राजेश सोफे से उठा और उसने फिर से म्यूज़िक चालू कर दिया – वही तेज़, धड़कता हुआ बीट वाला गाना जो रात भर बज रहा था।
कमरे में फिर से संगीत गूँजने लगा और वे सब फिर से नाचने लगे – नग्न, पसीने से चमकते, वीर्य और बीयर से सने हुए।
आधी रात हो चुकी थी – बाहर का अंधेरा गहरा हो गया था, मगर कमरे में वियाग्रा और शराब का असर अभी भी जारी था।
वे सब रुकने वाले नहीं थे। पार्टी अभी भी जारी थी – और जैसे-जैसे रात गहरी होती गई, उनकी इच्छाएँ और उनके काम और भी गहरे, और भी काले होते गए।
पूजा अब बाकी मर्दों के लिए सिर्फ एक सेक्स ऑब्जेक्ट बन चुकी थी।
वे उसे बिना किसी चेतना के, बिना किसी परवाह के चोद रहे थे – एक सर्कल में घूमते हुए, उसे इधर से उधर धकेलते हुए।
बीच नाच में कोई उसकी गांड चोदता, तो अचानक कोई और उसे खींचकर अपने लंड पर बिठा लेता और उसका मुँह चोदने लगता।
फिर कोई तीसरा आकर उसकी चूत में घुस जाता। कोई तालमेल नहीं था – सिर्फ एक जंगली, आदिम भूख थी।
जब किसी को पेशाब करने की ज़रूरत होती, तो वे पूजा को बाथरूम में खींच ले जाते – वे उसके मुँह में पेशाब करते और उसे निगलने का आदेश देते।
पूजा ने एक या दो बार उल्टी की – उसका शरीर अब इतना सब कुछ सहन नहीं कर पा रहा था, मगर वह फिर भी बाकियों की तरह बीयर पीती रही।
वह उनकी पूरी रंडी बन चुकी थी – उनकी इच्छाओं की गुलाम, उनके शरीरों का खिलौना।
धीरे-धीरे, एक-एक करके, वे सब उसी नग्न अवस्था में लिविंग रूम में सो गए – फर्श पर, सोफे पर, एक-दूसरे के ऊपर गिरे हुए।
उनके शरीर आपस में उलझे हुए थे, उनकी साँसें धीमी हो गई थीं, और कमरे में सिर्फ खर्राटों की आवाज़ें और वीर्य-बीयर की बदबू रह गई थी।
सुबह छह बजे, राजेश का अलार्म बजा – वह तेज़, कर्कश आवाज़ जो सुबह की सन्नाटे को चीर गई।
राजेश ने किसी तरह हाथ बढ़ाकर उसे बंद किया, मगर फिर अचानक उसे याद आया कि आज काम का दिन है।
वह तुरंत उठा और सबको जगाने लगा – “अरे उठो! देर हो रही है!”
सब धीरे-धीरे जाग रहे थे – अपनी आँखें रगड़ते हुए, अपने शरीरों को समेटते हुए। वे सब नग्न थे – फर्श पर, सोफे पर, एक-दूसरे से टकराते हुए।
और तभी पूजा ने देखा कि मयूर का लंड अभी भी उसकी गांड में था – पूरी रात वहीं था, उसके अंदर।
पूजा ने मयूर को धक्का देते हुए कहा, “मयूर, उठो… हटो।” मगर फिर उसने देखा कि उसका लंड अभी भी अंदर है – “हे भगवान, यह अभी भी सख्त कैसे है?”
शेखर, जो अब तक जाग चुका था, यह देखकर हँसा – “लगता है वियाग्रा अभी भी मयूर के लंड में काम कर रहा है।”
मयूर भी जाग गया – उसने अपनी आँखें मलीं, अपने लंड को पूजा की गांड से बाहर निकाला। एक गीली, चूसने वाली आवाज़ आई जैसे लंड छेद से बाहर आ रहा हो।
उन्होंने चारों ओर देखा – लिविंग रूम पूरी तरह से तबाह हो चुका था। बीयर की बोतलें हर जगह पड़ी थीं – कुछ टूटी हुई, कुछ लुढ़कती हुई।
चिप्स और नमकीन के पैकेट फर्श पर बिखरे हुए थे। कपड़े इधर-उधर फेंके हुए थे। और पूरे कमरे में पेशाब, वीर्य और बीयर की बदबू भरी हुई थी – एक गंदी, जंगली, जानवरों जैसी बदबू।
मोहित ने आदेश दिया – उसकी आवाज़ में एक अधिकार था, “चलो दोस्तों, यह रूम पूरी तरह बर्बाद है। हमें इसे जल्दी साफ करना होगा क्योंकि ऑफिस के लिए देर हो रही है।”
सब उठ गए – थके हुए, सुस्त, मगर फिर भी काम पर लग गए। उन्होंने बोतलें उठाईं, कपड़े समेटे, फर्श को पोंछा।
फिर एक-एक करके वे बाथरूम में गए – नहाए, अपने आप को साफ किया। उनके शरीर पूरी तरह से थक चुके थे – उनकी मांसपेशियों में दर्द था, उनकी आँखें लाल थीं।
पूजा अजीब तरह से चल रही थी – उसके फैले हुए, सूजे हुए छेदों के कारण उसकी चाल में एक अजीब सी झूलन थी। हर कदम के साथ वह थोड़ा लड़खड़ाती, मगर वह हँस रही थी।
जब सब तैयार हो गए, शेखर और पूजा अपने सभी दोस्तों और सहकर्मियों को विदा करने के लिए दरवाजे तक गए – मोहित, निखिल, राजेश, अनिकेत, मयूर।
शेखर ने कहा, उसकी आवाज़ में एक गहरी कृतज्ञता थी, “दोस्तों, यह बहुत मज़ेदार था। हम दोनों तुम्हारे बहुत आभारी हैं। तुमने हमारी शादी बचा ली।”
पूजा ने भी उन्हें नमस्कार किया – उसके चेहरे पर एक गर्म, संतुष्ट मुस्कान थी।
मोहित ने मुस्कुराते हुए कहा, “अरे तुम दोनों, हमें धन्यवाद मत दो। यह तो दोस्ती का फर्ज़ था… आखिरकार, तुम हमारी भाभी हो।”
और उसने पूजा के छोटे, गोल नितंबों को अपने हाथों में दबोच लिया – एक तेज, मज़ाक भरी निचोड़।
सब जोर से हँसे।
मयूर ने पूछा, “क्या तुम दोनों ऑफिस नहीं आ रहे?”
शेखर ने जवाब दिया, “नहीं, हम दोनों ने पहले ही छुट्टी ले ली है।”
पूजा ने कहा, उसकी आवाज़ में एक चंचलता थी, “वादा करो तुम सब – तुम सब जल्दी शादी करो और फिर हम एक बड़ी सामुहिक चुदाई की पार्टी करेंगे।”
निखिल ने जवाब दिया, उसकी आँखों में एक चमक थी, “बेशक भाभी!।”
वे सब चले गए – एक-एक करके, अपनी गाड़ियों में बैठते हुए, हँसते हुए, लहराते हुए।
अब कमरे में सिर्फ शेखर और पूजा थे – दोनों एक मिनट के लिए चुपचाप बैठे रहे।
कमरे में एक शांति थी, एक संतुष्टि थी, उन्होंने जो कुछ अनुभव किया था उसकी एक गहरी तसल्ली थी।
तभी अचानक पूजा ने पूछा, “तुम मुझे कुछ बता रहे थे – जब मैं पेशाब निगल रही थी तब तुम्हारे मन में कुछ था। वह क्या है?”
शेखर ने थोड़ी हिचकिचाहट के साथ कहा,
“ओह, वह… हाँ। वो मैं सोच रहा था… ऐसा लगता है कि तुम्हें यह सब बहुत पसंद आया – दूसरे मर्दों के साथ भी।
तो मैं सोच रहा था… क्या हम तुम्हारी इस विशेष कला का उपयोग अपने करियर के वित्तीय लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कर सकते हैं?”
पूजा ने एक नटखट मुस्कान और शैतानी आँखों से उसकी तरफ देखा – “तुम्हारे मन में क्या है?”
“ओह, कुछ नहीं… बस… तुम्हें हमारे बॉस के बारे में पता है? वह तुम्हें कैसे देखता है?”
“हम्म… चलो देखते हैं। खैर, यह विचार बुरा नहीं है।”
“हाँ, मेरा मतलब है, अगर तुम ऐसा करने में सहज हो…”
“बिल्कुल, मैं अब सहज हूँ। अगर तुमने अपनी बीमारी से पहले मुझसे ऐसा करने के लिए कहा होता, तो मैंने कभी ऐसी चीज़ों की कल्पना भी नहीं की होती।”
“पर मैंने देखा कि तुमने बहुत मज़ा लिया और कुछ नई बातें सीखी।”
“बेशक मैंने बहुत मज़ा लिया, जानू। यह मत सोचो कि मैं तुम्हें बता रही हूँ कि मुझे यह पसंद नहीं आया और मैंने तुम्हारे लिए ऐसा किया – ऐसा नहीं है।
मगर, क्या है,..ना ..अब कैसे समझाऊ?…चलो छोडो उस बात को। चलो अपनी नई ज़िंदगी पर ध्यान दें… तुम क्या कह रहे थे? क्या मुझे हमारे बॉस को फुसलाना चाहिए?”
“हाँ, ठीक यही मैं सोच रहा था।”
पूजा ने सोचा, “हम्म… देखते हैं… मगर शेखी, मुझे एक बात बताओ।”
“क्या?”
“तुम्हें यह कैसा लगा… मेरा मतलब है, क्या तुम्हें वाकई पसंद आया कि तुम्हारी पत्नी को तुम्हारे सामने लोग चोद रहे थे?”
पूजा ने पूछा, उसकी आवाज़ में एक गंभीरता थी, मगर उसकी आँखों में कोई शर्म नहीं थी।
शेखर ने एक गहरी साँस ली – उसकी आँखों में एक स्वीकारोक्ति थी, एक सच्चाई जो वह अब तक किसी से नहीं कह पाया था।
“ईमानदारी से कहूँ तो… मुझे मज़ा आ रहा था। मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि यह भावना इतनी शक्तिशाली होगी।”
पूजा ने एक मुस्कान के साथ कहा, “हाँ, वो शक्तिशाली तो थी। इतनी की उसने तुम्हारे लंड को खड़ा कर दिया, जहाँ कोई दवा काम नहीं कर रही थी।”
दोनों जोर से हँसे – उनकी हँसी कमरे में गूँजी, एक साझा रहस्य की तरह।
पूजा ने उठने की कोशिश की, मगर उसके पैरों में ताकत नहीं थी। वह लड़खड़ाई – उसकी जाँघों के बीच का दर्द उसे साफ महसूस हो रहा था।
शेखर ने उसे पकड़ा, “आराम से… आराम से…” उसकी आवाज़ में कोमलता थी।
दोनों उसकी हालत पर हँसे – पूजा की चाल में एक अजीब सी लड़खड़ाहट थी, जैसे कोई बच्चा चलना सीख रहा हो।
“चलो थोड़ी नींद लेते हैं और आराम करते हैं, जानू।
शेखी, क्या तुम मेरी पीठ के निचले हिस्से और जाँघों की मालिश करोगे? तुम्हारे दोस्तों ने मुझे पैरों के बीच से लगभग फाड़ दिया! मेरे दोनों छेद सूज गए हैं।”
शेखर ने हँसते हुए उसे सही किया, “अरे, वे सिर्फ मेरे दोस्त नहीं थे – वे हमारे सहकर्मी है! याद है?”
“हाँ हाँ… जो भी हो…” पूजा ने अपनी आँखें घुमाते हुए कहा।
और वे दोनों बेडरूम की तरफ चल दिए – शेखर ने पूजा की कमर को पकड़ा, उसे सहारा दिया, उसके हर कदम के साथ अपनी बाँहों को समायोजित किया।
पूजा का सिर उसके कंधे पर टिका हुआ था, उसकी साँसें धीमी थीं, उसकी आँखें थकान से भरी हुई थीं।