मामी को किया गर्भवती – भाग २

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मामी को किया गर्भवती – भाग १

शब्द हवा में लटक गए। कमरे का तापमान जैसे अचानक गिर गया हो। निखिल की साँसें रुक सी गईं। उसके कानों पर विश्वास नहीं हुआ। “क्या… क्या कहा आपने?”

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“ठीक सूना तूने,” तन्वी की आवाज़ में एक कंपकंपी थी, “रिशभ पिता नहीं बन सकते। हमारी… हमारी शादी में यह समस्या है। भविष्य में हमारे बच्चे नहीं होंगे।”

निखिल एकदम से खड़ा हो गया। उसका चेहरा लाल हो गया, आँखों में आग-सी धधक उठी। “यह कैसी बात कर रही हो मामी! मेरे मामा के बारे में ऐसा मत बोलो!” उसकी आवाज़ ऊँची और कर्कश हो गई थी, “वो मेरे लिए पिता से कम नहीं हैं! आप मामा पर ऐसा इल्जाम कैसे लगा सकती है!”

तन्वी ने घबराहट में अपना सिर हिलाया, “शांत हो जा निखिल, बैठ जा। मैं झूठ नहीं बोल रही।”

“तो फिर ऐसा क्यों कह रही हो? क्या बकवास है यह!” निखिल का हाथ काँप रहा था।

“बैठ!” तन्वी ने दृढ़ता से कहा। उसकी आँखों में आँसू आ गए थे, “मैं भी तुम्हारे मामा से प्यार करती हूँ निखिल। बेवजह उनके बारे में ऐसा नहीं कहूँगी। यह सच है। और… और तुंहारे मामा को भी यह पता है।”

यह सुनकर निखिल के पैरों तले जमीन खिसक गई। वह धीरे से सोफे पर वापस बैठ गया। उसका सारा गुस्सा एकदम से हवा हो गया, उसकी जगह एक ठंडी, सुन्न कर देने वाली हैरानी ने ले ली। “मामा को… मामा को भी पता है?”

“हाँ,” तन्वी ने आँसू पोंछते हुए कहा, “शादी से पहले ही पता चल गया था। पर हमने सोचा… शायद इलाज से ठीक हो जाए।”

“तो इलाज क्यों नहीं करवाया? डॉक्टर के पास क्यों नहीं गए?” निखिल का स्वर अब चिंतित और भ्रमित था।

“गए थे निखिल,” तन्वी की आवाज़ टूट रही थी, “कई डॉक्टरों के पास गए। टेस्ट करवाए। सबने एक ही बात कही… कि यह ठीक नहीं हो सकता। उनके वीर्य में शुक्राणु ही नहीं हैं। कभी नहीं बनेंगे, इलाज उनका होता है जिनमे शुक्राणु की कमी होती है। वो… वो कभी बाप नहीं बन सकते।”

निखिल ने अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया। उसे विश्वास नहीं हो रहा था। उसके मामा, जो हमेशा इतने मजबूत, इतने जीवंत दिखते थे… उनके साथ ऐसा कैसे हो सकता है? एक अजीब सी पीड़ा उसके सीने में उठी।

थोड़ी देर की चुप्पी के बाद उसने सिर उठाया। उसकी आँखें लाल थीं। “पर… पर यह सब आप मुझे क्यों बता रही हो मामी? यह तो… यह तो आप दोनों की निजी बात है। आपने बड़े लोगों से, परिवार से क्यों नहीं कहा?”

तन्वी ने एक कड़वी हँसी हँसी, “पागल हो गया है क्या तू? अगर यह बात रिश्तेदारों में फैल गई तो तुम्हारे मामा की जिंदगी खत्म हो जाएगी। उनकी इज्जत, उनकी पहचान, सब मिट्टी में मिल जाएगी। लोग उन पर हँसेंगे, उनका मजाक उड़ाएंगे। वो जीते-जी मर जाएंगे शर्म से। क्या तू चाहता है कि ऐसा हो?”

निखिल ने सोचा। उसने अपने समाज के बारे में सोचा, लोगों की बातों के बारे में सोचा। तन्वी सही थी। यह राज अगर खुल गया तो रिशभ मामा का जीवन नर्क हो जाएगा। उसने धीरे से सिर हिलाया, “नहीं… नहीं मामी। आप सही कह रही हो।”

“तो अब समझ आया इसे राज़ क्यों रखना है?” तन्वी ने कहा, उसकी आवाज़ में थोड़ी राहत थी।

“पर फिर भी…” निखिल ने सीधा देखते हुए पूछा, “आप यह सब मुझे ही क्यों बता रही हो? मैं इस में क्या कर सकता हूँ?”

तन्वी ने एक लंबी, काँपती हुई साँस ली। उसने निखिल की आँखों में देखा। उसकी अपनी आँखों में एक भयानक संघर्ष था, शर्म थी, हिम्मत थी, और एक ऐसा निर्णय जो उसने शायद बहुत सोच-विचार के बाद लिया था। वह बोली, और उसके हर शब्द में एक भारीपन था, एक ऐसी सच्चाई जो उनके रिश्ते को हमेशा के लिए बदल देने वाली थी।

“क्योंकि निखिल… क्योंकि मुझे एक बच्चा चाहिए।”

ये शब्द कमरे में गूँज गए, एक भारी, ज़हरीली हकीकत की तरह हवा में लटके रहे। निखिल की साँसें फिर से अटक गईं। उसने तन्वी को देखा, जैसे उसने कोई अजनबी भाषा बोल दी हो।

“कैसे?” उसका स्वर फुसफुसाहट जैसा था, “आप कैसे माँ बन सकती हो अगर मामा… अगर मामा नपुंसक हैं?”

तन्वी ने अपनी उँगलियाँ आपस में लिपटा लीं। उसकी हथेलियाँ पसीने से तर थीं। उसने एक कठिन निगलने की क्रिया की, गले का एक पिंड नीचे उतारा। “हमारे पास… एक योजना है। तेरे मामा और मेरे पास।”

“योजना?” निखिल की आँखें संकरी हो गईं, “क्या योजना मामी?”

तन्वी ने सिर धीरे-धीरे उठाया। उसकी नज़रें निखिल से जा मिलीं। वह नज़रें सीधी थीं, लेकिन उनमें एक अजीब सी लाचारी थी, एक ऐसी मजबूरी जो शर्म से भरी हुई थी। कई सेकंड तक वे चुपचाप एक-दूसरे को देखते रहे। कमरे में सन्नाटे का दबाव बढ़ता जा रहा था। फिर तन्वी ने धीरे से कहा, “तू… तू हमारी मदद कर सकता है।”

निखिल का सिर हल्का-सा झटका, जैसे उसे ठीक से समझ नहीं आया हो। “मैं? मैं कैसे मदद कर सकता हूँ? मैं तो… मैं तो बस…”

“तू हमें एक बच्चा दे सकता है, निखिल।”

इस बार शब्द साफ़ और स्पष्ट थे। और उनके प्रभाव से निखिल ऐसे उछला जैसे सोफे में कोई कील लगी हो। वह एकदम से खड़ा हो गया, उसका चेहरा विस्मय और घृणा के मिश्रण से विकृत हो गया।

“क्या?!” उसकी आवाज़ चीख बन गई, “क्या बकवास कर रही हो आप? पागल हो गई हो क्या मामी? यह कैसी बातें कर रही हो!”

“निखिल, सुन…”
“नहीं! मैं यह सब नहीं सुनना चाहता!” उसने हाथों से कान ढँक लिए, फिर तेजी से हाथ नीचे किए, “अगर मामा ने आपके दिमाग में ऐसी कोई बात सुनी तो… तो वो आपको मार डालेंगे! आप समझती हो यह क्या कह रही हो?”

तन्वी ने आँखें बंद कर लीं, जैसे उसे दर्द हो रहा हो। फिर उसने धीरे से, बहुत ही नियंत्रित आवाज़ में कहा, “बैठ जा निखिल। और शांत होकर सुन। तेरे मामा को… यह सब पता है।”

निखिल का मुँह खुला का खुला रह गया। उसके होठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।

तन्वी ने आँखें खोलीं। उनमें आँसू नहीं थे, बल्कि एक सुन्न, स्वीकार्य भाव था। “हाँ। हम दोनों ने इस पर बात की है। लंबी बहसें हुईं। रोए हैं। लड़े हैं। और… और अंत में दोनों सहमत हो गए।”

“नहीं…” निखिल का सिर हिलने लगा, “यह संभव नहीं है। मैं विश्वास नहीं कर सकता। अगर यह सच है… अगर मामा सच में सहमत हैं… तो उन्होंने मुझसे पहले क्यों नहीं कहा? सीधे मुझसे क्यों नहीं बात की?”

“शर्म, निखिल,” तन्वी की आवाज़ में एक करुणा थी, “वो तुझसे यह बात करने से शर्मिंदा थे। उन्होंने मुझसे कहा कि… कि मैं तुझसे बात करूँ। तुझे समझाऊँ।”

निखिल धीरे-धीरे सोफे पर वापस बैठ गया। ऐसे बैठा जैसे उसकी हड्डियाँ टूट गई हों। उसकी नज़रें खाली थीं, सीधे सामने दीवार पर टिकी हुईं। उसके दिमाग में तूफान मचा हुआ था। रिशभ मामा… उसके हीरो… वो यह सब स्वीकार कर चुके थे? उन्होंने अपनी पत्नी को… अपने भांजे के सामने ऐसा प्रस्ताव रखने के लिए कहा था?

लगभग पाँच मिनट तक वह चुप रहा। सिर्फ़ पंखे की फड़फड़ाहट और उसकी अपनी अनियमित साँसों की आवाज़ थी। तन्वी ने भी कुछ नहीं कहा। वह जानती थी कि यह निर्णय निखिल को ही लेना था।

आखिरकार निखिल ने सिर उठाया। उसकी आँखों में अब आघात नहीं, एक थकी हुई, भारी स्वीकार्यता थी। “ठीक है,” उसने कहा, आवाज़ सपाट और निर्जीव, “मैं करूँगा। मैं स्पर्म डोनेट कर दूँगा। अगर इससे तुम दोनों खुश रह सकते हो… तो मैं तैयार हूँ।”

तन्वी के चेहरे पर राहत की एक लहर दौड़ गई, पर वह जल्दी ही लुप्त हो गई। उसने अपने होंठ काटे। “अच्छा… तू हमारी मदत को तैयार हो गया, इसके लिए हम दोनों तेरे बहुत आभारी हैं। पर… पर एक बात और है जो तुझे समझनी होगी बेटा।”

निखिल की भौंहें तन गईं। “और क्या है? जो कुछ सुना उससे ज़्यादा और क्या हो सकता है?”

तन्वी ने गहरी साँस ली, जैसे अंतिम और सबसे कठिन बात कहने जा रही हो। “दरअसल… मम्म… बात यह है कि… तेरे मामा और मैंने तय किया है कि… यह प्राकृतिक तरीके से ही होगा।”

“प्राकृतिक तरीका?” निखिल ने पलकें झपकाईं, “क्या मतलब?”

तन्वी ने उसे सिर्फ़ देखा। एक ऐसी नज़र जिसमें सब कुछ कह दिया गया था। उसकी आँखों में एक शर्मिंदगी थी, एक अपील थी, और एक ऐसा सच था जिसे शब्दों में ढालना असंभव था।

निखिल के चेहरे पर भावनाओं का एक तूफ़ान उमड़ा। पहले भ्रम, फिर एक क्षणिक अबोध, और फिर अचानक एक भयानक समझ जिसने उसके रोंगटे खड़े कर दिए। उसकी आँखें फैल गईं। “नहीं… बिल्कुल नहीं!” वह फिर से खड़ा हो गया, “यह सच नहीं हो सकता! आप पागल हो गई हो! आईवीएफ का विकल्प है ना? क्यों नहीं उस रास्ते पर जाते?”

तन्वी ने दृढ़ता से सिर हिलाया, “क्योंकि तेरे मामा और मैं नहीं चाहते कि इस बात का कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड रहे। आईवीएफ करवाने का मतलब है हॉस्पिटल, डॉक्टर, फाइलें, दस्तावेज़… तेरे स्पर्म का रिकॉर्ड। आज नहीं तो कल, कभी भी यह रहस्य खुल सकता है। और अगर खुल गया तो तेरे मामा की असलियत दुनिया के सामने आ जाएगी। इसीलिए… इसीलिए हमने यह फैसला किया। प्राकृतिक प्रक्रिया। कोई रिकॉर्ड नहीं। कोई सबूत नहीं।”

निखिल ने अपना माथा पकड़ लिया। वह समझ रहा था। हर तर्क उसके दिमाग में घूम रहा था। यह पागलपन था, पर एक ठंडे, निर्मम तर्क का पागलपन। उसने धीरे-धीरे बैठते हुए पूछा, “ठीक है… यह तो समझ आया। पर… पर सिर्फ़ मैं ही क्यों? दुनिया में और भी लोग हैं।”

“क्योंकि तू बिल्कुल तेरे मामा के जैसा दिखता है,” तन्वी ने कोमलता से कहा, “तेरे मामा का एक संस्करण। अगर… अगर हमारा बच्चा होगा, तो वह भविष्य में हम दोनों जैसा दिखेगा। किसी को शक नहीं होगा। कोई सवाल नहीं उठेगा।”

और तभी सब कुछ निखिल के लिए स्पष्ट हो गया। शादी के बाद से मामा का बार-बार फोन करना, उसे बुलाना, उससे मिलने की जिद… यह सब एक योजना का हिस्सा था। एक लंबे समय से चली आ रही, सोची-समझी योजना। उसकी आँखें बंद हो गईं। उसने एक लंबी, काँपती हुई साँस ली।

“ठीक है,” उसने कहा, आवाज़ में अब एक निश्चय था, “मैं तैयार हूँ। पर एक शर्त है। मुझे पहले खुद मामा से बात करनी है। उन्हीं के मुँह से यह सब सुनना है।”

तन्वी के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आई, राहत और दुख का मिश्रण। “ठीक है।” उसने अपना फोन उठाया, उँगलियाँ काँप रही थीं। उसने रिशभ का नंबर डायल किया।

फोन दो-तीन बार बजने के बाद कनेक्ट हुआ। “हाँ?” रिशभ की आवाज़ दूसरी तरफ से आई।
“सुनिए… मैंने… मैंने निखिल से सब कुछ कह दिया।”
दूसरी तरफ़ एक लंबी चुप्पी। फिर, “और?”
“वो… वो आपसे बात करना चाहता है। आपके मुँह से सुनना चाहता है।”
फिर से चुप्पी। फिर एक भारी आह। “ठीक है। मैं आ रहा हूँ। बीस मिनट में पहुँचता हूँ।”

कॉल कट गई। तन्वी ने फोन नीचे रख दिया। अब वह और निखिल फिर से अकेले थे। निखिल ने उसकी तरफ़ देखा। तन्वी ने उसकी तरफ़ देखा। उनकी नज़रों में एक अजीब सी समझ थी, एक ऐसा बंधन जो अभी-अभी जन्मा था और जो शायद उन्हें हमेशा के लिए जोड़ देगा।

वे चुपचाप बैठे रहे, घर के मर्द के इंतज़ार में, जो अपनी ही पत्नी को अपने भांजे के साथ सोने की इजाज़त देने आ रहा था। बाहर बारिश की पहली बूँदें खिड़की से टकराने लगीं।

बीस मिनट बाद रिशभ घर लौट आए। उनके कपड़ों पर बारिश की हल्की बूँदें चमक रही थीं। दरवाजा खुलते ही उनकी नज़र सीधी निखिल पर पड़ी, फिर तन्वी पर। कमरे में हवा जैसे जम गई। वह अजीब सी खामोशी, जिसमें शर्म, डर और एक भयानक अपेक्षा का मिश्रण था।

रिशभ ने अपनी चाबियाँ टेबल पर रखीं। आवाज़ कर्कश थी। “तन्वी,” उन्होंने कहा, बिना उसकी तरफ देखे, “मैं और निखिल थोड़ी देर टहलने जा रहे हैं। बारिश रुक गई है।”

तन्वी ने सिर्फ सिर हिलाया, उसकी आँखें नीची थीं। निखिल उठ खड़ा हुआ, उसके पैर सुन्न से लग रहे थे। दोनों पुरुष बिना एक शब्द कहे दरवाजे से बाहर निकल गए।

बाहर हवा में बारिश के बाद की ताज़गी और जमीन से उठती सोंधी महक थी। पास के पार्क तक का रास्ता वे साइलेंट ही तय करते रहे। पार्क में दोपहर के समय कोई नहीं था, सिर्फ कुछ चिड़ियाँ पेड़ों पर चहचहा रही थीं। एक सुनसान बेंच के पास पहुँचकर रिशभ रुके। उन्होंने एक सिगरेट निकाली, जलाई और गहरा कश लिया।

“देख निखिल,” उन्होंने धुएँ को छोड़ते हुए शुरुआत की, आवाज़ भारी और थकी हुई, “तेरी मामी ने तुझे सब कुछ बता दिया होगा। हमारी… समस्या। और मैं तेरा बहुत शुक्रगुज़ार हूँ कि तू इस मुसीबत में हमारी मदद करने को तैयार है। तूने इस पूरी उलझन को एक परिपक्व इंसान की तरह समझा… मुझे तुझ पर गर्व है बेटा।”

उन्होंने निखिल की तरफ देखा। उनकी आँखों में एक गहरा दर्द था, एक ऐसी शर्मिंदगी जो एक मर्द के लिए सबसे बड़ी हार थी। “और… माफ़ करना। मैं खुद तुझसे यह बात करने में… असमर्थ रहा।”

निखिल ने जमीन पर पड़े एक पत्ते को अपने जूते से दबाया। “कोई बात नहीं मामा। मुझे बस आपसे पुष्टि चाहिए थी। क्योंकि… पहली बार मिली मामी, और उनका सीधे ऐसी बात कह देना… यह थोड़ा सदमा था।”

रिशभ ने एक कड़वी हँसी हँसी, सिगरेट का अंतिम कश लेकर उसे फेंक दिया। “हाँ… वो है ही एक दमदार औरत। अपने वंश को आगे बढ़ाने के लिए वो कुछ भी कर सकती है।” उनके स्वर में सम्मान और हताशा का अजीब मेल था। “खैर… अब ज़्यादा ज़रूरी है कि यह सब कैसे होगा।”

निखिल ने भी गहरी साँस ली। “हाँ मामा, मैं भी यही सोच रहा था। मेरा मतलब… हम सब एक ही छत के नीचे रहेंगे। और मैं और मामी… और आप अलग कमरे में… यह सोचकर ही…” उसकी आवाज़ धीमी पड़ गई। उसके मन में वह तस्वीर उभर आई – तन्वी नंगी, उसके नीचे… और उसकी पैंट में उसका लंड अचानक सख्त होकर उभर आया, एक दर्द भरी गर्मी के साथ।

रिशभ ने उसकी बात काट दी, जैसे उसके विचारों को पढ़ लिया हो। “हाँ हाँ, मैं जानता हूँ। मैं भी इसी के बारे में सोच रहा था। इसीलिए मैंने पहले से ही एक योजना बना ली है।”

“क्या योजना?” निखिल की आवाज़ में उत्सुकता और एक अजीब सी घबराहट थी।

रिशभ ने सीधे उसकी आँखों में देखा। “मैं लगभग पंद्रह-बीस दिन के लिए दूसरे शहर जा रहा हूँ। वैसी भी एक काम था ही मुझे। इस दौरान तुम दोनों… ताकि तुम दोनों बिना किसी रोक-टोक के… संभोग कर सको।” उन्होंने शब्द को ज़ोर दिया, मानो खुद को यकीन दिला रहे हों। “मैं चाहता हूँ कि तू उन दिनों में मामी चूत में जितनी बार हो सके, अपना लंड घुसेड़े। ताकि गर्भ ठहरने की संभावना बढ़ जाए। इस दौरान मैं शहर से बाहर रहूँगा। और किसी को कानों-कान भनक नहीं लगनी चाहिए। समझा?”

रिशभ के मुँह से सीधे ‘चूत’ और ‘लंड’ जैसे शब्द सुनकर, और उनके द्वारा सीधे उसे अपनी पत्नी को चोदने के लिए कहा जाना सुनकर, निखिल का लंड पैंट में और ज़ोर से खड़ा हो गया, एक तेज धड़कन के साथ। उसने अपनी पैंट को ढीला करने की कोशिश की। उसके मन में तन्वी की गांड, उसके भरे हुए दूध, उसके निप्पलों की छवि तैरने लगी। उसने सिर्फ सिर हिलाया, एक कर्कश स्वर में बोला, “हाँ मामा।”

रिशभ ने उसके कंधे पर हाथ रखा, एक भारी, दबाव वाला स्पर्श। “अच्छा बेटा। चलो, अब घर चलते हैं।”

वे दोनों पार्क से वापस चल पड़े। निखिल के कदमों में एक नई मजबूती थी, पर दिल एक अजीब सी ग्लानि और उत्तेजना के बीच झूल रहा था। रिशभ साथ चल रहे थे, शांत, उनका चेहरा एक अभेद्य मुखौटा बना हुआ था। आसपास का वातावरण सामान्य था – पक्षी, हवा, गीली जमीन – पर उन दोनों के बीच जो समझौता हुआ था, वह हवा में एक जहरीली, गर्म लपट की तरह लिपटा हुआ था। घर की ओर बढ़ते हुए, निखिल जानता था कि जो कुछ होने वाला था, वह उसे और उसके मामा के रिश्ते को हमेशा के लिए बदल देगा। और अब कोई पीछे हटने का रास्ता नहीं था।

घर लौटते हुए रास्ते में निखिल का दिमाग पूरे दिन की घटनाओं में खोया हुआ था। उसकी आँखों के सामने तन्वी का वह रूप तैर रहा था जब उसने पहली बार दरवाज़ा खोला था – उसकी भरी हुई छाती जो साड़ी के ब्लाउज में उभर रही थी, उसकी चिकनी, सुनहरी त्वचा जो दोपहर की रोशनी में चमक रही थी, उसकी वह मादक खूबसूरती जिसने उसे पल भर में अपना दीवाना बना दिया था। उसे याद आया कि कैसे उसने बाथरूम में उसकी कल्पना करके तुरंत ही अपना लंड हिलाया था, और फिर कैसे उसे एक तीखा पछतावा हुआ था, यह सोचकर कि उसे अपनी मामी के बारे में ऐसे गंदे विचार नहीं लाने चाहिए।

पर अब… अब स्थिति बिल्कुल पलट गई थी। अब पति और पत्नी दोनों ही उससे विनती कर रहे थे कि वह तन्वी को चोदे, उसे गर्भवती करे। उसके मन में एक दुष्ट मुस्कान फैल गई। कितना बेवकूफ था वह! और कैसे चीजें उसके पक्ष में घूम गई थीं। अब वह सिर्फ देख ही नहीं सकता था… अब वह चूम सकता था, चाट सकता था, उसकी हर इंच जमीन को अपने होठों और जीभ से नाप सकता था। उसके रसीले होंठ, उसके भारी दूध जो साड़ी के अंदर दबे हुए थे, उसका पेट और नाभि जो सुबह दरवाज़ा खोलते समय एक झलक दिखाई दी थी… और उसकी चूत… उसकी चूत कैसी होगी? गुलाबी? तंग? गीली? यह सोचते ही उसका लंड पैंट के अंदर और सख्त होकर ऐंठने लगा, एक तेज खुजली और गर्मी के साथ। उसने अपनी पैंट के बटन के पास हाथ रखा और लंड को दबाकर एक बेहतर स्थिति में लाने की कोशिश की, उसे अपनी जांघ से थोड़ा ऊपर की ओर समायोजित किया।

रिशभ ने यह सब देख लिया। उनकी आँखों के कोने से उन्होंने निखिल की उस हरकत को नोटिस किया। उनके मन में एक कड़वा विचार आया – ‘अब यह कमीना मेरी बीवी को चोदने के लिए पूरी तरह तैयार है। जल्दी ही उसकी चूत भर देगा।’ पर उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। बस चुपचाप साथ-साथ चलते रहे।

घर पहुँचे। दरवाज़ा एक बार फिर तन्वी ने ही खोला। और एक बार फिर निखिल ने उसे वैसी ही कामुक नज़रों से देखा, जैसी सुबह देखा था जब वह पहली बार आया था। पर फर्क सिर्फ इतना था कि सुबह वह हिचकिचा रहा था, शर्मिंदा था। अब उसकी नज़रों में कोई हिचकिचाहट नहीं थी, सिर्फ एक जानवरों जैसी, भूखी लालसा थी। एक ऐसी नज़र जो तन्वी के कपड़ों को फाड़कर सीधे उसके नंगे शरीर तक पहुँचना चाहती थी। तन्वी ने भी उस नज़र को महसूस किया। उसकी साँसें एक पल के लिए थम सी गईं।

दोनों अंदर दाखिल हुए। तन्वी और निखिल लिविंग रूम में बैठ गए। चुप्पी थी। तन्वी थोड़ी बेचैन लग रही थी, उसकी उँगलियाँ अपनी साड़ी के पल्लू को मरोड़ रही थीं। कुछ ही मिनटों बाद रिशभ बेडरूम से ताज़े कपड़े पहने और एक बड़ा बैग लटकाए हुए लौटे।

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