गरीबी का सौदा cuckold बन के किया – 3
उन तीन महीनों में जैसे रमेश और मीरा की दुनिया ही पलट गई थी। कच्ची ईंटों और टिन की छत वाला वह घुटन भरा झोपड़ा अब एक मज़बूत, पक्की छत वाले मकान में बदल चुका था।
घर के आँगन में अब कीचड़ नहीं, बल्कि पक्का फर्श था। बैठक में एक नया सोफा रखा था और बेडरूम में एक बड़ा सा डबल बेड। रमेश के पास अब नई चमचमाती बाइक आ गई थी, और मीरा के गले में सोने की एक मोटी चेन और कानों में भारी झुमके झूलने लगे थे।
इन तीन महीनों में, मीरा का जिस्म और उसका दिमाग पूरी तरह से एक पेशेवर वेश्या के साँचे में ढल चुका था। विक्रम और अमित के साथ रातें बिताना अब उनके लिए कोई राज़ या मजबूरी नहीं, बल्कि उनका फुल-टाइम धंधा बन गया था।
मीरा आईने के सामने खड़ी होकर अपने गले की सोने की चेन ठीक कर रही थी। उसने अपने सीने पर विक्रम के दाँतों के ताज़े लाल निशानों को देखा।
“कैसा पागल है वो…” मीरा ने मन ही मन सोचते हुए एक गहरी, कामुक साँस ली।
विक्रम और अमित जिस क्रूरता और अपमानजनक तरीके से उसे इस्तेमाल करते थे—उसके बाल खींचना, गंदी-गंदी गालियाँ देना, उसे जानवरों की तरह उसकी गांड फाड़ना—यह सब अब मीरा को ज़रा भी बुरा नहीं लगता था।
बल्कि सच तो यह था कि उसे इस बर्बरता की भयंकर लत लग चुकी थी। उसे उस दर्द में, उस नंगेपन में एक ऐसा गहरा चरम सुख मिलता था, जो उसे अंदर से पूरी तरह तृप्त कर देता था।
उधर, रमेश की ज़िंदगी भी पटरी पर आ गई थी। पैसों की वजह से अब उसकी फसलें भी लहलहाने लगी थीं। रमेश अब गाँव में एक छोटे साहूकार की तरह बन गया था। जो गाँव वाले पीठ पीछे मीरा को गालियाँ देते थे, वही ज़रूरत पड़ने पर रमेश के दरवाज़े पर ब्याज पर पैसे माँगने आते थे।
“रमेश भाई, बेटी की शादी है, दस हज़ार का इंतज़ाम कर दो,” कल ही गाँव के एक आदमी ने रमेश के आगे हाथ जोड़े थे। रमेश ने भी सीना चौड़ा करके उसे पैसे दिए थे।
गाँव के जो गरीब और लुच्चे मर्द थे, वो मीरा को देखकर लार टपकाते थे। वो चाहते थे कि वो भी मीरा को वैसे ही नोचें जैसे छोटे ठाकुर नोचते हैं, लेकिन उनकी औकात नहीं थी कि वो मीरा के जिस्म की कीमत चुका सकें।
लेकिन गाँव के कुछ पुराने अमीर और मेहनती किसानों को रमेश और मीरा की यह रातों-रात आई बेशुमार दौलत आँखों में चुभ रही थी। वे दिन-रात खेतों में हड्डियाँ गलाते थे, और यहाँ रमेश अपनी बीवी का जिस्म बेचकर मजे मार रहा था।
यह सुलगती हुई जलन एक दिन फूट ही पड़ी।
गाँव के मंदिर के पास एक बड़ा भंडारा था। गाँव के सभी प्रतिष्ठित लोग चंदा दे रहे थे। रमेश भी अपनी नई बाइक पर मीरा को लेकर वहाँ पहुँचा। मीरा ने एक महँगी रेशमी साड़ी पहनी थी और उसका निखरा हुआ हुस्न पूरे मेले की नज़रें अपनी तरफ खींच रहा था।
रमेश ने चौपाल पर बैठे सरपंच और गाँव के बड़े किसान, गजेन्द्र सिंह, के सामने 5100 रुपये की गड्डी रख दी।
“मंदिर के लिए मेरी तरफ से,” रमेश ने गर्व से कहा।
गजेन्द्र सिंह ने उन पैसों को ऐसे देखा जैसे कोई गटर की गंदगी हो। उसने गड्डी को अपनी लाठी से दूर खिसका दिया।
“मंदिर में मेहनत की कमाई लगती है रमेश, किसी की उतारी हुई इज़्ज़त की नहीं,” गजेन्द्र सिंह की कड़कती हुई आवाज़ ने पूरे चौपाल में सन्नाटा ला दिया।
रमेश का चेहरा लाल हो गया। “क्या मतलब है आपका गजेन्द्र काका? मैं भी खेती करता हूँ!”
“अरे काहे की खेती!” भीड़ में से एक दूसरे आदमी ने ताना मारा। “तेरी असली खेती तो शहर वाले फार्महाउस के बिस्तर पर होती है। अपनी लुगाई को रईसों के नीचे सुलाकर कमाए हुए इस पाप के पैसे को भगवान के दरबार में मत रख भड़वे!” पूरी भीड़ ज़ोर से हँस पड़ी।
“ज़बान सँभाल कर बात कर!”
रमेश का गुस्सा फूट पड़ा और वह गजेन्द्र की तरफ झपटा, लेकिन तभी मीरा ने पीछे से रमेश का कॉलर पकड़ कर उसे खींच लिया।
मीरा की आँखों में कोई आँसू नहीं थे, कोई शर्म नहीं थी। वह गजेन्द्र सिंह के सामने आकर खड़ी हो गई। उसने अपना सोने का झुमका घमंड से हिलाया।
“तुम्हारी जल रही है गजेन्द्र काका!”
मीरा ज़ोर से चिल्लाई, उसकी आवाज़ में एक बेशर्म गुरूर था।
“क्योंकि तुम दिन-रात मिट्टी में सड़ते हो फिर भी तुम्हारी औरतें फटे कपड़े पहनती हैं! हाँ, मेरे पास पैसा है! और अगर इतनी ही खुजली है, तो जाओ अपनी औरतों को भी भेज दो फार्महाउस पर! लेकिन याद रखना, ठाकुरों को मेरी जैसी मलाई चाहिए, तुम्हारी औरतों जैसी सूखी हड्डियाँ नहीं!”
“रांड! छिनाल! तेरी ये मजाल!”
गजेन्द्र गालियाँ बकने लगा। भीड़ उग्र होने लगी। रमेश ने मीरा का हाथ पकड़ा और दोनों वहाँ से बाइक पर बैठकर निकल आए।
लेकिन यह अपमान गाँव के उन पुराने लोगों के लिए असहनीय हो गया था। उस रात उन्होंने अपना असली रंग दिखा दिया।
अगली सुबह जब रमेश उठा और बाहर गया, तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसके नए पक्के घर की सफेद दीवार पर काले डामर से बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था:
“भड़वे का घर” और “मीरा रांड”।
रमेश घबराता हुआ अपने खेत की तरफ भागा, जो घर के ठीक पीछे था। वहाँ का नज़ारा देखकर रमेश अपने घुटनों के बल गिर पड़ा। उसकी लहलहाती हुई पूरी फसल रात के अंधेरे में ट्रैक्टर चलाकर और हँसियों से काटकर पूरी तरह बर्बाद कर दी गई थी। महीनों की मेहनत एक ही रात में मिट्टी में मिल गई थी।
रमेश ज़मीन पर मुक्के मार-मार कर चीखने लगा।
“कुत्ते के बच्चे! साले नामर्द! मेरी फसल बर्बाद कर दी!”
मीरा भी दौड़ती हुई खेत पर पहुँची। उसने दीवार पर लिखी वो गंदी गालियाँ और उजड़ा हुआ खेत देखा। लेकिन इस बार मीरा रोई नहीं। उसके अंदर की वह औरत जो अब पूरी तरह से अपनी कीमत जान चुकी थी, आग बबूला हो उठी।
मीरा ने देखा कि दूर पगडंडी पर गाँव के कुछ लोग खड़े होकर तमाशा देख रहे थे और दाँत निकाल रहे थे।
मीरा ने अपने दोनों हाथ कमर पर रखे और खेत के बीचों-बीच खड़ी होकर पूरी ताक़त से चिल्लाई—
“हाँ! मैं रांड हूँ! सुन रहे हो तुम सब? हूँ मैं रांड और छिनाल! और मेरा पति मेरी कमाई खाता है!” मीरा की आवाज़ पूरे गाँव में गूँज रही थी।
“तुम्हारे अंदर इतनी मर्दानगी नहीं थी कि मेरे सामने आकर लड़ सको, इसलिए रात के अंधेरे में खेत जला दिया? तुम्हारी औकात नहीं है मेरा जिस्म खरीदने की, इसलिए ये सब कर रहे हो!”
रमेश ने मीरा को रोकने की कोशिश की, “मीरा शांत हो जा…”
“नहीं जी! आज इन कुत्तों को में इनकी औकात दिखा के रहूंगी!”
मीरा हाँफ रही थी। उसकी आँखें नफरत और गुस्से से जल रही थीं। उसने रमेश को ज़मीन से उठाया और गाँव वालों की तरफ उँगली दिखाते हुए बोली,
“जितने का मेरा खेत जलाया है ना तुमने… उससे चार गुना ज़्यादा पैसा मैं सिर्फ एक रात में अपनी टाँगे खोलकर कमा लूंगी! मेरी एक रात की कीमत तुम्हारे पूरे साल की फसल से ज़्यादा है!”
मीरा ने रमेश का हाथ कसकर पकड़ लिया और उसे झकझोरते हुए बोली,
“रो मत जी! ये मिट्टी का खेल बहुत हो गया। इन सालों को इनकी औकात दिखानी है हमें।
रमेश वहीं ज़मीन पर बैठा हाँफ रहा था, लेकिन मीरा ने बिना एक पल गँवाए अपना फोन निकाला और सीधे विक्रम को मिलाया।
फोन विक्रम ने उठाया।
“क्या बात है मीरा? आज सुबह-सुबह याद कर लिया?” विक्रम की आवाज़ में वही पुराना अक्खड़पन और हवस थी।
“गाँव में फसल का त्योहार है आज, छोटे ठाकुर,”
मीरा की आवाज़ में आज कोई नज़ाकत या डर नहीं था। उसकी आवाज़ लोहे जैसी सख्त और सर्द थी।
“तुम्हें और अमित को मिलाकर तुम्हारे कितने खास दोस्त हैं?”
फोन स्पीकर पर था। दूसरी तरफ से विक्रम और अमित की हल्की हँसी सुनाई दी।
“क्यों? आज जश्न मनाने का मूड है क्या?” विक्रम ने हँसते हुए कहा।
“हम तीन और दोस्तों को बुला लेते हैं। तेरे लिए पाँच मर्द बहुत होंगे। तेरी सारी गरमी निकाल देंगे।”
“पाँच नहीं,”
मीरा ने अपनी आँखें दीवार पर लिखी गालियों पर गड़ाते हुए, एक बेहद खौफनाक और शांत लहज़े में कहा,
“आठ लोगों को बुलाओ। तुम दोनों को मिलाकर पूरे दस होने चाहिए!।”
फोन के उस पार अचानक सन्नाटा छा गया। रमेश, जो ज़मीन पर बैठा था, झटके से खड़ा हो गया। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
“दस?” विक्रम की आवाज़ में पहली बार हैरानी और एक अजीब सा खौफ सुनाई दिया।
“मीरा, तेरा दिमाग तो ठीक है? दस जवान मर्द… तू सह नहीं पाएगी। चीथड़े उड़ जाएंगे तेरे।”
“मेरी फिक्र तुम मत करो ठाकुर,” मीरा की आवाज़ में एक गुरूर भरा तंज़ था।
“तुम्हारे दोस्तों में दम होना चाहिए। और हाँ, एक बात और… कीमत दस हज़ार रुपये प्रति व्यक्ति होगी। पूरे एक लाख।”
अमित ने विक्रम के हाथ से फोन छीन लिया।
“दस हज़ार? पागल हो गई है तू! इतनी कीमत तो शहर की बड़ी-बड़ी…”
“अगर नहीं जमता, तो फोन रख दो,”
मीरा ने बेबाकी से काटते हुए कहा।
“तुम्हें पता है मैं क्या दे सकती हूँ। और आज रात… आज रात कोई सीमा नहीं होगी। कोई रोक-टोक नहीं। जो चाहे, जैसे चाहे, मुझे इस्तेमाल कर सकते हो। मैं हर हद पार करने को तैयार हूँ।”
यह सुनकर उन दोनों अमीर रईसज़ादों के जवान, उबलते हुए खून में एक विकृत हवस दौड़ गई। दस लोग? कोई सीमा नहीं? यह किसी भी मर्द को पागल कर देने वाला ऑफर था।
“ठीक है,” अमित ने हाँफते हुए कहा।
“आठ हज़ार। आठ हज़ार प्रति व्यक्ति देंगे हम। पूरे अस्सी हज़ार लेकर आएंगे आज रात। ठीक है?”
“ठीक है,” मीरा ने कहा।
“तो शाम को गाड़ी भेजता हूँ, फार्महाउस आ जाना,” विक्रम ने कहा।
“नहीं,” मीरा ने तुरंत टोका।
“आज रात फार्महाउस पर नहीं होगी। आज का जश्न हमारे इसी गाँव वाले घर में होगा।”
“क्या?” विक्रम चिल्लाया।
“तेरे गाँव में? वो गँवार लोग तमाशा बना देंगे!”
“वही तमाशा तो मैं उन्हें दिखाना चाहती हूँ,”
मीरा के चेहरे पर एक शैतानी, खौफनाक मुस्कान तैर गई।
“उन्होंने रात के अंधेरे में छुपकर मेरा खेत जलाया है। आज मैं उनके घरों के सामने, खुली आँखों के नीचे अपनी ताक़त दिखाऊँगी। वो जलेंगे, घुटेंगे, लेकिन कुछ कर नहीं पाएंगे। और हाँ, रास्ते से वो वाली ‘दवाइयाँ’ भी लेते आना। आज रात रुकनी नहीं चाहिए, ठाकुर। मैं चाहती हूँ कि इस गाँव का बच्चा-बच्चा रात भर उस जश्न की गूँज सुने।”
फोन कट गया।
आँगन में भारी सन्नाटा छा गया। रमेश का पूरा शरीर काँप रहा था। पाँच मर्दों तक की बात अलग थी, लेकिन दस? उसका दिल खौफ से ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
“मीरा… तूने ये क्या कर दिया?” रमेश ने मीरा के कंधे पकड़ लिए, उसकी आवाज़ में एक सच्चा डर था।
“दस मर्द? वो भी हमारे घर में? गाँव वाले हमें मार डालेंगे! और तू… तू ज़िंदा नहीं बचेगी मीरा! वो जानवर हैं, नोच खाएंगे तुझे!”
मीरा ने रमेश के हाथ अपने कंधों से हटाए और उसकी आँखों में गहराई से देखा। उसके चेहरे पर कोई घबराहट नहीं थी, बल्कि एक ऐसा आत्मविश्वास था जो रमेश ने पहले कभी नहीं देखा था।
“मर तो मैं उसी दिन गयी थी, जब लाला ने मुझे अपनी दुकान से धक्के मार कर निकाला था,”
मीरा की आवाज़ में दर्द नहीं, आग थी।
“इन गाँव वालों ने हमारी इज़्ज़त क्या छोड़ी है? दीवार पर रांड लिख दिया ना? तो आज मैं इन्हें बताऊँगी कि एक रांड की ताक़त क्या होती है। ये लोग अंदर से नामर्द हैं। आज जब दस अमीर, रसूखदार मर्द अपनी महँगी गाड़ियों में मेरे दरवाज़े पर आकर मेरे लिए लाइन लगाएंगे… तो इन गाँव वालों का वो झूठा स्वाभिमान और ईर्ष्या खून के आँसू रोएगी।”
“लेकिन दस लोग…”
रमेश अभी भी खौफ में था, हालाँकि उसके उस विकृत दिमाग के एक कोने में इस भयानक तमाशे को देखने की एक खौफनाक उत्तेजना भी सुलगने लगी थी।
“मैं सब सह लूँगी जी,” मीरा ने रमेश के सीने पर हाथ रखते हुए, एक दृढ़ और कामुक आवाज़ में कहा।
“मैं खुद को हर उस अपमान, हर उस दर्द के लिए तैयार कर चुकी हूँ, जिसकी तुम कल्पना भी नहीं कर सकते। आज रात मेरी कोई सीमा नहीं है। मैं उनके पैरों में गिरूँगी, उनकी गालियाँ सुनूँगी, उनका हर वो गंदा शौक पूरा करूँगी जो वो चाहते हैं… क्योंकि ये मेरा अपमान नहीं, मेरी जीत होगी। मैं अपने जिस्म को हथियार बनाकर इन गाँव वालों की छाती पर मूँग दलूँगी। तुम बस देखना… आज रात मैं हारूँगी नहीं, राज करूँगी।”
मीरा का यह खौफनाक आत्मविश्वास देखकर रमेश के अंदर का डर पूरी तरह से उस विकृत जोश में बदल गया। उसने एक गहरी साँस ली और अपनी पत्नी की इस खतरनाक, बेशर्म ताक़त के आगे नतमस्तक हो गया।
शाम होते-होते गाँव में एक अजीब सी खामोशी छा गई। फसल के त्योहार के ढोल-नगाड़े बज रहे थे, लेकिन रमेश के घर के आस-पास का माहौल किसी तूफान के आने से पहले की शांति जैसा था।
रात के करीब नौ बजे थे। गाँव की कच्ची सड़कों पर अचानक तेज़ रोशनी चमकी। एक-एक करके, तीन-चार महँगी SUV और गाड़ियाँ धूल उड़ाती हुई गाँव के संकरे रास्तों से गुज़रीं और सीधा रमेश के पक्के घर के सामने आकर रुक गईं।
गाड़ियों की आवाज़ और उनकी हेडलाइट्स की चकाचौंध से आस-पास के घरों के दरवाज़े और खिड़कियाँ खुलने लगीं। गजेन्द्र सिंह, सावित्री, रामू और वो तमाम लोग जिन्होंने रात को गालियाँ लिखी थीं, बाहर निकल आए।
गाड़ियों के दरवाज़े खुले। विक्रम, अमित और शहर के उनके आठ रईस और ताकतवर दोस्त बाहर उतरे। सबके हाथों में महँगी शराब की बोतलें थीं, आँखों में हवस थी और चेहरे पर एक अजीब सा पागलपन, शायद उन्होंने वो दवाइयां ले ली थी। उन्होंने गाँव वालों को ऐसे देखा जैसे वो कीड़े-मकोड़े हों।
रमेश के घर का दरवाज़ा खुला।
मीरा दरवाज़े की चौखट पर खड़ी थी। उसने कोई साड़ी नहीं पहनी थी। उसने एक गहरे लाल रंग का बेहद छोटा और पारदर्शी गाउन पहना था, वो अन्दर से पूरी नंगी थी, जो गाँव की मर्यादाओं के मुँह पर एक ज़ोरदार तमाचा था।
उसके बाल खुले थे, होंठों पर लाल लिपस्टिक थी और उसकी आँखों में एक नंगी, खौफनाक और बेशर्म चुनौती थी।
उसने उन दस मर्दों को देखा, और फिर धीरे से अपनी नज़रें घुमाकर सामने खड़े गाँव वालों पर डालीं। गाँव की औरतों ने शर्म से अपने चेहरे ढँक लिए, और मर्दों के चेहरे ईर्ष्या, हवस और लाचारी से लाल पड़ गए। वे कुछ नहीं कर सकते थे। ठाकुरों और रईसों की उस फौज के आगे गाँव वालों की बोलती बंद हो गई थी।
“आओ छोटे ठाकुर,” मीरा ने अपनी मादक आवाज़ में, गाँव वालों को सुनाते हुए ज़ोर से कहा।
“घर तुम्हारा ही है। आज रात… कोई रोक-टोक नहीं है।”
विक्रम ने एक शैतानी हँसी के साथ मीरा की कमर पकड़ी और वे दसों मर्द उस घर के अंदर दाखिल हो गए। रमेश ने चौखट पर खड़े होकर उन जलते हुए गाँव वालों को देखा, एक घमंडी मुस्कान दी, और ज़ोर से दरवाज़ा बंद कर लिया।
दरवाज़े के उस पार, आज रात मीरा ने तय कर लिया था कि वह अपमान और पतन की हर उस गहराई तक जाएगी, जो इंसानियत की सोच से परे है। उसे दवाइयों के नशे में धुत्त उन दस मर्दों की अथाह भूख मिटानी थी, और अपने इस नंगेपन से पूरे गाँव को ज़िंदा जलाना था।
कमरे में महँगी विदेशी शराब और सिगरेट के धुएँ का घनापन एक जानवरी गर्मी लिए हुए था। हवा में तैरता यह मिश्रण नशा नहीं, एक पूर्वाभास था—उस अमानवीय उत्सव का जो अभी शुरू होना था।
मीरा की पैनी नज़रें खिड़की की उन संकरी दरारों पर टिकी थीं, जहाँ से बाहर की काली रात अंदर झाँक रही थी। उसे साफ दिख रहा था—लकड़ी के पल्लों के बीच कई जोड़ी आँखें, कई साँसें रुकी हुई।
गजेन्द्र सिंह, सावित्री का पति, और वे सब ईर्ष्यालु गँवार जिन्होंने उसकी फसल जलाई थी, आज उसकी देहलीज़ पर छुपकर तमाशबीन बने हुए थे।
“आ गए ना, कुत्तों की तरह सूँघते हुए”,
मीरा ने मन ही मन सोचा, उसके लाल रंग के पलकों के नीचे से एक ठंडी, निर्दय चमक फूट पड़ी।
“तुम्हारी बीवियाँ जिन मर्दों के सपने देखती होंगी, वो आज तुम्हारी आँखों के सामने मेरे लिए अपनी औकात खोलेंगे। तुम सिर्फ देख सकोगे। छू नहीं सकोगे।”
उसने जानबूझकर सोफे पर अपनी मुद्रा बदली। पारदर्शी लाल गाउन निचे से ऊपर और खिसकाया, जिससे उसकी चिकनी जाँघ का और भी अधिक हिस्सा प्रकट हो गया। उसने एक पैर को दूसरे पर रखा, एक ऐसा आत्मविश्वासपूर्ण, राजसी अंदाज जो बाहर झाँक रही आँखों में जलन की आग सुलगाने के लिए पर्याप्त था।
कमरे के बीचोबीच रखे काँच के टेबल पास रमेश खड़ा था, उसके हाथों में महँगी स्कॉच व्हिस्की की बोतल थी। उसकी उँगलियाँ हल्की सी काँप रही थीं, शीशे के गिलास के किनारे से टकराती बोतल की गर्दन से एक बारीक खनखनाहट निकल रही थी।
लेकिन उसके साधारण से चेहरे पर, उसकी किसान वाली मिट्टी-रंगी त्वचा पर, एक अजीब सा विकृत गर्व लिपटा हुआ था। वह गर्व डर से लथपथ था, फिर भी चमक रहा था।
“ये दस शख्स… ये कोई आम गाँव के गुंडे नहीं हैं,” रमेश के दिमाग में विचारों की एक आँधी चल रही थी।
“कल तक जो लोग मुझे ‘भड़वा’ कहकर, मेरी फसल को रौंदकर चले जाते थे, आज उन्हीं के बराबर के रईस… नहीं, उनसे भी ऊँचे… मेरे इस नए घर में मेरी बीवी के लिए लार टपका रहे हैं। मैं इनका नौकर बनकर शराब परोस रहा हूँ… लेकिन असल में? असल में ये सब मेरी मीरा के गुलाम हैं। उसकी एक झलक के गुलाम।”
“अरे रमेश! हाथ जल्दी चला, यार! आज रात बहुत लंबी है, और बहुत कुछ देखना-सहना बाकी है!”
विक्रम ने अपने मोटे होंठों से सिगार का धुआँ छोड़ते हुए गरजती हुई हँसी के साथ कहा। उसने अपनी कुर्सी से उठकर, एक शोमैन की तरह मीरा की तरफ इशारा किया।
“दोस्तों, यही वो मलाई है, यही वो स्वाद है, जिसके लिए तुम सबको शहर की चकाचौंध छोड़कर इस धूल-भरे गाँव का सफर तय करना पड़ा। लेकिन याद रखना, यह सौदा तुम्हारे लिए फायदे का ही होगा। पर पहले… पहले एक-दूसरे से जान-पहचान तो हो जाए। रंगरूप तो देख लिया, अब असली हथियार देखने, दिखाने का वक्त है।”
अमित, अपने विदेशी डिज़ाइन के चश्मे को नाक पर टिकाए, आगे बढ़ा। उसके चेहरे पर शहर के बिगड़ैल रईस की वह ढीठ, निश्चिंत मुस्कान थी जो हर चीज़ को खरीद लेने का दम रखती है।
“भाभी जी,” उसने कहा, उसकी नज़रें मीरा के सीने पर पड़े उभारों को नापती हुई, “मेरे इन खास दोस्तों से रूबरू कराऊँ? बस, नाम लेते ही ये अपनी ताकत का प्रमाण पेश कर देंगे। कोई झिझक नहीं। आज यहाँ शर्म नाम की कोई चीज़ नहीं है।” अमित ने जानबूझकर इज्जत देने की कोशिश की।
मीरा ने सिर्फ़ एक बार सिर हिलाया, उसकी आँखों में एक कुतूहल और चुनौती का विचित्र मिश्रण था। “चलो, दिखाओ। तुम्हारा सब कुछ दिखाओ।”
“तो पहले, मेरा बहुत पुराना दोस्त, राजन,” अमित ने एक तरफ़ इशारा किया।
राजन वहाँ बैठा था—सबसे साफ-सुथरा, सबसे शांत। उसके बाल बिल्कुल सही तरह से संवरे हुए थे, उसकी कमीज़ की सिलवटें ताज़ी लग रही थीं, जैसे अभी प्रेस की हों। उसने एक विनम्र, लगभग औपचारिक सा सिर हिलाया।
“आर्किटेक्ट हूँ,” उसकी आवाज़ धीरी, स्पष्ट और नियंत्रित थी। “हर चीज़ को सही अनुपात और संरचना में देखने की आदत होती है।”
और फिर, बिना किसी हड़बड़ी के, उसने अपने सलीके से पहने हुए ट्राउजर का बटन खोला, ज़िप नीचे की। उसने अपना अंडरवियर हल्का सा नीचे किया और अपना लंड बाहर निकाला।
वह सीधा और गर्व से खड़ा था। लगभग सात इंच लंबा, मोटाई में औसत से थोड़ा अधिक, एकदम सीधा और नापा-तुला हुआ सा। उसकी नसें उभरी हुई थीं, पर उसका आकार आक्रामक नहीं, बल्कि डिज़ाइन किया हुआ लग रहा था। उसने धीरे-धीरे, एक स्थिर गति से, उसे हाथ में लेकर हिलाना शुरू किया।
मीरा ने उसे देखा। “इतना शांत, इतना नियंत्रित। अपने ब्लूप्रिंट की तरह। यह धीरे से, गहराई तक जाएगा। जल्दबाज़ी नहीं करेगा। पर पूरी तरह भर देगा।”
“और ये हैं कल्याण,” अमित ने आगे बढ़ते हुए कहा।
कल्याण एक विशालकाय आदमी था, उसका पेट एक थैले की तरह उसकी गोद में लटका हुआ था। वह अपनी कुर्सी में धँसा हुआ था, उसकी छोटी-छोटी, सूअर जैसी आँखों में एक तीखी चालाकी और आलस्य का मिला-जुला भाव था।
“ज़मींदार हूँ,” उसने एक भारी, घरघराती आवाज़ में कहा। “शरीर भारी है, मेहनत से जी चुराता हूँ। लेकिन दिमाग़… दिमाग़ हमेशा दौड़ता रहता है।”
उसने अपने मोटे हाथों से अपनी पैंट की मोटी कमर खोली। उसका लंड बाहर आया। वह छोटा था—ज़्यादा से ज़्यादा पाँच इंच। लेकिन उसकी चौड़ाई देखने लायक थी—लगभग चार इंच मोटा, एक गद्देदार, छोटा सा डंडा। यह उसके शरीर की तरह ही था—छोटा, लेकिन भरपूर और दबाव डालने वाला।
मीरा की भौंहें थोड़ी सी उठीं। “पाँच इंच… पर चार इंच चौड़ा। यह फाड़ेगा नहीं… बल्कि खूब भरेगा। एक मोटे डंडे की तरह।”
“भोला,” विक्रम ने आवाज़ दी, एक तरफ़ इशारा करते हुए।
भोला दुबला-पतला, उसकी महँगी कुर्ता उसके पतले डीलडौल पर लटक रही थी। उसका चेहरा बदसूरत था, नाक चपटी, आँखें बहुत ज़्यादा फैली हुई। वह बेचैन था, अपनी जगह पर हिल रहा था।
“पास के गाँव के सरपंच का बेटा हूँ,” उसने जल्दी-जल्दी में कहा, उसकी आवाज़ पतली और उत्सुक थी। “मैं… मैं जल्दी काम ख़त्म करना पसंद करता हूँ। दिखा देना चाहता हूँ कि मैं क्या कर सकता हूँ।”
उसने अपनी पैंट में ही हाथ डाला, बेढंगे से अपना लंड बाहर खींचा। वो देखने में अजीब था—लंबा, आठ इंच से भी अधिक, लेकिन अविश्वसनीय रूप से पतला, डेढ़ इंच से भी कम मोटाई लिए हुए। यह एक लंबी, पतली सुई जैसा लग रहा था, जो उसकी बेचैन हथेली में काँप रहा था।
“आठ इंच… पर इतना पतला। यह चुभेगा, भरेगा नहीं। जल्दबाज़ी में चूक जाएगा, अपनी भूख मिटा नहीं पाएगा, मीरा ने तुरंत आँक लिया।”
“समीर,” अमित ने आगे कहा।
समीर गोल-मटोल चेहरे वाला, चश्मा पहने एक सज्जन की तरह बैठा था। उसने एक सौम्य, बौद्धिक सी मुस्कान दी।
“शिक्षक हूँ,” उसकी आवाज़ नर्म और स्पष्ट थी। “तर्क और विवेक में विश्वास रखता हूँ।”
फिर, एकदम शालीनता से, उसने अपने ट्राउजर का बटन खोला और अपना लंड बाहर निकाला। लगभग छह इंच लंबा, मोटाई औसत से थोड़ी अधिक। यह एक सुसंगत, सम्पूर्ण आकार था—न ज़्यादा लंबा, न ज़्यादा मोटा, बल्कि संतुलित। उसने इसे आराम से, एक गति से सहलाना शुरू किया, जैसे कोई समीकरण हल कर रहा हो।
“छह इंच, मोटाई ठीक-ठाक। यह गणित की तरह सटीक होगा। दबाव बनाकर रखेगा, ज़रूरत से ज़्यादा नहीं, मीरा ने नोट किया।”
“जगन,” विक्रम ने एक गठीले, घमंडी दिखने वाले आदमी की तरफ़ इशारा करते हुए नाम लिया।
जगन ने सिर हिलाया भी नहीं। उसकी नज़रें सीधी मीरा पर गड़ी थीं, उसके चेहरे पर एक ऐसा अहंकार था जो किसी चुनौती को मुँह चिढ़ा रहा था।
“ठेकेदार,” उसने एक ही शब्द में कहा। उसने अपनी जीन्स के बटन पर ज़ोर दिया, उसे खोला, और अपना लंड बाहर खींच लिया। साढ़े सात इंच लंबा, मोटाई में औसत से अच्छा। यह आक्रामक रूप से सख़्त था, उसकी मुट्ठी में जानवरों जैसी ताकत से घिरा हुआ।
“साढ़े सात इंच। मारने-पीटने वाला। जानवरों की तरह झपटेगा, ताकत दिखाने की कोशिश करेगा, मीरा ने महसूस किया।”
“दीपक,” जगन के बगल वाले आदमी ने खुद ही कह लिया। वह मोटा था, उसकी गर्दन मोटी सोने की चेन से दबी हुई थी, हर उँगली भारी अँगूठियों से लदी थीं। “एस्टेट ब्रोकर। सोना पसंद है… और वो सब कुछ जो चमकता है।”
उसने अपने मोटे हाथों से अपना लंड बाहर निकाला। लंबाई में लगभग छह इंच, लेकिन चौड़ाई में काफ़ी मोटा। यह उसके शरीर और उसके गहनों की तरह ही था—भारी, दिखावटी, और थोड़ा छोटा।
“छह इंच, पर चौड़ाई ज़्यादा। अपने गहनों की तरह, भारी और दिखावटी। शायद जल्दी थक जाए, मीरा ने सोचा।”
“गोलू,” विक्रम ने कहा। “भोला के गाँव से ही है।”
गोलू एक अजीब दृश्य था। उसका ऊपरी धड़, उसकी छाती और बाँहें, गठीली और ताकतवर थीं, एक मज़बूत मज़दूर की तरह। लेकिन उसका एक पैर पतला और बेकार पड़ा था, जिसकी वजह से उसकी पूरी मुद्रा तिरछी हो गई थी।
उसके चेहरे पर गुस्सा, अपमान और एक जलती हुई बेचैनी थी। वह कुछ बोला नहीं, बस मीरा को घूरता रहा, जैसे उसकी सारी नफरत का निशाना वही हो। उसने ज़ोर से अपनी पैंट खोली और अपना लंड बाहर फेंका। यह आठ इंच से भी लंबा था, मोटाई में औसत से अधिक, एक मजबूत, कड़ी मांसपेशी जैसा, जो उसके गुस्से की तरह ही तनी हुई थी।
“आठ इंच से ज़्यादा, मोटा। यह अपनी अपंगता का बदला लेने आया है। इसका सारा गुस्सा… इसकी सारी ताकत… यहाँ है, मीरा ने विश्लेषण किया, एक सिहरन उसकी रीढ़ के नीचे से गुज़री।”
“और आखिर में… राजू, बॉडी बिल्डर है”
और पूरे कमरे का ध्यान उस विशालकाय व्यक्ति पर केंद्रित हो गया जो अब तक चुपचाप बैठा था। राजू। वह छह फुट से ऊँचा था, उसकी मांसपेशियाँ उसकी कमीज़ के नीचे से पत्थरों की तरह उभरी हुई थीं।
उसका चेहरा एक ख़ामोश तूफान था—आँखों में एक स्थिर, अनमनी हिंसा, होंठ पतले और दबे हुए। वह बोला नहीं। बस, धीरे से खड़ा हुआ, और उसके उठने भर से ही कमरे का संतुलन बदल गया, जैसे कोई पहाड़ अपनी जगह से हिला हो।
उसने अपने ट्रैक पैंट का बटन खोला। ज़िप नीचे खींची। और फिर, एक सहज, अप्रतिरोध्य गति से, उसने अपना लंड बाहर निकाला।
एक सामूहिक, दबी हुई साँस कमरे में फैल गई।
यह एक राक्षस था।
लंबाई में दस इंच से अधिक, और मोटाई तीन इंच से भी ज़्यादा। यह केवल एक लंड नहीं था; यह एक अस्त्र था, एक मोटी, नसदार, शिराओं से लबालब भयंकर मांस की दीवार जो उसकी जँघाओं के बीच से निकलकर हवा में लहरा रही थी।
इसका आकार अमानवीय था, एक ऐसा दंड जो विध्वंस के लिए बना प्रतीत होता था। राजू ने उसे अपने विशाल हथेली में लिया, और उसकी मुट्ठी भी उसकी पूरी परिधि को नहीं छिपा पा रही थी। उसने एक बार, फिर दो बार, जानवरों जैसे उसे सहलाया, और वह और भी सख्त, और भी विशाल होता गया।
मीरा की आँखें फैल गईं। उसके दिमाग ने, जो अब तक हर आकार का विश्लेषण कर रहा था, एक पल के लिए सन्नाटा सा छा गया।
“दस इंच! तीन इंच से ज़्यादा मोटा! यह… यह चीर देगा! यह तोड़ देगा!” यह डर नहीं था, बल्कि एक कठोर, वास्तविकता का आघात था। यह उस सीमा का प्रतीक था जिसे आज रात तोड़ा जाना था।
अब सभी दस मर्द अपने-अपने हथियार लिए खुलेआम खड़े या बैठे थे। कमरे की हवा अब नशीली नहीं, बल्कि जानवरी गर्मी से भर गई थी। दस अलग-अलग आकार, दस अलग-अलग इरादे, दस अलग-अलग प्रकार के आक्रमण का वादा लिए हुए।
राजन का सलीकेदार स्तंभ, कल्याण का मोटा डंडा, भोला की पतली सुई, समीर का संतुलित साधन, जगन का आक्रामक हथियार, दीपक का भारी गोला, गोलू का गुस्सैल तीर, विक्रम और अमित के अनुभवी अस्त्र, और फिर राजू का वह राक्षसी दंड—सब कुछ मीरा की निगाहों के सामने था, उसकी भविष्य की पीड़ा और विजय का नक्शा।
मीरा ने धीरे-धीरे अपनी नज़र उठाई, हर एक आदमी की आँखों में देखते हुए। उसके चेहरे पर वह शैतानी, घमंडी मुस्कान वापस लौट आई थी, जो अब और भी गहरी, और भी चुनौतीपूर्ण थी।
“बहुत खूब,” उसकी आवाज़ फिसलन भरी, लगभग गुनगुनाती हुई निकली।
“एक शानदार संग्रह है आपके पास। एक वास्तुकार, एक ज़मींदार, एक राजकुमार, एक शिक्षक, एक ठेकेदार, एक दलाल, एक योद्धा… और दो व्यापारी। और फिर ये महाकाय।”
उसकी नज़र राजू पर टिक गई।
“आज रात, मैं हर एक के हस्ताक्षर महसूस करूँगी। हर एक की छाप अपने अंदर लूँगी।”
उसने अपने गाउन को और ऊपर खिचा, अपने पूरे जाँघ के मुलायम मांस को उजागर कर दिया। बाहर खिड़की के पीछे, एक दबी हुई हलचल हुई—गाँव वालों की साँसें एक साथ रुक गईं, फिर तेज़ हो गईं।
रमेश कोने में स्तब्ध खड़ा था। उसकी आँखों के सामने उसकी पत्नी का शरीर एक बलिदान की वेदी नहीं, बल्कि एक विजयी मंच बन गया था। और उस मंच के नीचे, दस दावेदार अपने-अपने औज़ारों को सजा रहे थे। उसका अपना लिंग, अपनी साधारणता में, अपनी पैंट में सख्त हो रहा था, लेकिन यह उत्तेजना शर्म की नहीं, एक विकृत, असहनीय गर्व की थी।
विक्रम ने एक लंबी, संतुष्ट सिगार की खींच ली और धुएँ के बादल को छोड़ते हुए कहा, “तो फिर, मीरा जी… पहला निशाना कौन बनेगा? चुनाव आपका है। या फिर… हम लॉटरी लगा लें?”
मीरा की मुस्कान और चौड़ी हो गई। उसकी नज़रें, जो अभी तक राजू के राक्षसी आकार पर टिकी थीं, धीरे-धीरे भोला की बेचैन, पतली सुई पर जा ठहरीं। फिर कल्याण के मोटे डंडे पर। फिर राजन के सलीकेदार स्तंभ पर।
“जल्दबाज़ी किस बात की है, ठाकुर?” उसने आराम से कहा, जैसे कोई शतरंज का खिलाड़ी चाल चलने से पहले विचार कर रहा हो।
“आज रात तो बहुत लंबी है। और हर हथियार को अपना मौका मिलेगा। बारी-बारी से। पूरी तरह से।”
उसके इन शब्दों के साथ ही, बाहर खिड़की की दरार से झाँकती एक जोड़ी आँखें—शायद गजेन्द्र सिंह की—हट गईं, जैसे उन्हें एक झटके में वहाँ से खींच लिया गया हो। मीरा ने इसे देख लिया। उसकी जीत की पहली झलक।
कमरे में, दसों हाथ एक साथ चल रहे थे, दसों लिंग सख्त होकर उस एक स्त्री की प्रतीक्षा में तैयार थे, जो सिंहासन की तरह सोफे पर विराजमान थी। और उस सिंहासन के पीछे, अँधेरे कोने में, एक किसान खड़ा था, जो अपनी ही दुनिया के विध्वंस और पुनर्निर्माण का मूक गवाह बनने को तैयार था।
To be continued . . .
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