बेटे ने बुझाई अपनी हवस की प्यास – पार्ट २

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उस घटना के बाद के दिनों में अरुण के मन में शर्म और अपराधबोध की एक गहरी परत जम गई थी, लेकिन उसकी तृष्णा उससे कहीं अधिक गहरी थी।

यह एक मानसिक द्वंद्व था जो उसे रात-दिन कचोटता रहता। जब भी वह अपनी माँ को देखता – चाहे वो रसोई में चूल्हा जलाते हुए हो, कपड़े धोते हुए हो, या बस बैठकर सब्ज़ी साफ़ करते हुए – उसकी आँखें स्वतः ही उसके शरीर के मोड़ों पर टिक जातीं।

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उसके मन में वे विचार आने लगे जिनसे वह डरता था: उसकी त्वचा चाटने का, उसके मोटे होंठों को दबाने का, उस पर अपना पूरा वजन डालकर उसे चीरने का। और फिर, वह शर्म की उस गहरी भावना को एक ही तरीके से दबा पाता।

यह एक नई, विकृत दिनचर्या बन गई। दोपहर का समय, जब प्रकाश काम पर होते और चाल में सन्नाटा छाया रहता, अब एक गुप्त अनुष्ठान का समय बन गया। सरला फर्श पर पुरानी चादर बिछाकर आराम करने सो जाती, और अरुण अपने सोफे पर।

पतले सूती परदे के दोनों ओर, दो दुनियाएँ एक अदृश्य धागे से बँधी हुई थीं। सरला का पल्लू हमेशा की तरह एक तरफ सरका हुआ होता, उसकी चोली गर्मी से चिपकी हुई।

और अरुण, अपने बरमूडा के अंदर, उस धुँधली छवि को निहारते हुए, अपने तने हुए लंड को हिलाने लगता। यह उसका अपना, निजी पाप था, और धीरे-धीरे यह उसकी लत बन गई।

सरला इस सबके प्रति भीतर से पूरी तरह सजग हो चुकी थी। एक माँ की सूक्ष्म दृष्टि कुछ भी नहीं छोड़ती।

वह उस हल्की सी सरसराहट को सुन सकती थी, उस भारी साँसों को महसूस कर सकती थी, और उस अंतिम दबी हुई कराह को पहचान सकती थी जो हर दोपहर के अंत में आती थी।

पहले-पहल तो उसके मन में एक तीव्र विक्षोभ और चिंता उठी थी। लेकिन फिर, उसने अपने बेटे को देखा – शर्मीला, दुबला-पतला, मोटे चश्मे वाला, जिसके जीवन में किसी लड़की का नामोनिशान तक नहीं था।

एक माँ के रूप में उसका हृदय द्रवित हो उठा। बेचारा बच्चा… यह उम्र का दबाव है। शरीर की माँग है। और उसके पास कोई रास्ता नहीं है।

यह सोचकर कि यह एक क्षणिक, हानिरहित मार्ग है, उसने चुप्पी साध ली। एक सचेत, जानबूझकर की गई चुप्पी।

कभी-कभी, वह जानबूझकर और लंबे समय तक सोने का अभिनय करती।

अपनी पलकों को बंद रखते हुए, वह उन आवाज़ों पर ध्यान केंद्रित करती – कपड़े की हल्की रगड़, साँसों का तेज़ होना, और फिर वह अंतिम क्षण जब उसका बेटा तनाव से ढीला पड़ जाता।

उस क्षण के तुरंत बाद ही वह करवट बदलती, आँखें मलते हुए जागने का नाटक करती, मानो कुछ पता ही न हो। और फिर, शाम को, जब वह अरुण के बरमूडा या निकर धोती, तो उनपर जमे हुए उस सफेद, चिपचिपे पदार्थ की गंध से उसे पता चल जाता।

एक बार, जब चाल में कोई नहीं था, उसने एक गीला निकर उठाया और, चारों ओर देखने के बाद, उसे अपने चेहरे के पास ले गई।

उस तीखी, पशुवत गंध ने उसके पेट के निचले हिस्से में एक अजीब सी गुदगुदी पैदा कर दी। उसने तुरंत कपड़ा नल के नीचे डाल दिया, मानो कोई पाप किया हो।

क्योंकि कहीं न कहीं, इस नए विकास ने उसे भी उद्वेलित करना शुरू कर दिया था। उसका अपना वैवाहिक जीवन अब एक सूखे रेगिस्तान की तरह था।

प्रकाश के साथ सम्भोग – अगर कभी होता भी था – एक नीरस दायित्व मात्र रह गया था, एक ऐसा कार्य जिसे पूरा करके वे दोनों सो जाते थे।

उसमें न कोई उत्तेजना थी, न कोई तृप्ति। और दिनों-दिन, प्रकाश की शक्ति और इच्छा दोनों घटती जा रही थीं। सरला रातों को एक अधूरी, कसक लिए हुए सोती।

और अब, यह जानना कि उसका अपना बेटा, उसके शरीर को देखकर, उसकी छवि पर हाथ साफ़ करके तृप्ति पाता है… इसने एक निषिद्ध, विषैले फूल की तरह उसके भीतर एक भावना को खिला दिया था।

यह उसका शरीर अभी भी किसी को आकर्षित कर सकता है, यह जानने का एक विकृत आनंद।

इस चुपचाप की गई सहमति ने अरुण में एक झूठी हिम्मत भर दी। उसने सोचा कि उसकी माँ उसे फिर कभी नहीं पकड़ेगी। गलती एक बार हुई थी, अब यह एक स्वीकृत गुप्त रिवाज़ बन चुका था।

और एक दिन, इस झूठी निश्चिंतता ने उसे एक कदम और आगे बढ़ने के लिए उकसाया।

दोपहर का वही पुराना दृश्य था। सरला फर्श पर लेटी हुई थी। लेकिन आज, उसने जानबूझकर अपना पल्लू और भी दूर सरका दिया था, जिससे उसके भारी दूध, गीली चोली में लिपटे, और भी स्पष्ट दिखाई दे रहे थे।

साथ ही, उसने अपनी साड़ी के घेर को भी थोड़ा ऊपर खींच लिया था, जिससे उसकी जाँघों का मोटा, चिकना हिस्सा खुल गया था। यह एक निमंत्रण था, एक चुपचाप रखा गया जाल।

अरुण, हमेशा की तरह, परदे के पास पहुँचा, अपना लंड हिलाते हुआ। आज उसकी हिम्मत जवाब दे गई। उसने परदे को एक तरफ सरकाया। अब कोई बाधा नहीं थी।

फिर, एक काँपता हुआ हाथ बढ़ाते हुए, उसने अपनी उँगलियों को उस नंगी, सुनहरी जाँघ की त्वचा के पास ले गया। और फिर, स्पर्श किया।

गर्म। नर्म। जीवंत।

सरला के पूरे शरीर में एक झटका दौड़ गया। उसकी आँखें अचानक खुलने को हुईं, लेकिन उसने अपनी पलकों को जबरदस्ती बंद रखा।

उसका दिल अब धड़कने लगा था। यह… यह तो बहुत आगे निकल गया। रुक जाना चाहिए… अभी रुक जाओ। लेकिन उसका शरीर विद्रोह कर रहा था।

वर्षों की अतृप्त इच्छा, और इस निषिद्ध स्थिति का उत्तेजक रोमांच – उसके भीतर की सारी नैतिकता को ध्वस्त कर रहा था। वह सिर्फ़ अपना सिर दूसरी ओर घुमा सकी, मानो नींद में करवट बदल रही हो।

लेकिन उसकी साँसें, जो पहले नियंत्रित थीं, अब भारी और अनियमित होने लगीं।

अरुण के लिए, यह स्पर्श बिजली के झटके जैसा था। उसकी उँगलियों के पोर उस नर्म मांस पर रगड़ खाने लगे। वह और भी उत्तेजित हो गया।

कुछ देर तक जाँघों को सहलाने के बाद, एक और दुस्साहसिक विचार उसके मन में आया। उसने अपना दूसरा हाथ बढ़ाया और सरला की साड़ी के घेर को, बहुत ही धीरे-धीरे, ऊपर की ओर खींचना शुरू कर दिया।

उसका इरादा फिर से देखने का था – वह दृश्य जिसने उसे पहली बार लावारिस कर दिया था।

सरला के मन में अब एक उग्र संघर्ष चल रहा था। वह मेरी साड़ी उठा रहा है… रोक दो इसे… अभी रोक दो।

लेकिन उसका वह दूसरा मन, जो अब पूरी तरह से सत्ता में आ चुका था, चिल्ला रहा था: हाँ… देखने दो… चाहता है तो देख ले। उसकी अपनी चूत में एक गर्मी, एक नमी फैलने लगी थी, जो पति के साथ के सूखे सम्भोगों में कभी नहीं हुई थी।

उसने कोई प्रतिरोध नहीं किया। उसने अपने पैरों को थोड़ा और ढीला छोड़ दिया, सहजता का नाटक करते हुए।

अरुण ने साड़ी को कमर तक सफलतापूर्वक खींच लिया। और जो दृश्य उसकी आँखों के सामने आया, उसे देखकर वह स्तब्ध रह गया।

स्वर्ग का दृश्य। एक पतली, नीले रंग की नायलॉन की चड्डी, जो पहले से ही गहरे रंग की हो चुकी थी – नमी से भीगी हुई। उसके नीचे, चूत का आकार पूरी तरह से उभरा हुआ था।

और चड्डी के एक किनारे, शायद हलचल में, थोड़ी सी खिसक गई थी, जिससे एक गुलाबी, मोटे होंठ का एक हिस्सा बिल्कुल साफ़ दिखाई दे रहा था।

अरुण का मुँह लार टपकाते हुए खुला का खुला रह गया। उसकी आँखें फैल गईं। वह और आगे बढ़ा।

जबकि उसका एक हाथ अपने लंड पर तेज़ी से चल रहा था, उसने दूसरा हाथ आगे बढ़ाया और सीधे उस नम चड्डी के ऊपर, उसके चूत के उभार पर रख दिया।

जैसे ही उसका गर्म तलवा उस कोमल स्थान से टकराया, सरला के शरीर में एक अनैच्छिक ऐंठन दौड़ गई। उसने अपनी जाँघें थोड़ी और फैला दीं।

और फिर, उसके गले से एक दबी हुई, गहरी आह निकल पड़ी, “हम्म्म…” उसकी साँसें अब तेज़ और भारी हो चली थीं।

अरुण ने धीरे-धीरे रगड़ना शुरू किया – गोलाकार, दबाव डालते हुए।

और सरला की कमर ने, अपने आप, एक मंद, लहरदार गति में हिलना शुरू कर दिया, उसके हाथ के दबाव के साथ तालमेल बिठाते हुए।

उसके होठों से लगातार हल्की-हल्की कराहें निकलने लगीं, “आह… हाँ… ऐसे ही…” यह अभिनय अब नाटक नहीं रह गया था; यह एक वास्तविक, अनियंत्रित प्रतिक्रिया थी जो गहराई से छलक रही थी।

तभी अचानक, वह हाथ हट गया। दबाव गायब हो गया। सरला ने आँखें खोल दीं। एक पल के लिए भ्रम और निराशा से भरी हुई।

उसने एक झटके में, एक आँख से झाँका। अरुण बाथरूम की ओर तेज़ी से बढ़ रहा था, अपनी गीली पैंट को छुपाते हुए।

उसकी समझ में तुरंत आ गया। उसका बेटा फिर से फट चुका था। आज का ‘कर्तव्य’ पूरा हो गया था। लेकिन अब, सरला के भीतर एक तीव्र, दुखद विडंबना उठी।

वह स्वयं एक ज्वाला में जल रही थी, जिसे सुलगाया तो गया था, लेकिन बुझाया नहीं गया था। उसने अपने कपड़े समेटे, साड़ी नीचे की ओर खींची, और करवट बदलकर लेट गई। उसकी जाँघों के बीच एक दर्दनाक सनसनी थी, एक तीव्र खालीपन। उसकी चूत स्पंदित हो रही थी, नम और तड़पती हुई।

उसने आँखें बंद कर लीं। एक निर्णय उसके मन में पक रहा था, निराशा और एक नई, खतरनाक लालसा से जन्मा हुआ।

नहीं… अब और नहीं। अगली बार… अगली बार मैं कुछ करूँगी… कुछ ऐसा जो मेरी भी प्यास बुझाए।

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