शाही राजपुताना परिवार का वासना का खेल – १

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बाड़मेर की वो दोपहरें जब धूप आग बरसाती थी, रेगिस्तान की लहरों में मिट्टी के सौंदर्य और कामुकता का एक अजीब मिश्रण छुपा होता था।

राम सिंह की हवेली, जो काले पत्थरों और भव्य बुर्जों से मण्डित थी, उस गर्मी में भी अपने राजपूती गौरव को बनाए हुए थी।

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हवेली के आंगन में बरगद का वृक्ष छाया दे रहा था, और दूर बाजार से ढोल की धुन सुनाई दे रही थी।

राम सिंह जी, जो इलाके के एक प्रतिष्ठित ठाकुर थे, अपने मुख्य दरवाजे के पास बने बैठक में हुक्का पी रहे थे।

उनकी मूंछों पर एक ठेठ राजपूत सिक्का था, लेकिन आज उनके चेहरे पर एक चिंता की रेखाएं भी थीं।

उनकी नजर अक्सर आंगन के उस छोर पर जाती थी, जहां उनकी लाडली बेटी, गौरी, अपने आप में खोई हुई थी।

राम सिंह के लिए गौरी केवल एक बेटी नहीं थी; वो एक चुनौती थी। वो अच्छी तरह जानता था कि उसके ३८-३२-३८ के घंटाकार आकार में कैसी आग छुपी है।

उसकी पतली कमर और फिर नीचे उभरी हुई, भारी और गोल-गोल कूल्हे, जो चलते समय भूकंप पैदा कर देते थे, वो किसी भी मर्द को पागल कर सकते थे।

लेकिन समस्या यह थी कि गौरी केवल सुंदर नहीं थी; वो भूखी थी।

एक ऐसी भूख जो दिन-पर-दिन बढ़ती जा रही थी। राम सिंह देख चुका था कि कैसे उसकी आंखों में वासना की तड़प और गहराती जा रही थी।

वो जानता था कि उसकी इस ‘प्यास’ को केवल एक मजबूत, कड़क लौड़ा ही बुझा सकता है, और वो लौड़ा अभी तक उसकी जिंदगी में नहीं आया था।

दिन भर यही ख्याल राम सिंह के मन में घूमता रहा। वो दिन भर चिंतित रहा, और गौरी भी अपने कमरे में उदास बैठी रही, अपनी उस अधूरी प्यास को सहलाते हुए।

जब रात का सन्नाटा छा गया, तो राम सिंह अपने कमरे में गए। उनकी पत्नी बिस्तर पर उनका इंतजार कर रही थी।

बिना कोई शब्द कहे, राम सिंह ने अपनी धोती उतारी और अपनी पत्नी को कुतिया की मुद्रा में आने का इशारा किया।

“आज बहुत टेंशन है,” राम सिंह ने कहा, अपना कड़क लौड़ा अपनी पत्नी की चूत पर रखते हुए। “गौरी की शादी को लेकर बहुत परेशान हूं।”

उनकी पत्नी ने अपनी कमर थोड़ी और उठाई, ताकि राम सिंह आसानी से अंदर घुस सकें। “हां, मैं भी देख रही हूं,” उसने कहा, जैसे ही राम सिंह का लौड़ा उसकी चूत को फाड़ता हुआ अंदर गया।

“वो दिन-ब-दिन बेचैन होती जा रही है। उसका शरीर एक आग का गोला बन गया है।”

राम सिंह ने धीरे-धीरे अपनी गति बढ़ा दी। उनका लौड़ा अब उसकी चूत में आ-जा रहा था। “हां, और मैं जानता हूं कि वो क्या चाहती है,” राम सिंह ने सांस छोड़ते हुए कहा।

“वो एक मज़बूत लौड़ा चाहती है जो उसकी इस प्यास को बुझाए। लेकिन इस इलाके में ऐसा मर्द कहां मिलेगा जो उसे खुश रख सके? वो तो एक रांड की तरह चुदवाने को तैयार है, पर अभी तक कोई ऐसा वर नहीं मिला।”

उनकी पत्नी ने पीछे मुड़कर उन्हें देखा। “तो क्या करें? हमें कोई रास्ता निकालना होगा। वो बेचारी तड़प रही है।”

राम सिंह ने अपनी रफ्तार और बढ़ा दी। उनकी चुदाई अब ज़ोरदार हो गई थीं।

“मैं कोशिश कर रहा हूं। मैंने गांव के कई बड़े परिवारों से बात की है। लेकिन वो सब उसके सामने फीके पड़ते हैं। वो तो एक दरिंदे की तरह चुदवाना चाहती है, और ये समाज उसे एक पवित्रा पत्नी की तरह देखना चाहता है।”

उनकी पत्नी ने दर्द और आनंद में चीख दी। “आह… और जोर से… लेकिन वो तुम्हारी बेटी है… तुम्हें उसकी खुशी के लिए कुछ करना होगा।”

राम सिंह ने अपनी पत्नी की कमर को जकड़ लिया और एक ज़ोरदार धक्का मारा। “मैं कर रहा हूं, रंडी। मैं कर रहा हूं।” वो अपने आप को रोक नहीं पा रहे थे। उनका मन गौरी के बारे में सोचते-सोचते भी अपनी पत्नी की चूत को रौंद रहा था।

तभी अचानक दरवाज़े के पट खुलने की आवाज़ हुई। राम सिंह और उनकी पत्नी ने रुककर देखा। गौरी दरवाज़े पर खड़ी थी। उसका चेहरा उदास था, और वो ज़मीन की तरफ देख रही थी।

लेकिन राम सिंह ने चुदाई नहीं रोकी। वो अपनी पत्नी की चूत में अपना लौड़ा घुसा हुआ ही रखा। उनकी पत्नी ने भी कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई। उनके लिए यह कोई नई बात नहीं थी।

“आ जा, बेटा,” राम सिंह ने सांस भरते हुए कहा, वो धीरे-धीरे अपनी पत्नी को चोद रहे थे। “क्या हुआ? इतनी उदास क्यों है?”

गौरी धीरे-धीरे बिस्तर के पास आई। वो जानती थी कि उसके माता-पिता क्या कर रहे हैं, लेकिन इस परिवार में यह ‘सामान्य’ था। “कुछ नहीं, बाबूसा,” उसने धीरे से कहा। “बस… बहुत उदास हूं।”

राम सिंह ने अपनी पत्नी की गांड पर थपथपाते हुए कहा, “क्या बात है, बेटा? अपनी मां को बता।”

गौरी बिस्तर पर बैठ गई। उसकी आंखों में आंसू थे। “मुझे लगता है कि मेरी शादी नहीं होगी,” उसने रोते हुए कहा। “मैं… मैं बस इंतज़ार कर रही हूं कि कोई मुझे अपना ले… मेरी चूत फाड़ दे… पर वो दिन कभी नहीं आएगा।”

राम सिंह ने अपना लौड़ा अपनी पत्नी की चूत से बाहर निकाला। वो गौरी के पास गए और उसके सिर पर प्यार से हाथ रखा। “अरे बेटा, ऐसी बात नहीं है, तू इतनी सुंदर है… तुझे जल्द ही एक अच्छा वर मिलेगा।”

गौरी ने अपने पिता की आंखों में देखा। “पर बाबूसा, तुम हमेशा यही कहते हो… पर वो दिन कभी नहीं आता,” राम सिंह ने एक पिता के जज्बात के साथ, लेकिन अपने हाथ में थमे हुए अपने खड़े और गीले लौड़े को देखते हुए कहा।

“बेटा, सुन। अभी-अभी मुझे खबर मिली है। जोधपुर के उसी बड़े परिवार से बात बन गई है जिसके बारे में हम सोच रहे थे। उनका लड़का, सुमेर… उसके परिवार वाले तुम्हें देखने आने वाले हैं।”

यह सुनते ही गौरी के उदास चेहरे पर एक चमक आ गई। उसकी आंखें चमक उठीं, जैसे किसी अंधेरे कमरे में दीया जल उठा हो। उसने अपने पिता की तरफ देखा, आशा भरी नजरों से।

“सच बाबूसा? वाकई!… वो मुझे पसंद करेंगे?” गौरी ने पूछा, उसकी आवाज़ कांप रही थी।

“हां, बेटा,” राम सिंह ने उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, और फिर धीरे-धीरे अपना हाथ उसके कंधे से नीचे उसकी पीठ की तरफ ले गए।

“तुम जैसी सुंदरी को कौन पसंद नहीं करेगा? वो तो तुम्हें देखते ही पागल हो जाएंगे।” राम सिंह ने अपना लौड़ा, जो अभी भी उनकी पत्नी के रस से चिकना था, गौरी के चेहरे के पास ले आए।

“और अभी के लिए… तुम्हें चिंता करने की ज़रूरत नहीं। तुम्हें शादी का इंतज़ार करके अपनी इस प्यास को नहीं भुगतना पड़ेगा।”

गौरी ने अपने पिता के उस बड़े लौड़े को देखा। यह उसके लिए अब कोई नई बात नहीं थी। यह उसके लिए एक सुकून की चीज़ थी, जब तक कि उसका अपना पति न आ जाए।

राम सिंह ने अपना लौड़ा गौरी के होंठों के पास रखा और धीरे से दबाव डाला। “अभी के लिए इसे लो, बेटा। यह तुम्हें शांत कर देगा।”

गौरी ने बिना एक भी शब्द कहे, बेहिचक अपने मुंह खोल दिया और अपने पिता का लौड़ा अंदर ले लिया। उसकी आंखें खुशी से चमक रही थीं।

वो उसे चूसने लगी, पहले धीरे-धीरे सिर्फ सुपारी को, और फिर जीभ से उसके तने को चाटने लगी। उसके मुंह से चप… चप… की आवाज़ें आने लगीं।

राम सिंह ने सिर हिलाते हुए अपनी पत्नी को देखा और मुस्कुराए। उनकी पत्नी भी अपनी बेटी को खुश देखकर खुश हो रही थी। उसने अपना शरीर पलटा और गौरी के पास आकर बैठ गई।

उसने अपनी बेटी के बालों में हाथ फेरा और प्यार से बोली, “हां बेटा, जल्दी ही तुम्हारी चूत भी फटेगी। तुम्हारा पति तुम्हें रोज़ चोदेगा, बिल्कुल वैसे ही जैसे तुम्हारे बाबूसा मुझे चोदते हैं।”

गौरी अपने पिता के लौड़े को मुंह में भरे हुए अपनी मां की तरफ देखा। उसकी आंखों में एक सवाल था। उसने लौड़ा कुछ देर बाहर निकाला और मुस्कुराते हुए पूछा, “सच माँ? वो वाकई मुझे… मुझे रोज़ चोदेंगे? मेरी चूत को…?”

“हां बेटा,” उसकी मां ने उसके सिर को अपने हाथो से दबाते हुए कहा। “और अभी के लिए… तुम अपने बाबूसा का लौड़ा चूसो। यह तुम्हें तैयार करेगा।” उसने गौरी के सिर को धीरे से राम सिंह की तरफ धकेल दिया।

गौरी फिर से उसे चूसने लगी, इस बार और ज़ोर से। वो उसे गले तक उतारने की कोशिश कर रही थी। राम सिंह के मुंह से भी एक कामुक सिसकारी निकल गई। “आह… बेटा… तू तो बड़ी माहिर हो गई है।”

राम सिंह ने अपना लौड़ा गौरी के मुंह से बाहर खींचा और उसे खड़ा किया। उन्होंने गौरी को कुतिया बनने का इशारा किया। “चल बेटा, अब तू घुटनों के बल बैठ जा।”

गौरी झट से बिस्तर पर घुटनों के बल बैठ गई और अपना भारी लहंगा अपनी कमर तक उठा लिया। उसकी गोरी-गोरी, भरी हुई गांड राम सिंह के सामने नंगी हो गई।

राम सिंह ने अपना थूक अपनी उंगलियों पर लिया और गौरी की गांड के छेद पर लगा दिया।

गौरी ने खुशी से एक हल्की सी किलकारी भरी। वो जानती थी कि अब क्या होने वाला है। उसने अपनी गांड पीछे की तरफ उछाली, जैसे वो उसके लौड़े को मचल रही हो।

उधर, उसकी मां ने खुद को गौरी के सामने ऐसे सेट किया कि उसकी चूत गौरी के चेहरे के सामने थी। उसने अपनी टांगें चौड़ी कर लीं और अपनी उंगलियों से अपनी चूत को खोल दिया। “चल बेटा, अपनी मां की भी सेवा कर।”

गौरी ने अपना चेहरा नीचे किया और अपनी मां की चूत पर अपनी जीभ लगा दी। वो उसे चाटने लगी, जैसे एक भूखी बिल्ली दूध चाटती है।

तभी पीछे से राम सिंह ने अपना मोटा लौड़ा गौरी की गांड के छेद पर रखा और एक ज़ोरदार धक्का मारा। गौरी के मुंह से एक दर्द भरी सिसकारी निकली, पर वो रुकी नहीं।

“आह… बाबूसा… मार दिया…” उसने अपनी मां की चूत से मुंह उठाकर कहा, लेकिन उसकी मां ने उसका सिर वापस अपनी चूत पर दबा दिया।

“चुप कर चुदाई कर, रंडी,” उसकी मां ने कहा, जिसमें मादकता और प्यार दोनों था। “आह… हां बेटा… ऐसे ही चाट… और पीछे तेरे बाबूसा तेरी गांड का भोसड़ा बना रहे हैं… जल्दी ही तेरे पास अपना खुद का लौड़ा होगा…”

राम सिंह अब तेज़ी से गौरी की गांड मारने लगे। उनका लौड़ा उसकी टाइट गांड को रौंद रहा था। गौरी का पूरा शरीर आगे-पीछे होने लगा। वो अपनी मां की चूत चाट रही थी और अपने पिता के लौड़े का मज़ा ले रही थी।

उसके चेहरे पर दर्द और सुख का भाव था। वो जानती थी कि जल्द ही उसकी यह तपिश शांत हो जाएगी, लेकिन अभी के लिए यह उसके लिए सब कुछ था।

राम सिंह अब अपनी पूरी ताकत झोंक रहे थे। उनका मोटा, लाल लौड़ा गौरी की टाइट गांड के छेद को एक भूखे जानवर की तरह फाड़ रहा था।

थप… थप… थप… की आवाज़ पूरे कमरे में गूँज रही थी, जैसे कोई गीली चमड़ी को कोड़े से पीट रहा हो। गौरी की गांड अब तक इतनी लाल और सूजी हुई थी कि वो एक सेब जैसी दिख रही थी।

“आह… बाबूसा… और जोर से… फाड़ दो मेरी गांड… आह!” गौरी चीख रही थी, पर उसका मुँह अपनी माँ की चूत में दबा होने की वजह से उसकी आवाज़ दबी-दबी सी आ रही थी।

उधर उसकी माँ भी अपनी सीमा के पार पहुँच चुकी थी। बेटी के मुँह का गर्म साँस और जीभ की रगड़ने ने उसे पागल कर दिया था। उसने अपनी टांगें और कस दीं और गौरी के मुँह पर अपना पूरा रस छोड़ दिया।

वह फुहार की तरह गौरी के चेहरे पर बह निकली। गौरी ने अपनी माँ का वो पतला, गर्म रस पूरी तरह से पी लिया, एक प्यासी यात्री की तरह जो मरुस्थल में पानी पाता है।

“हाय… माँ… यह क्या पिला दिया…” गौरी ने अपना चेहरा उठाते हुए कहा, उसके चेहरे पर उसकी माँ का रस चमक रहा था।

तभी पीछे से राम सिंह ने एक ज़बरदस्त गर्जना की—”आह… ले रंडी… ले मेरा माल!” और उन्होंने अपना लौड़ा गौरी की गांड से बाहर निकाला।

वह टप-तप करके गौरी की गांड के छेद पर और उसकी पीठ पर झड़ने लगा। गाढ़ा, गर्म और चिपचिपा वीर्य गौरी की लाल चमड़ी पर फैल गया।

कमरे में सेक्स और पसीने की गंध भर गई थी।

राम सिंह हांफते हुए पीछे हट गए। गौरी ने अपनी गांड की तरफ पीछे मुड़कर देखा। उसकी गांड से उसके पिता का वीर्य बाहर लपक रहा था।

उसकी माँ, जो अभी भी एक झटके में थी, चौकन्नी माँ की तरह झपटी और गौरी की गांड को चाटने लगी। वो अपने पति के गाढ़े वीर्य को अपनी बेटी की गांड से चाट-चाटकर साफ कर रही थी, जैसे वो कोई अमृत हो।

गौरी ने अपना ध्यान अपने पिता की तरफ बढ़ाया। राम सिंह का लौड़ा अभी भी खड़ा था, और उस पर उनके वीर्य और गौरी की गांड के मैल का मिश्रण लगा था।

गौरी बिना एक पल भी सोचे, एक भूखी भेड़िए की तरह उस पर टूट पड़ी। उसने उस गंदे लौड़े को अपने मुँह में भर लिया।

चप… चप… वो उसे चूसने लगी। उसके मुँह में उसकी खुद की गांड का कड़वा स्वाद और उसके पिता के वीर्य का नमकीन स्वाद घुल रहा था। वो उसका स्वाद लेती हुई उसे गले तक उतारने की कोशिश कर रही थी।

राम सिंह ने खुशी से अपनी आँखें बंद कर लीं और गौरी के बालों में अपने हाथ फेरे। “हाँ बेटा… चाट ले… सबकुछ खा जा…”

गौरी ने अचानक चूसना रोक दिया और अपने पिता की आँखों में देखा। उसकी आँखों में एक उलझन और एक गहरी सी खुशी थी।

“बाबूसा… एक बात बताओ…” उसने धीरे से पूछा, अपनी जीभ से अपने होंठों को चाटते हुए।

“आप मुझे रोज़ ऐसे ही चोदते हो… गांड मारते हो, मुँह में डालते हो… फिर आप मेरी चूत को क्यों नहीं छूते? मेरी सील… मेरी कौमार्य को आप क्यों नहीं तोड़ते?”

यह सवाल सुनकर कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। गौरी की माँ, जो उसकी गांड चाट रही थी, रुक गई।

उसने राम सिंह की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक माँ की चिंता थी, लेकिन साथ ही उसमें एक गहरा रहस्य भी छुपा था।

राम सिंह ने गौरी का चेहरा अपने हाथों में लिया। उन्होंने उसके माथे पर एक पिता का प्यार भरा चुंबन दिया।

“अरे बेटा… तू इतनी क्यों सोचती है?” उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा।

“देख, बेटा… यह सब इतना आसान नहीं है। मैं तुझे चोदता हूँ, तुझे खुश करता हूँ… यह मेरे और तेरे बीच का एक खास रिश्ता है। एक पिता की तरह मैं तेरी हर भूख को मिटाता हूँ।”

वो थोड़ा रुके और गौरी को अपने बिस्तर पर बैठा लिया। उनकी पत्नी भी उनके पास आकर बैठ गई। तीनों एक-दूसरे के नंगे और पसीने से तर-बतर शरीरों से चिपके हुए थे।

“पर तेरी चूत… वो अलग है, बेटा,” राम सिंह ने गंभीर होकर कहा। “यह हमारी भारतीय संस्कृति है। यह हमारे राजपूती सम्मान की बात है। एक कुंवारी लड़की की सील उसके पति के लिए बची होती है।

सुहागरात को जब उसका पति उसकी चूत फाड़ता है, तो उसमें जो खून निकलता है… वो उस रिश्ते की पवित्रता है।”

गौरी उनकी बातें ध्यान से सुन रही थी, उसके हाथ में अभी भी राम सिंह का लौड़ा था, जिसे वो सहला रही थी।

“अगर मैं आज तेरी चूत फाड़ दूं, तो कल जब सुमेर तुझसे सुहागरात मनाएगा, तो उसे क्या मिलेगा?” राम सिंह ने पूछा। “वो खुश नहीं होगा। वो सोचेगा कि तू उससे पहले किसी और की रंडी रह चुकी है।

एक पति को अपनी पत्नी पर भरोसा होना चाहिए। और वो भरोसा तभी बनता है जब वो जाने कि तू सिर्फ उसकी है, उसके लिए तूने अपना सब कुछ बचाया है।”

गौरी धीरे-धीरे सिर हिलाई। उसे अपने पिता की बात में तर्क सूझ रहा था।

“सच बात है बाबूसा,” उसने मानते हुए कहा, जबकि वो अभी भी उनके लौड़े को अपने हाथों में सहला रही थी। “सुमेर जी को अपनी पत्नी पर गर्व होना चाहिए। वो खुश होंगे ये जानकर की में सिर्फ उनके लिए बनी हूँ।”

वो थोड़ा रुकी, उसकी आँखों में एक चालाकी और कामुकता थी। “पर बाबूसा… अगर वो मेरी सील तोड़ देंगे… तो उसके बाद? मेरी शादी के बाद… क्या तुम मेरी चूत को छू सकोगे? क्या तुम मुझे उस रूप में भी चोद पाओगे?”

राम सिंह और उनकी पत्नी ने एक-दूसरे की तरफ देखा। उनके चेहरों पर एक ऐसी मुस्कान थी जो इस परिवार की गहरी और गंदी गुप्त परंपरा को बयान करती थी। वो मुस्कुराए, जैसे उन्होंने एक साजिश रच ली हो।

“हाँ, बेटा,” राम सिंह ने गौरी के गालों पर चुंबन देते हुए कहा। “अगर तू चाहे, तो हम सब कुछ कर सकते हैं। पर एक शर्त है…”

गौरी उत्सुकता से पूछी, “क्या शर्त?”

राम सिंह ने अपनी पत्नी की तरफ इशारा किया, जो अपनी बेटी के कंधे पर सिर रखे हुए थी। “अगर तेरा वो सुमेर… अगर वो भी हमारी इस ‘पारिवारिक परंपरा’ में शामिल हो जाए, तो बात बन जाती है।”

उनकी आवाज़ में एक भारी कामुकता थी। “हमारे यहाँ पति-पत्नी का रिश्ता सिर्फ दो लोगों तक सीमित नहीं होता। यह तो सिर्फ शुरुआत होती है।”

उनकी पत्नी ने हँसते हुए कहा, “हाँ बेटा। जब तू यहाँ से वहाँ जाएगी, तो अपने साथ हमारी इस मिट्टी की खुशबू भी ले जाना। सुमेर को भी सिखाना कि एक राजपूत औरत को कैसे खुश रखा जाता है।

और अगर वो तुम्हें यहाँ लाकर हमसे भी चुदवाने दे, तो कोई बड़ी बात नहीं। यह तो शगुन माना जाएगा।”

गौरी इन बातों को सुनकर एकदम से खिल उठी। उसके चेहरे पर एक विजेता का भाव था। वो अपने माता-पिता के बीच में बैठी, अपने दोनों हाथों से उन्हें अपनी ओर खींचा। उसका नंगा, गीला शरीर उनके नंगे शरीरों से टकरा रहा था।

“मैं इसे ज़रूर इस परंपरा के बारे में उनको मनाउंगी दूँगी,” गौरी ने एक दृढ़ संकल्प के साथ कहा। उसकी आँखों में एक नई चमक थी।

“मैं सुनिश्चित करूँगी कि सुमेर हमारी इस परिवारिक परंपरा का हिस्सा बन जाए। शादी के बाद मैं उसे यहाँ लाऊँगी… और हम सब मिलकर… हम सब मिलकर वही करेंगे जो हम आज कर रहे हैं।”

वो अपने पिता के लौड़े को चूमा और फिर अपनी माँ की चूत को सहलाते हुए बोली, “मैं अपनी इस खूबसूरत कहानी को आगे बढ़ाऊँगी। चाहे कुछ भी हो जाए, मैं अपने परिवार की इस गौरवशाली परंपरा को कायम रखूँगी।”

“हाँ बेटा, पर एक बाद याद रखना” राम सिंह ने गौरी की चूची को पकड़ते हुए बोला,

“क्या बाबूसा?”

“हमारे परिवार की पकड़ इस इलाके में थोड़ी कम होती जा रही है, इसीलिए सुमेर के साथ तेरी शादी किसी भी हालत में होनी ही चाहिए!”

“ऐसी क्या मज़बूरी है बाबूसा?”

तभी गौरी की माँ ने राम सिंह का लौड़ा अपने मुह से निकाला और बोली ,

“सुमेर और उसका परिवार आर्थिक रूप से सधन है , काफी ज़मीन जायदाद है, अगर उनके परिवार से हमारे परिवार का मिलन हो जाये, तो हमारी भी हालत में बदलाव आ जायेगा”

“तो मुझे क्या करना होगा?”

“अरे तू कुछ ज्यादा मत सोच!..तू बस सुमेर को खुश कर …और उसे अपना जलवा दिखा” राम सिंह ने बेटी के स्तनों के साथ खेलते हुए , उसे इशारा किया.

“तुझे उस हवेली पर अपनी पकड़ बनानी है”

“ठीक है बाबूसा मैं ऐसा ही करूंगी”..ये कहते हुए गौरी ने अपने पापा को एक गहरा चुबन दिया ..

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