बेटे ने बुझाई अपनी हवस की प्यास – पार्ट १

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बोरीवली की उस पुरानी चाल में हवा का एक हल्का झोंका भी आता तो दीवारों से लगी लकड़ी की शटर खटखटाती थीं।

सुबह के पाँच बजे थे और चाल के सामान्य नल से पानी भरने की लाइन पहले से ही लगी हुई थी। सरला अपनी ताँबे की बाल्टी लिए खड़ी थी, अपनी साड़ी के पल्लू को सिर पर सटाकर।

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उम्र बयालिस साल थी, लेकिन उसकी काया ने अभी तक हार नहीं मानी थी। वो उन औरतों की तरह फूली हुई नहीं थी जो उम्र के इस पड़ाव पर अपने शरीर को भुला देती हैं।

बल्कि, उसके शरीर में एक तरह का ज़िद्दी नक्शा बचा हुआ था – उसका शरीर ऊपर और नीचे से भरा हुआ, लेकिन कमर पतली थी।, जिस पर ज़िंदगी की मेहनत ने कुछ मुलायम, स्त्रील गद्दे चढ़ा दिए थे।

उसकी चोली, जो सादे सूती कपड़े की थी, उसके भरे हुए दूधों को सहलाती हुई सी लगती, हर साँस के साथ उठती-गिरती।

साड़ी का मोटा कपड़ा भी उसकी चौड़ी, मजबूत जाँघों और गोल गांड के मोड़ों को पूरी तरह छिपा नहीं पाता था। उसके बाल, जिनमें चाँदी के तार अभी बिखरने लगे थे, एक ढीली-सी चोटी में बँधे थे।

पानी भरकर वो अपने कमरे में लौटी। कमरा… यह शब्द ही उस छोटी सी जगह के लिए एक उदारता थी।

बारह बाई दस का वो आयताकार स्थान उन तीनों की दुनिया था – शयनकक्ष, बैठक, अध्ययन कक्ष, सब कुछ। एक तरफ रसोई थी, और उससे सटा हुआ एक छोटा सा बाथरूम।

कमरे के बीचों-बीच, एक दीवार से दूसरी दीवार तक, एक पतली सी रस्सी बँधी हुई थी। उस पर पुराने साड़ी के कपड़े, एक चादर और कुछ तौलिये टाँगे हुए थे। यह उनकी नई ‘प्राइवेसी अरेंजमेंट’ थी।

अरुण अब बड़ा हो चला था, उन्नीस साल का। उसके और उसके माँ-बाप के बीच अब एक दृश्य, कपड़े का परदा खिंच गया था।

“अरुण, उठ जा बेटा। कॉलेज के लिए लेट हो जाएगा,” सरला ने रस्सी के दूसरी ओर, फोल्डिंग बेड-सोफे पर पड़े अपने बेटे से कहा। आवाज़ में वो ममता थी जो सुबह-सुबह की हड़बड़ी में भी नहीं घुलती थी।

अरुण करवट बदलकर सोया रहा। पतला-दुबला शरीर, चेहरे पर किशोरावस्था के आखिरी दाने, और आँखों के नीचे हल्के-से निशान।

वो शर्मीला लड़का था, अपने पिता प्रकाश की तरह ऊँचा-चौड़ा या गंभीर नहीं। उसकी दुनिया किताबों और अपने ही विचारों तक सीमित थी।

पर अब उसकी दुनिया में एक नया कोलाहल शुरू हो चुका था – उभरती जवानी का कोलाहल।

उसकी नींद में भी अब अजीब चित्र आने लगे थे, और जागने पर पहली चीज़ जो उसकी नज़रों के सामने आती, वो होती थी रस्सी पर टँगे कपड़ों के पर्दे के पार से झाँकता हुआ एक धुँधला सा साया… अपनी माँ का।

प्रकाश, उनतालीस साल के, पहले ही तैयार होकर चाय की प्याली सिप कर रहे थे। उनका चेहरा गंभीर था, आँखों के आसपास थकान के गहरे घेरे।

“आज एमएलए साहब की मीटिंग है मलाड में। देर हो सकती है,” उन्होंने सरला से कहा, बिना आँख उठाए।

प्रकाश उस इलाके के एमएलए के यहाँ एक हेल्पर थे – एक ऐसा पद जो नौकरी से ज़्यादा एक सेवा थी, जिसकी मजदूरी महानगर की महँगाई के आगे बौनी पड़ जाती थी।

फिर भी, राजनीति की रोशनी में जीने का एक छोटा-सा अहसास, एक छाया-सा सम्मान, उन्हें इस जीवन से बाँधे हुए था।

“ठीक है। टिफिन रखा है बैग में,” सरला ने कहा, अपने पति की कमीज़ के कॉलर को ठीक करते हुए। एक पल के लिए उसकी उँगलियाँ उसके कंधे पर रुकीं।

प्रकाश ने उसकी ओर देखा, एक सूखी-सी मुस्कान उनके होठों पर आई और फिर तुरंत लुप्त हो गई। यही उनका रोमांस था – एक नज़र, एक स्पर्श, और फिर दिनभर की दौड़ के लिए विदा।

अरुण उठ बैठा। उसकी नज़र अनजाने ही उस पर्दे की तरफ गई, जहाँ सरला अब अपने बाल खोलकर कंघी कर रही थी।

पतले कपड़े के पर्दे के पार, उसकी भुजाओं का उठना, उसके दूधों का हिलना, गर्दन का मोड़… एक बिजली-सी लहर अरुण की रीढ़ से होती हुई नीचे तक उतर गई।

उसने तुरंत अपनी नज़रें फर्श पर गड़ा दीं। मन में एक गहरी शर्म और ग्लानि की लहर उठी। ये क्या सोच रहा हूँ मैं? वो मेरी माँ है… लेकिन उसका शरीर, उसका यौवन, उसकी बात नहीं सुन रहा था।

वो एक भूख थी, एक जिज्ञासा थी, जो तर्क और नैतिकता को निगल जाती थी।

सरला ने फिर से साड़ी का पल्लू कमर पर फसाया। “जल्दी कर, नहीं तो ब्रेकफास्ट ठंडा हो जाएगा।”

कॉलेज जाने से पहले का समय हमेशा की तरह एक साधारण उथल-पुथल था। अरुण ने चुपचाप पराठे खाए, अपनी माँ से आँख मिलाने से बचता हुआ।

जब वो उसका टिफिन देने आई, तो उसकी उँगलियाँ एक पल के लिए उसकी उँगलियों से छू गईं। उस स्पर्श में एक गर्मी थी, एक कोमलता थी, जिसने अरुण के अंदर एक अश्लील कल्पना को हवा दे दी।

वो तुरंत उठ खड़ा हुआ, बैग उठाया और बिना कुछ कहे दरवाज़े की ओर बढ़ गया।

“शाम को सीधे घर आना, बाज़ार से मिर्च लेते आना,” सरला ने कहा, दही के कटोरे को सँभालते हुए।

“हाँ, माँ,” अरुण ने पीछे मुड़कर जवाब दिया। उस पल उसकी नज़र अनचाहे ही उस पर टिक गई।

सुबह की धूप खिड़की से आकर सीधे उस पर पड़ रही थी, उसकी साड़ी के पारदर्शी होते हुए कपड़े में से उसकी टाँगों का आकार झलक रहा था, उसकी कमर का मोड़, उसके दूधों का भार… अरुण ने गला सूखता हुआ महसूस किया।

वो तेज़ी से मुड़ा और सीढ़ियों से नीचे भाग गया, मानो कोई भूत उसका पीछा कर रहा हो।

पूरा दिन कॉलेज में उसका दिमाग उसी एक छवि में उलझा रहा। लेक्चर के दौरान, दोस्तों से बात करते हुए, लाइब्रेरी में बैठे-बैठे… उसकी आँखों के सामने वही धुँधला साया नाचता रहता।

उसे अपने ऊपर गुस्सा आ रहा था, घृणा हो रही थी। पागल हो गया हूँ क्या? ये गुनाह है… लेकिन फिर एक और आवाज़, गहरी, कामुक, कहती – औरत है वो… एक खूबसूरत औरत। जिस्म की भूख कोई गुनाह थोड़े ही है।

दोपहर ग्यारह बजे के करीब वो घर लौटा। चाल में दिन के इस वक्त एक सन्नाटा छाया रहता था। मर्द काम पर, औरतें किचन में या झपकी ले रही होतीं। उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।

अंदर घुसते ही उसने सुना – बाथरूम से पानी की आवाज़। माँ नहा रही थी। पर्दा खिंचा हुआ था, लेकिन बाथरूम का दरवाज़ा, जो किचन में खुलता था, बंद नहीं था।

पानी की फुहारों की आवाज़ साफ आ रही थी। अरुण वहीं खड़ा रह गया, जैसे जड़वत हो गया हो। उसकी साँसें रुक-रुककर चलने लगीं। कानों में खून की धड़कन सुनाई देने लगी।

उसकी कल्पना ने एक जीवंत चित्र बना दिया – गीले शरीर पर पानी की धाराएँ, भीगे बाल, साबुन के झाग… उसने अपनी आँखें बंद कर लीं, मन ही मन खुद को कोसते हुए।

लेकिन उसका शरीर बगावत कर चुका था। उसकी पैंट में एक तनाव, एक कसाव आ गया था, जिसे नज़रअंदाज करना नामुमकिन था।

पानी की आवाज़ रुकी। कुछ पलों की ख़ामोशी। फिर बाथरूम का दरवाज़ा खुलने की आवाज़। अरुण की आँखें फटी की फटी रह गईं। सरला, बस एक तौलिए में लिपटी हुई, बाथरूम से निकली।

उसके बाल पीठ पर भीगे हुए लटक रहे थे, पानी की बूँदें उसके कंधों से होती हुई उसकी छाती की ओर सरक रही थीं।

तौलिया उसके दूधों को ढँक रहा था, लेकिन उसकी गोल गांड और मोटी जाँघों का ऊपरी हिस्सा बाहर था। त्वचा पर पानी की चमक, गर्म पानी से भाप-सी उठती हुई…

सरला ने उसे देखा। उसकी आँखों में एक पल के लिए हैरानी तैर गई, फिर वो शर्म से लाल हो गई। उसने तौलिए को कसकर पकड़ लिया। “अरुण! तू… तू कब आ गया? कुछ बोला क्यों नहीं?”

अरुण कुछ बोल नहीं पा रहा था। उसका गला सूख चुका था। उसकी नज़रें उसके चेहरे से हटकर उसके गीले कंधों पर, फिर जमीन पर गिर गईं। उसने एक गहरी साँस ली। “अभी… अभी आया हूँ, माँ।”

“ऐसे चुपचाप खड़ा क्यों है? जा… जा अपना बैग रख आ। मैं… मैं कपड़े पहनती हूँ,” सरला की आवाज़ में एक हल्की कंपकंपी थी। वो तेज़ी से उस पर्दे के पीछे की ओर बढ़ी, जो उनके सोने की जगह को अलग करता था।

अरुण बैग लेकर अपने कोने में गया, जहाँ उसका बेड कम सोफा था। उसके हाथ काँप रहे थे।

उसके मन में भावनाओं का एक तूफ़ान था – शर्म, अपराधबोध, लेकिन उस सबसे ऊपर, एक जलती हुई इच्छा, जो अब उसकी आँखों के सामने एक जीवित, साँस लेती हुई वास्तविकता बनकर आ गई थी।

वो तस्वीर उसकी आँखों के सामने से हटने का नाम नहीं ले रही थी – गीला शरीर, लिपटा हुआ तौलिया, शर्म से लाल हुआ चेहरा…

पर्दे के पीछे से कपड़ों की सरसराहट की आवाज़ आ रही थी। अरुण ने अपने दाँतों से होंठ काट लिया। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि अब आगे क्या होगा।

उसकी दुनिया, उसकी नैतिकता, उसकी शुद्धता… सब कुछ उस एक पल में धूमिल हो गया था। और सबसे डरावनी बात ये थी कि उस धुंधलके में, उसे एक अजीब सी रोशनी दिखाई दे रही थी।

एक ऐसी रोशनी जो निषिद्ध थी, वर्जित थी, पर जिसकी ओर उसका पूरा अस्तित्व अब एक अनजाने, अदम्य आकर्षण से खिंचा चला जा रहा था।

दोपहर की चिलचिलाती गर्मी ने बोरीवली की उस चाल के कमरे को एक भट्ठी बना दिया था। पुराना फैन खटखटाते हुए चल रहा था, लेकिन उससे निकलने वाली हवा महज़ गर्म साँसों का झोंका भर थी।

कमरे का वह छोटा सा स्थान दो अलग-अलग दुनियाओं में बँटा हुआ था, जिसे केवल एक पतले सूती कपड़े के परदे ने अलग किया हुआ था।

परदे के एक ओर, फोल्डिंग सोफे पर अरुण लेटा हुआ था। उसने बरमूडा पहन रखे थे और उसका ऊपरी शरीर नंगा था। पसीने की हल्की परत उसकी पतली छाती और पेट पर चमक रही थी।

वो फोन पर कुछ स्क्रॉल कर रहा था, लेकिन उसका ध्यान कहीं और था। उसकी नज़रें बार-बार उस पारदर्शी से परदे पर टिक जातीं, जिसके पार धुँधली पर स्पष्ट एक आकृति दिखाई दे रही थी।

परदे के दूसरी ओर, फर्श पर एक पुरानी चादर बिछाकर सरला आराम कर रही थी। गर्मी से बेहाल होकर उसने अपनी साड़ी का पल्लू पूरी तरह सिर से हटा दिया था और उसे एक तरफ सरका रखा था।

वो सीधी पीठ के बल लेटी हुई थी, आँखें बंद करके। उसकी चोली, जो गर्मी में उसके शरीर से चिपक गई थी, उसके भारी दूधों के आकार को पूरी तरह उभार रही थी।

हर साँस के साथ वो ऊपर उठते और नीचे गिरते, मानो कोई लहरें हों। पसीने की कुछ बूँदें उसकी गर्दन से होती हुई उसकी छाती की गहरी घाटी में समा रही थीं, एक चमकती हुई नम रेखा छोड़ती हुई।

अरुण ने अपना फोन एक तरफ रख दिया। उसका मुँह सूख गया था। उसकी नज़र उन उभारों पर गड़ी हुई थी, जो परदे के पार एक मोहक परछाईं की तरह दिख रहे थे।

उसके नीचे, उसके बरमूडा के अंदर, एक हलचल शुरू हो गई। उसने महसूस किया कि उसका लंड सख्त होकर उठ रहा है, अंदरूनी कपड़े से रगड़ खा रहा है। एक अनियंत्रित कराह उसके गले में ही रुक गई।

धीरे से, लगभग स्वप्निल अवस्था में, उसने अपना हाथ अपने बरमूडा के अंदर डाला। उसकी उँगलियाँ अपने आप उस गर्म, तनी हुई मांसपेशी पर पहुँच गईं।

उसने एक लंबी, दबी हुई साँस ली। आँखें अब भी परदे पर टिकी हुई थीं। वो उठकर बैठ गया, और फिर बिल्कुल धीमी, सावधान चालों से परदे की ओर बढ़ने लगा, जैसे कोई शिकारी अपने शिकार के पास सरक रहा हो।

उसका दाहिना हाथ अभी भी अपनी पैंट के अंदर चल रहा था, एक लयबद्ध, मंथर गति से।

परदे के पास पहुँचकर वो रुक गया। अब दृश्य और स्पष्ट था। उसकी माँ के दूध वाकई बड़े थे, उसकी चोली के भीतर से फटने को आतुर से लग रहे थे।

गर्मी के कारण उसकी त्वचा चमक रही थी, और पसीने की नमी ने चोली के कपड़े को और पतला, और अधिक पारदर्शी बना दिया था।

अरुण ने तेज़ी से हिलाना शुरू कर दिया। उसके दिमाग में विचारों की एक बाढ़ आ गई।

काटूँ… उन मम्मों को… दाँतों से दबाऊँ… उस पसीने को चाटूँ… उसके शरीर का नमक चखूँ… उसके रसीले होंठ… उसकी नाभि… उसका पेट…

उसकी साँसें भारी होने लगीं, गर्म और तेज़। उसकी हथेली और उसकी गर्म त्वचा के बीच का घर्षण एक जलन पैदा कर रहा था, एक ऐसी जलन जो दर्द से ज़्यादा मदहोश कर देने वाली थी। तभी अचानक, सरला करवट लेती हुई एक ओर मुड़ गई।

अब उसकी पीठ और कमर का मोड़ दिखाई दे रहा था। साड़ी का पल्लू हट जाने से उसकी पीठ का ऊपरी हिस्सा खुला था, और जैसे ही उसने अपने पैर सिकोड़े, साड़ी का घेर घुटनों से ऊपर सरक गया।

उसकी जाँघें, गोल, मोटी और सख्त, पूरी तरह से नज़र आने लगीं। त्वचा चिकनी और सुनहरी थी, जिस पर फैन की हवा के कारण रोंगटे खड़े हो रहे थे।

अरुण एक पल के लिए जम गया, सिर्फ़ निहारता रहा। यह दृश्य उसकी कल्पना से भी ज़्यादा उत्तेजक था।

उसके लंड में एक नई, तीखी ऐंठन उठी, और उसने और तेज़ी, और ज़ोर से हिलाना शुरू कर दिया। लालसा ने उसकी सारी सावधानी निगल ली थी।

उसने एक काँपता हुआ हाथ बढ़ाया और सूती परदे को एक इंच खिसकाया, ताकि बीच का कोई भी धुँधलापन दूर हो जाए।

अब दृश्य बिल्कुल साफ़ था, बिना किसी फिल्टर के। सरला का पूरा देह उसकी आँखों के सामने थी। अरुण का मुँह आश्चर्य और कामना से खुला का खुला रह गया, एक भूखे कुत्ते की तरह जिसके सामने गोश्त का टुकड़ा डाल दिया गया हो।

वो अपना सिर और नीचे झुकाने लगा, अपनी कमर थोड़ी तोड़कर, ताकि उसकी नज़र उसकी माँ की जाँघों के बीच के अँधेरे हिस्से पर जा सके। उसका हाथ अब पागलों की तरह चल रहा था।

वहाँ, उस अँधेरे में, एक गहरा सा छाया-सा दिख रहा था। और फिर, जैसे कोई नियति ही उसकी मदद कर रही हो, सरला ने अपने पैरों को थोड़ा और फैलाया। एक सहज, नींद में की गई हरकत।

और तब वह दृश्य सामने आया।

उसकी माँ ने गुलाबी रंग की एक नायलॉन की चड्डी पहन रखी थी, जो पसीने से चिपकी हुई थी।

उस चड्डी के पतले कपड़े के पार, उसकी चूत का पूरा आकार साफ़ उभर रहा था – दो नर्म उभारों के बीच एक लकीर। और सबसे आघात पहुँचाने वाली बात… वहाँ बिल्कुल भी बाल नहीं थे। एकदम चिकनी, कमानीदार त्वचा।

यह देखते ही अरुण के शरीर में बिजली-सी दौड़ गई। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उसके मुँह से एक दबी हुई, भारी आह निकली।

उसकी कमर में एक जबरदस्त ऐंठन उठी, फिर एक, फिर दो… उसका पूरा शरीर तनाव से काँप उठा। उसने अपनी पैंट के अंदर ही, गर्म, चिपचिपा वीर्य स्खलित कर दिया। एक लंबी, अनियंत्रित कराह उसके गले से फूट पड़ी, “आआआहहहहह!”

आवाज़ सुनते ही सरला की आँखें खुल गईं। वो एक झटके में बैठ गई, चौंककर। “क्या हुआ? अरुण?”

अरुण सदमे में था। उसने तुरंत सोफे पर पड़ा एक तकिया उठाया और अपनी गोद में रख लिया, अपनी शर्मनाक गीली पैंट और फैला हुआ वीर्य छिपाने के लिए।

उसका चेहरा मौत जैसा पीला था, आँखों में भय और अपराध का भाव। “क… कुछ नहीं, माँ,” उसकी आवाज़ काँप रही थी।

सरला ने अपने कपड़े ठीक किए, परदे के पार से ही देखते हुए। उसकी नज़र चिंतित थी, लेकिन अब उसमें एक तीक्ष्णता आ गई थी।

“वो आवाज़ क्या थी? चोट तो नहीं लगी? कुछ हुआ क्या?” उसकी आवाज़ में ममता थी, लेकिन उसकी नज़रें अरुण के चेहरे पर, और फिर उस तकिए पर टिक गईं, जिसे वो अपनी गोद पर जान से भी ज़्यादा कसकर दबाए हुए था।

“न… नहीं। बस… पैर की माँसपेशी में खिंचाव आ गया था। तेज़ दर्द था। अब ठीक है,” अरुण ने जल्दी से झूठ बोला, नज़रें चुराते हुए।

सरला ने कुछ सेकंड तक चुपचाप देखा। उसकी नज़रें दृश्य का आकलन कर रही थीं –

खिसका हुआ परदा, उसका अपना अर्ध-खुला शरीर, जो अब तक ठीक से ढका नहीं था, उसका बेटा जो तकिए को हड्डियों तक दबाए हुए था, उसके गालों का लालपन, और हवा में मौजूद वह विशिष्ट गंध… एक परिपक्व औरत के लिए इन सभी बिंदुओं को जोड़ना एक पल का काम था।

उसके चेहरे पर एक पल के लिए एक अजीब सी भावना आई – हैरानी, शर्म, और फिर एक गहरी, गुप्त समझ। उसने कुछ नहीं कहा। कोई फटकार नहीं, कोई सवाल नहीं।

बस एक सूक्ष्म, लगभग अदृश्य मुस्कान उसके होंठों के कोनों पर खेलकर लुप्त हो गई, जैसे कोई रहस्य उसकी आँखों में कौंध गया हो।

“ठीक है,” उसने साधारण स्वर में कहा। “मुझे बाथरूम जाना है।”

और इतना कहकर वो उठी, साड़ी को ठीक से लपेटते हुए, और किचन की ओर बढ़ गई। बाथरूम का दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आई।

अरुण वहीं जमा रह गया, तकिए को कसकर पकड़े हुए। उसका दिल अब भी ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।

उसने देख लिया… उसने सब कुछ समझ लिया है… अब वो लौटेगी और इस तकिए को खींच लेगी… और फिर… हे भगवान… शर्म और डर से उसका पेट मुड़ गया।

लेकिन बाथरूम के अंदर, नल का पानी चलने लगा। एक लंबा, जानबूझकर खींचा गया समय।

सरला दर्पण के सामने खड़ी थी। उसकी आँखों में एक चमक थी। उसने अपने होठों को दबाया। उसके मन में विचार चक्रित हो रहे थे।

बेचारा बच्चा… उम्र का जोश है… और मैं… ऐसे लेटी थी… एक अजीब सी गर्मी, एक निषिद्ध गर्व का भाव उसके अंदर उठा।

उसने जानबूझकर पानी चलाया था, ताकि अरुण को बरमूडा बदलने का मौका मिल जाए। एक माँ का कर्तव्य… और एक औरत का गुप्त आनंद, जो उसकी आँखों की चमक में दिखाई दे रहा था।

कमरे में अरुण अभी भी स्तब्ध था, उसकी गीली पैंट में चिपचिपाहट ठंडी पड़ने लगी थी, और उसकी दुनिया अब एक ऐसे रहस्य पर टिकी हुई थी जो उसने और उसकी माँ ने बिना एक शब्द कहे आपस में बाँट लिया था।

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