AdBlocker Detected!

हमारी website की कहानियाँ पढ़ने के लिए कृपया अपना AdBlocker disable करें. Disable करने के बाद site access करने के लिए refresh करें.

मामी को किया गर्भवती – भाग १

मामी को किया गर्भवती

इंदौर की गर्मी अपने चरम पर थी, लेकिन निखिल के मन में एक अजीब सी बेचैनी थी, जो मौसम से कहीं ज़्यादा तपिश लिए हुए थी। तीन साल। पूरे तीन साल हो गए थे उसने अपनी नई मामी को देखे। फोन पर ही हाँ-हूँ हो जाती थी, जब भी मामा से बात होती। एक तरफ़ इंजीनियरिंग की पढ़ाई का बोझ, दूसरी तरफ चेन्नई की अपनी दुनिया… और कहीं दूर, बहुत दूर, एक शादी हो गई थी जिसमें वह शामिल नहीं हो सका था। उसकी माँ का गुस्सा जायज़ था। “इतना बड़ा हो गया है, और इतना बेअदब भी!” वह अक्सर कहतीं, “तेरे मामा ने तेरे लिए क्या-क्या नहीं किया? और तू उनकी शादी में तक नहीं आया! अब जब पुणे जा रहा है कोचिंग के लिए, तो पहले भोपाल जाकर माफ़ी माँग। वरना मैं तुझसे बात नहीं करुँगी।”

निखिल बस सुनता रहता। उसका मामा, रिशभ, उसके लिए पिता से कम नहीं थे। चालीस की उम्र के आसपास, दमदार कद-काठी, मूँछों पर ताव, और एक ऐसी मुस्कान जो निखिल की हर शैतानी को माफ़ कर देती थी। वही रिशभ चाचा, जो उसे बचपन में कंधे पर बैठाकर घुमाते थे, जिन्होंने उसके पहले साइकिल चलाना सिखाया था। और अब वह उनकी पत्नी, अपनी मामी, को मिलने से भी कतरा रहा था। निखिल की माँ का फोन आया था रिशभ मामा को। निखिल ने आधी-अधूरी बातें सुनी थीं। “हाँ भैया, भेज रही हूँ इस नख़रेले राजकुमार को… उधर से तुरंत जवाब आया “अरे नहीं, मत डाँटो उसे दीदी… जवान है, अपनी दुनिया में मस्त रहता है। भेज दो उसे हमें ख़ुशी होगी उसे देखकर।”

और इस तरह, एक सुबह, निखिल इंदौर से भोपाल के लिए बस में बैठा था। चौबीस साल का यह लड़का, इंजीनियरिंग की डिग्री लिए, अब एक नई रेस की तैयारी में जुटने वाला था। उसका शरीर फिट था, कंधे चौड़े, और चेहरे पर मामा जैसी ही तेजस्विता थी, बस उम्र कम थी। लोग अक्सर कहते थे कि रिशभ और निखिल देखने में भाई जैसे लगते हैं। बस में बैठे-बैठे उसके मन में कौतूहल था। तन्वी मामी। फोटो में देखा था – सुंदर, गोरी-चिट्टी, मुस्कुराता चेहरा। पर फोटो और असलियत में फ़र्क होता है। मामा ने फ़ोन पर एकबार मज़ाक में कहा था, “तू नहीं आया शादी में, मेरा सबसे हसीन तोहफा देखने से वंचित रह गया।” निखिल हँस देता था। पर अब वह तोहफ़े से सामने होने वाला था।

भोपाल पहुँचते-पहुँचते दोपहर होने लगी थी। ऑटो से मामा के बंगले वाले इलाके में उतरा तो एक सन्नाटा था, हरियाली और शांति। दिल की धड़कन थोड़ी तेज़ हो गई। वह दरवाज़े के सामने खड़ा हुआ। एक गहरी साँस ली और बेल बजा दी।

अंदर से आवाज़ आई, “आयी, आयी!”
दरवाज़ा खुला।

और निखिल की साँसें थम सी गईं।

सामने खड़ी औरत रोटी बेलने वाला बेलन हाथ में लिए थी, दूसरे हाथ पर आटा लगा था। उसने साड़ी का पल्लू कमर में टाँक रखा था, जिससे उसके घुमावदार, भरपूर शरीर का आकार साफ़ उभर रहा था। चेहरे पर हल्का सा आटा और पसीना चमक रहा था, गेहुँए रंग की निखरी त्वचा पर। उम्र कोई बत्तीस-तैंतीस साल रही होगी, पर चेहरे पर एक ताज़गी और चमक थी जो शहर की औरतों में कम देखने को मिलती थी। बाल एक सलीके से जूड़े में बँधे थे, जिससे उसकी लंबी गर्दन और नाज़ुक कंधे दिख रहे थे। मेकअप हल्का था, पर आँखों का काजल और होंठों की लालिमा उसके सौंदर्य को और भी निखार रही थी।

पर निखिल की नज़र सबसे पहले उसके सीने पर टिक गई। साड़ी का ब्लाउज, जो शायद थोड़ा टाइट था या फिर उसके भरपूर वक्षों ने उसे तनाव दिया था, उसके दूधिया उभारों को स्पष्ट रूप से उकेर रहा था। कपड़े के ऊपर से निप्पलों के उभार तक दिख रहे थे। वह आकृति इतनी सम्मोहक थी कि निखिल का मुँह सूख गया। उसकी नज़र धीरे-धीरे ऊपर उठी – पतली कमर, फिर मख़मली गर्दन, और अंत में उस चेहरे पर पहुँची, जिस पर एक अलसाई, मगर कुछ चंचल सी मुस्कान थी।

तन्वी ने उसे देखा। इस नौजवान को, जिसकी उम्र बीस से पच्चीस के बीच होगी, लंबा, तगड़ा, और चेहरे पर रिशभ जैसी ही झलक। वह जान गई यही निखिल है। पर उसकी तरफ़ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आ रही थी। वह तो बस… देखे जा रहा था। उसकी नज़रों का सफ़र उसने महसूस किया – अपने सीने से लेकर चेहरे तक। एक अजीब सी गर्मी उसके गालों पर फैल गई, शायद आटे के नीचे।

“निखिल?” उसने आवाज़ दी, आवाज़ में एक मिठास घुली हुई।
निखिल चौंका, जैसे गहरी नींद से जगाया गया हो। उसकी आँखें फिर से फोकस हुईं।
“निखिल, बेटा?” तन्वी ने फिर कहा, और उसकी मुस्कान थोड़ी और चौड़ी हो गई, आँखों के कोनों में बल पड़ गए। “अंदर आओ। सफ़र कैसा रहा?”

निखिल ने गले से एक अटकी हुई सी आवाज़ निकाली। “हाँ… हाँ मामी। सफ़र ठीक रहा।”

“तो फिर बाहर क्यों खड़े हो?” तन्वी ने दरवाज़ा पूरा खोल दिया और पीछे हट गई। उसके हिलते हुए कदमों में एक लय थी, एक प्राकृतिक लावण्य। “अजी सुनते हो!” उसने पीछे मुड़कर, घर के अंदर की ओर आवाज़ लगाई, “देखो तो, आपका चहेता भांजा आ गया है!”

और उस पल, दरवाज़े के भीतर से आती हुई उसकी आवाज़ की गूँज, उसके होंठों का हल्का सा कंपन, और वह नज़र जो एक पल के लिए वापस निखिल पर टिक गई थी – सब कुछ मिलकर एक ऐसा पल बन गया, जिसे निखिल शायद ही कभी भूल पाएगा। यह वह पहली मुलाकात थी, जिसके बारे में उसने कभी सोचा भी नहीं था। और यहाँ, आटे और रोटियों की महक के बीच, एक नया अध्याय शुरू हो रहा था।

दरवाज़े के पीछे से कदमों की आहट सुनाई दी और रिशभ मामा लिविंग रूम में आते दिखे। उन्होंने हल्के सूती कुर्ते-पायजामे पहन रखे थे और चेहरे पर वही पुरानी, गर्मजोशी भरी मुस्कान थी। “अरे वाह! आ गया मेरा इंजिनियर!” उन्होंने आवाज़ लगाई और निखिल के पास आकर उसे जोर से गले लगा लिया। गले मिलते हुए उन्होंने उसकी पीठ थपथपाई, “कैसा रहा सफर? बस ठीक थी ना?”

निखिल, जिसका ध्यान अभी भी दरवाज़े पर खड़ी तन्वी की तरफ़ लौटने की कोशिश कर रहा था, खुद को संभालते हुए बोला, “हाँ मामा, बिल्कुल ठीक। आप कैसे हैं?”

“हम तो हमेशा की तरह!” रिशभ ने कहा और तन्वी की तरफ़ देखकर मुस्कुराए, “देखा तन्वी? यही है वो मेरा लाड़ला, जो हमारी शादी में नहीं आया।” उनकी आवाज़ में मजाक था, कोई गुस्सा नहीं।

तन्वी ने आँखें घुमाईं, “चलो शुक्र है आपको शादी याद तो है!, अब चलो, अंदर आओ दोनों। चाय बनाकर लाती हूँ।” वह मुड़ी और रसोई की ओर चल दी। उसके चलने का अंदाज, कमर का हिलना, पल्लू का हवा में लहराना… निखिल बेसाख़्ता उसे देखता रह गया।

लिविंग रूम में बैठकर रिशभ मामा ने पूछताछ शुरू की – पढ़ाई कैसी चल रही है, पुणे जाने की तैयारी, घरवाले कैसे हैं। निखिल जवाब देता रहा, पर उसका ध्यान आधा-अधूरा था। उसकी नज़रें बार-बार रसोई की ओर भाग रही थीं, जहाँ से चाय के बर्तनों की खनक आ रही थी।

थोड़ी देर में तन्वी ट्रे में दो कप चाय लेकर आई। वह निखिल के सामने वाले सोफे पर बैठे रिशभ की तरफ़ बढ़ी, एक कप उनके सामने रखा। फिर वह निखिल के पास आई। जैसे ही उसने आगे झुककर टेबल पर कप रखा, उसकी नीली साड़ी का नेकलाइन वाला हिस्सा थोड़ा और खुल गया। निखिल की साँस अटक गई। उसकी नज़र सीधे उस खुले हिस्से में घुस गई, उन भरे हुए वक्षों की ऊपरी रेखा देखने की कोशिश में, जो कपड़े से मुश्किल से ढके हुए थे। उस गहरी खाई का एक झलक, चिकनी त्वचा का एक टुकड़ा… वह कुछ सैकंड के लिए स्तब्ध हो गया।

तन्वी ने उठते हुए, बिल्कुल सही वक्त पर, अपनी नज़र उठाई और निखिल की आँखों से सीधा टकरा गई। उसने देखा कि निखिल कहाँ देख रहा था। एक पल के लिए उसकी आँखों में कोई भाव नहीं था, फिर एक हल्की सी लालिमा उसके गालों पर फैल गई। उसने बिना कुछ कहे, चुपचाप ट्रे उठाई और रसोई की ओर चली गई, उसके कदमों में पहले से ज़्यादा तेज़ी थी।

रिशभ ने चाय की चुस्की ली और बोले, “अच्छा, तू जा नहा ले। लंबा सफर किया है। फ्रेश हो जा, फिर लंच करेंगे।

निखिल ने राहत की साँस ली। उसे वहाँ से हटने की ज़रूरत थी। “ठीक है मामा,” वह उठा और बाथरूम की ओर चल दिया।

बाथरूम का दरवाजा बंद करते ही निखिल ने खुद को दर्पण के सामने खड़ा पाया। उसका चेहरा लाल था, आँखों में एक अजीब सी चमक। “क्या कर रहा था मैं?” उसने खुद से फुसफुसाते हुए कहा, “वह मेरी मामी है। रिशभ मामा की पत्नी।” पर उसका मन उस छवि से मुक्त नहीं हो पा रहा था – दरवाज़े पर आटे में सनी हुई वह औरत, उसका झुकाव, उसकी गर्दन की रेखा, और वह दृश्य जो अभी कुछ मिनट पहले उसकी आँखों के सामने था।

उसने कपड़े उतारे और शॉवर चालू किया। ठंडे पानी ने उसके शरीर को झँझोड़ दिया, पर मन की आग शांत नहीं हुई। आँखें बंद करते ही तन्वी की छवि और स्पष्ट हो गई। अब वह उसकी कल्पना में और भी नज़दीक थी। उसने सोचा कि कैसे वह उसके सामने झुकी थी, कैसे उसके सीने का भार उसके ब्लाउज पर दबाव डाल रहा था, कैसे उसकी त्वचा पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं… उसका हाथ अपने आप नीचे चला गया। उसने अपना लंड पकड़ लिया, जो पहले से ही कड़ा और गर्म था, लगभग सात इंच लंबा और मोटा। उसकी साँसें तेज़ हो गईं। उसने आँखें बंद रखीं और कल्पना की कि तन्वी उसके सामने है, नहाते हुए, पानी की धाराएँ उसके शरीर पर बह रही हैं, उसके भारी स्तन हिल रहे हैं, उसकी चूत के होंठ गीले और खुले हुए हैं…

उसकी कल्पनाओं ने जोर पकड़ा। उसका हाथ तेजी से चलने लगा। उसने तन्वी के बारे में सोचा, उसकी गोल गांड के बारे में, उसकी चौड़ी जांघों के बारे में। उसने सोचा कि कैसे वह उसे दबोचता, उसकी चूत में अपना लंड घुसाता, उसकी चीखें सुनता… उसकी साँसें फूलने लगीं, शरीर में झुरझुरी दौड़ गई, और एक झटके के साथ वह स्खलित हो गया। गर्म वीर्य उसके हाथ और फर्श पर गिरा, पानी के साथ बहता हुआ।

फिर अचानक जैसे कोई बर्फ़ की पट्टी उसके सिर पर रख दी गई हो। उसने आँखें खोलीं। शॉवर का पानी अब भी बह रहा था। उसने अपने हाथ को देखा, फिर अपनी परछाईं को दर्पण में। एक तीखा पछतावा उसके मन में उठा। “क्या कर रहा था मे? यह तो रिशभ मामा की पत्नी है। वही मामा जिन्होंने मुझे हमेशा प्यार दिया, जो मेरे लिए पिता से कम नहीं हैं।”

उसने अपना सिर दीवार से टकराया। “बस। अब नहीं। यह गलत है।” उसने खुद से वादा किया। उसने तेजी से नहाया, मानो अपने पापों को धो डालना चाहता हो। फ्रेश कपड़े पहने, वह बाथरूम से बाहर आया, अपने मन को दृढ़ करते हुए कि अब वह तन्वी को सिर्फ़ अपनी मामी की नज़र से देखेगा।

डाइनिंग टेबल पर खाना लग चुका था। खाने की खुशबू पूरे कमरे में फैली हुई थी। तन्वी ने कई तरह के व्यंजन बनाए थे – पनीर की सब्ज़ी, दाल, चावल, रायता, और घर की बनी हुई मुलायम रोटियाँ।

“वाह मामी, इतना सब कुछ?” निखिल ने हैरानी से पूछा।

रिशभ मामा ने मजाकिया लहजे में कहा, “अरे भई, आज तो खास मेहमान आया है ना। मुझे तो रोज-रोज की दाल-रोटी ही मिलती है।” उन्होंने तन्वी की तरफ़ देखकर आँख मारी, “क्या हुआ आज? पूरा राशन ही लगा दिया क्या?”

तन्वी ने हल्के से झिड़की देते हुए कहा, “अरे छोड़ो आप भी। पहली बार मिल रही हूँ अपने भांजे से। थोड़ा इम्प्रेशन तो बनाना था ना। वरना आप ही कहते रहेंगे कि मैंने आपके लाडले ठीक से खिलाया नहीं।”

“हाँ-हाँ, अब जब भांजा आ गया है तो पति को कौन ही पुछेगा भाई,” रिशभ ने हँसते हुए कहा।

निखिल भी हँस पड़ा, “अरे मामा-मामी, आप दोनों अपनी लड़ाई में मुझे बीच में मत घसीटो। मैं तो बेचारा मेहमान हूँ।”

यह कहते हुए उसकी नज़र अनजाने में तन्वी पर चली गई, जो रोटी पर घी लगा रही थी। उसका हाथ हिल रहा था, जिससे उसका ब्लाउज फिर से थोड़ा खिंच गया। निखिल ने जल्दी से नज़र हटा ली, पर तन्वी ने देख लिया। उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, बस रोटी निखिल के सामने रख दी।

खाना शुरू हुआ। एक मौन के बाद तन्वी ने रिशभ से कहा, “सच कहूँ, निखिल देखने में बिल्कुल आप जैसा लगता है। शादी में भी सब यही कह रहे थे। फोटो में भी ऐसा ही लगता था। पर फोटो का क्या है। अब जब वह सामने बैठा है… मैं मान गई। हैरानी होती है।”

रिशभ ने गर्व से अपना सीना चौड़ा किया, “कहता था ना मैं? मेरा भांजा है, पर मैं इसे अपने बेटे जैसा मानता हूँ।” उन्होंने निखिल की तरफ़ देखा, “याद है निखिल, जब तू दसवीं में फेल हो गया था, और तेरे पापा तुझे खूब पीटने वाले थे? मैंने ही बचाया था ना तुझे?”

निखिल मुस्कुराया, “हाँ मामा, हर बार आप ही बचाते थे। माँ-पापा की डांट से, टीचरों की शिकायत से… आप मेरे हीरो थे।”

“हैं और हमेशा रहूँगा बेटा,” रिशभ ने गर्व से कहा।

खाना खत्म हुआ। रिशभ ने अपनी प्लेट रखी और उठ खड़े हुए, “चलो, मुझे ऑफिस के लिए निकलना पड़ेगा। तुम दोनों आराम से बातें करना। शाम तक लौट आऊँगा।”

तन्वी ने सिर हिलाया, “ठीक है। गाड़ी सावधानी से चलाना।”

रिशभ ने निखिल के कंधे पर हाथ रखा, “तेरा सामान तेरे कमरे में रख दिया है। ” यह कहकर वह अपने कमरे की ओर गए, जल्दी से तैयार हुए और चाबियाँ खनखनाते हुए दरवाजे से बाहर निकल गए।

गाड़ी के इंजन की आवाज़ धीरे-धीरे दूर हो गई। और अचानक घर में एक गहरी सन्नाटा छा गया। निखिल और तन्वी अकेले थे। डाइनिंग टेबल पर खाली प्लेटें और चमचे पड़े थे। पंखे की फड़फड़ाहट ही एकमात्र आवाज़ थी।

तन्वी पहले खड़ी हुई, “चलो, अब बर्तन उठा लेती हूँ।”

निखिल भी उठा, “मैं मदद करता हूँ मामी।”

“अरे नहीं, तू मेहमान है,” तन्वी ने कहा, लेकिन निखिल ने पहले ही कुछ प्लेटें उठा ली थीं। वे दोनों रसोई में गए। रसोई छोटी और साफ-सुथरी थी। खिड़की से हल्की धूप आ रही थी।

प्लेटें सिंक में रखते हुए तन्वी ने पूछा, “तो… पुणे जाने की तैयारी कैसी चल रही? कोचिंग वगैरह सेलेक्ट कर ली?”

निखिल ने दीवार के सहारे खड़े होकर जवाब दिया, “हाँ, एडमिशन लगभग कन्फर्म है। दो हफ्ते बाद जाना होगा।”

“अच्छा है।” तन्वी ने नल चलाया और बर्तन धोने लगी। उसकी पीठ निखिल की तरफ थी। साड़ी का ब्लाउज उसकी पीठ के वक्रों को उभार रहा था। कमर के नीचे गांड का गोलाई लिए हुए आकार स्पष्ट दिख रहा था। निखिल ने अपनी नज़रें हटा लीं, पर दिल की धड़कन तेज़ हो गई। उसने बाथरूम में किए अपने वादे को याद किया, और गहरी साँस ली।

“मामी,” उसने आवाज़ दी।
“हाँ बेटा?” तन्वी ने पलटकर नहीं देखा, बस काम करती रही।
“मैं… मैं शादी में नहीं आ पाया। उसके लिए माफ़ी चाहता हूँ।”

तन्वी के हाथ रुके। उसने नल बंद किया और धीरे से मुड़ी। उसके चेहरे पर एक कोमल, समझदार सी मुस्कान थी, “अरे, यह सब क्यों? मामा ने तुझे माफ़ कर दिया था ना? और मैं… मैं तो तुझे जानती भी नहीं थी ठीक से। फोन पर दो-चार बातें ही हुई थीं। कोई बात नहीं।”

“पर फिर भी… यह अच्छा नहीं लगता,” निखिल ने कहा, उसकी आँखें जमीन पर टिकी हुई थीं।मामा ने कभी कुछ नहीं कहा, पर मुझे पता है कि उन्हें दुख हुआ होगा।”

तन्वी ने अपने हाथ पोंछे और निखिल के पास एक कदम बढ़ाया। उसकी आवाज़ में एक मातृसुलभ कोमलता थी, “सुन, जो बीत गया, सो बीत गया। तू अब यहाँ है ना? आज पर ध्यान दे। कल को लेकर पछतावे में जीने से कुछ नहीं मिलता।”

निखिल ने सिर उठाया। तन्वी की आँखें सीधी उससे मिल रही थीं, उनमें डांट नहीं, समझदारी थी। उसने हल्का सा सिर हिलाया। तन्वी मुस्कुराई, “चल, लिविंग रूम में चलते हैं। यहाँ रसोई में खड़े-खड़े क्या बात करेंगे?”

वे दोनों लिविंग रूम में वापस आए और सोफे पर बैठ गए। बाहर आसमान में बादल और गहरे हो रहे थे, हवा में बारिश की सी गंध आने लगी थी। कमरे में एक अजीब सी शांति थी, जिसमें अनकही बातों का तनाव हवा में तैर रहा था।

कुछ देर तक वे सामान्य बातें करते रहे – मौसम, भोपाल के बारे में, निखिल की पढ़ाई की योजनाएँ। पर हर वाक्य के पीछे एक अनकहा सवाल मंडरा रहा था। निखिल की नज़रें अब भी कभी-कभी तन्वी के चेहरे पर टिक जाती थीं, पर वह जल्दी से हटा लेता था।

लगभग पंद्रह मिनट बीत गए होंगे। तन्वी ने अपनी चाय का आखिरी घूँट पिया और कप टेबल पर रख दिया। उसने एक गहरी साँस ली, जैसे कोई बड़ा फैसला कर रही हो।

“निखिल,” उसने आवाज़ दी, आवाज़ में एक नई गंभीरता थी।
“जी मामी?”
“तू… कितने दिन यहाँ रुकेगा भोपाल में?”

निखिल ने हैरानी से देखा। यह सवाल अचानक क्यों? “मेरी कोचिंग क्लासेज पुणे में अगले महीने शुरू हो रही हैं। तब तक मैं पूरी तरह फ्री हूँ। शायद तीन-चार हफ्ते। क्यों पूछ रही हो मामी?”

तन्वी ने अपनी उँगलियों से सोफे के कवर पर बने पैटर्न को टटोला। उसकी साँसें थोड़ी तेज हो गईं। “एक बात है… एक राज। जो हमारे पूरे परिवार को नहीं पता।”

निखिल की आँखें चौड़ी हो गईं। “राज? किस बात का राज मामी?”

तन्वी ने सिर उठाया। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी – डर, विश्वास और कुछ कहने की जल्दी सब मिला-जुला। “पहले तू मुझे वादा कर। वादा कर कि यह बात तू किसी को नहीं बताएगा। ना परिवार में, ना दोस्तों को… और… और ना अपने माता पिता को।”

निखिल का दिल जोरों से धड़कने लगा। उसने सोफे पर आगे की ओर झुकते हुए पूछा, “क्या बात है मामी? आप मुझे डरा रही हो। क्या हुआ है?”

तन्वी ने अपने होंठ दबाए। उसने आसपास देखा, मानो यह सुनिश्चित कर रही हो कि कोई नहीं सुन रहा। फिर उसने धीरे से, लगभग फुसफुसाते हुए कहा, “तुम्हारे मामा… रिशभ… वो… वो नपुंसक हैं।”

नयी कहानियों की अपडेट सबसे पहले पाने के लिए हमारे Telegram चैनल से जुड़ें!

Join Telegram 🚀
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Scroll to Top