लेकिन भीतर ही भीतर वो पागलों की तरह खुश हो रही थी। उसके मन में लाठियाँ चल रही थीं।

‘अरे बाप रे, यह तो और भी मज़ेदार हो गया। अब माँ-बापू को यह भी पता चलेगा कि सासू माँ कितनी बड़ी चुदक्कड़ और चालाक है। शायद वो उनसे भी सीख लें या फिर मिलकर सुमेर को और भी खा जाएँ।’

कुछ देर बाद गौरी के पैतृक गाँव का नज़ारा आने लगा। वहाँ का पुराना किला जैसा महल दिखाई दिया। राम सिंह और उनकी पत्नी दरवाज़े पर खड़े उनका इंतज़ार कर रहे थे। कार रुकते ही पारंपरिक राजपूती अंदाज़ में स्वागत शुरू हो गया।

ढोल की थाप गूँज उठी। राम सिंह ने सुमेर को एक भव्य शॉल ओढ़ाई और उसके माथे पर लंबा टीका लगाया। गौरी की माँ ने उनके चारों तरफ थाली में दीपक लहराते हुए आरती उतारी।

“खूब फले रे बेटा, सुहागिन के रूप में हमारी गौरी को खूब संभालना,” वो बोलीं, अपनी आवाज़ में एक अजीब सी मादकता घोलते हुए।

सुमेर इतने सम्मान में फूल रहा था। उसने राम सिंह के पैर छुए और आशीर्वाद लिया। फिर वो सब अंदर के बड़े दरबार हॉल में आ बैठे। वहाँ के सोफे भारी और शाही थे, और दीवारों पर राजपूत योद्धाओं की तलवारें टंगी हुई थीं।

चारों एक गोल में बैठ गए। सुमेर के एक तरफ़ गौरी और दूसरी तरफ़ उसकी सासू बैठी थीं। राम सिंह सामने वाली कुर्सी पर कब्ज़ा जमाए हुए थे। गौरी की माँ ने आज एक ऐसी साड़ी पहनी थी जो सुमेर का ध्यान खींचने के लिए काफ़ी थी।

वो गहरे लाल रंग की चिन्नों वाली साड़ी थी, और उसके ब्लाउज का स्टाइल कुछ ज़्यादा ही ‘उभार’ वाला था। उनके भारी-भरकम चूचे ब्लाउज़ के बाहर निकलने को बेताब थे, और गहरी खुली गर्दन के बीच से उनकी गोरी-गोरी रेखाएँ साफ़ झलक रही थीं।

यह राम सिंह की ही चाल थी। वो जानता था कि सुमेर की कमज़ोरी क्या है—एक अच्छी, भरी हुई चूत और बड़े-बड़े दूध। और उसकी पत्नी अभी भी उस कसौटी पर खरी उतरती थी। उसने अपनी पत्नी को तैयार किया था, ठीक वैसे ही जैसे उसने गौरी को।

सुमेर की नज़रें बार-बार अपनी साँस के उस विशालकाय बस्त में जाकर फंस रही थीं। वो गौरी से बात करते-करते बीच में अचानक रुक जाता और उसकी माँ के उस गहरे खाई को घूरने लगता।

उसके दिमाग में ख्याल आया—’साली, जब मैं पहली बार यहाँ गौरी को देखने आया था, तो मैंने इस औरत को ध्यान से नहीं देखा था। क्या मस्त बदन है इसका! उसकी कमर अभी भी एकदम मज़बूत है, और ये दूध… भगवान की कसम, गौरी के दूध भी इतने बड़े नहीं हैं।’

वो अनुमान लगाने लगा कि शायद यह औरत उसकी माँ ठाकुराइन की उम्र की ही होगी। लेकिन जहाँ ठाकुराइन एक सख्त और राजनीतिज्ञ की तरह दिखती थीं, वहीं गौरी की माँ एक पकी हुई, रसीली अमरुद जैसी लग रही थीं।

गौरी और उसके पिता राम सिंह ने सब कुछ देख लिया था। वो सब एक-दूसरे की तरफ़ देखकर शातिर मुस्कुराहट बाँट रहे थे। राम सिंह को पता था कि शिकार जाल में फंस चुका है।

अचानक, गौरी की माँ ने अपनी मधुर और भरी हुई आवाज़ में अपनी उंगलियों से एक तेज़ ‘छुटकी’ बजाई। उस आवाज़ से सुमेर का ध्यान टूटा।

“क्या हुआ जमाई राजा?” उसने पूछा, अपनी आँखें झुकाते हुए और अपने होंठों को एक शरारती हंसी के साथ हिलाते हुए। “कहाँ खो गए हो?”

सुमेर झटके से अपनी तरफ़ देखा। उसका मुँह खुला का खुला रह गया था। उसके मुँह के कोने से लार भी टपकने वाली थी। उसने जल्दी से अपना मुँह साफ़ किया और बड़बड़ाया, “हा…? अ… हाँ… नहीं, कुछ नहीं। क्या हुआ?”

गौरी ने उसकी इस हालत पर ज़ोर से हँसी भर दी। उसकी हँसी की आवाज़ पूरे हॉल में गूँज उठी। राम सिंह भी अपनी मूँछों पर हाथ फेरते हुए ठठ्ठा लगाने लगे।

उनके लिए यह एक मज़ाकिया पल था, एक सामान्य शरारती चुटकुला। लेकिन सुमेर के लिए यह स्थिति काफ़ी अजीब और शर्मनाक महसूस हो रही थी। वो समझ नहीं पा रहा था कि क्या जवाब दे।

दोपहर का खाना खाने के बाद सुमेर की आँखें भारी होने लगीं। थकान और भरपेट भोजन के बाद वो चैन की बिस्तर तलाश रहा था। दोनों अपने दिए गए कमरे में आ गए।

गौरी ने उसके कपड़े उतारे और उसे बिस्तर पर लिटा दिया। वो अपने पति के बालों में उंगलियाँ फेरते हुए बोली,

“अब आप थोड़ा आराम कर लीजिए साहब। आप थक गए होंगे सफर में। मुझे अभी माँ-पापा से मिलकर कुछ बातें करनी हैं, बहुत दिनों बाद मिली हूँ न। रात को… रात को हम अपनी दुनिया में खो जाएँगे।”

सुमेर आँखें मूंद कर सो गया। वो नहीं जानता था कि उसकी प्यारी बीवी की दुनिया में वो खुद भी सिर्फ एक मोहरा था।

जैसे ही सुमेर की सांसें गहरी हो गईं, गौरी उठकर बाहर निकल आई। उसका चेहरा एक अजीब सी उत्सुकता से लाल हो रहा था। वो जल्दी-जल्दी अपने माता-पिता के बेडरूम की तरफ बढ़ी। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था—वो उत्साह से नहीं, बल्कि एक गहरी, पुरानी आदत से था।

उसने दरवाज़े पर धीरे से दस्तक दी।

अंदर से गौरी की माँ ने दरवाज़ा खोला। उनका चेहरा शांत था, लेकिन आँखें चौकन्नी थीं। उन्होंने गलियारे का एक नज़र से मुआयना किया, सुनिश्चित करते हुए कि कोई नौकर या सुमेर वहाँ नहीं है। फिर उन्होंने गौरी को अंदर खींचा और दरवाज़ा बंद करते ही उस पर अन्दर से कुण्डी लगा दि।

कमरे के अंदर का नज़ारा एकदम अलग था। बड़े राजसी बिस्तर पर राम सिंह बैठे थे। उनके शरीर पर एक भी धागा नहीं था। उनका बदन घुड़सवारी और शक्ति से भरपूर था, और उनके हाथ में वो असली ताकत थी—एक मोटा, लहूलुहान, 8 इंच का लौड़ा जिसे वो आहिस्ता से आगे-पीछे कर रहे थे।

गौरी को अपने बाप की वो तस्वीर देखकर एक सुकून मिला। वो उसके पास दौड़कर गई, उसकी आँखों में आँसू थे। वो रोई नहीं थी, वो उस पल से भावुक थी। उसने अपने पिता का चेहरा पकड़ा और उन्हें जोश से चूमना शुरू कर दिया। वो एक बेटी के प्यार के साथ एक प्रेमिका की भूख से उनके होंठों को चूस रही थी।

“पापा… मैंने आपको बहुत याद किया,” गौरी ने उनके होंठों से हटते हुए फुसफुसाया।

फिर उसकी नज़र नीचे उसके लौड़े पर पड़ी। उसने मुस्कुराते हुए कहा, “और… इसे तो बोहोत ज्यादा याद किया।” वो झुकी और अपने पिता के उस मोटे लंड को चूमने लगी, जैसे कोई भक्त मूर्ति को चूमता है। वो उसके सुपारे को अपने होंठों से रगड़ रही थी।

“और मैं?” एक आवाज़ पीछे से आई।

गौरी की माँ उसके पीछे खड़ी थीं। उन्होंने आकर गौरी का घाघरा ऊपर कर के उसकी पैंटी को एक झटके से नीचे खींच दिया। गौरी की कमर से नीचे वो एकमात्र कपड़ा गिर गया।

गौरी घूमी और तुरंत अपनी माँ को भी चूमने लगी। उसकी आँखों में वही भाव था—माँ और बेटी का रिश्ता, लेकिन दो शिकारियों की तरह।

“मैं कैसे भूल सकती हूँ आपको माँ,” गौरी ने उनके गालों पर चुंबन दिए। “आपने ही मुझे यह सब सिखाया है।”

माँ ने उसके बालों में हाथ फेरते हुए कहा, “चल जल्दी कर ले बेटा। हमें बहुत कुछ बात करनी है। सुमेर के बारे में, भविष्य के बारे में। लेकिन इससे पहले… चलो अपना काम खत्म करते हैं।”

गौरी ने अपना सिर हिलाया। उसके चेहरे पर एक चालाक मुस्कान आई। “माँ, पापा, मैं आपको एक खुशखबरी देना चाहती हूँ।”

वो बिस्तर पर कूद गई और अपनी पीठ तकिए पर टिका ली। फिर उसने अपनी टांगें चौड़ी कर लीं और अपने दोनों हाथों से अपनी चूत की फांकों को खोल दिया। उसकी चूत अभी भी सुमेर की चुदाई से सूजी हुई थी और उसका छेद अब ढीला पड़ चुका था।

“देखिए,” उसने शर्म के मारे नहीं, बल्कि गर्व के साथ कहा। “यह रही आपकी खुशखबरी। मैं अब कुंवारी नहीं रही।”

राम सिंह ने अपनी बेटी की उस फूली हुई, लाल-नीली चूत को देखा। उसके चेहरे पर गर्व छा गया। यह वो निशानी थी जो उसकी बेटी ने अपने खानदान की रीत को निभाते हुए अर्जित की थी। वो जानता था कि इस ‘टूटी’ चूत का मतलब है कि अब सुमेर को रोकना मुश्किल हो गया है, और राम सिंह की पकड़ मज़बूत हो गई है।

“शाबाश बेटी,” राम सिंह ने कहा, अपना लौड़ा हाथ में और कसते हुए। “तुमने बिल्कुल सही किया।”

उसने बिस्तर पर चढ़कर अपनी बेटी के दोनों पैरों के बीच अपनी जगह बना ली। गौरी की चूत से उठती कामुक गंध उसे पागल कर रही थी। उसने अपना मोटा लंड उसकी चूत के छेद पर सेट किया…

राम सिंह का मोटा, नसों से उभरा हुआ लौड़ा गौरी की चूत के द्वार पर टिका था। उसकी चमकदार गुलाबी फांकें अभी भी सुमेर की चुदाई से थोड़ी सूजी हुई और लालिमा लिए हुए थीं।

राम सिंह की सांसें तेज हो गईं, उसकी आँखों में एक जानवरी भूख थी—अपनी ही संतान की कोख में अपना बीज डालने का वह विचित्र और वर्जित उत्साह। उसने अपनी कमर आगे की ओर झटका देने के लिए तैयारी की।

“आज… आज मैं अपनी बेटी को असली मज़ा दिखाऊंगा,” वह फुसफुसाया, उसकी आवाज़ गद्गद् थी।

लेकिन तभी एक हाथ ने उसकी कलाई पकड़ ली। गौरी की माँ, जिसने अपनी साड़ी और पेटीकोट को एक ही झटके में उतार फेंका था, अब पूरी तरह नंगी खड़ी थी।

उसका शरीर चालीस वर्ष की उम्र में भी मूर्ति जैसा आकर्षक था—भरे हुए, लटकते हुए चूचे जिनके निप्पल काले और उभरे हुए थे, चिकना पेट, और चिकनी चूत।

“रुको गौरी के पापा,” उसने कहा, उसकी आवाज़ में एक अनुभवी औरत की समझदारी थी। “इतनी जल्दी क्या है? देखो न, यह बेचारी अभी तक पूरी तरह तैयार भी नहीं है। आपका यह हथियार तो लोहे की छड़ जैसा है। बिना चिकनाई के अंदर घुसेगा तो इसकी चूत के कोमल मांस को चीर देगा।”

राम सिंह ने गुस्से से उसकी तरफ देखा, लेकिन गौरी की माँ ने अपनी बात जारी रखी, अपनी उंगली से राम सिंह के सीने पर हल्के से दबाव डालते हुए।

“याद रखो, तुम इसके पिता हो। थोड़ी दया, थोड़ी सहानुभूति तो बनती है। पहले इसे चिकना करो, फिर मजे से चोदना। वरना दर्द से चिल्लाएगी तो सुमेर को शक हो जाएगा।”

राम सिंह ने गौरी की तरफ देखा। गौरी ने अपने पिता की आँखों में झांका और फिर एक सहमति भरी, शरारती मुस्कुराहट के साथ अपना सिर हल्का सा हिला दिया। ‘जो माँ कह रही है, सही कह रही है,’ उसकी आँखों ने कहा।

राम सिंह ने एक गहरी सांस ली और फिर अपना सिर घुमाकर अपनी पत्नी की तरफ देखा। वह अब बिस्तर के किनारे खड़ी थी, एक हाथ से अपनी चूत को मसल रही थी और दूसरे हाथ से अपने भारी चूचे के काले निप्पल को चुटकी से दबा-दबाकर उसे और सख्त बना रही थी।

उसकी आँखें आधी बंद थीं और होंठों पर एक लालसापूर्ण मुस्कान थी।

यह देखकर राम सिंह का गुस्सा और भड़क उठा। उसने तेजी से आगे बढ़कर अपनी पत्नी के लंबे, खुले बालों को अपनी मुट्ठी में जकड़ लिया और उसे अपनी ओर खींच लिया।

“अच्छा! तो तू ही मेरे लौड़े को चिकना कर दे!” उसने गुर्राते हुए कहा, उसकी आवाज़ में धमकी थी। “और जल्दी कर! मेरा धैर्य खत्म हो रहा है।”

उसने उसके सिर को जबरदस्ती नीचे झुकाया, गौरी के फैले हुए पैरों और अपने उभरे हुए लौड़े के बीच की जगह में।

उसने उसकी गर्दन और सिर को इस तरह मोड़ा और स्थित किया कि गौरी की माँ का मुँह गौरी के पेट के ठीक नीचे आ गया, और गौरी की चूत उसके मुँह के ठीक निचे।

अब राम सिंह अपनी पत्नी के मुँह में लौड़ा मारकर उसे चिकना कर सकता था, और उसी मुद्रा में थोड़ा निचे, सीधे गौरी की चूत में प्रवेश कर सकता था।

“अब चूस!” राम सिंह ने आदेश दिया और अपनी कमर आगे की ओर झटकी।

उसका मोटा, गर्म लौड़ा अपनी पत्नी के मुँह में घुस गया। उसने तेज और गहरे धक्के मारने शुरू कर दिए, उसके गले की नसों पर जोर डालते हुए।

“गक… गक… गक…” की गीली, घुटन भरी आवाज़ कमरे में गूंजने लगी। हर धक्के के साथ, उसकी पत्नी के मुँह से लार की लकीरें निकलकर सीधे नीचे गौरी की चूत और उसके गुलाबी भगोष्ठों पर गिरने लगीं।

गौरी की चूत धीरे-धीरे चमकदार और गीली होती जा रही थी, लार उसे प्राकृतिक चिकनाई दे रही थी।

“आह… बाबूसा… यह आवाज़…” गौरी ने कराहते हुए कहा, लेकिन उसके चेहरे पर आनंद था। “मुझे भी यह सिखाओ न… कैसे मुँह से लौड़ा चूसते हैं… ताकि मैं सुमेर को भी इस तरह खुश कर सकूँ। “

राम सिंह, जो अपनी पत्नी के गले को चोद रहा था, ने हाँ में सिर हिलाया। “हाँ… हाँ बेटी… तुझे सब कुछ सिखाऊँगा… एक दिन… आह!” उसने एक और जोरदार धक्का दिया।

लगभग पाँच मिनट तक यही चलता रहा। राम सिंह का लौड़ा अब पूरी तरह चिकना और चमकदार हो चुका था, उसकी पत्नी की लार से भीगा हुआ। अंत में उसने एक लंबा, गहरा धक्का देकर अपना लौड़ा बाहर निकाल लिया। उसकी पत्नी के मुँह से लार की एक लंबी लकीर लटक रही थी।

तुरंत गौरी ने अपनी माँ से अनुरोध किया, उसकी आवाज़ में एक बच्चे जैसी लालसा थी। “माँ… अब तुम भी मेरी चूत चाटो ना… बस एक-दो बार… ताकि मैं और गीली हो जाऊँ… और तैयार हो जाऊँ।”

गौरी की माँ ने प्यार से मुस्कुराते हुए, अपनी बेटी के पसीने से तर माथे पर हाथ फेरा।

“अरे मेरी लाडली… जब से तू ससुराल गई है, माँ का दिल तेरे लिए तरस रहा है।” फिर वह झुकी और अपनी बेटी की चूत के ऊपर लार की उस चमकदार परत को अपनी जीभ से साफ करने लगी।

उसने अपनी जीभ का फ्लैट हिस्सा गौरी के भगोष्ठों पर फेरा, फिर उसकी संकरी फांक में घुसाकर कोमलता से चाटा। “तू तो बिल्कुल माँ जैसी हो गई है… इतनी सुंदर चूत…”

“बस! अब बहुत हुआ!” राम सिंह का धैर्य टूट गया। उसने अपनी पत्नी को वहाँ से खींचकर अलग किया। “अब और इंतज़ार नहीं होता!”

गौरी एक शरारती, विजयी मुस्कान के साथ खिलखिलाई। राम सिंह ने अपने हाथों से गौरी की जांघों को और चौड़ा किया, अपने घुटनों के बल बिस्तर पर ऊपर उठा, और अपने चमकदार लौड़े के सिर को गौरी की चूत के द्वार पर टिका दिया। उसने एक धीमा, दबावपूर्ण धक्का दिया।

“हम्म्म…” राम सिंह ने आँखें बंद कर लीं जैसे कोई स्वाद ले रहा हो। उसका लौड़ा गौरी की चूत की गर्म, नम और आश्चर्यजनक रूप से तंग गुफा में घुस रहा था।

हर इंच के साथ, उसे अपनी बेटी की चूत की मांसपेशियों का संकुचन महसूस हो रहा था, जो उसके लौड़े को चारों ओर से जकड़ रही थीं। “क्या जकड़ है… भगवान की कसम…”

गौरी ने भी अपने होठ दबा लिए। उसे अंदर एक गहरी, भराव वाली अनुभूति हो रही थी। यह सुमेर के लौड़े से अलग था। यह अधिक मोटा, अधिक भारी था, और इसमें एक अजीब सा परिचितपन था। “आ… आ… पापा…” वह फुसफुसाई।

राम सिंह ने धीरे-धीरे गति बढ़ानी शुरू की, अंदर-बाहर करते हुए। हर बार बाहर निकलते हुए उसका लौड़ा लगभग पूरा बाहर आ जाता, और अंदर जाते हुए वह गौरी की चूत की गहराई तक जा पहुँचता। “बहुत… बहुत मजा आ रहा है बेटी… तेरी चूत तो सचमुच स्वर्ग है…”

गौरी की माँ, जो अब बिस्तर के पास रखी एक बड़ी, मखमली सोफा कुर्सी पर बैठ गई थी, ने अपनी टाँगें फैला दीं। उसने अपनी एक उंगली अपनी चूत में डाली और तेजी से अंदर-बाहर करने लगी, अपनी दूसरी हाथ से अपने चूचे को मसलते हुए।

लेकिन उसकी आँखें चिंतित थीं। “साहब जी ! धीरे करो! सावधान!” उसने चेतावनी दी। “अपना माल उसके गर्भ में मत डालना! याद रखो, गर्भ सुमेर का होना चाहिए! यही हमारी योजना है!”

राम सिंह ने, जो अब पूरी रफ्तार से चोद रहा था, अपनी पत्नी की तरफ एक झलक देखा। “अब कोई फर्क नहीं पड़ता!” उसने हांफते हुए कहा। “जिसका भी बच्चा होगा… कौन पता लगा पाएगा? वो सब समझेंगे कि सुमेर का है!”

“आह… आह… पापा… धीरे…” गौरी कराह रही थी, लेकिन फिर भी बातचीत में कूद पड़ी। उसने अपने पिता के कंधे पकड़ लिए। “लेकिन पापा… सुमेर और उसकी माँ ठाकुराइन को हल्के में मत लेना… वो… आह… वो चालाक है…”

राम सिंह ने पिस्टन की तरह तेज गति से चोदना जारी रखा, गौरी के नितंब उसकी जांघों से टकरा रहे थे। “अच्छा? अब तू उनकी तारीफ करने लगी है?” उसने व्यंग्यात्मक स्वर में कहा। “क्या हुआ? उस ठाकुराइन ने तुझपर अपना जादू चला दिया है मेरी प्यारी रंडी?”

“नहीं बाबूसा! मैं गंभीर हूँ!” गौरी ने जोर देकर कहा, अपनी आँखें खोलकर। “सुनिये… उस औरत ने… आह्ह!… उसने सुमेर को आदेश दिया है कि मुझे कभी भी, कहीं भी, महल में किसी के सामने चोदे… यहाँ तक कि उसके अपने सामने भी! सोचो तो जरा… कौन सी माँ ऐसा करवाती है?”

यह सुनते ही राम सिंह अचानक रुक गया। उसका लौड़ा गौरी की चूत के अंदर ही जम गया। एकदम से सन्नाटा छा गया। सोफा कुर्सी पर बैठी गौरी की माँ ने भी अपनी चूत में उंगली चलाना बंद कर दिया।

पति-पत्नी की नजरें एक दूसरे से मिलीं। उनकी आँखों में एक ही सवाल था—यह नई जानकारी क्या मायने रखती है?

गौरी की माँ ने धीरे से कहा, उसकी आवाज़ में गंभीरता थी। “

“यह… यह बात तो पूरा खेल बदल देती है,” गौरी की माँ ने कहा, अपनी उंगली अपनी चूत से निकालते हुए।

वह धीरे-धीरे सोफे से उठी और बिस्तर के किनारे पर आकर खड़ी हो गई। “अगर ठाकुराइन इतनी बेशर्म और निर्लज्ज है कि अपने बेटे को दुल्हन को सामने ही चोदने का आदेश देती है… तो इसका मतलब है कि वह कोई साधारण औरत नहीं है। वह हमसे भी आगे की सोच रखती है।”

राम सिंह का चेहरा गंभीर हो गया था। क्रोध और कामुकता की लाली अब चिंता और गहरी सोच में बदल गई थी।

उसने गौरी की चूत से अपना लौड़ा बाहर निकाल लिया, जिससे एक गीला, चूसने जैसा आवाज़ निकला। “तू सही कह रही है गौरी की माँ,” उसने अपनी पत्नी से कहा।

“हमने सोचा था कि हम एक भोले-भाले राजपूत लड़के और उसकी रूढ़िवादी माँ के साथ खेल रहे हैं। लेकिन अगर ठाकुराइन खुद ही इस तरह के खुलेआम कुकर्मों का आदेश देती है… तो शायद वह हमारे जैसी ही है। या फिर… हमसे भी ज्यादा खतरनाक।”

“आह… पापा…” गौरी ने विलाप किया, अपनी टाँगें हिलाते हुए। उसकी चूत अब खाली और ठंडी महसूस हो रही थी, और उसके अंदर का ज्वार अभी भी चरम पर था। “बातें बाद में करना… पहले… पहले तो मेरी चूत का ख्याल रखो ना। आपने इसे ऐसे ही छोड़ दिया… बीच में ही…”

गौरी ने बिल्कुल एक नाराज बच्ची की तरह अदा की, अपनी मुट्ठियाँ बिस्तर पर पटकते हुए। उसकी यह हरकत देखकर राम सिंह के चेहरे पर एक मुलायम, पितृसुलभ मुस्कान आ गई। उसका ध्यान फिर से उसकी बेटी की जरूरतों पर गया।

“ओह, माफ करना मेरी प्यारी,” उसने कहा, अपना हाथ बढ़ाकर उसके गाल को सहलाते हुए। “तू बिल्कुल सही कह रही है। बाबूसा तो बातों में उलझ गया।”

उसने फिर से अपने घुटनों के बल ऊपर उठाया, लेकिन इस बार वह पूरी तरह से गौरी पर लेट गया। उसने अपना पूरा वजन उस पर डाल दिया, उसके नरम, युवा शरीर को अपने भारी, मांसल शरीर से दबा दिया। गौरी ने एक छोटी सी चीख निकाली, जो आनंद और आश्वासन से भरी हुई थी।

राम सिंह ने गौरी के होंठों पर जबरदस्ती अपने होंठ रख दिए, एक जानवर की तरह उसे चूमना शुरू कर दिया। यह कोमल चुंबन नहीं था; यह एक दावे का चुंबन था, एक अधिकार जताने वाला चुंबन।

और फिर, बिना किसी और देरी के, उसने अपना लौड़ा फिर से गौरी की चूत में झोंक दिया। इस बार कोई धीमी शुरुआत नहीं थी। वह तुरंत पूरी गति और पूरी ताकत से चोदने लगा। उसकी कमर का हर झटका गौरी के पूरे शरीर को बिस्तर में धंसा देता था। बिस्तर की लकड़ी चरमराने लगी।

“हाँ! हाँ! ऐसे ही पापा! ऐसे ही!” गौरी चिल्लाई, उसकी आवाज़ दबी हुई थी क्योंकि उसके पिता का मुँह अभी भी उसके मुँह पर चिपका हुआ था। उसने अपनी एड़ियों को राम सिंह की पीठ पर लपेट लिया, उसे और गहराई तक खींचने की कोशिश करते हुए।

पाँच मिनट तक यह अंधाधुंध चुदाई चलती रही। राम सिंह ने सब कुछ भूलकर, अपनी पत्नी की चेतावनी, ठाकुराइन के बारे में चिंता, सब कुछ। उसकी दुनिया सिर्फ उसकी बेटी की गर्म, तंग चूत थी जो उसके लौड़े को हर तरफ से निचोड़ रही थी।

उसकी सांसें फूलने लगीं, उसकी चुदाई की गति और भी तेज और अनियमित हो गई।

“आ रहा हूँ… गौरी… आ रहा हूँ बेटा!” उसने गुर्राते हुए कहा।

और फिर वह झड गया। एक गहरी, कंपकंपी देने वाली चीख के साथ, उसने अपना लौड़ा गौरी की चूत की सबसे गहरी जगह में धकेल दिया और अपना गाढ़ा, गर्म वीर्य उसके गर्भाशय के द्वार पर फेंक दिया। झटके के साथ उसका पूरा शरीर कांप उठा।

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