नमस्ते दोंस्तो .. पिछले भाग में हमने देखा की कैसे राम सिह और उसकी पत्नी ने उनके बेटी की गांड मरते हुए , उसे समझाया की ससुराल में उसे क्या करना है,..अगर अपने वो पाठ नहीं पढ़ा है तो यंहा शाही राजपुताना परिवार का वासना का खेल – १ क्लिक करके पढ़ सकते है. अब आगे …
आखिर वो सुहाना दिन आ ही गया। आज गौरी का राजकुमार, सुमेर, उसे देखने आ रहा था।
वह गहरे सुर्ख लाल रंग के लहंगे और चुनरी में सज-धज कर पूरी तरह से तैयार हो रही थी।
वो जानबूझकर अपना दुपट्टा ऐसे डाल रही थी कि उसके ३८-३२-३८ के घंटाकार आकार का आभास दिखे।
बाहर दालान में मेहमानों की आवभगत के लिए राम सिंह जी ने पूरी जान लगा दी थी।
गरमा-गरम दाल-बाटी और चूरमे की सौंधी खुशबू से पूरा घर महक रहा था, लेकिन गौरी के शरीर से निकलती कामुक गंध उससे भी तीव्र थी।
“पावणों की सेवा में कोई चूक नहीं होनी चाहिए, आज रिश्ता पक्का करके ही छोड़ना है,” यही सब सोच-सोचकर राम सिंह के माथे पर थोड़ा पसीना था।
वो जानते थे कि इससे पहले भी दो अलग-अलग परिवारों के लोग गौरी को देखकर जा चुके थे, लेकिन कहीं बात नहीं जमी थी।
शायद उन्हें गौरी की आँखों में छुपी उस भूख का पता चल जाता था, या फिर वो लड़के उस कद्र के ‘मर्द’ नहीं थे जो इस हवेली की बहू को संभाल सकें।
शाम ढलते ही मेहमानों ने कदम रखा। गौरी की माँ रसोई के अंदर अपने इष्टदेव के सामने हाथ जोड़े मन्नत मांग रही थीं—
“हे भगवान, आज किसी भी तरह उनकी बेटी के हाथ पीले होने की बात पक्की हो जाए। उसकी कोख को वो वीर्य मिले जो उसे माँ बना सके।”
फिर एक लंबा सा घूंघट निकाले, अपनी चांदी की पाजेब छनकाती हुई गौरी मेहमानों की खातिर चाय की ट्रे लेकर वहां पहुंची।
घूंघट के झीने परदे से जैसे ही उसने नजरें ऊपर कीं, पहली ही नजर में उसे सुमेर भा गया।
उसने अपने सपनों में जैसा सोचा था, सुमेर हूबहू वैसा ही दिख रहा था—एकदम गबरू जवान, कसरती शरीर और चेहरे पर एक अलग ही राजपूती शान।
गौरी की निगाहें सीधे उसकी पजामे के उभार पर गईं। वो देखकर उसकी सांसें थम गईं—वहां एक बड़ा और भारी सा रॉड दिख रहा था।
उधर सुमेर की आंखों में भी गौरी तुरंत बस गई। गौरी के भरे-पूरे गदराए हुस्न और कजरारी आंखों ने सुमेर के दिल पर सीधा तीर चला दिया था।
सुमेर महसूस कर सकता था कि ये औरत कोई फूल नहीं, बल्कि एक आग है जिसे बुझाने के लिए एक मजबूत आदमी की जरूरत है।
बस फिर क्या था, दोनों तरफ रजामंदी हो गई। शगुन का नारियल चढ़ाया गया और ठीक दस दिन के बाद की शादी तय हो गई।
आज राम सिंह जी की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। उन्हें पता था कि उनकी बेटी को अब वह मर्द मिलने वाला है जो उसकी ‘पूरी’ कर पाएगा।
गौरी की माँ भी फूली नहीं समा रही थीं।
और गौरी… वो तो जैसे अपने ही मीठे सपनों की दुनिया में खो गई थी, जहां वो सिर्फ अपनी सुहागरात के उस पल के बारे में सोच रही थी जब सुमेर का लौड़ा उसकी सील तोड़ेगा।
गांव की सखियां जब भी सुमेर का नाम लेकर उसे छेड़तीं, तो उसका गोरा रंग शर्म से लाल हो उठता।
वो घंटों आईने के सामने खुद को निहारती और आने वाले खूबसूरत दिनों के सपने बुनने लगती—सपने जो रातों को उसे अपने पिता की गोद में भी नहीं बुझा पाते थे।
उमंग और बेचैनी में किसी तरह वो दस दिन कट ही गए।
मेहंदी और हल्दी-उबटन की रस्में बड़े धूमधाम से संपन्न हुईं। घर की औरतों ने मंगल गीत गाए, जिनके बोल अक्सर दूल्हे-दुल्हन की रात की साधना को छेड़ते थे।
गौरी के हाथों पर लगी गहरी मेहंदी के नक्शे उसके भविष्य की गाथा कह रहे थे—उसके कमर के नीचे जो नक्शे बने थे, वे तो मानो सीधे उसकी कोख की गहराइयों की ओर इशारा कर रहे थे।
सजने-संवरने के बाद लाल जोड़े, भारी नथ और माथे पर चांदी का बोरला पहने गौरी किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी।
उसका वह ३८-३२-३८ का कातिलाना आकार अब भारी लहंगों के पीछे छिपा नहीं था, बल्कि उन कपड़ों से लड़कर अपनी उपस्थिति दावत रहा था।
वो जब भी चलती, उसके कूल्हे एक जोश के साथ इधर-उधर हिलते, जैसे वो किसी ताल पर नाच रही हों।
शाम ढलते ही ढोल-नगाड़ों की गूंज के साथ सुमेर की बारात दरवाजे पर आ गई। सुमेर सफेद शेरवानी में किसी बादशाह जैसा लग रहा था।
उसकी आँखों में एक ऐसी आग थी जिसे देखकर गौरी का शरीर एक बार फिर से कांपने लगा। वो जानती थी कि आज रात वह आग शांत होगी, और वो भी बड़े ही दर्द और आनंद के साथ।
शादी की सारी रस्में पूरी हुईं। फेरे लेते समय जब सुमेर का हाथ उसके कंधे को छूता, तो गौरी को लगता था जैसे वो उसे अपने बिस्तर पर खींच रहा हो।
पुजारी के मंत्रों के बीच भी गौरी के कानों में सिर्फ सुमेर की सांसें और उसके लौड़े की कल्पना गूंज रही थी।
फिर वह भारी घड़ी आ गई—विदाई का समय।
हवेली के दरवाजे पर चारों तरफ एक अजीब सी उदासी छा गई, लेकिन गौरी के मन में तो एक उत्सव था।
अपनी लाडली बेटी को विदा करते हुए राम सिंह जी फूट-फूट कर रो पड़े, लेकिन उनके आँसू बेटी को खोने के नहीं, बल्कि उसके “गृहप्रवेश” के लिए खुशी के थे।
उन्हें पता था कि गौरी अब उस मर्द के पास जा रही है जो उसकी तड़प को शांत कर पाएगा।
राम सिंह ने सुमेर का हाथ अपने हाथों में लिया और उसे दबाकर बोले, “बेटा सुमेर, यह लाडो अब तुम्हारी जिम्मेदारी है। इसे हर खुशी, हर सुख दो… और हाँ, इसकी हर इच्छा को पूरा करने में कभी पीछे न हटना।”
उनकी आँखों में एक ऐसा संदेश था जो केवल सुमेर समझ सकता था—गौरी एक साधारण लड़की नहीं है, वो एक असली राजपूत रानी है जो बिस्तर पर भी राज करती है।
गौरी की माँ ने भी अपनी बेटी को गले लगाते हुए फुसफुसाया, “जाओ बेटा, अपना और हमारा नाम रोशन करो। याद रखो वो बातें जो हमने सिखाई थीं… अपने पति को खुश रखो, चाहे उसके लिए तुम्हें कुछ भी करना पड़े।”
गौरी ने अपने माता-पिता के पैर छुए और पलंग पर चढ़ गई। जब पालकी उठी, तो उसने पीछे मुड़कर देखा। वो दृश्य उसकी आँखों में कैद हो गया।
वो अब उस हवेली को छोड़कर जा रही थी जहाँ उसने अपनी यौवन की पहली आग महसूस की थी, जहाँ उसने अपने पिता से गांड मरवाकर सीखा था कि कैसे एक मर्द की प्यास बुझाई जाती है।
अब वो एक नई दुनिया में जा रही थी—सुमेर की दुनिया में।
सुमेर की हवेली में गौरी के स्वागत का इंतज़ाम राजशाही ठाठ-बाट से किया गया था। सुमेर की माँ, ठकुराईन श्रृंगार किए बैठी थीं, जब वो दोनों हाथों में कलश लिए दहलीज पर खड़ी हुईं।
उन्होंने गौरी को आशीर्वाद दिया, और उसकी बहू के माथे पर सिंदूर भरते हुए उसके कानों में फुसफुसाया, “बेटा, अब तुम यहाँ की बहु हो। यह हवेली, यह राज-पाट, और सुमेर… सब तुम्हारे हैं। बस उनकी आवाज़ में आवाज़ मिलाना।”
उनकी आँखों में एक ऐसा ठंडा और गहरा भाव था जो गौरी को एक पल के लिए डरा गया।
रस्मों के बाद, जब दोनों नवविवाहित जोड़े को उनके सुहागरात के कमरे के लिए छोड़ा गया, तो गौरी का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। वो कमरा एक स्वर्ग जैसा सजा था।
दीवारों पर सोने का पानी चढ़ा था, बीचों-बीच एक विशाल राजसी पलंग था जिस पर लाल और सुनहरे रंग की रेशमी चादरें बिछी थीं। कमरे के कोनों में अगरबत्ती जल रही थीं, और हवा में गुलाब की महक घुली हुई थी।
एक ओर बड़ा आईना लगा था, जिसमें पूरा कमरा और उसमें बैठी गौरी की परछाई नज़र आ रही थी।
गौरी बिस्तर के किनारे पर बैठी थी, अपना घूंघट थामे हुए। उसके मन में उत्सुकता और एक अजीब सा सावधानी भाव था। तभी दरवाजा खुला और सुमेर अंदर आए। वो अपने दोस्तों के साथ शादी की दावत में भारी शराब पीकर आए थे।
उनके कदम टलमला रहे थे और उनकी आँखें सुर्ख लाल थीं। उनके मुँह से शराब की तीखी गंध आ रही थी।
सुमेर ने कमरे को नहीं, बल्कि सीधे गौरी को देखा। उनकी नज़रें भूखी शेर की तरह थीं। गौरी को देखते ही उनके चेहरे पर एक विकृत मुस्कान आ गई। वो अपनी शेरवानी का बटन खोलते हुए बिस्तर की तरफ बढ़े।
गौरी के दिमाग में तुरंत उसकी माँ की बातें गूँजने लगीं—”याद रखो बेटा, सामने वाले को लगना चाहिए कि तुम्हारा यह पहला अनुभव है। शर्माओ, सहमाओ, और नादान बनो। तुम्हारे पिता के साथ वो सब तो यहाँ छूटा हुआ खेल है।”
गौरी ने तुरंत अपना चेहरा शर्म से छुपाते हुए झुका लिया और अपनी साँसें तेज़ कर लीं। वो एक नादान, डरी हुई कुंवारी की तरह दिखने लगी।
सुमेर बिस्तर तक पहुँचे और बिना कुछ बोले, उन्होंने गौरी को पकड़ा और एक झटके से बिस्तर पर पलट दिया। यह झटका इतना ज़बरदस्त था कि गौरी का बोरला बिखर गया और उसके गहने खनक उठे।
“आखिरकार मिली ही गयी तुम, मेरी रानी,” सुमेर फूट पड़े, जिसमें नशे और कामवासना का मिश्रण था। “आज तो मैं तुम्हें ऐसे चोदूंगा कि तुम याद रखोगी।”
सुमेर सीधे गौरी के ऊपर चढ़ गए। गौरी शर्म और डर के मारे उनसे बचने का नाटक करने लगी, लेकिन सुमेर ने उसके हाथ बिस्तर पर दबा दिए। वो गौरी के ऊपर झुककर उसके होंठों पर अपने शराबी सांसों को फूंकने लगे।
गौरी को उस कड़वी और तीखी शराब की बदबू बिल्कुल पसंद नहीं आई, और वो अपना मुँह हटाने की कोशिश करने लगी। पर सुमेर ने उसका मुँह अपने होंठों से जकड़ लिया और उसे चूसने लगे। यह चुंबन प्यार नहीं, बल्कि एक दावत थी।
फिर सुमेर नीचे की तरफ बढ़े। उन्होंने गौरी के काले रंग के ब्लाउज को पकड़ा और एक ज़ोरदार खींच के साथ उसे फाड़ दिया। फट! धागे टूट गए और गौरी के ३८ साइज़ के, भरे हुए, गोल-गोल और चिकने स्तन आज़ाद होकर हवा में उछल पड़े।
उन पर से कपड़े का एक भी टुकड़ा शेष नहीं था।
सुमेर ने बिना देर किए उन पर झपट पड़े। उन्होंने गौरी के निप्पल्स को अपने मुँह में भर लिया और जानवरों की तरह काटने और चूसने लगे। गौरी दर्द से आह… ऊई… कर उठी। उसके बाबूसा उसे इतना दर्द नहीं देते थे। सुमेर के रूखे मुँह और दांत उसकी नर्म त्वचा को छलनी कर रहे थे।
लेकिन फिर अचानक सुमेर ने मुँह हटाया और सीधे उसकी कमर की तरफ बढ़ गए। उन्होंने गौरी के भारी लहंगे को फाड़ने की जहमत नहीं उठाई, बल्कि उसे उसकी कमर तक ऊपर खींच दिया। गौरी की गोरी, चिकनी जांघें और वहां बीच में छुपी उसकी कोमल कामुकता अब बेपर्दा थी।
सुमेर ने एक पल भी नहीं रुका। वो उसकी चूत के ऊपर झुक गए और अपनी मोटी जीभ सीधे उसके छेद पर रख दी। गौरी का शरीर एक बिजली सी कंप गया।
वो इस हालत में इसकी उम्मीद नहीं कर रही थी। सुमेर की जीभ उसकी चूत की फांकों को चाट रही थी। उसका कड़वा स्वाद और सुमेर की थूक से गीली जीभ गौरी को मदहोश कर रही थी। उसके मुँह से अनजाने में आनंद की सिसकारियाँ निकलने लगीं।
“हाय… साहब जी… यह क्या…” गौरी ने झूठी शर्म के साथ कहा, पर उसका शरीर सच कह रहा था।
सुमेर उठे और गौरी की टांगों को अपने दोनों हाथों से ज़ोर से फैला दिया। वो उसकी चूत की फांकों को अपने अंगूठे से बीच से खींचकर अलग कर दिया।
गौरी ने अपनी आँखें बंद कर लीं और अपनी चूत की मांसपेशियों को ढीला छोड़ दिया, जैसे वो उसके पिता के साथ करती थी। वो जानती थी कि वो ‘देखी जाएगी’, और उसे वही दिखाना था जो वो देखना चाहता था—एक बंद, कुंवारा छेद।
सुमेर ने उसकी नाजुक त्वचा को चौड़ा किया और अंदर झांका। उनकी उंगली की नोक ने उसकी चूत की दीवारों को छुआ। वहां एक पतली सी पर्दे जैसी झिल्ली थी जो अभी तक अछूती थी।
एक कामुक, क्रूर मुस्कान सुमेर के चेहरे पर फैल गई। वो संतुष्ट हो गए। उनके लिए यह सिर्फ एक जीत नहीं थी, बल्कि अपनी संपत्ति की शुद्धता का प्रमाण था।
“कसी हुई है… जैसा होना चाहिए,” सुमेर ने खुश होकर फुसफुसाया। उन्होंने गौरी की चूत पर एक तमाचा मारा, जिससे गौरी का शरीर झनझना गया।
फिर सुमेर ने अपना अंडरवियर नीचे खींचा और अपना लौड़ा बाहर निकाला। गौरी ने उसे चोरी-चोरी देखा। वो औसत साइज़ का था—उसके बाबूसा के उस भयानक और मोटे सांप से काफी छोटा।
गौरी के मन में एक तरह से राहत की सांस आई। उसने सोचा, ‘अरे वाह, यह तो बच्चों का खेल है। मैंने बाबूसा का वो मोटा लौड़ा भी अपनी गांड में लिया है, यह तो मेरी चूत के लिए कोई मुश्किल नहीं होगा।’
वो भरोसे में आ गई कि वो इसे आसानी से संभाल लेगी। वो उसकी चुदाई का मज़ा लेगी और साथ ही अपनी नादानी का नाटक भी कायम रखेगी।
लेकिन गौरी एक बड़ी गलती कर रही थी। वो गांड मरवाने के दर्द को ही चुदाई का असली दर्द समझ रही थी। उसे नहीं पता था कि एक कुंवारी चूत की फटने की पीड़ा और क्या होती है।
सुमेर अब बेसब्र हो उठे थे। शराब के नशे और उत्साह में उन्हें कोई धीरज नहीं था। उन्होंने गौरी की टांगों को अपने कंधों पर रखा और अपना लौड़ा उसके उस छोटे से छेद पर सेट किया।
गौरी ने अपनी आँखें बंद कर लीं और उसके अंदर तैयार हो गई, उम्मीद लगाए हुए कि वो जल्दी ही अंदर जाएगा।
और फिर, बिना कोई चेतावनी के, सुमेर ने अपनी कमर को पीछे हटाया और फिर एक भयानक ज़ोर के साथ आगे धक्का मारा। वो उसके अंदर घुसना नहीं चाहते थे, वो तो उसे फाड़कर अंदर घुसना चाहते थे।
चीर!
“आआआअह… मा… मार डाला! बचाओ!”
गौरी के मुँह से एक ऐसी चीख निकली जिसने शायद पूरी हवेली की छत फाड़ दी। उसकी आँखें बाहर निकल आईं। यह दर्द उसने कभी महसूस नहीं किया था।
गांड मरवाने का दर्द तो कुछ और था, लेकिन यह… यह तो जैसे किसी ने उसके शरीर के बीच में से एक गर्म लोहे की सलाख पेर दी हो। उसकी चूत का पर्दा एक ही झटके में फट गया था।
गौरी की चीख इतनी ज़ोरदार थी कि वो कमरे से बाहर तक गूँज उठी। नीचे दालान में बैठी सुमेर की माँ ने जब यह आवाज़ सुनी, तो उनके चेहरे पर एक विकृत संतुष्टि का भाव आ गया।
उन्हें पता था कि यह आवाज़ उसकी बहू की ‘पवित्रता’ टूटने की आवाज़ है, और इससे उन्हें अपने पुत्र की ‘पुरुषता’ पर गर्व महसूस हुआ।
पर बिस्तर पर हालात बदतर थे। सुमेर को गौरी की चीख से कोई फर्क नहीं पड़ा। वो तो उसके रोने को उत्तेजना की तरह ले रहे थे। उन्होंने पूरा लौड़ा एक ही धक्के में गौरी की चूत के सबसे गहरे हिस्से में पेल दिया।
सुमेर ने चुदाई शुरू कर दी। उनकी रफ़्तार बेतहाशा थी। वो बार-बार पूरी ताकत से अंदर जा रहे थे और बाहर निकल रहे थे। गौरी की चूत से खून की धार बह निकली। वो उनके लौड़े और उनके जांघों पर लग गया। सफेद चादर अब लाल खून से लथपथ हो रही थी।
“नहीं… रुकिए!…आ..आ..आआ..स्स.स्स..!!… धीरे करिये… मुझे दर्द हो रहा है!” गौरी रोते हुए बिलख रही थी। उसके नाखून सुमेर की पीठ में गड़ गए थे, पर सुमेर को इसका कोई अहसास नहीं था।
“नाटक बंद कर !..,” सुमेर गरजे। “तूने मुझे दिनभर तड़पाया है। अब ले मेरा लौड़ा।”
वो 20 मिनट तक बिना रुके उसे चोदते रहे। गौरी का दर्द अब एक सुन्नी में बदल चुका था। उसकी चूत अब एक ज़ख्मी गुफा जैसी हो गई थी जो लगातार खून बहा रही थी। वो रोती रही, चीखती रही, पर सुमेर का लौड़ा नहीं रुका।
आखिरकार, सुमेर की सांसें तेज़ हो गईं। उन्होंने एक आखिरी, शक्तिशाली झटका मारा और गौरी की चूत के अंदर ही झड़ गए।
गर्म वीर्य की धार उसकी चूत की गहराइयों में गिरी। सुमेर गौरी के ऊपर ही ढह गए, पसीने से तर-बतर होकर। गौरी बेचैनी से कांपती रही, उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे और उसकी चूत से खून और वीर्य का मिश्रण बाहर टपक रहा था।
बिस्तर पर अकेली पड़ी गौरी के आँसू अब भी बह रहे थे। उसका शरीर दर्द से थर्राता हुआ था। वो अपने माता-पिता की याद करके और ज्यादा रोने लगी।
उसके दिमाग में वो दिन ताज़ा हो गए जब उसके पिता, राम सिंह, ने उसे धीरे-धीरे इस दुनिया के राज़ सिखाए थे। वो याद करती कि कैसे उसकी माँ उसके सिर को अपनी गोद में दबाए रहती थी जब राम सिंह पहली बार उसकी गांड को तैयार कर रहे होते थे।
उसके पिता ने कभी जल्दबाज़ी नहीं की थी। वो पहले अपनी उंगली से उसकी गांड को ढीला करते, उस पर थूक लगाते, और उसे प्यार से चूमते। वो कहते थे, “बेटा, धीरज रखो, इससे तुम्हे दर्द नहीं होगा।”
लेकिन यहाँ… यहाँ तो बस एक जानवर था। सुमेर ने उसे एक रगड़ने वाले औजार की तरह इस्तेमाल किया था। गौरी को अहसास हुआ कि वो अपने मायके में एक राजकुमारी थी, जिसकी सील उसके पिता ने संभाल कर रखी थी, पर इस ससुराल में वो सिर्फ एक नर्म गुड़िया थी जिसे बिस्तर पर फेंककर तोड़ा गया।
उसके पिता उसकी गांड मारते वक्त भी उसकी खुशी के बारे में सोचते थे, जबकि सुमेर को तो बस अपना रस निकालना था।
यह समाज की कड़वी हकीकत थी—एक बेटी को सिर्फ एक रांड की तरह इस्तेमाल किया गया, और उसके पति को उसके दर्द से कोई फर्क नहीं पड़ा।
उधर बिस्तर पर से उठकर सुमेर ने अपनी आँखें रगड़ीं। शराब का नशा अभी भी उनके सिर में घूम रहा था। उन्हें भारी प्यास लगी हुई थी।
उन्होंने कमरे के कोने में रखा मटका उठाया और उसे हिलाया—खाली। शराब और चुदाई के बाद उन्हें प्यास लग रही थी।
वो बिना कुछ सोचे-समझे, बिल्कुल नंगे, अपने लौड़े को हाथ में थामे हुए, जो अभी भी गौरी के खून और वीर्य से सना हुआ था, कमरे से बाहर निकल आए।
उन्होंने अपना हाथ अपने लौड़े पर रखा जैसे कोई तलवार संभाल रहा हो, लेकिन उस पर लगा खून उसे एक भयानक रूप दे रहा था। वो लड़खड़ाते हुए दरवाज़े की तरफ बढ़े। दरवाज़ा खोलते ही उनके होश ठिकाने आ गए।