कुछ देर बाद, तन्वी की आँखें खुलीं। कमरे में शाम का सुनहरा अँधेरा घिरने लगा था, और बारिश की हल्की फुहारों की आवाज़ फिर से खिड़की से टकरा रही थी। सबसे पहले उसने अपने शरीर पर महसूस किया – चिपचिपाहट। उसकी जाँघों के बीच, उसकी चूत के आसपास, सब कुछ सूखे हुए वीर्य और अपने ही रस से अटपटा और भारी लग रहा था। उसने अपनी टाँगें हिलाईं तो एक हल्की सी खिंचाव और गहराई में एक सुखद थकान महसूस हुई।
उसकी नज़र बिस्तर पर पड़ी। चादर उनके पसीने, रस और वीर्य से गंदी हो चुकी थी, सफेद और पारदर्शी धब्बों से भरी हुई। कमरे की हवा में अभी भी उनके जंगली संभोग की गाढ़ी, मादक गंध समाई हुई थी – पसीना, सेक्स और एक आदिम प्रजनन की गंध। उसने एक गहरी साँस ली, और अजीब तरह से, यह गंध उसे शर्मिंदा नहीं, बल्कि एक गुप्त संतुष्टि दे गई।
वह करवट लेकर निखिल की ओर देखने लगी। वह अभी भी गहरी नींद में था, उसका सिर तकिए पर पड़ा हुआ, उसकी नंगा शरीर शांत और शिथिल था। उसकी नज़र उसकी जाँघों के बीच गई। उसका लंड, जो कुछ घंटे पहले एक उग्र, नसों से भरा हुआ हथियार था, अब सिकुड़कर शांत अवस्था में था। पर इस शांत अवस्था में भी, उसका आकार और मोटाई उसके पति रिशभ के उत्तेजित लंड के बराबर, या शायद उससे भी अधिक थी। एक विचार उसके मन में कौंधा – अगर यही सुल्तान मेरे अंदर बीज बो गया है, तो बच्चा कैसा होगा? उसके होंठों पर एक स्वप्निल, लजीली मुस्कान खिल आई। आशा की एक गर्म लहर उसके सीने में दौड़ गई। गर्भवती होने की आशा।
उसने खुद को बिस्तर से अलग किया, धीरे से, ताकि निखिल न जागे। उसके पैर जमीन पर पड़े तो उसे चक्कर सा आया। उसकी चूत से अभी भी थोड़ा सा रिसाव हो रहा था, जो उसकी जाँघ के अंदरूनी हिस्से पर गर्म और चिपचिपा लग रहा था। वह लड़खड़ाते हुए बाथरूम की ओर बढ़ी, अपने शरीर को इस नए, भीतरी दाग़ से धोने के लिए।
करीब आधे घंटे बाद, शाम के पाँच बज चुके थे। बारिश तेज हो गई थी, और खिड़की के शीशे पर बूंदों की एक लयबद्ध थाप गूँज रही थी। निखिल की नींद टूटी। उसने आँखें मलीं और पाया कि बिस्तर पर वह अकेला है। उसकी नग्न देह पर चादर का एक कोना पड़ा था। उसने चारों ओर देखा – कमरा वैसा ही था, उनकी काम-क्रीड़ा के निशान हर जगह बिखरे हुए थे। उसके मुँह पर एक आत्मसंतुष्ट मुस्कान आ गई।
वह बिस्तर से उठा, बिना कुछ ओढ़े-बिछाए ही। उसका शरीर अभी भी हल्का-सा दर्द कर रहा था, एक अच्छे कसरत के बाद जैसी थकान। वह सीधा किचन की ओर चल पड़ा, यह जानने के लिए कि उसकी मामी कहाँ है।
किचन के दरवाजे पर खड़े होकर, उसकी साँसें एक पल के लिए रुक सी गईं। तन्वी स्टोव के पास खड़ी थी, चाय की केतली पर ध्यान लगाए हुए। पर उसने अपने कपड़े बदल लिए थे। उसने एक चमकदार, हरे रंग की रेशमी साड़ी पहन रखी थी, जो उसके घुमावदार शरीर पर ऐसे लिपटी हुई थी जैसे दूसरी त्वचा हो। ब्लाउज आधी बाँह का, मॉडर्न कट का था, जो उसकी बगलों और पीठ के ऊपरी हिस्से को पूरी तरह से उजागर कर रहा था। उसके गीले बाल एक तौलिये में लपेटे हुए थे, जिसे उसने सिर पर बन की शैली में रख लिया था, जिससे उसकी गर्दन की सुडौल रेखाएँ और खुले कान दिख रहे थे।
निखिल उसे पीछे से निहारता रहा। उसकी नज़र उसकी पतली कमर से होती हुई उसके भरे हुए नितंबों पर टिक गई, जो साड़ी के पल्लू के नीचे से उभरकर आ रहे थे। कुछ ही घंटे पहले उसने इसी औरत को बेरहमी से चोदा था, उसकी चूत में अपना वीर्य उड़ेला था। पर अब, उसकी इस सुंदरता को देखकर, उसके अंदर फिर से वही ज्वाला सुलग उठी। उसकी नज़रों के स्पर्श से ही उसका लंड, जो अभी शांत था, फिर से जागृत होने लगा, धीरे-धीरे सख्त होकर उभर आया।
शायद उसकी मौजूदगी का एहसास हुआ, या छठी इंद्रिय से, तन्वी ने पीछे मुड़कर देखा। उसके चेहरे पर थकान नहीं, बल्कि एक शांत, संतुष्ट और खुशनुमा चमक थी। उसकी नज़र निखिल के नग्न बदन पर गई, उसके उभरते हुए लंड पर ठहर गई, और उसके होंठों पर एक शरारत भरी, गुप्त मुस्कान खेल गई।
“अरे, तुम जाग गए,” उसने आवाज़ दी, आवाज़ में एक नर्म, घरेलू मिठास थी, “मैं चाय बना रही हूँ। जाओ, नहा-धोकर आओ लिविंग रूम में। तब तक चाय तैयार हो जाएगी।”
फिर, उसकी नज़र फिर से उसके लंड पर पड़ी, जो अब पूरी तरह से खड़ा होने लगा था। एक लजीला, लेकिन नटखट अंदाज़ में उसने कहा, “कम से कम… कोई शॉर्ट्स तो पहन लो।”
निखिल के चेहरे पर भी एक चुलबुली, समझदार मुस्कान फैल गई। उसने सिर हिलाकर हामी भरी। उसकी मामी का इशारा और उसकी मुस्कान उसे और भी उत्तेजित कर रही थी, पर उसने अपने आप पर काबू रखा। वहाँ से मुड़ा, और बाथरूम की ओर चल पड़ा, एक नए सिरे से उत्तेजना को अपने शरीर में महसूस करते हुए।
शॉवर की गर्म धारा निखिल के शरीर पर पड़ रही थी, पर उसका मन तो उससे भी ज्यादा गर्म विचारों में डूबा हुआ था। साबुन के झाग को अपने शरीर से साफ करते हुए, उसके होठों पर एक विजयी, अविश्वसनीय मुस्कान थी। यह छुट्टियाँ, यह घर… उसकी जिंदगी का सबसे बेहतरीन मोड़ साबित हो रही थी।
क्या जिंदगी है यार, उसने मन ही मन सोचा, अपने लंड पर साबुन लगाते हुए जो फिर से जागृत हो रहा था। एक ऐसी औरत मिली जो पक्की है, गरम है, और चूत भी मारने को तैयार बैठी है… और ऊपर से प्रेगनेंसी की कोई टेंशन ही नहीं। बल्कि उल्टा, उसका पति खुद बोल रहा है कि बीज डालो।
उसने अपनी कल्पना में अपने दोस्तों के हालात याद किए, जो किसी लड़की को पटाने, फिर कंडोम लाने, फिर सेफ डेज का हिसाब लगाने में उलझे रहते थे। एक बार चुदाई के लिए इतनी मेहनत! और यहाँ… उसकी अपनी मामी। बिना किसी शर्त के। बिना किसी डर के। सबसे बड़ी बात, यह सब परिवार के अंदर, पति की इजाजत से हो रहा था। समाज का डर? एक्सपोज होने का खतरा? सब शून्य। यह तो सपनों जैसा सेटअप था।
रिशभ मामा सच में कमाल के आदमी हैं, उसके विचार चलते रहे, जबकि उसका हाथ अपने लंड को साबुन लगाकर धीरे-धीरे मलने लगा। अपनी बीवी को ही अपने भांजे के साथ सुला दिया। और मामी… हाय रे मामी… क्या जिस्म है उसका। आज दिनभर उसी की चूत का ख्याल आ रहा था।
उसकी मुस्कान और चौड़ी हो गई। उसने शॉवर बंद किया और तौलिए से अपने शरीर को जोर-जोर से पोंछा। उसका लंड अब पूरी तरह से खड़ा और तनाव से भरा हुआ था, एक नए संभोग सत्र के लिए तैयार। वह नंगा ही बाथरूम से बाहर निकला, लिविंग रूम की ओर चल पड़ा।
लिविंग रूम में, तन्वी सोफे पर बैठी फोन पर बात कर रही थी। उसने हरे रेशम की साड़ी पहन रखी थी, पर पल्लू लापरवाही से टँगा हुआ था। निखिल को आता देख उसने फोन को थोड़ा हटाया और मुस्कुराते हुए कहा, “लो, आ गया तुम्हारा भांजा।” और उसने फोन निखिल की ओर बढ़ा दिया।
निखिल ने फोन लिया। “हैलो मामा? आप सुरक्षित पहुँच गए न?”
“हाँ बेटा, पहुँच गया,” रिशभ की आवाज़ आई, “तुम फिक्र मत करो।”
कुछ औपचारिक बातें हुईं – खाने का, मौसम का, यात्रा का। फिर निखिल ने आवाज़ को गंभीर करते हुए असली मुद्दे पर बात की। “मामा… सुनिए… एक बात है। मैं… उस फोन के लिए, पिछले फोन के लिए माफी चाहता हूँ। आपने फोन किया और हम… हम सेक्स कर रहे थे… और मैंने जो कुछ कहा, मामी को जो गालियाँ दीं… मैं… मैं कामवासना में बह गया था। मैं सच में शर्मिंदा हूँ।”
वह तन्वी की ओर देख रहा था। तन्वी ने उसकी ओर एक कोमल, समझदार नज़र से देखा, जैसे कह रही हो कि तुम्हें अपराधबोध महसूस नहीं करना चाहिए।
फोन के दूसरी ओर से रिशभ की हँसी सुनाई दी। “अरे नहीं-नहीं-नहीं, बेटा! उसके लिए माफी कैसी? ऐसे हालात में तो यह सब होता ही है। और सुनो… तन्वी को बिस्तर में यही सब पसंद है। गालियाँ, रफ बातें…”
“हाँ, उसने मुझे बताया,” निखिल ने कहा, अब थोड़ा आश्वस्त होकर।
“देखो न! मैं यही कह रहा हूँ। तो इस तरह की बातें मन से निकाल दो। जो मन करे, करो। बस याद रखना…”
“हाँ हाँ, मुझे पता है,” निखिल ने तन्वी की ओर देखते हुए कहा, जो अब मुस्कुरा रही थी, “हर एक बूंद उसकी चूत में ही जानी चाहिए।”
“बिल्कुल सही!” रिशभ ने कहा, “अच्छा, अब फोन तन्वी को दे दो।”
निखिल ने फोन तन्वी को वापस किया और चाय का प्याला उठाकर एक लंबा घूँट लिया। चाय गर्म और मीठी थी, जैसे इस पल का स्वाद।
तन्वी ने फोन कान से लगाया। “हैलो? हाँ सुन रही हूँ… हम्म… निखिल थोड़ा शर्मीला सा लग रहा है… शायद पछता रहा है। मैं चाहता हूँ तुम कुछ खास कोशिश करो… उसे और उकसाओ, कुछ सेक्सी कपड़े पहनो ताकि वह खुल सके। मैं जानता हूँ उसने तुझे जमकर चोदा होगा… पर देख, अब वह सोच में पड़ गया है। हमें इस चीज़ को नॉर्मल बनाना है, समझ रही हो? उसे तुझे चोदने में शर्म नहीं, बल्कि मजा आना चाहिए। याद रखो हमने क्या तय किया था। इसी साल तुझे प्रेगनेंट होना है। अगर वह ज्यादा अग्रेसिव हो जाए… सह लेना, ठीक है? हमारे पास कोई चारा नहीं है।”
तन्वी ने एक गहरी साँस ली, उसकी नज़र निखिल पर टिकी हुई थी, जो चाय पी रहा था। “हाँ, मैं समझ गई। मैं पहले से ही कोशिश में हूँ। और अग्रेसिवनेस की फिक्र मत करो, तुम जानते हो मुझे वही पसंद है।”
दूसरी ओर से रिशभ की हल्की सी हँसी आई और उसने फोन काट दिया। तन्वी ने फोन साइड टेबल पर रख दिया।
निखिल ने अपनी चाय का प्याला खाली कर दिया था। वह सोफे पर आराम से बैठा, उसकी नज़रें तन्वी पर चिपकी हुई थीं। उसका एक हाथ अपनी जाँघ पर था, और वह धीरे-धीरे अपने खड़े हुए लंड को सहला रहा था, जो उसकी नंगी जाँघ के खिलाफ मजबूती से खड़ा था। उसकी आँखों में वही भूख थी, वही दावे की चमक।
“मामी… चलो…” उसने कर्कश स्वर में कहा।
“मुझे पता है,” तन्वी ने मधुर, लेकिन दृढ़ स्वर में जवाब दिया।
और फिर, बिना किसी हिचकिचाहट के, उसने अपनी साड़ी के पल्लू को सरकाकर अपनी कमर तक इकट्ठा कर लिया, जिससे उसकी नंगी जाँघें और पेट का निचला हिस्सा पूरी तरह से उजागर हो गया। फिर उसने अपने दोनों पैरों को सोफे पर मोड़कर एक स्क्वाट जैसी पोजीशन ले ली, घुटने छाती के पास, पैरों के तलवे सोफे पर टिके हुए। इस पोजीशन में उसकी चूत पूरी तरह से खुलकर सामने आ गई – गुलाबी, थोड़ी सूजी हुई, और अभी भी पिछले संभोग से नम और चमकदार।
उसने अपने दोनों हाथों से अपनी चूत के बाहरी होंठों को धीरे से फैलाया, उसके गहरे गुलाबी, नम भीतरी हिस्से को पूरी तरह से प्रदर्शित करते हुए। उसकी नज़रें सीधे निखिल की आँखों से मिलीं, उसके चेहरे पर एक चुनौतीपूर्ण, कामुक मुस्कान थी।
“इस बार,” उसने फुसफुसाते हुए कहा, उसकी आवाज़ में एक नया, दबंग अंदाज़ था, “पहले तुम्हें मेरी चूत चाटनी होगी।”
“बिल्कुल, मामी…” निखिल का स्वर गहरा और समर्पित था। वह सोफे से उतरकर फर्श पर घुटनों के बल बैठ गया, सीधे तन्वी की फैली हुई जाँघों के बीच में। उसका एक हाथ अपने लंड को धीरे-धीरे सहलाता रहा, जो अब पत्थर जैसा कड़क और नसों से उभरा हुआ था, उसकी जाँघ से टकराता हुआ। फिर वह धीरे से आगे झुका, उसका सिर तन्वी की चूत के समीप पहुँचा।
उसकी नाक से सिर्फ कुछ इंच की दूरी पर, तन्वी की चूत खुली हुई थी – गुलाबी, नम और चमकदार। उससे योनि के प्राकृतिक रस की सूक्ष्म, मीठी और तीखी गंध उठ रही थी, जो पिछले संभोग के बाद के वीर्य और पसीने की गंध के साथ मिलकर एक अद्भुत, आदिम खुशबू बना रही थी। रस की कुछ बूंदें उसके भीतरी होंठों से टपककर उसकी गुदा की ओर सरक रही थीं। निखिल ने गहरी साँस ली, उसकी साँसों की गर्म हवा तन्वी की संवेदनशील त्वचा को छू गई।
“वाह, मामी…” उसने कर्कश स्वर में कहा, उसकी आँखें उस नम, गुलाबी भूलभुलैया पर टिकी हुई थीं, “तुम्हारी चूत की खुशबू… बहुत लज़ीज़ है।”
तन्वी, जो पहले से ही उसकी गर्म साँसों से उत्तेजित हो चुकी थी, ने अपने निचले होंठ दाँतों से दबा लिए। उसका एक हाथ अपने ब्लाउज के ऊपर से ही अपने दूध को जोर से मसलने लगा, निप्पल को उँगलियों के बीच दबाकर सख़्त कर दिया। दूसरा हाथ नीचे था, दो उँगलियों से अपनी चूत के होंठों को और फैलाए हुए, उसकी गहराई को पूरी तरह प्रकट करते हुए। उसकी आवाज़ कामोत्तेजना से भारी और लिपटी हुई थी, “फिर… क्यों नहीं चखते हो, बेटा… इसका स्वाद?”
यही वह निमंत्रण था जिसकी निखिल को प्रतीक्षा थी। उसने अपनी जीभ बाहर निकाली, चौड़ी और गुलाबी, और एक लंबे, धीमे लपेटे में, तन्वी की चूत के निचले हिस्से से शुरू करते हुए, ऊपर उसके दाने तक, पूरी लंबाई चाट डाली। “स्लर्प!”
जैसे ही उसकी जीभ का गर्म, नम स्पर्श तन्वी की अत्यंत संवेदनशील त्वचा से हुआ, उसका पूरा शरीर ऐंठ गया। “आआहहह… हाँ… आहहह!” उसकी कराह ने कमरे की हवा को भर दिया। उसने अपने दूध को और जोर से दबाया, और तुरंत ही अपना हाथ निखिल के सिर पर रख दिया, उसके घने बालों को अपनी उँगलियों में जकड़ लिया, और उसे अपनी चूत की ओर और दबाव के साथ खींच लिया। “आहह हाँ… ऐसे ही!”
निखिल अब पूरी तरह से समर्पित हो चुका था। उसने अपनी जीभ से तन्वी की चूत के हर कोने, हर तह का अन्वेषण शुरू कर दिया। उसने उसके भीतरी होंठों को चूसा, उसके मीठे, गर्म रस को चखा, और जोर से घूँट भरते हुए निगल लिया। “स्लर्प… स्लूप… चप-चप…” उसके मुँह से निकलने वाली ये आवाज़ें तन्वी की बढ़ती हुई कराहों के साथ मिलकर कमरे में एक अश्लील संगीत का सृजन कर रही थीं।
“आहह… आह… हम्म्म… हाँ… ऐसे ही बेटा… हाँ… वहाँ… ठीक वहाँ… आहहह हाँ… हम्म्म… आहहह… स्स्स…” तन्वी पागलों की तरह हो रही थी। निखिल की जीभ का हर छूआ, हर चाट, उसके शरीर में बिजली के झटके दौड़ा रहा था।
निखिल का मुँह अपनी लार और तन्वी के चूत के रस से लबालब भर गया था। अतिरिक्त तरल उसकी ठोड़ी से टपककर तन्वी की जाँघों, उसकी गुदा और सोफे पर गिर रहा था, सब कुछ चिपचिपेपन से भीगता जा रहा था। निखिल ने उसके चूत के होंठों को जोर से चूसना शुरू कर दिया, कभी-कभी अपनी जीभ को उसकी योनि के अंदर घुसेड़कर उसकी चूत को चोदने का अंदाज़ अपनाता, और फिर अचानक वापस उसके संवेदनशील दाने पर लौट आता, उसे तेजी से और लगातार चाटने लगता।
इससे तन्वी और भी जंगली होती जा रही थी। उसने अपनी जाँघें और चौड़ी कर दीं, अपने पैरों के तलवे सोफे पर गड़ा दिए, और निखिल के सिर को अपनी चूत में और गहराई तक धकेल दिया, जबकि वह अपने दूधों को मसलती रही। उसका शरीर अजीब तरह से हिल रहा था – ऐंठन, झटके, और एक लयबद्ध घूमन जो उसकी कमर से निकल रहा था, वह अपने चूत को निखिल की जीभ के हर स्पर्श से रगड़ने के लिए स्वयं को हिला रही थी।
यह लगभग दस मिनट तक चला, और आवाज़ें लगातार तेज और अधिक उग्र होती गईं। तन्वी की कराहें अब लगभग चीखों में बदल चुकी थीं, और निखिल के स्लर्प और चप की आवाज़ें और भी गीली और जोरदार हो गई थीं।
फिर, एक तीव्र, अचानक ऐंठन ने तन्वी के पूरे शरीर को जकड़ लिया। उसकी पकड़ निखिल के बालों पर और कस गई, उसकी उँगलियाँ सफेद हो गईं। उसकी आँखें चौंधिया गईं, उसका मुँह खुला रह गया, और एक दम घुटी हुई, फिर फूट पड़ने वाली चीख निकली।
“आआ… आ… आआआहहहहह! मैं… मैं आ रही हूँ… आआहहहहह!”
और फिर, उसकी चूत से एक फव्वारे की तरह सफेद, पानी जैसा गाढ़ा तरल फूट पड़ा। पहला जोरदार जेट सीधे निखिल के चेहरे पर लगा, उसकी नाक, गाल और ठोड़ी को भिगो दिया। फिर यह तरल बलपूर्वक बहने लगा, तन्वी की गुदा के रास्ते से होता हुआ, सोफे पर फैल गया, और फिर धारा बनाकर फर्श पर टपकने और बहने लगा।
तन्वी का शरीर हर बार ऐंठता, जब उसकी चूत की गहराई से यह तरल बाहर फूटता। उसकी आँखें बंद थीं, उसका सिर पीछे को झुका हुआ था, और उसके अंग एक अंतिम, थकाऊ आनंद में काँप रहे थे। धीरे-धीरे, उसके शरीर का झटकना कम होता गया, केवल हल्की स्पंदनशील कंपकंपी रह गई।
इस दौरान, निखिल खड़ा हुआ। उसने अपना चेहरा अपने हाथ के पिछले हिस्से से पोंछा, उस पर चिपचिपा, सफेद तरल लगा हुआ था। फिर, उसने उसी हाथ को अपने लंड पर लगाया, उस तरल से अपने पत्थर जैसे कड़क लंड को चिकनाई दी, जो अब और भी बड़ा और नसों से भरा हुआ लग रहा था। उसकी नज़रें तन्वी पर टिकी हुई थीं, जो अभी भी सोफे पर पड़ी हुई थी, हाँफ रही थी, उसकी चूत से रिसाव जारी था।
“अब,” निखिल ने कहा, उसकी आवाज़ में एक नया, अधिकारपूर्ण और भूखा स्वर था, “मेरी बारी है, मामी।”
तन्वी फैली हुई टाँगों के साथ सोफे पर पड़ी थी, उसकी चूत से अभी भी रिसाव हो रहा था। उसका चूत का छिद्र, उसके ताज़ा ऑर्गैज्म के बाद के संकुचनों के कारण, हल्के से खुल और बंद हो रहा था, जैसे एक थकी हुई मछली का मुँह। उसका पूरा शरीर हल्के से काँप रहा था, और वह धीरे-धीरे अपनी साँसें सामान्य करने की कोशिश कर रही थी। उसने अपनी आँखें खोलीं, जो अभी भी आनंद से धुंधली थीं, और निखिल की ओर देखा, जो अपना लंड सहला रहा था।
“आ जाओ, बेटा… डालो अपना लंड अंदर,” उसने हाँफते हुए कहा।
“इस पोजीशन में नहीं, मामी,” निखिल ने जवाब दिया, उसकी आवाज़ में एक दबंग, नियंत्रण करने वाला स्वर था। “उठो और डॉगी पोजीशन लो।”
तन्वी ने बिना किसी हिचकिचाहट के आज्ञा का पालन किया। वह सोफे से उठी, और उस चिपचिपे, गीले सोफे पर ही घुटनों के बल बैठ गई। फिर वह मुड़ी, आगे की ओर झुकी, और अपने दोनों हाथों को सोफे के पीछे के हिस्से पर टिका दिये। उसने अपनी पीठ को नीचे की ओर एक सुडौल मेहराब की तरह मोड़ दिया, जिससे उसकी नंगी, गोल गांड पूरी तरह से उजागर हो गयी। उसने अपनी साड़ी को फिर से कमर तक समेट लिया, और अपने पैरों को थोड़ा और चौड़ा करके स्थिर हो गई, ताकि निखिल उसे आसानी से चोद सके। उसने अपने कूल्हों को पकड़कर, अपनी चूत को और खोलने के लिए खींचा।
“ठीक है, बेटा? अब… अब पूरा अंदर डालो, प्लीज़,” उसने मिन्नत भरे स्वर में कहा, अपने कंधे के ऊपर से पीछे मुड़कर निखिल की ओर देखते हुए।
“हो ..हो.!., मामी… तुम सच्ची रंडी हो,” निखिल ने कहा, अपने लंड को हाथ में लेकर धीरे-धीरे सहलाते हुए। उसे यह देखकर हैरानी और उत्तेजना दोनों हो रही थी कि उसकी मामी सेक्स की पोजीशन जानती है और बिना किसी निर्देश के सही तरीके से पोजीशन ले लेती है। “मुझे अंदाज़ा लगाने दो… मामा भी आपको ऐसे ही चोदना पसंद करते होंगे, है न?”
उसने अपने लंड का सिर तन्वी की गीली, फड़कती हुई चूत के प्रवेश द्वार पर रख दिया, बात करते हुए ही। तन्वी को उसके लंड के सिर के स्पर्श से एक झुरझुरी सी दौड़ गई, और वह कराह उठी। “आहह… स्स्स…”
“तुम क्या सोचते हो, मुझे सेक्स की पोजीशन नहीं आती… आहह… स्स्स…” उसने जवाब दिया, और निखिल के लंड को अपनी चूत में लेने के लिए खुद को थोड़ा पीछे की ओर खिसकाया।
इस बार, निखिल का लंड का सिर आसानी से फिसलकर अंदर चला गया। “ओह हाँ… तुम सचमुच बहुत गीली और गरम’ हो चुकी हो, मामी… है न?” निखिल ने कहा, और उसने तन्वी के नितंब पर एक हल्का थप्पड़ जड़ दिया। थप!
तन्वी की चूत, जो पहले से ही संवेदनशील और उसके पूरे लंड को निगलने के लिए बेताब थी, उसे अंदर खींचने की कोशिश करने लगी। निखिल के लंड के सिर के अंदर जाने और उसके नितंब पर थप्पड़ की प्रतिक्रिया में, वह बोली, “हम्म्म… आआहहह… स्स्स्स्स… हाँ… तुमने ही मुझे… स्स्स… आआहह… तुमने ही मुझे इतनी कामुक कुतिया बना दिया है… आहह… अब चोदो मुझे… आहह… हम्म्म… स्स्स…” उसकी आवाज़ लगभग एक बच्चे जैसी, भीख माँगती हुई लग रही थी।
निखिल मुस्कुराया। उसने तन्वी की कमर को दोनों हाथों से मजबूती से पकड़ लिया, और अपने लंड को धीरे-धीरे अंदर सरकाना शुरू किया। “स्स्स… हाँ… इसे ही कहते हैं असली रंडी… एक असली कुतिया! आहहह… क्या चूत है तेरी… आस्स्स… स्स्स… कुतिया… आआहहह…” वह अपनी आँखें बंद करके धीरे-धीरे अंदर जा रहा था, अपने लंड के हर इंच पर उस गर्म, चिपचिपी, रिसती हुई चूत के लपेटे जाने का एहसास कर रहा था। उसकी चूत उसके लंड का इस तरह स्वागत कर रही थी, जैसे उसे ही तलाश हो। उसकी चूत की मांसपेशियाँ निखिल के लंड को निचोड़ रही थीं और फिर छोड़ रही थीं, मानो उसे निगलने की कोशिश कर रही हों। निखिल महसूस कर सकता था कि उसकी मामी की चूत खुद ही उसे अंदर खींच रही थी। अंदर जाते हुए एक गीली, चप-चप की आवाज़ आ रही थी।
कुछ ही सेकंड में, उसका सात इंच का मोटा लंड पूरी तरह से उसकी चूत की गहराई में समा गया। “म्म्म्म… आआहहह…” तन्वी ने एक गहरी, संतुष्ट कराह भरी, जब निखिल का लंड आखिरकार पूरी तरह से अंदर चला गया।
फिर, निखिल ने धीरे-धीरे बाहर निकलना शुरू किया… और अचानक, सारा नियंत्रण खोकर, उसने एक असली कुत्ते की तरह जानवरों जैसा, उग्रता से चोदना शुरू कर दिया। थप-थप-थप! स्क्वेल्च-स्क्विश! आवाज़ें तेज और लगातार हो गईं।
उसने तन्वी के नितंब पर एक जोरदार थप्पड़ जड़ा। थड़! “ले यह, कुतिया! आआहहहह!” फिर एक और थप्पड़। थड़!
कमरे में चोदने की गीली, तेज आवाज़ें, थप्पड़ों की आवाज़ें और दोनों की कराहें गूँजने लगीं। तन्वी का शरीर निखिल के इस जानवरों जैसे, बेलगाम धक्कों से लगातार हिल रहा था, सोफे के खिलाफ उछल रहा था।
“आआहहहहह! हाँ… हाँ… हाँ… आआह… स्स्स… हम्म्म… हाँ… फफफक्क्क… चोद… चोद मुझे… आहह!” तन्वी लयबद्ध तरीके से चिल्लाने लगी, उसकी आवाज़ हर धक्के के साथ ऊँची-नीची हो रही थी। उसकी पीठ का मेहराब और गहरा हो गया, उसने अपना सिर पीछे की ओर झुका लिया, और अपने नितंबों को निखिल के धक्कों की ओर उभारा, हर बार उसे और गहराई से लेने के लिए।
निखिल उसी उग्र गति से चोदता रहा, सात-आठ मिनट तक, एक ऐसी अदम्य ऊर्जा से भरा हुआ जैसे उसकी कमर में कोई चक्का लगा हो। थप-थप-थप! स्क्वेल्च-स्क्विश! आवाज़ें लगातार और तेज़ थीं। फिर अचानक वह रुक गया। उसने अपना लंड पूरी तरह से बाहर निकाला, धीरे-धीरे, ताकि उस चौड़े हुए, गीले चूत के छिद्र को देख सके, जो अब भी उसके लंड के आकार को समेटे हुए था। फिर, एक तेज़ झटके के साथ, उसने अपने लंड को फिर से तन्वी की चूत की गहराई में घुसेड़ दिया – स्लर्प! – मानो वह कोई खेल खेल रहा हो।
वह यही करता रहा। हर बार जब वह पूरा बाहर निकालता, तो एक गीली, चिपचिपी आवाज़ आती – फ्लुप! – और फिर जब वह जोर से अंदर धंसाता, तो थड़! की आवाज़ के साथ उसकी जाँघें तन्वी के कूल्हों से टकरातीं। इस बदलाव के कारण, हर बार जब निखिल अपना लंड गहराई में धकेलता, तन्वी चीख उठती। “आआहहह!” थड़! “आआहहहह!” थड़! “आआह हाँ! स्स्स!” निखिल और तन्वी दोनों इस नए तरीके का आनंद ले रहे थे, एक क्रूर लय में खोए हुए।
यह लगभग एक-दो मिनट तक चला। पर अचानक, एक धक्के में… फ्फुत्त्च्छ्ह्ह! एक नई, गहरी, चिपचिपी आवाज़ आई।
निखिल, जो आँखें बंद किए इस चोदाई का आनंद ले रहा था, ने अपने लंड के चारों ओर एक अलग, अत्यधिक तंग, गर्म जकड़न महसूस की। तन्वी चीख उठी। “आआहहहहहह! बाहर निकालो! बाहर निकालो! आआहह! दर्द हो रहा है! आआहहह!” उसकी चीखें असह्य पीड़ा से भरी थीं।
निखिल ने आँखें खोलीं। “क्या हुआ, मामी?” वह घबराया हुआ था। फिर उसने नीचे देखा।
उसकी नज़रें उस जगह पर टिक गईं जहाँ उसका लंड तन्वी के शरीर में प्रवेश कर रहा था। वह उसकी गुलाबी, फड़कती हुई चूत में नहीं था। उसका आधा लंड तन्वी की गांड के अंधेरे, गुलाबी छिद्र में धँसा हुआ था, जो अब अप्रत्याशित रूप से फैल गया था और उसके लंड के सिरे को निगल रहा था।