बेटे ने बुझाई अपनी हवस की प्यास – पार्ट ३

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अगले दिन सुबह, प्रकाश ने चाय की चुस्की लेते हुए घोषणा की, “दिल्ली जाना है। एमएलए साहब की कुछ जरूरी मीटिंग है। दो-तीन दिन लगेंगे।”

उसकी आवाज़ में राजनीतिक कार्यकर्ता की वह साधारण-सी गंभीरता थी, जो घर की चारदीवारी में भी काम की बात करते हुए नहीं जाती थी।

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सरला ने सिर्फ़ सिर हिलाया, “ठीक है। कपड़े-वपड़े रख दिए हैं बैग में।” लेकिन उसके भीतर, उस साधारण वाक्य ने एक ज्वालामुखी को जगा दिया। दो-तीन दिन… अकेले… बस हम दोनों।

अरुण, जो अपनी किताबें समेट रहा था, उसने भी यह सुना।

एक झटके में, कल की सारी घटनाएँ – उसका स्पर्श, उसकी माँ की भारी साँसें, उसकी कराह – उसके दिमाग में ताज़ा हो गईं। रातभर वह उन्हीं यादों के सहारे जलता रहा था।

एक सवाल उसे कचोट रहा था: क्या वह सचमुच सो रही थी? या… नाटक कर रही थी? क्या… उसे भी अच्छा लग रहा था? और अब, भगवान ने ही मौका दे दिया था उन सवालों के जवाब तलाशने का।

उसके चेहरे पर, चश्मे के पीछे, एक अदृश्य उत्साह दौड़ गया।

प्रकाश ने अरुण की ओर देखा, “तू माँ का हाथ बँटाना। घर का ख्याल रखना।”

“जी, पापा,” अरुण ने नीची नज़रों से जवाब दिया, लेकिन उसका दिल जोरों से धड़क रहा था। हाँ, ज़रूर रखूँगा… बिल्कुल अलग तरह से।

प्रकाश के जाते ही, कमरे में एक अलग किस्म की खामोशी छा गई। यह खालीपन नहीं, एक संभावना थी। सरला बर्तन साफ़ करने लगी, लेकिन उसका मन कहीं और था।

कल की अधूरी, जलन भरी इच्छा उसकी जाँघों के बीच अब भी सुलग रही थी। और अब कोई रुकावट नहीं थी। उसके विचार उस पड़ोसन की ओर मुड़ गए, जिसकी कहानी उसने कभी किसी से साझा नहीं की थी।

वह औरत, उन्हीं की चाल में रहती थी। उसका पति एक दुर्घटना में स्थायी रूप से लकवाग्रस्त हो गया था। पैसों के लिए, उसने चुपके से देह व्यापार शुरू कर दिया।

एक दिन उसका बेटा, जो अरुण से कुछ बड़ा था, उसने किसी ग्राहक के साथ उसे रंगेहाथ पकड़ लिया था।

सरला को याद आया कि कैसे उस पड़ोसन ने, एक बार रोते-रोते, उसे राज़ बताया था: “पहले तो बहुत शर्मिंदगी हुई, दीदी… जब मेरे ही बेटे ने मुझसे… वो… किया।

लेकिन फिर… वो भी तो एक मर्द ही है न? और वो भी मेरे जिगर का टुकड़ा, उसमें और बाकियों में क्या फर्क है? अब तो वो मेरी मदद भी करता है, ग्राहक ढूँढने में।

घर में अब कोई झिझक नहीं है। पैसे भी आते हैं।”

उस वक्त सरला ने उस कहानी को एक भयानक विवशता के रूप में सुना था। लेकिन आज, उसके अपने मन की गलियों में, वही कहानी एक अलग अर्थ ले रही थी। *

“उसमें और बाकियों में क्या फर्क है?”* वाक्य उसके कानों में गूँज रहा था। उनकी स्थिति वैसी नहीं थी, यह सच था।

लेकिन क्या भावनात्मक विवशता कम थी? एक सूखा वैवाहिक जीवन, एक तरसता हुआ शरीर, और अब एक ऐसा बेटा जो उसकी ओर आकर्षित था… क्या यह उस दबाव से इतना अलग था? एक अजीब सी तर्कसंगतता उसके दिमाग में पैठ बना रही थी। *

अरुण बड़ा हो चुका है। उसे औरत के शरीर का अनुभव तो करना ही है। किसी बाहर की लड़की के चक्कर में पड़ने से अच्छा है… मैं ही… कम से कम सुरक्षित तो है। और मेरी भी… तृप्ति हो जाएगी।* यह विचार पापिल था, लेकिन उतना ही शक्तिशाली भी।

अरुण कॉलेज चला गया। सरला ने सामान्य दिनचर्या के अनुसार घर के काम निपटाए। लेकिन जब नहाने का समय आया, तो उसके मन में एक दृढ़ निश्चय आ चुका था।

बाथरूम में, शरीर पोंछते हुए, वह आईने के सामने खड़ी हुई। उम्र के चालीसवें पड़ाव पर भी उसका शरीर अभी आत्मसमर्पण नहीं करना चाहता था।

उसने अपने भारी दूधों को देखा, अपनी चौड़ी कमर को, अपनी मोटी जाँघों को। एक गहरी साँस लेकर, उसने एक निर्णय लिया।

उसने अपनी साफ़ चड्डी उठाई… और फिर वापस रख दी। दिल जोर से धड़का। उसने सीधे पेटीकोट पहना, उसके ऊपर साड़ी।

साड़ी का ब्लाउज पहनते हुए उसके हाथ काँप रहे थे। ब्लाउज के बटन लगाए, लेकिन उसे एहसास हुआ कि बिना चड्डी के, पेटीकोट का पतला कपड़ा सीधे उसकी त्वचा से रगड़ खा रहा था।

हवा का एक झोंका भी उसकी जाँघों के बीच से सरकता हुआ महसूस हो रहा था। यह अजीब, बेहद संवेदनशील और उत्तेजक अनुभव था।

वह आईने के सामने से हट गई। उसका चेहरा गंभीर था। योजना बन चुकी थी। दोपहर का नाटक आज और आगे बढ़ेगा। वह अरुण को उत्साहित करेगी, उसकी हिम्मत बढ़ाएगी, ताकि वह आगे बढ़ सके।

और शायद… शायद आज वह खुद भी उस अधूरेपन से मुक्ति पा सके, जो कल की घटना ने छोड़ दिया था। उसने अपनी साड़ी के पल्लू को कमर पर बाँध लिया, लेकिन आज उसकी चाल में एक जानबूझकर की गई लापरवाही थी। वह तैयार थी।

अब बस इंतज़ार था, दोपहर का, और अपने बेटे के लौटने का।

दोपहर की चिलचिलाती गर्मी ने कमरे की हवा को स्थिर और भारी बना दिया था। पुराना पंखा केवल गर्म हवा को इधर-उधर धकेल रहा था।

अरुण कॉलेज से लौटा और सामान्य रस्म अदायगी की तरह अपना बैग रखा। आज उसके मन में कल की तरह घबराहट नहीं, एक सुनिश्चित, गर्म उत्साह था।

पिता की अनुपस्थिति ने उसके भीतर एक नई तरह की निर्भीकता भर दी थी। उसने अपनी बरमूडा पहनी और परदे को देखने लगा, जो अब एक मात्र औपचारिकता मात्र रह गया था।

परदे के पार, सरला पहले से ही फर्श पर लेटी हुई थी, आँखें बंद किए। उसका पल्लू फर्श पर सरका हुआ था, और चोली के नीचे से उसके दूधों का आकार साफ़ उभर रहा था।

गर्मी और अंदर से सुलगते हुए शरीर की आग ने मिलकर माहौल को गाढ़ा और इंतज़ार से भरपूर बना दिया था।

सरला ने सोने का अभिनय शुरू कर दिया, लेकिन आज उसकी नब्ज़ तेज़ चल रही थी। उसकी जाँघों के बीच एक सनसनी थी – नम, गर्म और उत्सुक।

उसने जानबूझकर पेटीकोट के नीचे कुछ नहीं पहना था, और अब हवा का हर झोंका, कपड़े का हर स्पर्श सीधा और तीखा महसूस हो रहा था। उसका मन आशंका और उम्मीद के बीच झूल रहा था। आज… आज ज़रूर कुछ होगा।

अरुण ने अपने बरमूडा के अंदर हाथ डाला और अपने पहले से ही तने हुए लंड को हिलाना शुरू कर दिया।

कल के अनुभव ने उसे विश्वास दिला दिया था कि यह एकतरफ़ा खेल नहीं था। वह आवाज़ रहित कदमों से परदे के पास गया।

आज कोई डर नहीं था, कोई हिचक नहीं। एक हाथ से अपना लंड सहलाते हुए, उसने दूसरे हाथ से परदे को एक तरफ़ सरकाया। कपड़े की हल्की सरसराहट हुई।

सरला ने वह आवाज़ सुनी। उसका शरीर तन गया। आ गया। उसने अपनी साँसों को थोड़ा भारी बनाया, नींद में डूबी हुई स्त्री का नाटक जारी रखते हुए।

अरुण की नज़र सीधे उसके घुटनों पर पड़ी साड़ी के घेर पर गई। उसने अपना मुक्त हाथ आगे बढ़ाया और साड़ी के कोने को अपनी उंगलियों में लिया।

फिर, बेहद धीरे-धीरे, लगभग सम्मोहन की गति से, वह उसे ऊपर की ओर खींचने लगा। कपड़ा उसकी जाँघों पर से सरकता हुआ, ऊपर उठने लगा।

सरला के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। हर इंच के साथ, उसका नंगापन उजागर हो रहा था। उसकी साँसें स्वाभाविक रूप से भारी और तेज़ होने लगीं, अब अभिनय नहीं, बल्कि वास्तविक उत्तेजना के कारण। *

यह हो रहा है… वह देख रहा है…* जैसे ही साड़ी का घेर उसकी नाभि के पास पहुँचा, उसने महसूस किया कि ठंडी हवा सीधे उसकी चूत पर लग रही है।

सारा घेर अब उसके पेट पर इकट्ठा हो चुका था। उसका पूरा निचला हिस्सा, उसकी पूरी चूत, उसके बेटे के सामने अनावृत थी।

इस तथ्य का एहसास होते ही उसके गाल और कान जलने लगे। वह शर्म से अपना सिर दूसरी घुमा लिया, आँखें कसकर बंद कर ली।

अरुण उस दृश्य को देखकर स्तब्ध रह गया। उसकी कल्पना में भी ऐसा स्पष्ट, ऐसा साहसिक दृश्य नहीं था। उसकी माँ की चूत पूरी तरह से नंगी थी – चिकनी, मुंडी हुई, थोड़ी सी फूली हुई और गुलाबी।

और वहाँ, उसके गहरे गुलाबी होंठों के बीच से, एक चमकदार, सफेद नमी रिस रही थी, जो पहले से ही उसकी जाँघों के बीच की त्वचा पर हल्की चमक बिखेर रही थी।

अरुण का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया। उसने अपने लंड को हिलाना बंद कर दिया, पूरी तरह से मंत्रमुग्ध।

फिर, एक गहरी साँस लेकर, उसने अपना हाथ बरमूडा से बाहर निकाला और आगे बढ़ाया। उसकी उँगलियाँ सबसे पहले सरला की जाँघों पर पड़ीं, उस नर्म, गर्म मांसपेशी को रगड़ते हुए।

स्पर्श इतना कोमल था कि सरला के गले से एक दबी हुई कराह निकल पड़ी, “स्स्स्स्स…” एक लंबी, रेंगती हुई साँस।

यह आवाज़ अरुण के लिए पुष्टि थी। वह जाग रही थी। वह इसे महसूस कर रही थी। और उसे अच्छा लग रहा था। इस जानकारी ने उसे बिजली की तरह ऊर्जा से भर दिया।

उसने दोनों हाथों से उसकी जाँघों को पकड़ा और उन्हें धीरे से अपनी ओर खींचा। सरला ने कोई प्रतिरोध नहीं किया।

उसके पैर आसानी से फैल गए, और उसकी चूत अब पूरी तरह से खुल गई, दोनों होंठ थोड़े से अलग हो गए, जिससे अंदर का गहरा गुलाबी मांस और भी अधिक नमी दिखाई देने लगी।

उसका चूत का होंठ, एक छोटी सी गुलाबी कली, अब स्पष्ट रूप से दिख रहा था, नमी से चमक रहा था।

अरुण ने झुकना शुरू किया। वह धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ा, अपना सिर उसके जघन के ऊपर लाया। उसने एक लंबी, गहरी साँस ली, अपनी नाक को उसकी चूत के ठीक ऊपर रखकर।

गंध तीखी, मिट्टी जैसी और मादक थी। यह वह गंध नहीं थी जिसकी उसने कल्पना की थी, लेकिन यह उसके मुँह में पानी ला देने वाली थी, उसके पेट के निचले हिस्से में आग लगा देने वाली थी।

सरला ने उसकी गर्म साँस को अपनी सबसे संवेदनशील जगह पर महसूस किया। उसके शरीर में एक जोरदार झटका दौड़ गया।

उसके होठों से लगातार दबी हुई आहें निकलने लगीं, “आआहहह… स्स्स्स… आह…” उसकी ऊँगलियाँ चादर में समा गईं, उन्हें जकड़ लिया।

अरुणने, जिज्ञासा से भरकर, अपना हाथ आगे बढ़ाया और अपना अंगूठा सीधे उसकी चूत के खुले होंठों पर रख दिया, नमी में डूबा हुआ।

सरला एक तेज़, ऊँची कराह के साथ ऐंठ गई, “आआहहहह! स्स्स्स!” उसका शरीर हिल उठा। अरुण रुका नहीं। उसने अपनी उँगलियों से उसके होंठों को और अलग किया, अंदर झाँकने की कोशिश करते हुए। उसकी उँगलियाँ चिपचिपी, गर्म नमी से भीग गईं।

सरला अब लगातार कराह रही थी, “आह… स्स्स्स्स… आआहह…” उसकी साँसें छोटी और तेज़ हो गई थीं।

अरुण ने देखा – गहरा गुलाबी मांस, चमकदार सफेद रस, और उसकी उँगलियाँ पूरी तरह से तर। एक विचार उसके दिमाग में कौंधा। इसका स्वाद कैसा होगा? उसने अश्लील फिल्मों में देखा था।

उसके चाल के एक दोस्त ने भी इसके बारे में डींगें मारी थीं। एक क्षण की हिचकिचाहट के बाद, उसने अपनी जीभ बाहर निकाली।

उसने एक लंबा, धीमा चाटा मारा, उसकी चूत के निचले हिस्से से शुरू करके, बीच से होते हुए, ऊपर उसके चूत का होंठ तक जाते हुए।

यह अचानक, सीधा, गीला हमला था।

सरला का संयम टूट गया। एक जोरदार, लंबी कराह उसके गले से फूट पड़ी, जो कमरे की दीवारों से टकराई, “आआआआआहहहहह! हाँ! हम्मम्म!” उसकी आँखें अभी भी बंद थीं, लेकिन उसके हाथ अनैच्छिक रूप से ऊपर उठे और अरुण के सिर को जकड़ लिया,

उसे अपनी चूत के और करीब दबाते हुए। उसकी उँगलियाँ उसके बालों में फँस गईं।

अरुण पहले तो इस नए विकास से चौंका। लेकिन फिर, उस जबरदस्त पकड़, उस आवाज़ में छिपी तृप्ति की चीख ने उसकी सारी हिचकिचाहट को जला दिया।

एक नया आत्मविश्वास, एक प्रभुत्व की भावना उसके भीतर भर गई। उसने अपने हाथों से उसकी जाँघों को और जोर से पकड़ा, उन्हें और चौड़ा फैलाया, उसकी चूत को पूरी तरह से अपने लिए खोल दिया।

और फिर उसने फिर से चाटना शुरू कर दिया – लंबी, मजबूत, रस लेते हुए चाट। दो… तीन बार…

और फिर वह अचानक रुक गया।

सरला, जो आनंद के एक उग्र समुद्र में डूबी हुई थी, लगातार कराह रही थी, उसके सिर को अपनी ओर दबाए हुए थी… वह भी रुक गई।

एक सन्नाटा छा गया, जिसमें केवल उनकी भारी, तेज़ साँसों की आवाज़ थी। अरुण ने अपना सिर ऊपर उठाया। उसकी ठुड्डी और होंठ उसकी माँ के रस से चमक रहे थे।

उसने देखा कि उसकी माँ की आँखें अभी भी कसकर बंद थीं, उसका चेहरा आनंद और शर्म से तनावपूर्ण था।

यह अरुण की चाल थी। उसने इस मूक नाटक, इस मासूमियत के ढोंग को तोड़ना चाहा। वह अब आँख मिलाकर सामना करना चाहता था।

वह चाहता था कि यह स्वीकृति के साथ हो, ताकि वे अपनी स्थिति को पूरी तरह से स्वीकार करके आनंद ले सकें।

यह रुकना उसकी माँ के लिए एक छेड़छाड़ थी, एक चुनौती थी – अब देखो मुझे। जान लो कि मैं जानता हूँ। और बताओ कि तुम भी चाहती हो।

वह उसके ऊपर मंडराता रहा, उसकी नम, खुली चूत से कुछ इंच ऊपर, उसके चेहरे का इंतज़ार करता रहा। हवा में तनाव एक टूटने वाले तार की तरह खिंच रहा था।

सरला की पलकें झटके से खुल गईं। उनमें निराशा, उत्तेजना और एक तीव्र माँग थी। वह सीधे अरुण की आँखों में देखते हुए, हाँफते हुए बोली, “क्या हुआ बेटा? क्यों रुक गया? आगे बढ़ो… जारी रखो।”

उसके शब्दों में एक ऐसी विनती थी जो सारी सीमाएँ तोड़ देती थी। अरुण के होंठों पर एक विजयी, कोमल मुस्कान खेल गई। यही तो वह चाहता था – इस मूक ढोंग की दीवार का गिरना।

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