साँस ने की दामाद की सेवा – पार्ट १

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गायत्री देवी उस दिन पहली बार पटना आई थीं। बिलासपुर का छोटा सा गाँव, जहाँ उन्होंने अपनी ज़िंदगी के चार दशक बिताए थे, वहाँ से निकलकर पटना जैसे शहर में आना उनके लिए किसी नई दुनिया में कदम रखने जैसा था।

लेकिन बेटी नैना की ज़िद के आगे हार माननी ही पड़ी थी।

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“अम्मा, अब तुम अकेले उस गाँव में कैसे रहोगी? पापा के जाने के बाद से तुम बिल्कुल अकेली हो गई हो। और मैं प्रेग्नेंट हूँ, मुझे भी तुम्हारी ज़रूरत है,” नैना ने फ़ोन पर कई बार कहा था।

गायत्री देवी को संकोच था। समाज की बातें, बेटी के ससुराल में रहने का ख़्याल, लोग क्या कहेंगे — ये सब बातें उनके मन में काटे की तरह चुभती रहती थीं। लेकिन जब उनके पास कोई और सहारा नहीं था, तो उन्होंने हाँ कर दी।

नैना उनकी इकलौती बेटी थी। गायत्री देवी की शादी बहुत छोटी उम्र में हो गई थी — जब वह मुश्किल से सोलह साल की थीं।

उन दिनों बिहार के गाँवों में लड़कियों की शादी कम उम्र में कर देना आम बात थी। लेकिन किस्मत से उनका विवाह रामप्रसाद जी से हुआ, जो एक शिक्षक थे।

रामप्रसाद पढ़े-लिखे थे, समझदार थे, और उन्होंने हमेशा अपनी बेटी की पढ़ाई-लिखाई का पूरा ध्यान रखा।

गायत्री देवी खुद अनपढ़ थीं, लेकिन बेवकूफ़ नहीं थीं। गाँव की औरतों की तरह उन्होंने खेतों में काम किया, घर संभाला, और अपनी बेटी को पढ़ाने के लिए हर संभव कोशिश की।

आज नैना पटना में एक अच्छी कंपनी में काम करती थी और उसकी शादी महेश से हुई थी, जो पहले उसका सहकर्मी था।

पटना पहुँचने के दिन गायत्री देवी ने महेश को दुबारा करीब से देखा। गाँव के पुरुषों से बिल्कुल अलग — तगड़ा, चौड़े कंधे, चुस्त बदन।

छह फुट के आसपास लंबाई, घनी दाढ़ी, और एक अजीब सा आत्मविश्वास।

“नमस्ते, अम्मा,” महेश ने हाथ जोड़कर कहा।

गायत्री देवी ने झिझकते हुए हाथ जोड़े। “जी, नमस्ते।”

नैना ने हँसते हुए कहा, “अम्मा, तुम इतना औपचारिक मत बनो। महेश तुम्हारा दामाद है।”

गायत्री देवी ने सिर झुकाकर हल्की सी मुस्कान दी। लेकिन उनकी नज़र अनजाने में महेश के चौड़े कंधों और मज़बूत बाहों पर जाकर टिक गई।

शरीर से ऐसा लगता था जैसे कोई फिल्मी हीरो हो नहीं तो पहलवान। उन्होंने जल्दी से नज़र हटा ली।

पहले कुछ दिन बस गुज़र गए। गायत्री देवी को शहर की ज़िंदगी समझने में समय लगा।

फ्रिज, माइक्रोवेव, गीज़र, एसी — ये सब चीज़ें उनके लिए नई थीं। लेकिन नैना ने उन्हें सब समझाया। धीरे-धीरे वह संभल गईं।

और फिर शुरू हो गया एक नियमित दिनचर्या का चक्र।

गायत्री देवी हर काम करतीं — सुबह जल्दी उठना, चाय बनाना, नाश्ता तैयार करना, घर की सफ़ाई, कपड़े धोना, खाना पकाना, नैना का ध्यान रखना।

नैना प्रेग्नेंसी की वजह से छुट्टी पर थी, तो ज़्यादातर दिन वह आराम करती या टीवी देखती।

महेश ऑफिस जाता था। लेकिन जब भी घर पर होता, गायत्री देवी उसे देखने से खुद को नहीं रोक पातीं।

उसकी मसल्स, उसका तरीका चलने का, बात करने का — सब कुछ उन्हें अजीब तरह से खिंचता था। वह खुद को समझातीं कि यह गलत है, लेकिन फिर भी उनकी नज़रें बार-बार उसकी तरफ उठ जातीं।

रात को जब वह अपने कमरे में अकेली होतीं, तो पुरानी यादें ताज़ा हो जातीं। रामप्रसाद… उनके पति।

एक अच्छे इंसान थे, लेकिन बिस्तर में — एकदम फीके थे। उनका लंड तो बच्चों के अंगूठे जैसा था।

कभी कभी तो लगता था जैसे अंदर कुछ गया ही नहीं। और वह तीन मिनट में ही खत्म कर देते थे।

जीवनभर गायत्री देवी ने कभी उस संतुष्टि का अनुभव नहीं किया था जिसके बारे में औरतें चुपके-चुपके बातें करती थीं।

तभी उन्होंने वह रास्ता अपनाया था — पड़ोस में रहने वाला एक आदमी, जो शहर से कभी-कभी आता था। उसके साथ उन्होंने कुछ बार शारीरिक संबंध बनाए थे।

लेकिन वह भी कोई खास नहीं था। बस एक राहत भरा मौका था।

लेकिन अब पटना में उनके पास कोई नहीं था। और महेश को देखकर उनके अंदर एक अजीब सी हलचल होती थी।

वह खुद को कोसतीं, लेकिन अपनी भावनाओं पर काबू नहीं पाती थीं।

एक दोपहर का समय था। नैना ड्रॉइंग रूम में सोफ़े पर लेटी हुई टीवी देख रही थी।

प्रेग्नेंसी के चौथे महीने में थी, उसे आराम की ज़रूरत थी। गायत्री देवी किचन में बर्तन धो रही थीं। तभी उन्हें प्यास लगी, तो वह पानी लेने बाहर निकलीं।

बाथरूम का दरवाज़ा थोड़ा खुला था। उन्होंने पानी बहने की आवाज़ सुनी।उन्हें लगा की शायद नल ठीक से बंद नहीं हुआ है, ये सोचकर वह आगे बढ़ गईं।

“कोई है ?” उन्होंने धीरे से आवाज़ दी।

लेकिन कोई जवाब नहीं आया।

उन्होंने दरवाज़ा हल्के से खोलकर देखा।

अंदर महेश खड़ा था — बिल्कुल नंगा।

शरीर पर झाग बिखरा हुआ था। पानी की धार उसके चौड़ी छाती से होती हुई नीचे बह रही थी। उसकी आँखें बंद थीं और वह अपने हाथों से अपने शरीर को रगड़ रहा था — छाती, पेट, और फिर नीचे…

वहाँ गायत्री देवी की नज़र ठहर गई।

महेश का लंड खड़ा हुआ था — जैसे कोई मोटा, लंबा स्टील का पाइप। आठ-नौ इंच तो कम से कम होगा। उतना मोटा और बड़ा कि गायत्री देवी ने कभी अपनी ज़िंदगी में नहीं देखा था।

रामप्रसाद का तो उसके सामने कुछ भी नहीं था। यह तो एक जानवर का लंड लगता था — काली नसों से भरा, घनी काले बालों के बीच से निकला हुआ, और ऊपर एक चमकता हुआ सिर, जैसे किसी ने तेल लगा रखा हो।

गायत्री देवी की साँस रुक गई। वह वहीं खड़ी रह गईं। उनके पैर जैसे ज़मीन पर जम गए थे। वह जानती थीं कि उन्हें अभी वहाँ से निकल जाना चाहिए, लेकिन उनका शरीर उनके मन की बात नहीं मान रहा था।

महेश की उंगलियाँ उसके लंड पर धीरे-धीरे घूम रही थीं — ऊपर-नीचे, ऊपर-नीचे। शायद वह मस्त हो रहा था, या शायद अभी-अभी हस्तमैथुन कर रहा था। उसकी गर्दन दाएँ-बाएँ मुड़ रही थी और होंठों से हल्की आहें निकल रही थीं।

गायत्री देवी की अपनी साड़ी के नीचे का हिस्सा गीला हो रहा था। उनके हाथ अपने आप नीचे चले गए — एक उंगली उनकी चूत पर साड़ी के ऊपर से दबाव डालने लगी।

वह खुद भी नहीं समझ पा रही थीं कि वह क्या कर रही हैं। उनका शरीर तो जैसे पिघल रहा था। एक अजीब सी गर्मी उनके अंदर से निकल रही थी, और नीचे रस टपक रहा था।

वह महेश के लंड को घूर रही थीं — उसकी चौड़ाई, उसकी लंबाई, वह नस जो उसके नीचे से ऊपर तक जा रही थी। कितना दर्द होता होगा इसे अंदर लेने से। लेकिन साथ ही कितना भर देने वाला एहसास होता होगा। गायत्री देवी मन ही मन सोच रही थी।

उनके हाथ की हरकत तेज़ हो रही थी। वह अपनी चूत को साड़ी के ऊपर से जोर-जोर से दबा रही थीं, जैसे अंदर का रस निकालना चाहती हों। उनकी आँखें बंद हो रही थीं, और वह अपने होंठ काट रही थीं कि कोई आवाज़ न निकले।

तभी महेश ने पानी से अपना चेहरा धोया।

उसकी आँखें खुल गईं।

दोनों की नज़रें चार हो गईं।

गायत्री देवी का हाथ अभी भी नीचे था। महेश की नज़र पहले उनके चेहरे पर पड़ी, फिर उनके हाथ पर जो उनकी चूत को साड़ी के ऊपर से दबा रहा था।

दो पल — सिर्फ़ दो पल — दोनों ने एक-दूसरे को देखा। महेश के चेहरे पर हैरानी थी, लेकिन कुछ और भी — जैसे उसे समझ में आ गया हो। उसकी आँखों में एक चमक, एक समझौता न करने वाली चमक आ गयी।

गायत्री देवी को जैसे बिजली का झटका लगा। उन्होंने झटके से अपना हाथ वहाँ से हटाया और बिना कुछ कहे — बिना देखे — पीछे हटीं और बाथरूम का दरवाज़ा बंद कर दिया।

उनका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। वह किचन की तरफ भागीं, लेकिन रुक गईं। साँस लेने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन कामयाब नहीं हो रही थीं। उनके हाथ काँप रहे थे, पैर कमज़ोर पड़ गए थे। वह दीवार से टिककर खड़ी हो गईं।

अंदर बाथरूम में महेश खड़ा था। पानी बह रहा था, लेकिन वह सुन्न था। उसने अभी-अभी देखा था — अपनी सास, जो उसकी बीवी की माँ थी, उसे नंगा देख रही थी, और खुद को छू रही थी।

उसके भीतर एक अजीब सी गुदगुदी दौड़ गई। नैना प्रेग्नेंट थी, और अब — अब उसके सामने मौका था।

उस घटना के बाद से तीन-चार दिन बीत गए थे, लेकिन गायत्री देवी के मन से वह नज़ारा नहीं हटा था।

हर बार जब वह महेश को देखतीं, तो उनकी नज़रें झुक जातीं। लेकिन उनके अंदर एक अजीब सी हलचल थी — जैसे कोई चीज़ टूट गई हो, और अब उसकी मरम्मत नहीं हो सकती थी।

महेश ने भी उसे देखने का तरीका बदल दिया था। अब वह उन्हें इस तरह देखता था जैसे कोई अपनी मलकियत की चीज़ को देखता है — ललचाई नज़रों से, आँखों में एक चमक लिए।

जब भी मौका मिलता, वह उनके पास से गुज़रता, अपने हाथ से उनकी कमर या बाँह को छू जाता। पहले तो ऐसे लगता था जैसे गलती से छू गया, लेकिन फिर वह जानबूझकर ऐसा करने लगा।

गायत्री देवी हर बार काँप उठतीं। वह उससे दूर रहने की कोशिश करतीं, लेकिन उनका शरीर उनकी बात नहीं मानता था।

उनकी साड़ी के नीचे का हिस्सा हर बार गीला हो जाता जब महेश उन्हें छूता।

वह खुद को कोसतीं — “मैं क्या कर रही हूँ? वह मेरा दामाद है, मेरी बेटी का पति…” — लेकिन फिर भी वह उसके हाथों का स्पर्श चाहती थीं।

एक शाम जब नैना सोफ़े पर लेटी हुई टीवी देख रही थी, गायत्री देवी किचन में खाना बना रही थीं।

महेश ऑफिस से लौटा था और वह किचन में पानी पीने आया। जैसे ही वह अंदर घुसा, गायत्री देवी को लगा जैसे उनके शरीर में बिजली दौड़ गई।

वह चूल्हे की ओर मुँह किए खड़ी थीं, उनकी पीठ महेश की ओर थी।

महेश ने धीरे से कदम बढ़ाया। उसने देखा कि गायत्री देवी की साड़ी पीछे से उनकी कमर पर कसी हुई है, और उनके कूल्हे की गोलाई साफ़ दिख रही है। उसका मन किया कि वह उन्हें पकड़ ले।

लेकिन उसने रुकने की कोशिश की। पानी पिया और बाहर निकल गया।

लेकिन दूसरे दिन जब नैना अपने कमरे में आराम कर रही थी, महेश ने मौका देखा। गायत्री देवी बालकनी में कपड़े सुखा रही थीं।

वह धीरे से उनके पीछे आया और बिना कुछ बोले, उनकी कमर पर अपने हाथ रख दिए।

गायत्री देवी चौंक गईं। उनके हाथ से कपड़ा छूटकर गिर गया। “दामाद जी! क्या कर रहे हो? नैना… नैना जाग सकती है।”

“नैना सो रही है,” महेश ने फुसफुसाते हुए कहा। उसके हाथ धीरे-धीरे ऊपर बढ़ने लगे — उनकी नाजुक कमर से होते हुए उनकी पसलियों तक।

गायत्री देवी ने उसके हाथों को रोकने की कोशिश की, लेकिन उनके हाथ काँप रहे थे।

“बेटा, नहीं… रुको… ये बहुत गलत है ,” उन्होंने कहा, लेकिन उनकी आवाज़ में कोई जोर नहीं था।

“तुम क्यों झूठ बोल रही हो, अम्मा?” महेश ने कहा। उसके होंठ उनके कान के पास थे, और उसकी साँसों की गर्मी उनकी गर्दन पर पड़ रही थी।

“उस दिन बाथरूम में तुमने मुझे देखा था। तुम्हारी आँखें झूठ नहीं बोलती थीं। और तुम्हारा हाथ — जो तुम्हारी चूत पर था — वह भी झूठ नहीं बोल रहा था।”

गायत्री देवी की आँखों में आँसू आ गए। वह रोने लगीं। “महेश, मैं तुम्हारी सास हूँ… नैना की माँ… यह सब गलत है।”

“तुम एक औरत भी हो,” महेश ने कहा, उसकी आवाज़ में एक गहरा आकर्षण था। ” और तुम तो अभी जवान भी हो। तुम्हारा शरीर कहता है कि तुम्हें भूख लगी है। और मैं वह भूख मिटा सकता हूँ।”

उसने अपने हाथ आगे बढ़ाए और उनके स्तनों को साड़ी के ऊपर से दबा लिया। गायत्री देवी ने साँस रोक ली।

उनका शरीर काँप गया, लेकिन उन्होंने उसे नहीं रोका। वह जानती थीं कि उन्हें रोकना चाहिए, लेकिन उनके अंदर की भूख उनसे बड़ी थी।

“बेटा… महेश… नहीं मत करो ये सब,” उन्होंने कहा, लेकिन उनकी आवाज़ बस एक फुसफुसाहट थी।

महेश ने उनके स्तनों को जोर से दबाया और फिर धीरे से उन्हें घुमाकर अपनी ओर कर लिया। अब वह सामने थीं, उसकी बाहों में।

उसने उनके चेहरे को देखा — आँखें नीची, होंठ काँपते हुए, लेकिन उनमें एक उत्तेजना थी जो वह छिपा नहीं पा रही थीं।

“अम्मा, मैं तुम्हें कुछ कहता हूँ,” महेश ने कहा, उसकी आवाज़ ठंडी और गंभीर हो गई थी। “उस दिन जो हुआ, वह सिर्फ मैंने नहीं देखा।

तुमने भी महसूस किया। और अगर नैना को पता चल गया कि उसकी माँ अपने दामाद को नंगा देखकर खुद को छू रही थी, तो…”

गायत्री देवी के चेहरे पर खौफ आ गया। “नहीं! बेटा, रहम करो… नैना को कुछ मत बताना। वह तो… वह पेट से है। उसे झटका लगेगा। वह टूट जाएगी, मेरी बेटी के साथ ऐसा मत करो।”

“तो फिर तुम्हें यह समझना होगा,” महेश ने कहा, उसकी आवाज़ में एक संयम था। “मैं ब्लैकमेल नहीं करना चाहता।

मैं चाहता हूँ कि तुम अपनी मर्जी से आओ। देखो, नैना प्रेग्नेंट है… मुझे महीनों से कोई संतुष्टि नहीं मिली। और तुम — तुम भी भूखी हो, मैंने तुम्हारी आँखों में वह चमक देखी है।”

गायत्री देवी ने सिर हिलाया, लेकिन कुछ नहीं बोलीं। उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन उनके अंदर एक अजीब सी हलचल थी — वह सोच रही थीं कि शायद यह मौका उनकी ज़िंदगी में एक बार आया है।

“आज दोपहर मैं ऑफिस से आधे दिन की छुट्टी लेकर आऊँगा,” महेश ने कहा।

“तुम बाज़ार जाने का बहाना बनाकर बाहर निकलना। मैं तुम्हें बाज़ार के पास से ले लूँगा। और फिर… एक होटल में चलेंगे।”

गायत्री देवी ने सिर नकारात्मक रूप में हिलाया। “नहीं, बेटा महेश… नहीं। यह गलत है। मैं नहीं कर सकती।”

“तुम कर सकती हो,” महेश ने उनके चेहरे से आँसू पोंछते हुए कहा। उसके हाथ की गर्मी उनकी त्वचा पर महसूस हुई।

“बस एक बार। कोई नहीं जानेगा। नैना को कभी पता नहीं चलेगा। और मैं वादा करता हूँ — तुम्हें वह सब मिलेगा जो तुम्हारे पति ने कभी नहीं दिया।”

गायत्री देवी ने फिर से सिर हिलाया। “नहीं… मैं नहीं आ सकती। यह बहुत बड़ा पाप होगा।”

महेश ने उनकी ठोड़ी पकड़कर उनका चेहरा ऊपर उठाया। “तो ठीक है। लेकिन याद रखना — अगर तुम नहीं आईं, तो मैं नैना को सब बता दूँगा। और फिर वही तय करेगी कि क्या सही है और क्या गलत।”

गायत्री देवी के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई। वह उसकी बाहों में लटक गईं।

बिना एक शब्द और कहे, महेश मुड़ा और किचन से बाहर चला गया।

वह ड्रॉइंग रूम में नैना के पास गया और उसके माथे पर एक चुम्मा देकर बोला, “प्रिय, मैं ऑफिस जा रहा हूँ। आज थोड़ा लेट आऊँगा।”

नैना ने मुस्कुराकर कहा, “ठीक है, जाओ। ध्यान रखना अपना।”

महेश अपने रूम में गया, कपड़े बदले, और बाहर निकल गया।

उसके जाने के बाद गायत्री देवी किचन में अकेली खड़ी रह गईं। उनके हाथ काँप रहे थे, उनके पैर कमज़ोर हो गए थे।

“अब क्या करूँ?” उन्होंने खुद से पूछा। “जाऊँ तो पाप, न जाऊँ तो बेटी की ज़िंदगी बर्बाद… और — और सच कहूँ तो — कौन सा पाप? क्या मैंने कभी अपनी ज़िंदगी में कोई खुशी पाई थी?”

वह खिड़की से बाहर देखने लगीं। उसे बिलासपुर का छोटा सा घर याद आया, जहाँ हर शाम को वह खेत से लौटकर थक जाती थीं और रात को रामप्रसाद का वह तीन मिनट का व्यवहार।

और फिर वह बाथरूम का वह दृश्य — महेश का वह विशाल, तना हुआ लंड।

उनके अंदर कहीं एक आवाज़ ने कहा, “एक बार… बस एक बार… अपनी ज़िंदगी में जी ले।”

वह सोफे पर बैठ गईं, अपना चेहरा हाथों में छिपा लिया। आँसू फिर बहने लगे।

लेकिन इस बार उनमें एक और बात शामिल थी — एक उत्तेजना, एक बेचैनी, एक ऐसी चाहत जिसे वह सालों से दबाए हुए थीं।

दोपहर के ग्यारह बज चुके थे। उनके पास डेढ़ घंटे थे।

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