शाही राजपुताना परिवार का वासना का खेल – ३

Advertisement

दोस्तों पिछले भाग में हमने देखा की कैसे सुमेर गौरी का कुंवारापन बेरहमी से दूर किया और उसे एक लड़की से औरत बना दिया अगर आपने वो भाग नहीं देखा है तो यंहा शाही राजपुताना परिवार का वासना का खेल – २ क्लिक कर के जरुर पढ़े तभी आगे की कहानी पढने में मज़ा आएगा. अब आगे …

Advertisement

सामने, गलियारे में उनकी माँ, ठाकुराइन, खड़ी थीं। वो शायद बेटे के कमरे के बाहर बनी दीवार का सहारा लिए वहाँ थीं, शायद यह सुनने की कोशिश कर रही थीं कि क्या ‘काम’ तो हो गया। लेकिन अचानक खुले दरवाज़े और सामने खड़े अपने बेटे को देखकर वो सकते में आ गईं।

सुमेर का बिल्कुल नंगा शरीर, और उस पर लटकता हुआ वो लौड़ा… जो गौरी के कौमार्य के खून से लाल था।

ठाकुराइन की निगाहें सीधे उस लाल, खून से लथपथ लौड़े पर टिक गईं। उनके चेहरे पर पहले तो एक हैरानी थी, लेकिन फिर वह दृश्य देखकर उनकी आँखें चौड़ी हो गईं।

सुमेर को भी एहसास हुआ कि उनकी माँ क्या देख रही है। नशे में धुत्त होने के बावजूद, एक बेटे की शर्म ने उन्हें घेर लिया। उन्होंने तुरंत अपने दोनों हाथों से अपना खून से लथपथ लौड़ा छिपाने की कोशिश की।

“माँ… आप… यहाँ…” सुमेर हकलाए। उनका चेहरा शर्म से लाल हो गया। “मैं… मुझे पानी चाहिए था…”

एक अजीब सा सन्नाटा छाया रहा। ठाकुराइन अपने बेटे के उस शर्मिंदे चेहरे को देख रही थीं। फिर अचानक उनके होंठों पर एक विजेता की मुस्कान आ गई। वो आगे बढ़ीं।

“छिपाओ मत, बेटा,” ठाकुराइन ने अपनी आवाज़ में एक गहरा राजसी गर्व भरते हुए कहा। “वाह, मेरे शेर… वाह!”

सुमेर हैरानी से अपनी माँ को देखने लगे। वो सोच नहीं पा रहे थे कि यह प्रतिक्रिया क्यों हो रही है।

“यह खून… यह लाल रंग…” ठाकुराइन ने सुमेर के हाथों को हटाते हुए उस लौड़े को देखा। “यह राजपूत शेर का निशान है। तुमने अपनी औरत को जीत लिया है, बेटा। यह खून इस बात का सबूत है कि तुम एक असली मर्द हो, एक वो जो अपनी रानी को पूरी तरह से अपना बना सके।”

सुमेर की शर्म धीरे-धीरे घमंड में बदलने लगी। उन्हें अपनी माँ के शब्दों में एक अजीब सा सुकून मिला। हाँ, वो एक मर्द थे। उन्होंने अपनी औरत को जीता था। उनका सीना फैल गया और वो अपना लौड़ा छिपाना भूल गए।

ठाकुराइन ने पास में रखे एक बर्तन से पानी भरा और सुमेर को पिलाया। सुमेर ने एक सांस में सारा पानी गटक लिया।

“बेटा,” ठाकुराइन ने उनके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, जबकि उनकी निगाहें अभी भी उस खून से लथपथ लौड़े पर थीं।

“यह बहुत अच्छा है कि तुमने इतनी जल्दी अपना हक जता दिया। लेकिन यह तो सिर्फ शुरुआत है। मैं चाहती हूँ कि तुम इसे हर रोज़ करो।

जब भी तुम्हारा मन करे, जहाँ भी तुम्हारा मन करे… चाहे मैं ही सामने खड़ी हों। मुझे कोई ऐतराज़ नहीं है। तुम्हारा वीर्य और तुम्हारा जोश इस परिवार की शक्ति है।”

सुमेर के होश उड़ गए। वो अपनी माँ को एक नए नज़रिए से देखने लगे। उन्हें एहसास हुआ कि वो औरत सिर्फ एक माँ नहीं, बल्कि एक चतुर राजनीतिज्ञ भी थी।

“देखो, बेटा,” ठाकुराइन ने उन्हें समझाते हुए कहा, अपना स्वर थोड़ा गंभीर करते हुए। “हम राजपूत हैं। हम इस समाज के नेता हैं, शाही लोग हैं। हम दूसरों पर राज करते हैं। और एक राजा का राज तब तक मज़बूत नहीं होता

जब तक उसका वंश आगे नहीं बढ़ता, जब तक हमारी गद्दी पर एक वारिस नहीं बैठता।” ठाकुराइन की आवाज़ में वही ज़िंदगी भर की ताकत और क्रूरता थी जो किसी भी राजपूत महल की दीवारों में दस्तक देती है।

“समाज हमें इसलिए देखता है क्योंकि हम अलग हैं, सुमेर। हम वो नहीं हैं जो अपनी औरतों को पूजते हैं। हम उन्हें इस्तेमाल करते हैं—राज को आगे बढ़ाने के लिए।”

वो एक कदम और आगे बढ़ी, अपने बेटे के नंगे शरीर से बिल्कुल घबराए बिना। उसने उसके कान में धीरे से कहा, “और वारिस केवल तभी पैदा होगा जब तुम उस रांड को हर रात, हर पल चोदोगे। तुम्हें उसकी परवाह नहीं करनी है, तुम्हें सिर्फ उसकी गर्भाशय में अपना वीर्य भरना है।”

सुमेर अपनी माँ के इस खुलेपे को सुनकर सन्न रह गया था। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि वो इतनी… आधुनिक और ठंडे तरीके से सोच सकती है।

लेकिन उसके शब्दों में एक तर्क था—एक वो तर्क जो उसके शराबी दिमाग को समझ आ गया। हाँ, वो राजा है, और राजा का काम सिर्फ राज करना है, भावुक होना नहीं।

“अब यह लो,” ठाकुराइन ने तभी कहा, जब सुमेर अपनी माँ की बातों में खो गया था। उसने पास में रखा एक तांबे का लोटा उठाया और उसमें से ठंडा पानी अपने हाथों में लिया।

सुमेर सहम सा गया। “माँ… आप…”

“चुप!” ठाकुराइन ने एक कड़क आवाज़ में कहा और फिर बिना किसी हिचकिचाहट के, अपने बेटे के उस खून से लथपथ और गन्दे लौड़े को अपने हाथों में पकड़ लिया।

सुमेर का शरीर एक बिजली सी कंप गया। यह अजीब था। उसकी माँ उसके लौड़े को धो रही थी—वो लौड़ा जिसने अभी-अभी उसकी नई बीवी को फाड़ा था।

लेकिन ठाकुराइन के चेहरे पर कोई भी लज्जा या कामुकता नहीं थी। उसके हाथ मज़बूत और आश्वस्थ थे।

वो उस पर लगी गौरी की चूत के खून और अपने बेटे के वीर्य को एक गीले कपड़े से साफ़ कर रही थी, जैसे वो किसी युद्ध के बाद अपने बेटे की तलवार साफ़ कर रही हो।

“यह तलवार है, सुमेर,” उसने धोते हुए कहा, अपनी उंगलियों से उसके लौड़े की नस को सहलाते हुए। “

और राजा की तलवार को हमेशा चमकदार रखना चाहिए।” उसने पानी डाला और उसके ऊपर से गंदगी धो डाली।

“तुम्हारी पत्नी को खून बहाना पड़ा, यह उसका भाग्य है। लेकिन तुम्हारा काम अभी खत्म नहीं हुआ। एक बार से वारिस पैदा नहीं होता।”

सुमेर को अपनी माँ की इस बुद्धि और परिपक्वता पर गर्व महसूस होने लगा। वो समझ गया कि वो कितनी बड़ी खिलाड़ी है।

उसने अपनी माँ के उस हाथ को महसूस किया जो उसकी इज्जत और शक्ति को साफ़ कर रहा था।

उसका लौड़ा फिर से खड़ा होने लगा, ठाकुराइन के स्पर्श से और उसके उस ज्ञान से कि वो क्या करने वाला है।

ठाकुराइन ने उसका लौड़ा धोकर एक साफ़ सूती कपड़े से पोंछा। अब वो फिर से चमकदार और तैयार था, हालांकि उस पर अभी भी थोड़ा सा लाल रंग बना हुआ था।

उसने अपने बेटे के लौड़े पर एक जोरदार थपाथप किया, जैसे किसी घोड़े को दौड़ के लिए तैयार किया जाता है।

“अब जाओ,” उसने आदेश दिया, अपनी उंगली से बेडरूम के दरवाज़े की तरफ इशारा करते हुए। उसकी आँखों में एक जंगली चमक थी।

“जाओ और उसे फिर से लो। उसे थकने मत देना। याद रखो, हमें वारिस चाहिए… और वो जल्दी आएगा अगर तुम उसे हर रात इसी तरह बिस्तर पे पसारोगे।”

सुमेर ने अपनी माँ को देखा। शर्म गायब थी, उसके स्थान पर एक जबरदस्त आत्मविश्वास और कामुकता थी।

गलियारे की ठंडी हवा से बेपरवाह, सुमेर बिल्कुल नंगे बदन था। उसका लौड़ा अभी भी खून से सना हुआ था, पर उसकी नसें फूली हुई थीं और वो फिर से कड़क हो रहा था। उसके दिमाग में अपनी माँ, ठाकुराइन के शब्द गूँज रहे थे।

“वारिस चाहिए… राजपूतों का वंश आगे बढ़ाना है।”

सुमेर ने अपने चेहरे पर एक विकृत मुस्कान लिया। वो समझ गया था कि उसकी माँ कितनी बड़ी चतुर है। दुनिया की बातें, राजनीति, सब वो जानती है। उसे लगा जैसे वो उसी हाथी को पकड़ रहा है जिसे पकड़ने का सपना वो देखता था।

गौरी सिर्फ एक रसोई का बर्तन नहीं, बल्कि एक ऐसा बर्तन है जिसमें उसे अपना वीर्य भरकर एक राजा पैदा करना है। और इसके लिए जो कुछ भी करना पड़ेगा, वो करना होगा। उसकी माँ ने साफ़ कह दिया था—चाहे मैं सामने खड़ी रहूँ, तुम रुको मत।

सुमेर ने अपने लौड़े को हाथ में जकड़ लिया और धीरे-धीरे आगे-पीछे करने लगा। उसे अहसास हो रहा था कि वो कितना बड़ा और गर्म हो गया है।

उसके मन में अपनी माँ के उस स्पर्श का एहसास ताजा था। जैसे उसने उसकी तलवार को चमकाई हो, वैसे ही उसने उसके लौड़े को साफ़ किया था।

वो भावना उसके शरीर में आग लगा रही थी। उसकी माँ के उन ठंडे और मजबूत हाथों ने जब उसके मांस को छुआ था, तो उसे एक अजीब सी सिहरन महसूस हुई थी। वो सिर्फ माँ नहीं थीं; वो एक स्त्री भी थीं।

“वो सिर्फ 34 साल की हैं…” सुमेर सोचते हुए मुस्कुराया। उसके दिमाग में गणित चल रहा था।

उसकी माँ तब भी एक बच्ची थी जब उसकी शादी हुई थी, और सुमेर उनके विवाह के एक साल बाद ही पैदा हो गया था।

मतलब जब वो खेल के मैदान में दौड़ रहा था, तब उसकी माँ अभी भी अपनी खूबसूरती की शिखर पर थी।

आज के बदलते समाज में जहाँ लोग 30 की उम्र तक भी शादी नहीं करते, उसकी माँ 34 की उम्र में भी एक देवी जैसी लगती थीं।

सुमेर का लौड़ा उसके हाथ में और तन गया। वो अपनी माँ के शरीर के बारे में सोचकर मस्त हो रहा था। उसे एक साल पहले की वो घटना याद आ गई। वो दिन उसकी ज़िंदगी में सबसे ज़्यादा कामुक पल था।

वो अपने कमरे से निकलकर अपनी माँ के बेडरूम में घुस गया था, बिना दरवाज़ा खटखटाए। और जैसे ही उसने अंदर कदम रखा, उसके पैर ज़मीन पर चिपक गए थे।

ठाकुराइन बिस्तर के पास खड़ी थीं, कपड़े बदल रही थीं। वो उस समय सिर्फ एक पतली सी गुलाबी चिकनी चड्डी में थीं।

सुमेर की आँखें फटी की फटी रह गई थीं। उसके सामने वो शरीर था जिसे उसने सपनों में भी नहीं देखा था।

उसकी माँ का वो गोरा, गुलाबी और मुलायम शरीर हवा में लहरा रहा था। उनकी ४० साइज़ की भारी चूचियाँ जैसे दो तरबूज लटक रहे थे, जो गुरुत्वाकर्षण के कारण थोड़े नीचे की तरफ झुके हुए थे।

वो चूचियाँ वही थीं जिनसे सुमेर ने अपना बचपन पिया था, लेकिन आज वो उसे एक शिकारी की नज़र से देख रहा था। वो देख रहा था कि कैसे उन पर नीली-नीली नसें दिखाई दे रही थीं और उनके निप्पल कड़क होकर बाहर निकल आए थे।

उसकी नज़र उनकी कमर पर गई, जो एकदम पतली थी, और फिर उनकी उस पतली पैंटी पर जो उनकी गोल-गोल और भरी हुई गांड को कसकर पकड़े हुए थी।

सुमेर का लौड़ा उस समय अपने पैंट में फंसकर तड़प रहा था। वो अपनी माँ को एक रांड की तरह घूर रहा था, उनकी हर एक अंग को नोच रहा था।

सामान्य तौर पर कोई माँ इस हालत में चीख पड़ती। लेकिन ठाकुराइन ने न तो चीखा और न ही कपड़े छुपाए। उन्होंने बस अपने बेटे को वहाँ खड़ा देखा, जिसकी आँखें उनकी चूचियों को चाट रही थीं।

सुमेर बेहोश सा खड़ा था। तभी ठाकुराइन ने अपनी उंगलियों से एक तीखी आवाज़ निकाली। सुमेर का ध्यान टूटा और उसने अपनी माँ के चेहरे की तरफ देखा।

“मैं यहाँ हूँ, ऊपर!,” ठाकुराइन ने अपनी आँखों में एक चालाक मुस्कान लेकर कहा।

उनकी आँखें सीधे सुमेर की पैंट के उस उभार पर गईं, जो साफ़ दिखाई दे रहा था। उन्होंने देख लिया था कि उनका बेटा उन्हें एक औरत की नज़र से देख रहा है और वो भी काफी गर्म हो गया है।

सुमेर शर्म से पानी-पानी हो गया। उसका चेहरा लाल हो गया। वो अपनी माँ के चेहरे पर कोई नाराज़गी ढूंढ रहा था, पर वहाँ तो सिर्फ एक खेल भरा भाव था।

ठाकुराइन ने अपनी उंगलियों से ताली बजाई और बोली, “अरे बाबा… मेरा छोटा सा शेर… अब बड़ा हो रहा है क्या? देख रही हूँ कि तू कितना ‘बड़ा’ हो गया है।”

उस शब्द ने सुमेर को बिजली सा कंपा दिया था। उसकी माँ उसका मज़ाक उड़ा रही थी, लेकिन उसके अंदर एक भारी कामुकता छुपी थी।

वो अपने बेटे को एक आदमी की तरह देख रही थी, एक आदमी जिसका लौड़ा उसके लिए खड़ा हो रहा था। सुमेर वहाँ से भाग निकला था, लेकिन उसके दिमाग में वो दृश्य बस गया था।

और आज… आज जब उसकी माँ ने अपने हाथों से उसका लौड़ा धोया था, तो वो याद ताजा हो गई थी। उसे एहसास हुआ कि उसकी माँ ने जानबूझकर उसे गर्म किया था। उसने उसके लौड़े को छुआ था, उसे साफ़ किया था,

और फिर उसे गौरी को चोदने के लिए भेज दिया था। वो याद ताज़ा करते हुए अपने लौड़े को और ज़ोर से मसलने लगा। उसके हाथ में उसकी माँ के उस नर्म स्पर्श का एहसास अभी भी बाकी था। वो कमरे के दरवाज़े पर खड़ा था।

Advertisement

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top