सास ने की दामाद की सेवा – पार्ट २

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दोपहर का समय था। गायत्री देवी ने अपना मन बना लिया था। वह नैना के पास गईं और बोलीं, “बेटा, मैं सब्ज़ी लेने बाज़ार जा रही हूँ। कुछ चाहिए तुझे?”

नैना सोफ़े पर लेटी हुई थी, उसने हाथ हिलाकर कहा, “नहीं अम्मा, तुम जाओ। मुझे कुछ नहीं चाहिए।”

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गायत्री देवी ने साड़ी ठीक की, पल्लू को कंधे पर अच्छी तरह से समेटा, और बाहर निकल गईं। उनके कदम हल्के थे, लेकिन दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। उन्हें लग रहा था जैसे कोई उन्हें देख रहा हो, कोई उनकी हरकत को देख रहा हो। लेकिन सड़क पर सब अपने काम में मशगूल थे।

सब्ज़ी बाज़ार पहुँचकर वह एक दुकान के पास खड़ी हो गईं। दिखावे के लिए उन्होंने मिर्च और टमाटर उठाए, लेकिन उनकी नज़रें हर गुज़रती गाड़ी को देख रही थीं।

कुछ ही मिनटों में एक काली कार उनके पास आकर रुकी। महेश ने खिड़की नीचे की और उन्हें देखा। उसकी आँखों में वही चमक थी — शिकार पर निकले शेर की तरह।

“अंदर आ जाओ, अम्मा,” उसने कहा, आवाज़ में एक दबी हुई उत्तेजना थी।

गायत्री देवी ने चारों ओर देखा — कोई उन्हें नहीं देख रहा था। वह तेज़ी से कार में बैठ गईं और दरवाज़ा बंद कर लिया। कार चल पड़ी।

अंदर का माहौल ख़ामोश था। दोनों के बीच सिर्फ़ एक फुट की दूरी थी, लेकिन उस दूरी में हज़ारों अनकही बातें थीं। गायत्री देवी ने साड़ी के पल्लू को बार-बार ठीक किया, अपने हाथों को एक-दूसरे में उलझाती रहीं।

लेकिन उनके मन में तो बस एक ही तस्वीर थी — वह बाथरूम का दृश्य। महेश का वह 9 इंच का विशाल लंड, जो ऊपर को उठा हुआ था, नसों से भरा हुआ, चमकता हुआ।

वह सोच रही थीं — कैसा लगेगा उसे अपने अंदर लेना? क्या वह उसे ले पाएगी? वह तो रामप्रसाद की छोटी सी चीज़ से ही तंग आ जाती थी। लेकिन फिर उनके मन में एक और आवाज़ आई — पर एक बार तो मरकर देख लूँ।

महेश एक छोटे से होटल के पास कार रोकी। एक सस्ता होटल, साफ-सुथरा, लेकिन ज़्यादा बड़ा नहीं। उसने कमरा बुक किया और रिसेप्शन से चाबी ली। दोनों लिफ्ट में चढ़े। लिफ्ट के अंदर उनके बीच वही ख़ामोशी थी, लेकिन अब वह और भी गहरी हो गई थी।

कमरे के दरवाज़े पर पहुँचकर महेश ने ताले में चाबी घुमाई। दरवाज़ा खुला और दोनों अंदर घुसे।

जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ, महेश ने बिना एक शब्द कहे गायत्री देवी को अपनी बाँहों में भर लिया। उसके होंठ उनके होंठों पर आ गए — बेहद जोरदार चुंबन, जैसे वह इन चार दिनों की प्यास बुझा रहा हो।

गायत्री देवी ने पहले तो झिझक महसूस की, लेकिन फिर वह भी पिघल गईं। उनके हाथ उसकी छाती पर, फिर उसकी पीठ पर घूमने लगे। वह चुंबन का जवाब दे रही थीं — पहले डर कर, फिर उत्सुकता से, फिर पूरी तरह डूब कर।

महेश ने उन्हें उठाकर बिस्तर पर गिरा दिया और खुद उनके ऊपर आ गया। उसके हाथों ने उनकी साड़ी के पल्लू को हटाया और उनकी गर्दन पर चुंबनों की बारिश कर दी।

“आह… महेश…” गायत्री देवी के मुँह से एक आह निकल गई।

उसने उनके स्तनों को साड़ी के ऊपर से दबाया — धीरे-धीरे, गोल-गोल घुमाकर। गायत्री देवी की साँसें फूलने लगीं। उनकी छाती ऊपर-नीचे हो रही थी।

महेश ने उनकी साड़ी को ऊपर से खोलना शुरू किया। उसकी उँगलियाँ जल्दी-जल्दी काम कर रही थीं, लेकिन एक पिन फँस गई थी। उसने जोर लगाया, लेकिन नहीं खुली।

गायत्री देवी ने एक गहरी साँस ली और फुसफुसाईं, “अरे… मैं ही खोलती हूँ, तुम ऐसे ही… साड़ी के नीचे करो हाथ।”

उनके हाथ काँप रहे थे लेकिन उन्होंने अपनी ब्लाउज़ की पिन खोल दी। जैसे ही ब्लाउज़ खुला, उनके 38 साइज़ के स्तन बाहर निकल आए — उभरे हुए, गोल, काले निप्पल के साथ। वह निप्पल पहले से ही सख्त हो चुके थे — गाँठ की तरह उभरे हुए।

गायत्री देवी ने महेश का सिर पकड़कर अपने स्तनों की ओर खींच लिया।

“लो यह, दामादजी… यह तुम्हारा है,” उन्होंने कहा, उनकी आवाज़ में एक गहरी लालसा थी।

महेश ने उनके एक स्तन को अपने मुँह में ले लिया। उसने धीरे-धीरे चूसना शुरू किया — पहले हल्का, फिर ज़ोर से। उसकी जीभ निप्पल पर गोल-गोल घूमने लगी, और फिर उसने हल्का सा दाँत से दबाया।

गायत्री देवी ने चीख निकाल दी। “आह! हाँ… दामादजी… ऐसे ही… और चूसो मुझे।”

उसने दूसरे स्तन पर हाथ रखकर उसे दबाना शुरू किया — उंगलियों से निप्पल को रगड़ना, निचोड़ना, फिर फिर से दबाना।

गायत्री देवी की आँखें बंद थीं। उनके मुँह से बस आहें निकल रही थीं। कभी वह महेश के बालों में हाथ फेरतीं, कभी उसकी पीठ पर नाखून गड़ातीं।

उन्होंने अपनी ज़िंदगी में ऐसा कभी अनुभव नहीं किया था। रामप्रसाद तो बस ऊपर आते, तीन-चार बार हिलते, और ख़त्म। पास वाले पड़ोसी ने भी कभी इस तरह से उनके स्तनों को नहीं चूसा था।

महेश धीरे-धीरे उनके स्तनों से नीचे उतरता गया — पेट पर चुंबन, नाभि के आसपास हल्की जीभ घुमाना। गायत्री देवी का पेट काँपने लगा — यह उनका सबसे संवेदनशील हिस्सा था, और महेश उसे भली-भाँति जान रहा था।

“अरे दामादजी… तुम तो मुझे पागल कर दोगे,” गायत्री देवी ने कहा, उनके हाथ महेश के सिर पर थे। “ऐसा तो मेरे साथ कभी किसी ने नहीं किया।”

महेश ने ऊपर देखा, उसके होंठ गीले थे। “सच में, अम्मा? तुम्हारे पति ने तुम्हें कभी ऐसा प्यार नहीं किया?”

गायत्री देवी ने सिर हिलाया और फिर से एक लंबी आह भरी।

महेश ने उनकी नाभि और पेट पर चुंबन जारी रखा, और साथ ही साथ उनकी साड़ी को कमर से धीरे-धीरे ऊपर खिसकाने लगा। उसके हाथ उनकी जाँघों पर चलने लगे — अंदर की तरफ, बाहर की तरफ, हर जगह।

गायत्री देवी के शरीर से हल्की-हल्की ऐंठन सी होने लगी थीं। हर स्पर्श पर उनका शरीर बिजली की तरह हिलता था।

फिर महेश ने एक झटके में उनकी साड़ी को पूरी तरह से कमर के नीचे कर दिया। अब उनके सामने उनकी पेटीकोट और उसके अंदर की पैंटी नज़र आ रही थी — सफ़ेद रंग की पैंटी, जो पूरी तरह से गीली हो चुकी थी। उस पर से उनकी चूत का जोश साफ़ दिख रहा था — पैंटी के कपड़े पर गीला धब्बा फैल चुका था।

महेश ने उंगली से उनकी पैंटी के ऊपर से चूत को छुआ और कहा, “अम्मा, तुम तो बिल्कुल पानी-पानी हो गई हो।”

गायत्री देवी ने आँखें बंद रखीं। उनके होंठ पर एक शर्मीली मुस्कान थी, और उनकी साँसें तेज़ थीं। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस अपने कूल्हे हल्के से ऊपर उठाए — जैसे कह रही हों, “हाँ, मैं तुम्हारे लिए ऐसी हूँ।”

महेश ने उनकी पैंटी पर उंगलियाँ घुमानी शुरू कीं — धीरे-धीरे, गोल-गोल, पहले हल्का दबाव, फिर गहरा। गायत्री देवी के मुँह से लगातार आहें निकल रही थीं। उन्होंने बेडशीट को अपनी मुट्ठी में कसकर पकड़ लिया — नाखून कपड़े में गड़ रहे थे।

महेश उनकी पैंटी के निचले किनारे को खींचकर नीचे करने लगा। गायत्री देवी ने उसकी मदद करते हुए अपनी कमर हल्की ऊपर उठाई और पैंटी पूरी तरह से निकल गई।

महेश ने सामने देखा — तो उसके होश उड़ गए। गायत्री देवी की चूत पूरी तरह से साफ़ करी हुई थी — बालों का एक भी निशान नहीं। और वह पर एकदम चिकनी, चमकती हुई, और पूरी तरह से गीली थी — उनके रस से लबालब।

“अरे अम्मा! तुमने तो साफ़ कर रखा है यहाँ। बिल्कुल चिकनी चूत है तुम्हारी,” महेश ने तारीफ़ करते हुए कहा। उसकी आवाज़ में सच्ची हैरानी थी। “कितनी गीली है, देखो। पानी बह रहा है इससे।”

गायत्री देवी ने आँखें खोलीं और महेश की तरफ देखा। उनकी आँखों में अब शर्म नहीं थी, बल्कि एक खुली हुई लालसा थी। उन्होंने फुसफुसाते हुए कहा, “तुम्हारे लिए ही किया है, दामादजी… पता था कि तुम इसे देखोगे।”

महेश को और देर नहीं लगी। उसने अपना सिर उनके पैरों के बीच झुकाया और अपने होंठ उनकी चूत के पास ले गया। उसकी साँसों की गर्मी उनके सबसे संवेदनशील हिस्से पर पड़ रही थी।

गायत्री देवी का शरीर तन गया। वह जानती थीं कि अब क्या होने वाला है, लेकिन फिर भी उनका शरीर बेसब्री से उस पल का इंतज़ार कर रहा था।

महेश ने अपनी जीभ निकाली और धीरे-धीरे उनकी चूत की बाहरी लिप को चाटा — ऊपर से नीचे, फिर से ऊपर, एक धीमी, लंबी चाट।

गायत्री देवी का शरीर इस तरह हिला जैसे उन्हें बिजली का झटका लगा हो। उन्होंने ज़ोर से चीख निकाली, “आह! हे भगवान! दामादजी!”

महेश ने उनकी घबराहट को अनदेखा किया और अपनी जीभ को उनकी चूत के हर हिस्से पर घूमने दिया — ऊपर की छोटी सी गाँठ पर, नीचे के होंठों पर, और बीच में उस छेद पर जहाँ से उनका रस बह रहा था। वह धीरे-धीरे, प्यार से चाट रहा था, जैसे वह कोई मीठी चीज़ हो।

गायत्री देवी अब पूरी तरह से खो चुकी थीं। उन्होंने महेश का सिर दोनों हाथों से पकड़ा और उसे अपनी चूत के खिलाफ़ जोर से दबाया।

गायत्री देवी अब पूरी तरह से खो चुकी थीं। उन्होंने महेश का सिर दोनों हाथों से पकड़ा और उसे अपनी चूत के खिलाफ़ जोर से दबाया।

“हाँ… हाँ… ऐसे ही चाटो मुझे, दामादजी! हे भगवान!”

गायत्री देवी का शरीर ऐसा हिल रहा था जैसे कोई मछली पानी से बाहर निकल कर तड़प रही हो। उनके हाथ महेश के सिर पर थे और वह उसे और जोर से अपनी चूत के खिलाफ दबा रही थीं।

उनकी जाँघें महेश के कानों को दबा रही थीं, लेकिन उसे कोई परवाह नहीं थी। वह तो बस उस रसीले, चिकने, साफ-सुथरे चूत का स्वाद ले रहा था – जो पूरी तरह से उनके रस से भीगी हुई थी।

महेश की जीभ उनकी चूत के हर कोने को चाट रही थी। ऊपर वाली छोटी सी गाँठ पर हल्का दबाव, फिर नीचे वाले होंठों को जीभ से अलग करके अंदर के गुलाबी हिस्से को चाटना। और गायत्री देवी की आवाज़ें… हर बार उसकी जीभ के स्पर्श पर वह और जोर से कराहतीं, और वह और तेज़ कर देता।

गायत्री देवी की उंगलियाँ महेश के बालों में उलझ गईं। उन्होंने उसका सिर और जोर से दबाया और चिल्लाईं, “अंदर! दामादजी, जीभ अंदर डालो!”

महेश ने उनकी चूत के छेद पर अपनी जीभ को सख्त करके धकेल दिया – अंदर, जहाँ उनका रस सबसे ज्यादा बह रहा था। उसकी जीभ अंदर घुस गई और वह उसे घुमाने लगा – गोल-गोल, चारों तरफ।

“अह्ह्ह्ह्ह! हाँ! ऐसे! अह्ह्ह्ह्ह!” गायत्री देवी ने बिस्तर पर हाथ पटक दिए। उनकी कमर अपने आप ऊपर-नीचे होने लगी – वह उसकी जीभ पर खुद को चोदने लगी थीं।

महेश ने उनकी चूत के अंदर अपनी उंगली भी डाल दी – पहले एक, फिर दूसरी। उसकी उंगलियाँ उनके अंदर घूम रही थीं और उसकी जीभ बाहर उनकी क्लिट को चाट रही थी। गायत्री देवी के शरीर से बिजली सी दौड़ गई।

“अरे दामादजी! तुम मुझे मार डालोगे!” वह चिल्लाईं। “ये तो स्वर्ग का सुख है!”

गायत्री देवी का शरीर काँपने लगा। उनके पैर महेश के कंधों पर कस गए और उन्होंने अपने नाखून उसकी पीठ में गड़ा दिए। “रुको… रुको दामादजी… मैं… मैं फट जाऊँगी… आ रहा है… बहुत जोर से आ रहा है!”

महेश ने और तेज़ कर दिया – उंगलियाँ अंदर तेज़ी से आगे-पीछे, जीभ बाहर उनकी क्लिट पर जोर से दबाव।

“मैं… आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह!”

गायत्री देवी का शरीर एक बार सख्त हुआ, फिर ढीला पड़ गया, फिर एक और बार सख्त हो गया। और फिर उनकी चूत से एक फव्वारा सा निकल पड़ा – गर्म, चिपचिपा रस जो महेश के चेहरे पर फैल गया। वह बार-बार छोटे-छोटे झटकों में फट रही थीं – उनकी चूत की मांसपेशियाँ एक के बाद एक सिकुड़ रही थीं।

वह चिल्लाईं, “हाय दय्या! मर गयी! दामादजी… ऐसा सुख तो मैंने अपनी ज़िंदगी में कभी नहीं पाया!”

उनका शरीर बिस्तर पर फैल गया, साँसें तेज़-तेज़ चल रही थीं। उनके हाथ महेश के सिर से हट गए और बिस्तर पर गिर गए। उनकी आँखें बंद थीं, और उनके चेहरे पर एक गहरी शांति थी।

कुछ पल बाद उन्होंने अपनी आँखें खोलीं। उनकी नज़र महेश पर पड़ी – उसका चेहरा उनके रस से नहाया हुआ था। उनके होंठों पर एक शरारती मुस्कान आ गई।

“दामादजी,” उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा, “अब तो तुम भी अपने कपड़े उतारो। मैं तुम्हारा वह राज देखना चाहती हूँ जो मैंने बाथरूम में देखा था।”

महेश खड़ा हो गया और अपने पैंट के बटन खोलने लगा। गायत्री देवी की नज़र उसके हाथों पर जमी हुई थी। वह लेटी हुई थीं, लेकिन उनकी आँखों में उत्सुकता साफ़ दिख रही थी। उसकी पैंट नीचे गिरी, फिर उसके अंडरवियर, और…

उसका 9 इंच का लंड बाहर निकल आया। गीला, तनाव से लाल, और पूरी तरह से खड़ा हुआ।

गायत्री देवी की आँखें फैल गईं। वह धीरे से उठकर बैठ गईं और अपनी नज़रें उस पर टिका दीं। उनके होंठ थोड़े अलग हो गए, और उन्होंने लार निगल ली।

“हे माँ!” उनके मुँह से धीमी आवाज़ निकली। “यह तो… यह तो हाथी का सूँड है… इतना बड़ा… इतना मोटा… मैं इसे कैसे लूँगी?”

लेकिन उनके चेहरे पर डर नहीं था। बल्कि एक ऐसी चाहत थी जो किसी खौफ से बड़ी थी। उन्होंने अपना हाथ बढ़ाया और धीरे से महेश के लंड के सिर को अपनी उँगलियों से छुआ। उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं।

गायत्री देवी अब अपने दामाद के उस विशाल नौ इंच के लंड को छू रही थीं। उनकी उँगलियाँ उसकी सतह पर धीरे-धीरे घूम रही थीं, हर नस को, हर उभार को महसूस कर रही थीं।

उनके मन में एक ही सवाल था – यह इतना बड़ा, इतना मोटा, इसे वह अपने अंदर कैसे ले पाएँगी? रामप्रसाद का तो अँगूठा जितना था और वह पड़ोसी भी कोई खास नहीं था। लेकिन यह… यह तो कोई हथियार था।

उनकी उँगलियाँ उसके सिर पर पहुँचीं – चिकना, गोल, और ऊपर से एक छोटा सा छेद जिसमें से उनके रस की महक आ रही थी। उन्होंने उसे अपनी हथेली में लपेटा और उसका वज़न महसूस किया। कितना भारी था, कितना गर्म।

महेश ने उनके हाथ को पकड़कर रोक दिया और अपने लंड को उनके चेहरे के सामने लाकर कहा, “ले लो अम्मा… अब समय है अपने दामाद को खुश करने का। इसे अपने मुँह में लो।”

गायत्री देवी ने ऊपर देखा – महेश की आँखों में वही शिकारी चमक थी। फिर उन्होंने नीचे देखा – वह विशाल लंड उनके चेहरे से बस कुछ इंच दूर था, उसकी गर्मी उनके होंठों को छू रही थी। वह अभी कुछ बोल पातीं, इससे पहले ही महेश ने उनके सिर को पकड़ा और अपने लंड को उनके होंठों के बीच धकेल दिया।

गायत्री देवी का जबड़ा अचानक हुए इस हमले से चौड़ा हो गया। उनके मन में पहले तो एक झटका लगा – यह जबरदस्ती थी। लेकिन फिर उनके अंदर एक अजीब सी स्वीकार्यता आ गई। वह तो यही चाहती थीं, है न? वह तो इसी के लिए आई थीं।

उन्होंने अपने जबड़े को ढीला किया और धीरे-धीरे अपना सिर आगे-पीछे करना शुरू किया। उनकी जीभ उसके सिर को चाट रही थी, उसे कोई मीठा लॉलीपॉप समझकर। चाटने और चूसने की आवाज़ें कमरे में गूँजने लगीं – च्वाप-च्वाप, च्वाप-च्वाप।

महेश ने अपनी आँखें बंद कर लीं। इतने महीनों बाद उसे किसी औरत के होंठों का एहसास हो रहा था, कोई औरत उसके लंड को अपने मुँह में ले रही थी। उसकी सास का मुँह उसके लंड को गरमाहट दे रहा था, उसकी जीभ उसके कोमल हिस्सों को सहला रही थी।

फिर वह खुद भी हिलने लगा – अपनी कमर को आगे-पीछे करते हुए, उसके मुँह के अंदर-बाहर करने लगा।

लेकिन तभी एक आवाज़ आई – “गक्क!”

महेश का लंड गायत्री देवी के गले में आधा ही अंदर गया था और वहाँ जाकर रुक गया था। गायत्री देवी ने झटके से अपना सिर पीछे खींचा और जोर-जोर से खाँसने लगीं। उनकी लार उनके मुँह से निकलकर उनकी ठुड्डी से होती हुई उनके स्तनों और पेट पर टपक रही थी।

” दामादजी… बहुत बड़ा है,” उन्होंने हाँफते हुए कहा, उनकी आँखों में पानी आ गया था।

लेकिन महेश ने उनकी एक न सुनी। उसने फिर से उनके सिर को पकड़ा और अपने लंड को उनके मुँह में धकेल दिया।

“गक्क! गक्क्क!”

हर बार वही आवाज़ – हर बार लंड का सिर उनके गले के अंदर जाकर अटक जाता था। गायत्री देवी का चेहरा लाल हो गया था, उनकी आँखों से आँसू बहने लगे थे। वह अपने हाथों से महेश की जाँघों को धकेलने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन महेश तो और जोर से उनके सिर को पकड़े हुए था।

चार-पाँच सेकंड तक यह चलता रहा – गायत्री देवी का दम घुट रहा था, उनकी आँखों का लाल हो चुका था, उनके चेहरे पर नसें उभर आई थीं। तब जाकर महेश ने उनके सिर को छोड़ा और अपना लंड बाहर निकाला।

गायत्री देवी जोर-जोर से साँस लेने लगीं, खाँसती हुई। उनके मुँह से लार का एक बड़ा बुलबुला निकला जो उनकी ठुड्डी से टपकता हुआ नीचे गिर गया।

“नहीं दामादजी… मैं गहरा नहीं ले सकती… रको,” उन्होंने गिड़गिड़ाते हुए कहा।

महेश ने समझौता किया और अपने लंड को उनके मुँह में आधा ही डाला – जहाँ तक वह आराम से ले सकती थीं।

“गक्क… गक्क… गक्क… गक्क…”

यह आवाज़ें अब एक ताल में बदल गई थीं – हर बार जब महेश अपनी कमर आगे बढ़ाता, गायत्री देवी के गले से वही आवाज़ निकलती। उनका सिर बिस्तर पर पीछे को झुका हुआ था, महेश उनके ऊपर खड़ा होकर उनके मुँह को चोद रहा था।

पाँच मिनट तक यह सिलसिला चलता रहा। गायत्री देवी के होंठ सुन्न हो गए थे, उनके जबड़े में दर्द हो रहा था, लेकिन वह रुकना नहीं चाहती थीं। हर बार जब महेश का लंड उनके मुँह में जाता, वह उसे चूसतीं और उनकी जीभ उसके निचले हिस्से को सहलाती।

फिर महेश ने उनके मुँह से अपना लंड निकाला और उन्हें बिस्तर पर लिटा दिया। उनके पैरों को फैलाकर उनके बीच में खड़ा हो गया।

गायत्री देवी ने अपनी आँखें बंद कर लीं और गहरी साँस ली। वह इस पल के लिए तैयार हो रही थीं – उस विशाल चीज़ को अपने अंदर लेने के लिए, जो उनकी ज़िंदगी में अब तक की सबसे बड़ी चुनौती थी।

महेश ने अपने लंड के सिर को उनकी चूत के प्रवेश द्वार पर रखा – चिकना, गीला, पूरी तरह तैयार। जैसे ही उसका लंड उनकी चूत के बाहरी हिस्से को छुआ, गायत्री देवी के मुँह से एक संतुष्टि भरी आह निकली – “आह्ह्ह… दामादजी…”

महेश ने धीरे-धीरे अपने लंड के सिर को उनकी चूत में धकेला। उसकी चूत की दीवारें इतनी तंग थीं कि उसे लगा जैसे वह किसी बंद मुठ्ठी में जा रहा हो।

“अम्मा, तुम्हारी चूत तो नैना से भी तंग है,” महेश ने तारीफ करते हुए कहा।

गायत्री देवी ने कराहते हुए जवाब दिया, “तुम्हारे ससुर का तो… टिकली जितना था… और दूसरा जो था… वह भी औसत ही था… इसीलिए…”

महेश के हाथ रुक गए। उसके चेहरे पर हैरानी फैल गई। “क्या? क्या कहा तुमने? तुम्हारा किसी और से भी… अपने पति के अलावा?”

गायत्री देवी के चेहरे पर शर्म और उत्तेजना का मिश्रण था। वह पूरी तरह से उस विशाल लंड के एहसास में डूबी हुई थीं जो उनकी चूत को चौड़ा कर रहा था। उन्होंने कराहते हुए कहा, “मैं तुम्हें सब बताऊँगी… पहले मुझे चोदो… मुझे और मत तड़पाओ, दामादजी!”

महेश के चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान आ गई। “बेशक, सासू माँ…”

और फिर उसने अपने पूरे नौ इंच के लंड को एक ही जोरदार स्ट्रोक में उनकी चूत के अंदर धकेल दिया।

“फच्च!”

यह आवाज़ पूरे कमरे में गूँज गई – उनकी चूत की गीली दीवारों का उस विशाल लंड से टकराने की आवाज़। गायत्री देवी की आँखें फैल गईं। उनके मुँह से एक चीख निकली – “आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह!” – इतनी जोर से कि ऐसा लगा जैसे किसी ने उनमें चाकू घोंप दिया हो।

उनकी नज़रें महेश की आँखों से मिल गईं – एक लंबा, गहरा नज़रों का मिलन। गायत्री देवी के अंदर एक अजीब सी पीड़ा और सुख का मिश्रण था। वह लंड उनकी चूत के अंदर पूरी तरह से समा गया था, उनकी कोख तक पहुँच गया था।

महेश ने धीरे-धीरे अपना लंड बाहर निकाला – हर इंच, हर सेंटीमीटर, उनकी चूत की दीवारों को रगड़ता हुआ। गायत्री देवी को लगा जैसे कोई स्वर्ग का एहसास उनके शरीर से गुज़र रहा हो। यह पीड़ा नहीं थी – यह एक गहरा, अद्भुत आनंद था, जैसे उनकी चूत खुद उस लंड को चूस रही हो अपने अंदर।

जब महेश का लंड पूरी तरह बाहर आया, गायत्री देवी ने एक लंबी साँस छोड़ी और फिर महेश से बोलीं, “दामादजी… अब चोदना शुरू करो।”

महेश ने अपनी वही शैतानी मुस्कान लगाई और कहा, “बेशक, सासू माँ… क्या तुम अपनी लालसा को नहीं रोक सकतीं? मैं तो हर पल का आनंद लूँगा।”

फिर उसने चोदना शुरू किया – पहले धीरे-धीरे, फिर धीरे-धीरे गति बढ़ाते हुए।

“थप… थप… थप… थप…”

यह आवाज़ें अब एक ताल में बदल गई थीं – हर बार जब महेश का लंड गायत्री देवी की चूत में जाता और बाहर आता। महेश उनके ऊपर लेटा हुआ था, उनकी टाँगें चौड़ी फैली हुई थीं, और वह उन्हें जानवर की तरह चोद रहा था।

उसने अपना सिर झुकाया और गायत्री देवी के निप्पल को अपने मुँह में ले लिया – उसे दाँतों से काटना, जीभ से चाटना, चूसना। वह एक ही समय में उनके स्तन को दबा रहा था और उनकी चूत को चोद रहा था।

गायत्री देवी के हाथ उसकी पीठ पर थे, उसके कंधों पर, उसके बालों में उलझे हुए। लेकिन फिर महेश ने उनके हाथों को पकड़ा और उनकी हथेलियों को अपनी हथेलियों से जोड़कर बिस्तर पर दबा दिया – उँगलियाँ एक-दूसरे में फँसी हुई थीं। यह पूर्ण वर्चस्व का आसन था।

गायत्री देवी नीचे थीं, पूरी तरह से उसके नियंत्रण में। और वह इस पुरुष प्रभुत्व को हर तरह से एन्जॉय कर रही थीं।

महेश का लंड उनकी चूत को हर स्ट्रोक के साथ और चौड़ा करता जा रहा था। उसका अंडकोश उनकी चूत के निचले हिस्से पर हथौड़े की तरह पटक रहा था – “थप-थप-थप-थप!”

नौ से दस मिनट तक यह चलता रहा – महेश गायत्री के दोनों स्तनों को बारी-बारी से चूसता और काटता रहा, और उनकी चूत को चोदता रहा। गायत्री देवी स्वर्ग में यात्रा कर रही थीं – उनके मुँह से बस आहें और कराहें निकल रही थीं।

फिर अचानक महेश ने अपना लंड बाहर निकाल लिया और रुक गया।

गायत्री देवी की आँखें खुलीं। उनके चेहरे पर हैरानी थी। “क्यों रुक गए, दामादजी? क्या हुआ?”

महेश नीचे झुका और उन्हें एक गहरा चुंबन दिया – उनके होंठों पर, धीरे-धीरे, प्यार से। और फिर उसने कहा, “मेरा माल निकलने वाला था, इसलिए रुक गया। मैं तुम्हें अलग पोजीशन में भी चोदना चाहता हूँ।”

गायत्री देवी ने भोलेपन से पूछा, “क्या पोजीशन? क्या ऐसी भी कोई चीज़ होती है? हम अलग-अलग तरीकों से चोद सकते हैं?”

महेश उनकी इस मासूमियत पर ज़ोर से हँस पड़ा। उसकी हँसी कमरे में गूँजी, लेकिन उसमें कोई मज़ाक नहीं था — बल्कि एक स्नेह भरा आश्चर्य था।

“अरे सासू माँ… तुम्हें तो आधुनिक चुदाई के बारे में कुछ पता ही नहीं। मैं तुम्हें हर संभव पोजीशन दिखाऊँगा,” महेश ने कहा और अपने घुटनों के बल बिस्तर पर खड़ा हो गया। वह अपने लंड को सहला रहा था — वह अभी भी पूरी तरह से तना हुआ था, गीला और चमकता हुआ।

“अब पलटो,” उसने गायत्री देवी को निर्देश दिया। “चारों पैरों पर आ जाओ। जैसे कुत्ते खड़े होते हैं, वैसे।”

गायत्री देवी ने थोड़ी झिझक के साथ वैसा ही किया। वह पलटीं और अपने घुटनों और हथेलियों के बल आ गईं। उनका चेहरा बिस्तर की ओर था, और उनके नितंब ऊपर उठे हुए थे — सीधे महेश के सामने।

उनकी चूत पूरी तरह से खुली हुई थी उसकोण से, उनका रस अब भी बह रहा था और उनकी जाँघों के अंदरूनी हिस्से को गीला कर रहा था।

उन्होंने अपनी गर्दन घुमाकर पीछे देखा और पूछा, “ऐसे दामादजी? क्या मैं सही कर रही हूँ?”

महेश की नज़र उनके फैले हुए नितंबों पर टिक गई — उनकी सफ़ेद त्वचा, उनके कूल्हों का गोल आकार, और बीच में वह लाल, गीली, खुली हुई चूत। उसकी साँसें भारी हो गईं।

“हाँ, सासू माँ, बिल्कुल सही। अब मैं कुत्तों की तरह चोदूँगा तुम्हें,” उसने कहा और अपने लंड के सिर को उनकी चूत के प्रवेश द्वार पर रख दिया।

एक पल के लिए वह वहीं रुका — दोनों की साँसें कमरे में सुनाई दे रही थीं। गायत्री देवी का शरीर उत्तेजना से काँप रहा था। फिर महेश ने अपनी कमर को आगे बढ़ाया और अपना लंड उनकी चूत के अंदर धकेल दिया।

“आह्ह्ह्ह्ह!” गायत्री देवी के मुँह से एक लंबी, गहरी कराह निकली।

इस पोजीशन में महेश का लंड और गहराई तक जा रहा था — हर इंच उनकी चूत की दीवारों के साथ रगड़ खा रहा था। उसने अपने हाथ गायत्री देवी के कूल्हों पर रखे और धीरे-धीरे चोदना शुरू किया।

“थप… थप… थप… थप…”

हर स्ट्रोक के साथ उसके जांघे उनके नितंबों से टकराते और एक गीली, मांसल आवाज़ पैदा होती। गायत्री देवी का सिर नीचे झुका हुआ था, उनके हाथ बिस्तर की चादर को मुट्ठी में पकड़े हुए थे। उनके स्तन नीचे लटक रहे थे और हर झटके के साथ झूल रहे थे — एक तरफ से दूसरी तरफ।

“दामादजी… यह तो… यह तो और भी गहरा जा रहा है,” उन्होंने हाँफते हुए कहा।

महेश ने गति बढ़ा दी। उसके अंडकोश उनकी चूत के निचले हिस्से पर जोर-जोर से पटक रहे थे। उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया और गायत्री देवी के बालों को पकड़कर अपनी तरफ खींचा, जिससे उनकी पीठ और झुक गई और उनके नितंब और ऊपर उठ गए।

“हाँ, सासू माँ… अब सही है,” महेश ने गुर्राते हुए कहा। “अब मैं तुम्हें ठीक से चोदूँगा।”

उसने अपने नाखून उनके कूल्हों की त्वचा में गड़ा दिए और जोर-जोर से चोदने लगा — तेज़, गहरे स्ट्रोक जो हर बार उनकी चूत के अंदर तक जा रहे थे। गायत्री देवी अब सिर्फ कराह ही सकती थीं — उनके मुँह से बस “आह… आह्ह्ह… हाँ… दामादजी…” निकल रहा था।

कमरे में केवल तीन आवाज़ें थीं — उनकी कराहें, उनके शरीरों के टकराने की थप-थप की आवाज़, और बिस्तर का चरमराना।

पाँच मिनट तक डॉगी पोजीशन में जोरदार चुदाई के बाद महेश ने अपना लंड गायत्री देवी की चूत से बाहर निकाल लिया। उसकी साँसें भारी थीं, उसका शरीर पसीने से नहाया हुआ था। उसने अपने लंड के सिर को गायत्री देवी के नितंबों के बीच उनके गुदा के ठीक ऊपर रखा और अपना वीर्य निकालना शुरू कर दिया।

गर्म, चिपचिपा, सफेद वीर्य उनके नितंबों पर फूट पड़ा। पहली धार जोर से निकली और उनकी पीठ के निचले हिस्से पर गिरी, फिर धीरे-धीरे उनकी रीढ़ की हड्डी के साथ बहती हुई नीचे की ओर जाने लगी। दूसरी धार उनके नितंबों के बीच की दरार में गिरी, जहाँ से वह उनकी चूत पर बहता हुआ नीचे टपकने लगा।

तीसरी धार उनकी पीठ के ऊपरी हिस्से पर गिरी, जो उनकी रीढ़ के साथ एक लंबा रास्ता बनाती हुई नीचे की ओर बहने लगी।

महेश जानवर की तरह गुर्रा रहा था। उसके मुँह से लगातार आवाज़ें निकल रही थीं, “आह्ह्ह्ह्ह्ह… सासू माँ… आह्ह्ह्ह… ले लो… सब ले लो…”

गायत्री देवी का शरीर उस वीर्य की गर्मी महसूस करते हुए काँप रहा था। वह चारों पैरों पर झुकी हुई थीं, उनकी साँसें तेज़ चल रही थीं, उनका पूरा शरीर इस अद्भुत अनुभव से थरथरा रहा था।

जब महेश का वीर्य पूरी तरह से निकल गया, तो वह बिस्तर पर करवट लेकर लेट गया। गायत्री देवी भी अपने आप को संभालते हुए बिस्तर पर लेट गईं – दोनों नग्न, पसीने से लथपथ, और गहरी साँसें लेते हुए।

कुछ पल की खामोशी के बाद महेश ने गायत्री देवी की तरफ मुँह करके पूछा, “अम्मा, अब बताओ। गाँव में क्या मामला था? तुमने किसके साथ…?”

गायत्री देवी का चेहरा शर्म से लाल हो गया। उनकी आँखें नीचे झुक गईं। वह पहली बार किसी के सामने अपने इस राज को खोलने वाली थीं – और वह भी अपने दामाद के सामने, जिसके साथ अभी-अभी उन्होंने सबसे गहरी शारीरिक अंतरंगता बाँटी थी।

गायत्री देवी ने गहरी साँस ली और फिर धीरे-धीरे बोलना शुरू किया, “दामादजी… तुम्हारे ससुर का… वहाँ नीचे… कुछ खास नहीं था। एक अंगूठे जितना। शादी के बाद मैंने कभी उससे सुख नहीं पाया। पहले-पहले मैं सोचती थी कि शायद यही सब होता है।

लेकिन जब गाँव की औरतें आपस में बात करती थीं, तो मुझे पता चला कि और कुछ भी हो सकता है।”

उन्होंने एक पल रुककर लार निगली और फिर जारी रखा।

“हमारे पड़ोस में एक लड़का रहता है – राजू। वह शहर में काम करता है, लेकिन अक्सर गाँव आता है। एक बार जब रामप्रसाद मछली पकड़ने गया हुआ था, राजू मेरे घर आया। मैं अकेली थी। उसने मुझसे कहा कि वह मुझे बहुत दिनों से देख रहा है।

मैंने पहले तो मना किया, लेकिन… तुम जानते हो दामादजी, एक औरत की भूख भी तो कुछ होती है।”

गायत्री देवी की आवाज़ में अब एक हल्की सी कँपकँपी थी।

“राजू का भी कोई बहुत बड़ा नहीं था। औसत ही था। लेकिन रामप्रसाद से तो बड़ा था ही। उसके साथ मैं किसी तरह अपनी ज़रूरत पूरी कर लेती थी। लेकिन कभी ऐसा नहीं लगा जैसा आज तुम्हारे साथ लगा।”

महेश उनकी बातें ध्यान से सुन रहा था। उसका हाथ धीरे-धीरे गायत्री देवी के पेट पर घूम रहा था, उन्हें सहला रहा था।

“अब तुम चिंता मत करो, अम्मा,” महेश ने कोमलता से कहा। “अब मैं हूँ तुम्हारे लिए। मैं तुम्हें नियमित रूप से चोदूँगा। नैना के बच्चा होने के बाद भी। हम यह रिश्ता जारी रखेंगे।”

गायत्री देवी की आँखों में चिंता और डर दोनों थे। वह बोलीं, “लेकिन दामादजी… यह बहुत खतरनाक है। अगर नैना को पता चल गया तो? मेरी बेटी है वह। वह मुझे कभी माफ नहीं करेगी। तुम्हें भी छोड़ देगी। सब बर्बाद हो जाएगा।”

महेश ने उनके चेहरे को अपने हाथ में लेकर उन्हें अपनी तरफ देखने को कहा।

“सासू माँ, मैं सब संभाल लूँगा। मैं कोई बेवकूफ नहीं हूँ। हम सावधानी से रहेंगे। ऐसा समय और जगह चुनेंगे जब नैना को शक न हो। तुम सिर्फ मुझ पर भरोसा रखो।”

गायत्री देवी कुछ पल चुप रहीं। उनके मन में एक तरफ डर था तो दूसरी तरफ यह भी था कि अब उन्हें कोई सच्चा सुख मिला है। और अगर वह मान जाएँगी, तो नैना भी सुरक्षित रहेगी — क्योंकि नैना अब गर्भवती थी, और महेश की ज़रूरतें तो होंगी ही।

अगर महेश बाहर किसी और के पास गया, तो नैना को धोखा तो मिलेगा ही और साथ में कोई बीमारी भी ला सकता है।

गायत्री देवी ने सोचा — यह तो फायदे का सौदा है। मुझे अपनी ज़िंदगी में पहली बार असली सुख मिल रहा है, मेरी बेटी का पति मेरे पास ही रहेगा और किसी और के पास नहीं जाएगा, और नैना को कभी पता भी नहीं चलेगा।

उन्होंने आँखें बंद कीं और फिर खोलकर महेश की तरफ देखा।

“ठीक है, दामादजी। मैं मान गई। लेकिन वादा करो — सावधानी से रहोगे। कभी लापरवाही नहीं करोगे।”

महेश मुस्कुराया। “वादा, सासू माँ। हमेशा सावधान।”

दोनों करीब दस मिनट तक ऐसे ही लेटे रहे — नग्न, थके हुए, लेकिन एक नई समझौते के साथ। फिर उठकर दोनों ने कपड़े पहने। गायत्री देवी ने अपनी साड़ी ठीक की, महेश ने अपनी शर्ट और पैंट पहनी। दोनों ने एक-दूसरे को देखा और एक गहरी मुस्कान साझा की।

वह होटल से बाहर निकले और कार में बैठकर घर लौट आए।

शाम को डिनर के समय नैना, महेश और गायत्री देवी तीनों मेज़ पर बैठे थे। नैना ने गायत्री देवी को देखा और उसकी आँखों में एक चमक देखी। उसने मुस्कुराकर पूछा, “अम्मा, आज तुम्हें देखकर लग रहा है जैसे कुछ खास हुआ हो। तुम्हारा चेहरा कितना चमक रहा है।”

गायत्री देवी का चेहरा हल्का लाल हो गया। उन्होंनी अपनी नज़रें झुका लीं और फिर महेश की तरफ देखा। महेश ने मुस्कुराते हुए कहा, “सासू माँ को यहाँ गाँव से ज़्यादा अच्छा लग रहा है, है न अम्मा?”

गायत्री देवी ने अपने आपको संभाला और बोलीं, “हाँ बेटा, पहले तो मुझे यहाँ आकर अच्छा नहीं लग रहा था। मैं सोचती थी कि गाँव में ही ठीक थी। लेकिन अब मैं यहाँ के माहौल में ढल गई हूँ। शहर की ज़िंदगी में भी अपना मज़ा है। और तुम दोनों के साथ रहकर मुझे बहुत संतोष मिलता है। मैं अब पूरी तरह से खुश हूँ।”

नैना ने अपनी माँ की बात सुनकर एक गहरी संतुष्टि महसूस की। वह हँसते हुए बोली, “अच्छा है, अम्मा। मुझे डर था कि तुम यहाँ बोर हो जाओगी। लेकिन देखो, तुम तो पूरी तरह से सेटल हो गई हो।”

तीनों ने एक-दूसरे को देखा और खाना खाने लगे। नैना को नहीं पता था कि उसकी माँ और उसके पति के बीच क्या हुआ था। वह बस इतना जानती थी कि उसकी माँ अब खुश है, और यही उसके लिए काफी था।

गायत्री देवी ने अपने मन में सोचा — यह राज़ हमेशा के लिए छिपा रहेगा। और इसी राज़ के साथ, वह अपनी ज़िंदगी के सबसे सुखद दिनों की शुरुआत कर रही थीं।

समाप्त

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