गरीबी का सौदा cuckold बन के किया – 4
विक्रम ने अपनी सिगार का एक लंबा, धीमा कश लिया। धुआँ उसके नथुनों से निकलकर हवा में लहराता हुई मीरा के चेहरे तक पहुँचा, जैसे एक अदृश्य बेड़ी उसे बाँध रहा हो। वह आगे बढ़ा, अपने भारी डील-डौल से उस पर हावी होता हुआ, उसकी छाया ने मीरा के पूरे शरीर को निगल लिया।
“सबसे पहला हक़ मेरा है, रांड,”
उसने अपनी आवाज़ को एक खुरदुरे, दावेदारी भरे स्वर में घुमाया। उसकी आँखों में वह शिकारी चमक थी जो सौदेबाज़ी के क्षणों के बाद अब संपत्ति पर कब्ज़े के क्षण में बदल गई थी।
“क्योंकि सबसे पहला विश्वास… सबसे पहला पैसा… और सबसे पहली बार तेरी चूत को… मैंने ही लिया था। याद है ना? जब तेरे इस भड़वे पति ने कर्जा उतारने के लिए पैसा लिया था, और तूने मेरे दरवाज़े पर दस्तक दी थी? मैंने ही तुझे सिखाया था कि औरत की देह ही उसका सबसे मजबूत हथियार होती है।”
उसने अपनी बेल्ट खोली। उसका साढ़े सात इंच लंबा, कड़ी नसों से उभरा हुआ लंड पहले से ही सख्त और लालिमा लिए हुए था, जैसे कोई जंगली जानवर जाग गया हो। उसने मीरा के काले, घने बालों की एक लट पकड़ी और उसे एक जानवरों वाले झटके के साथ अपनी गोद की ओर खींच लिया। मीरा का शरीर लुढ़क गया, उसकी पीठ चारपाई के किनारे से टकराई, एक मामूली थप-थपाहट हुई। उसने आँखें बंद नहीं कीं। उसकी नज़र सीधी खिड़की की उन दरारों पर थी, जहाँ से अब भी वे आँखें झाँक रही थीं।
“‘देखो, गजेन्द्र सिंह… देखो सब।”
“देख, रमेश,” विक्रम ने अपना सिर घुमाकर कोने में खड़े पति से कहा। उसने अपना लंड उठाया और उसे मीरा के लाल लिपस्टिक से रंगे होंठों पर टिका दिया। लंड का गर्म, चिकना सिरा उसके होंठों को छूता ही था कि मीरा की पलकें एक बार फड़फड़ाईं। एक सेकंड का विरोध, फिर समर्पण।
“तेरी बीवी की यही औकात है। हमारे पैरों के नीचे। हमारे लंडों के सामने एक गर्म, गीला गड्ढा। बस इतना ही। और तू… तू सिर्फ एक गवाह है। एक कमीना भडवा।”
उसने एक जोरदार झटका दिया। “श्लूप!!!!..गाक्ख्ह्ह!!!”
आवाज़ गीली और दम घोंटने वाली थी, जैसे किसी गहरी, चिकनी मिट्टी में पैर धँस गया हो। मीरा का मुँह बलपूर्वक चौड़ा हुआ और वह उसकी पूरी लंबाई एक ही बार में निगल गई। उसका गला अचानक फूला, उसकी आँखों में पानी भर आया, पलकें गीली हो गईं, लेकिन उसने आँखें नहीं मूंदीं। वह उन्हीं दरारों की ओर देखती रही। विक्रम ने उसके सिर को दोनों हाथों से कसकर पकड़ लिया, अपनी उँगलियाँ उसके बालों में जकड़ दीं, जैसे कोई घोड़े की लगाम कस रहा हो। फिर वह एक पशुवत, निर्मम लय में धकेलना शुरू कर दिया।
“अउम्फ… अउम्फ… अउम्फ…”
हर धक्का गहरा और तेज था। हर बार उसका लंड मीरा के गले के पिछले हिस्से से टकराता,
“गाक… गाक …गाक …गाक …”
एक गले की घुटन भरी आवाज़ पैदा करता। मीरा की साँसें फूलने लगीं, उसके नथुनों से हवा सीटी की आवाज़ निकालती हुई बाहर आ रही थी, उसकी छाती तेजी से उठ-गिर रही थी।
विक्रम ने उसका सिर पीछे खींचा, उसे अपने लंड से अलग किया। मीरा की जीभ बाहर लटकी हुई थी, लार की लकीरें ठुड्डी तक बह रही थीं, उसके होंठ चिपचिपे और लाल थे। विक्रम ने अपना सिर झुकाया और उसके चेहरे पर एक गर्म, गाढ़ा थूक फेंका। वह उसकी आँखों और नाक पर फैल गया, एक सफेद, चिपचिपी परत की तरह।
“ये ले! गाँव की रांड!”
वह गुर्राया, उसकी आवाज़ में नफरत और तृप्ति का एक विषैला मिश्रण था। फिर वह और भी तेजी से चलने लगा, अब उसकी गति एक यंत्र की तरह निर्दय और लयबद्ध थी।
उसकी जाँघों की मांसपेशियाँ तनी हुई थीं, उसके दाँत पिस रहे थे, उसकी गर्दन की नसें फूल गई थीं। अंत में, एक लंबी, जानवरी गुर्राहट उसके गले से निकली—
“ऊँऊऊऊहह… साली!”
उसका शरीर एकदम से ऐंठ गया, एक ज़ोरदार झटके के साथ। उसने मीरा के सिर को और कसकर अपनी ओर दबाया, उसके चेहरे को अपनी जाँघों से चिपका लिया, उसकी नाक और मुँह अपने जघनों में दबा दिए।
“फ्फ्फ्फ्फ्फ…”
गाढ़ा, गर्म वीर्य उसके गले के पिछले हिस्से में सीधे उतरा, उसका गला भरते हुए, एक गर्म धार की तरह जो उसकी अन्न नली में जलन पैदा कर रही थी।
“निगल!”
विक्रम चिल्लाया, उसकी आवाज़ में एक आदेश की जगह एक पागलपन भरा उन्माद था।
“सारा का सारा निगल! और आँखें खोलकर देख! अपने नामर्द पति की तरफ देख! उसे बता कि कैसा स्वाद है!”
मीरा ने आँखें खोलीं। वीर्य और लार से सनी पलकों के पीछे से उसकी नज़र साफ और स्थिर थी। उसका गला हिला।
“गुल्प… गुल्प…”
दो बार। आवाज़ साफ और सुनाई देने वाली थी, जैसे कोई चट्टान निगल रही हो, एक भारी सत्य को पचा रही हो। फिर वह धीरे-धीरे अपना सिर घुमाई। उसकी नज़र कोने से होती हुई सीधे रमेश पर टिक गई। उसकी आँखों में दर्द नहीं था, गुस्सा नहीं था, शर्म नहीं थी। सिर्फ एक गहरा, बर्फीला सत्य था, एक गवाही थी।
“हाँ… देख रहे है ना जी ? मैंने कैसे निगल लिया!, यह मेरा अपमान नहीं… यह हमारा हिसाब है। और आप… आप भी इस हिसाब का एक हिस्सा है। आपकी चुप्पी, आपकी मौजूदगी… यही तो मेरी ताकत है।”
उसने रमेश की आँखों में देखा। रमेश का चेहरा पीला पड़ गया था, मिट्टी जैसा फीका। उसकी मुट्ठियाँ बंधी हुई थीं। उसकी आँखों में एक भयंकर युद्ध चल रहा था—शर्म का समुद्र और गर्व की एक जलती हुई चिंगारी। और उसकी पैंट के बटन के नीचे, एक उभार साफ दिख रहा था। वह भी इस नर्क का एक हिस्सा बन चुका था, एक सहयोगी, एक प्रेरित दर्शक।
विक्रम ने अपना लंड बाहर खींचा, एक चिपचिपी, गीली आवाज़ के साथ। उसने मीरा के बाल छोड़ दिए। वह लड़खड़ाती हुई सीधी बैठ गई, उसके होंठों से वीर्य और लार की एक सफेद धार बह निकली, जो उसकी गर्दन पर टपककर उसके सीने के उभारों तक पहुँच गई।
वह साँस लेने के लिए हाँफ रही थी, गहरी, कर्कश साँसें भर रही थी, लेकिन उसके चेहरे पर एक विचित्र शांति थी, जैसे उसने कोई पहला युद्ध जीत लिया हो, कोई पहली सीमा पार कर ली हो।
उसकी एक झलक फिर खिड़की की ओर गई। दरारें अब भी वहीं थीं। आँखें अब भी वहीं थीं। लेकिन अब उनमें जलन के साथ-साथ एक भय भी दिखाई दे रहा था।
विक्रम पीछे हट गया, अपनी सिगार फिर से मुँह में लगाते हुए, जो अब भी धुआँ छोड़ रही थी। उसने अपने दोस्तों की तरफ देखा, जो चुपचाप यह सब देख रहे थे, उनकी आँखों में हवस अब और गहरी, और खतरनाक हो चुकी थी, सब अपना अपना लंड हिला रहे थे, अपनी बारी का इंतज़ार करते हुए, जैसे एक भूख जाग गई हो जो अब शांत नहीं हो सकती।
“अब तेरी बारी, अमित,”
विक्रम ने कहा, एक शैतानी मुस्कान के साथ, जबकि उसने अपनी सिगार से धुएँ का एक घेरा छोड़ा। वह पीछे हटकर एक कुर्सी पर बैठ गया, उसकी नज़रें अब भी मीरा के लार और वीर्य से सने चेहरे पर टिकी हुई थीं।
“देखते हैं तेरा क्या हुनर है। बिजनेस के पैमाने पर कैसे तौलता है तू इस ‘एसेट’ को।”
अमित आगे बढ़ा, उसने अपना चश्मा उतारा, एक धीमी, सोची-समझी हरकत में। उसने अपनी शर्ट के सफेद, महँगे कपड़े के कोने से लैंस को साफ किया, यह एक ऐसा सटीक, व्यवसायिक हरकत थी जो उसकी पूरी प्रकृति को दिखा रही थी—हर चीज़ का मूल्यांकन, हर चीज़ की सफाई।
चश्मा वापस लगाते हुए, उसकी नज़र मीरा पर पड़ी, जो अब भी विक्रम के वीर्य को निगलने के बाद हाँफ रही थी, उसकी छाती तेजी से उठ-गिर रही थी, और उसके चेहरे पर सफेद तरल की परत चमक रही थी।
“मेरी बारी,”
अमित ने कहा, उसकी आवाज़ विक्रम के गुर्राने की जगह एक ठंडी, गणना करने वाली, बिल्कुल बैंक मैनेजर जैसी थी।
“मैं इसे… व्यापार का पाठ पढ़ाऊँगा। बाज़ार का नियम। डिमांड एंड सप्लाई। और क्वालिटी एश्योरेंस।”
उसने अपना सिर घुमाकर रमेश से देखा, जो अब भी गिलासों को बेमन से पोंछ रहा था, उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं लेकिन उसके चेहरे पर एक अजीब सी तृप्ति थी।
“इसे खड़ा कर। दीवार के सामने। मैं चाहता हूँ कि यह ‘एसेट’ अपनी पूरी ऊंचाई पर दिखे। प्रेजेंटेशन मैटर्स।”
रमेश हिला। एक पल की हिचकिचाहट थी, उसकी आँखों में एक मूक अपील, एक दर्द—लेकिन उसके नीचे, एक गहरी, कुंद उत्तेजना भी धड़क रही थी।
“ये सब देख रहा हूँ मैं… मेरी मीरा… मेरी बीवी… सबकी नज़रों में… सबकी इच्छा का केंद्र… और मैं यहाँ खड़ा हूँ… उसका पति… उसका मालिक नहीं… उसका संरक्षक… उसके इस तांडव का साक्षी…”
लेकिन मीरा ने खुद ही अपने हाथों से चारपाई के किनारे को पकड़ा और अपने टूटे हुए, कांपते हुए पैरों पर खड़ी हो गई। उसने रमेश की ओर देखा, एक पल के लिए, और उसकी आँखों में एक अनकहा संदेश था—
“डरो मत… यह हमारी लड़ाई है… और हम जीत रहे हैं।”
वह दीवार की तरफ लड़खड़ाती हुई गई और अपनी पीठ उस ठंडी, पलस्तर वाली दीवार से टिका दी। उसकी छाती तेजी से उठ-गिर रही थी, उसके शरीर पर पसीना, लार और विक्रम के तरल पदार्थ चमक रहे थे, उसका लाल गाउन अब कमर तक खुल चुका था, उसके निचले हिस्से का कोई आवरण नहीं बचा था।
उसकी नज़र बार-बार खिड़की की उन दरारों पर जा रही थी।
“देखो… देखो अब… ये शहर में रहने वाला विक्रम का भाई… ये भी मेरे आगे बेबस है…”
अमित उसके सामने आया। उसने अपने हाथ से मीरा की ठुड्डी पकड़ी, उसका सिर दीवार के खिलाफ दबा दिया, एक डॉक्टर के मरीज को जांचने या एक खरीदार के सामान को परखने जैसा अंदाज।
उसका लंड, विक्रम के मुकाबले पतला लेकिन सख्त और सीधा, लगभग सात इंच लंबा, बाहर था। यह एक ‘बिजनेसमैन’ का लंड था—उद्देश्यपूर्ण, नियंत्रित, और निर्मम रूप से कार्यक्षम। उसने इसे अपने हाथ में लिया, एक बार सहलाया, जैसे कोई अपना पेन चेक कर रहा हो।
“तुम एक एसेट हो, मीरा,”
अमित ने शुरुआत की, उसकी आवाज़ एक लेक्चर देते प्रोफेसर या शेयर बाजार का विश्लेषक जैसी थी।
“और हर एसेट की वैल्यू… उसकी यूटिलिटी से पता चलती है। उसकी उपयोगिता से। उसकी मांग और पूर्ति से। आज रात, तुम्हारी मांग बहुत ज़्यादा है। देखते हैं तुम्हारी सप्लाई कितनी है। तुम्हारी क्वालिटी क्या है।”
उसने अपना लंड मीरा के खुले मुँह में न डालकर, अचानक उसे उठाया और मीरा के पूरे चेहरे पर—गालों, आँखों, माथे, होंठों पर—जोर-जोर से मारना शुरू कर दिया। यह सेक्स नहीं था, यह एक मूल्यांकन था। एक वस्तु का मूल्य तौलना।
“थप! थप्प! थप-थप-थप!”
आवाज़ तेज और चपटी थी, गाल पर थप्पड़ जैसी। लंड का गर्म, नम सिरा उसकी त्वचा से टकराता, एक अजीब सी चिपचिपी आवाज़ पैदा करता। कुछ वार आँखों के पास लगे, जिससे मीरा अपनी पलकें झपकाने लगी, लेकिन उसने अपना सिर स्थिर रखा।
उसकी नज़र अब भी खिड़की पर थी।
“ये है तेरा फेस वैल्यू!”
अमित ने कहा, हर थप्पड़ के साथ, उसकी आवाज़ बिल्कुल बेतरही, विश्लेषणात्मक।
“तेरे चेहरे की कीमत! ये है ब्रांड इक्विटी! लेकिन ब्रांड इक्विटी अकेली कुछ नहीं… असली चीज़ है प्रोडक्ट क्वालिटी!”
फिर, बिल्कुल अचानक, उसने रुककर एक गहरा, सटीक धक्का दिया।
“श्लूप!!!!”
वह पूरी लंबाई से अंदर घुस गया, मीरा के गले की नसें एकबार फिर बाहर निकल आईं, उसका मुँह जबरदस्ती चौड़ा हुआ। अमित की शैली विक्रम से अलग थी। यह नियंत्रित थी, लेकिन उतनी ही निर्दय।
वह गहराई तक जाता, पूरे लंबाई से, फिर वहीं रुक जाता, कुछ सेकंड के लिए, जैसे कोई मशीन अपना माप ले रही हो, प्रेशर चेक कर रही हो। फिर वह धीरे से, पूरी तरह बाहर खींचता, लगभग पूरा, और फिर दोबारा अंदर धँसाता। यह एक मैकेनिकल प्रक्रिया थी।
“रमेश,” अमित ने अपना सिर घुमाया, लेकिन शरीर का संपर्क बनाए रखा, उसकी नज़रें अब भी मीरा के चेहरे के भावों को पढ़ रही थीं।
“बता? तेरी बीवी का मुँह… यह गला… कितने का है? अस्सी हज़ार रुपए के लिए किराए पर दिया है ना आज? या इसकी असली कीमत एक लाख है? मार्केट रेट क्या कहता है?”
रमेश का गला सूख गया। वह कुछ नहीं बोल पाया, सिर्फ एक अजीब सी आवाज़ निकली—
“ह… हु…”
उसकी जीभ लड़खड़ा गई। उसकी नज़र मीरा पर थी, जो दीवार से सटी हुई थी, उसका मुँह फैला हुआ था, और उसकी आँखें… उसकी आँखें अब भी खुली थीं, और वे सीधे उससे जा मिल रही थीं। उनमें कोई शिकायत नहीं थी, कोई मदद की गुहार नहीं थी। सिर्फ एक गहरी, थकी हुई चुनौती थी।
“बोलिए ना,जी… बोलिए कि मैं कितने की हूँ… इसी में हमारी जीत है।”
अमित ने मीरा के बाल पकड़े, उन्हें अपनी मुट्ठी में जकड़ लिया, और फिर उसके सिर को जानबूझकर, तालबद्ध तरीके से अपनी जाँघों से टकराना शुरू कर दिया।
“धड़म! धड़म! धड़म!”
हर टक्कर एक कुंद, दर्दनाक आवाज़ पैदा करती। यह उसके गले में धकेलने से ज़्यादा अपमानजनक था, यह एक पशु को हांकने जैसा था। मीरा का सिर हर झटके से पीछे की ओर उछलता, दीवार से टकराता। लेकिन उसने आवाज़ नहीं निकली।
बाहर, खिड़की से एक दबी हुई, सामूहिक सिसकारी की आवाज़ आई—गाँव के वे लोग जो चुपचाप सुन रहे थे, उनकी साँसें एक साथ अटक गई थीं, फिर एक सामूहिक, दम घुटती हुई साँस के साथ छूटीं। मीरा ने यह आवाज़ सुन ली।
उसके होठों के कोने, जो अमित के लंड से फैले हुए थे, एक बार फिर से मुड़े—एक सूक्ष्म, विजयी मोड़।
“सुन लिया ना तुमने? ये आवाज़ है तुम्हारी हार की।”
अमित ने अपनी गति बढ़ा दी, अब वह और तेज, और गहरा धकेलने लगा, उसका नियंत्रण टूट रहा था, उसकी सांसें तेज हो गईं।
“गाक गाक गाक गक्ग…”
उसके चेहरे पर वह ठंडा, व्यवसायिक भाव गायब हो चुका था, उसकी जगह एक पशुता ने ले ली थी। उसके गाल लाल हो गए, उसकी आँखों में वह शुष्क चमक गायब होकर एक गीला, उन्मादी भूख ने ले ली थी।
“क्वालिटी… क्वालिटी चेक… अभी हो रहा है…”
वह हाँफने लगा, उसकी आवाज़ अब लेक्चर देने वाले की नहीं, एक जानवर की थी जो शिकार पर झपट पड़ा है।
“अउम्फ-अउम्फ-अउम्फ!” हर धक्का अब अनियंत्रित था, गहरा और तेज।
अंत में, उसका शरीर तन गया, एक कड़ी ऐंठन के साथ। उसने मीरा को अपनी ओर खींचा, उसके चेहरे को अपने जघनों से चिपका लिया, और ,
“फ्फ्फ्फ्फ्फ…”
एक लगातार, पतली धार में अपना वीर्य निकाला। लेकिन वह उसके गले में नहीं, बल्कि सीधे उसके चेहरे पर छिड़क दिया—आँखों पर, गालों पर, नाक पर, खुले होंठों पर।
सफेद, गाढ़ा तरल उसकी बंद पलकों पर, नाक के पुल पर, होंठों के कोनों पर फैल गया। कुछ बूँदें उसकी पलकों से चिपक कर लटक गईं, जैसे विषाद के सफेद आँसू, और कुछ उसके होंठों पर जम गई, एक चिपचिपी मोम की परत सी।
अमित ने अपना लंड बाहर खींचा, एक चूसने जैसी आवाज़ के साथ। उसने मीरा के बाल छोड़ दिए। वह लड़खड़ाती हुई दीवार से सटी रही, उसका चेहरा अब उसके अपने वीर्य से सना हुआ था, एक तरल मुखौटा पहने हुए।
उसने आँखें खोलीं। सफेद तरल की परत के नीचे से उसकी पुतलियाँ चमक रही थीं, और वे सीधे खिड़की की दरारों पर जा टिकीं।
“देख लिया ना? ये तुम्हारे अमीर सेठ का पानी है… मेरे चेहरे पर… तुम्हारी बीवियों के चेहरे पर कभी नहीं चढ़ेगा…”
अमित ने अपना चश्मा फिर से ठीक किया, जैसे कोई काम पूरा करके अपना उपकरण संभाल रहा हो। उसने अपनी साँसों को नियंत्रित किया, अपनी शर्ट को ठीक किया, और फिर मीरा के चेहरे को देखा, जो अब एक गन्दी, चिपचिपी कलाकृति लग रहा था। उसकी नज़र में फिर से वही ठंडापन लौट आया था।
“मार्केट प्राइस तो ठीक है,”
उसने अपने दोस्तों की तरफ मुड़ते हुए कहा, एक व्यवसायिक रिपोर्ट देते हुए।
“लेकिन क्वालिटी… सेकेंड ग्रेड। ज़्यादा इस्तेमाल से घिस चुकी है। रेट में छूट की गुंजाइश है।”
रमेश कोने में खड़ा, अपनी मुट्ठी को इस ताकत से भींच रहा था कि उसके नाखून हथेली में घुसने लगे थे। उसकी नज़र मीरा के वीर्य से सने चेहरे पर थी, और फिर अमित के संतुष्ट, व्यवसायिक चेहरे पर।
उसके मन में एक तूफान था—गर्व का एक ज्वार और शर्म की एक भयंकर लहर, और इन दोनों के बीच, एक गहरी, कुरूप उत्तेजना जो उसकी पैंट को तनाव दे रही थी।
“मेरी मीरा… मेरी रानी… तू कितनी खूबसूरत लग रही है… इस नर्क में भी… तू जीत रही है… और मैं… मैं तेरे साथ हूँ… हमेशा…”
वह पीछे हट गया, शराब का गिलास उठाते हुए। उसकी जगह लेने के लिए पहले से ही एक तीसरा आदमी आगे बढ़ रहा था—राजन। उसकी आँखों में अब कोई संकोच नहीं था, सिर्फ एक खुली हुई, उत्तेजित लालसा थी जो उसके शांत बाहरी व्यवहार के नीचे एक खतरनाक गहराई तक जाती थी।
रमेश ने देखा कि खिड़की के बाहर की साँसें अब और तेज, और करीब आती जा रही थीं, जैसे वे दर्शक इस नाटक में और डूब रहे हों।
राजन ने आगे बढ़ते हुए अपनी कमीज़ की आस्तीनें ऊपर चढ़ाईं। यह कोई जुनूनी हरकत नहीं थी, बल्कि एक कार्यशील तैयारी थी, जैसे कोई मैकेनिक किसी मशीन पर काम करने से पहले अपनी यूनिफॉर्म सही करता हो।
उसकी आँखों में कोई गर्म हवस नहीं, बल्कि एक ठंडा, विश्लेषणात्मक भाव था, जैसे वह एक जटिल ब्लूप्रिंट को हल करने जा रहा हो।
“इसे फर्श पर लिटाओ,”
उसने एक सपाट, आदेशात्मक स्वर में कहा, अपनी नज़र मीरा पर टिकाए हुए जो अब भी दीवार से सटी हुई साँस भर रही थी।
“सिर उत्तर दिशा की तरफ। शुद्ध ज्यामितीय अक्ष पर। मैं कोणीय दक्षता से काम लूँगा। कोई फालतू की गति नहीं। कोई अपव्यय नहीं।”
विक्रम और अमित ने तुरंत मीरा को पकड़ा। वह पहले से ही लड़खड़ा रही थी, उसके घुटने काँप रहे थे, उसकी टाँगें जवाब दे रही थीं। उन्होंने उसे ठंडे, कंक्रीट के फर्श पर लिटा दिया।
उसकी पीठ का नंगा तल फर्श से टकराया, एक थप्पड़ जैसी आवाज़ आई। मीरा ने आँखें बंद कर लीं, एक पल के लिए, फर्श की ठंडक उसकी त्वचा में समा रही थी।
राजन ने अपने जूते उतारे—महँगे, चमचमाते लेदर के जूते। उसने उन्हें सावधानी से मीरा के सिर के दोनों ओर रख दिया, जैसे कोई पवित्र वस्तुएँ हों, एक वर्ग बनाते हुए। जूतों का चमड़े का गंध और फर्श की धूल का मिश्रण उसके चेहरे के इतने करीब था कि वह उसे सूंघ सकती थी।
उसका लंड सात इंच का था, एकदम सीधा और बिल्कुल नापा हुआ, जैसे किसी इंजीनियरिंग ब्लूप्रिंट से उतरा हो। उस पर एक भी मुड़ी हुई नस नहीं थी; वह एक ग्रे, निष्क्रिय टूल जैसा लग रहा था जो अचानक सक्रिय हो गया हो।
“तुम्हारा शरीर,”
राजन ने शुरू किया, अपना लंड हाथ में लेते हुए, उसकी उँगलियाँ उसकी लंबाई को नापती हुईं,
“एक अनियोजित, अराजक ढाँचा है। गाँव की कच्ची मिट्टी जैसा। टेढ़ा-मेढ़ा, भावनाओं से भरा, अतार्किक। मैं इसे दुरुस्त करूँगा। शहरी व्यवस्था दूँगा। एक इमारत की तरह सीधा, खड़ा, और कार्यात्मक।”
वह झुका, अपने घुटनों को मोड़कर, उसकी जाँघें मीरा के कंधों के पार्श्व में आ गईं। उसने अपने हाथों से मीरा के सिर को पकड़ा, उसे जूतों के बीच स्थिर किया। और बिना किसी भूमिका के, एक ड्रिल मशीन की तरह सीधा और सटीक तरीकेसे अपना लंड घुसा दिया।
“श्र्र्र्रूप!!!!!…”
आवाज़ भी यांत्रिक थी, एक गीला पिस्टन जैसी। राजन की गति एक एल्गोरिदम की तरह थी—पूर्णतः लयबद्ध और निर्दय। हर धक्का बिल्कुल एक ही गहराई तक जाता, एक ही कोण पर, एक ही बल के साथ।
वह अपने कूल्हों को पीछे खींचता, एक सेकंड रुकता—शायद माप लेता हुआ—और फिर ठीक उसी तरह आगे धकेलता। कोई भावना नहीं, कोई उत्तेजना नहीं, सिर्फ कार्यपूर्ति। उसकी साँसें भी समान रूप से निकल रही थीं।
उसने अपना एक हाथ आगे बढ़ाया और अपनी उँगलियों से मीरा की नाक बंद कर दी। मीरा का शरीर ऐंठा। उसकी साँस रुक गई। उसकी आँखें चौंधियाईं, ऑक्सीजन की तलाश में, उसकी पुतलियाँ फैल गईं।
“मुँह से साँस लो,” राजन ने निर्विकार आदेश दिया, जैसे कोई निर्देश दे रहा हो।
“अपना काम करो। यही तेरी अब एकमात्र जिम्मेदारी है।”
मजबूरन, मीरा ने अपना मुँह और खोला, एक गहरी, घुटन भरी साँस लेने की कोशिश में। और उसी क्षण राजन ने अपने कूल्हे आगे किए, अपने लंड को उसके गले की और गहराई में धकेल दिया।
“गाक्ख्ववावव्व्ह्ह!!!!!!!…”
अब वह नाक से साँस नहीं ले सकती थी, सिर्फ मुँह से। और मुँह तो उस लंड से अटका पड़ा था, एक मोटे, ठोस प्लग की तरह। हर साँस के साथ, उसे उसकी लंबाई, उसकी मोटाई, उसकी उपस्थिति को और अंदर खींचना पड़ रहा था। यह डूबने जैसा था, एक नियंत्रित, यांत्रिक डूबने की प्रक्रिया जहाँ पानी की जगह मर्द की देह थी।
राजन की यांत्रिक गति जारी रही।
“अउम्फ… अउम्फ… अउम्फ…” हर धक्का एक ही लय में।
“गाक्क!……गाक्क!!……..गाक्क!……गाक्क!!……गाक्क!!..”
उसके चेहरे पर एक बूँद पसीना नहीं था। वह एक मशीन की तरह था जो अपना प्रोग्राम रन कर रहा हो। रमेश कोने में खड़ा यह सब देख रहा था, उसकी आँखें फैली हुई थीं। उसकी अपनी साँसें तेज हो गई थीं।
“यह… यह क्या है? यह प्यार नहीं है… नफरत नहीं है… यह तो… एक काम है… और मीरा… वह इस काम की मशीन है… मेरी मीरा… कितनी अजीब है यह बात… पर कितनी सच है…”
उसकी पैंट में लंड का उभार और सख्त हो गया, एक विरोधाभासी उत्तेजना जो उसके मन के गर्व और शरीर की लालसा के बीच फँसी हुई थी।
जब राजन चरम पर पहुँचा, तो उसने अपनी आँखें बंद कीं। उसके शरीर में कोई ऐंठन या गुर्राहट नहीं हुई। बस एक हल्का सा कंपन, जैसे कोई मोटर अपनी अंतिम ऊर्जा खर्च कर रही हो, एक सूक्ष्म कंपकंपी जो उसकी जाँघों से शुरू होकर उसकी रीढ़ तक गई।
फिर उसने अपना वीर्य निकाला। यह एक पतली, सटीक धार थी, जो सीधे मीरा के गले के पिछले हिस्से में उतरी, बिना एक बूँद गिराए, बिना उसकी जीभ या होंठों को छुए, जैसे एक पाइपलाइन से तरल सीधे टैंक में गिर रहा हो। एक परफेक्टली एक्जिक्यूटेड ऑपरेशन।
उसने पूरी लंबाई बाहर खींची, एक हल्की चिपचिपी आवाज़ के साथ। उसने मीरा की नाक से हाथ हटा लिया। मीरा एक ज़ोरदार, घुटन भरी साँस अंदर खींची,
“हाँआआह!”
उसका पूरा फेफड़ा हवा से भर गया, और फिर वह खाँसने लगी, एक गहरी, दर्दनाक खाँसी जो उसके पूरे शरीर में ऐंठन ला रही थी।
“खाँ-खाँ-खाँ!” उसका शरीर सिकुड़ रहा था, उसकी आँखों से पानी बह रहा था, लेकिन वह अब भी चुप थी, कोई चीख नहीं।
राजन ने अपने जूते उठाए, उन्हें पहना, बिना किसी जल्दबाजी के। उसने अपनी कमीज़ की आस्तीनें नीची की, हर बटन को सही तरीके से बंद किया। उसने मीरा की तरफ, फर्श पर पड़ी उस टूटी हुई, काँपती हुई देह की तरफ, एक नज़र डाली—जैसे कोई इंजीनियर किसी पूरी हो चुके प्रोजेक्ट को, उसकी कमियों और उपलब्धियों को, एक ठंडी नज़र से देखता है।
“संरचना पूर्ण,” उसने घोषणा की, अपने दोस्तों की तरफ मुड़ते हुए, उसकी आवाज़ फिर से वही सपाट, सूचनात्मक स्वर था।
“डिजाइन के अनुसार मजबूतीकरण हो गया। अगला।”
और जैसे ही उसने यह कहा, चौथा आदमी, कल्याण, अपनी भारी देह को आगे बढ़ाते हुए, अपने मोटे होंठों पर एक लालची मुस्कान लिए हुए, तैयार खड़ा था।
एक भरी, मोटे चेहरे वाला व्यक्ति जिसके हाथ में पहले से ही एक छोटी सी शराब की बोतल थी जिसे वह बेचैनी से घुमा रहा था। खिड़की के बाहर, साँसें रुकी हुई थीं, लेकिन अब उनमें एक दबी हुई, भयभीत हलचल आने लगी थी, जैसे देखने वालों का धैर्य अब टूट रहा हो।
कल्याण आगे बढ़ा। वह दसों में सबसे भारी था—एक मोटा, भारी-भरकम ज़मींदार जिसका पेट महँगी शराब और गाँव की लगान वाली कमाई से लटक रहा था, एक ढीला थैला जैसा।
उसकी चाल लुढ़कती हुई, असंतुलित थी, नशे और अपने वजन के कारण। उसकी छोटी-सी, लाल आँखें मीरा पर टिक गईं, जो अब भी फर्श पर पड़ी हाँफ रही थी, उसका चेहरा और गला पिछले तीन मर्दों के द्रव्यों से सना हुआ था, एक चिपचिपा, बहुरंगी मुखौटा।
“मेरी बारी,”
कल्याण ने गुर्राते हुए कहा, उसकी आवाज़ गले में घुटे हुए शराब और एक विशेष प्रकार की घृणा से भरी हुई—वह घृणा जो असफल इच्छा से पैदा होती है।
“मैं इसकी शकल पर बैठूँगा। जैसे मैं अपनी ज़मीन पर बैठता हूँ। मेरी ज़मीन जैसा वजन… इसके चेहरे पर पड़ेगा। और यह… यह मेरे नीचे दब जाएगी… जैसे तेरे खेत की मिट्टी दब गई थी पिछले साल… है ना, रमेश?”
उसने झुककर मीरा के बालों की एक लट पकड़ी और उसे एक झटके से पीठ के बल खींच लिया, उसकी पीठ फर्श पर रगड़ खाती हुई। फिर, बिना किसी चेतावनी के, उसने अपना दायाँ पैर उठाया—एक भारी, मैले जूते वाला पैर—और उसे मीरा के नंगे सीने पर, उसके उभारों के ठीक बीच में रख दिया।
उसने धीरे-धीरे दबाव डालना शुरू किया। मीरा की पसलियाँ चरमराईं, एक दबी हुई चीख उसके गले से निकलकर रुक गई, एक घुटा हुआ गला घोंटना। वह साँस नहीं ले पा रही थी। उसका हाथ बेबस होकर कल्याण के टखने को पकड़ने की कोशिश करने लगा, लेकिन वह बेकार था, एक पत्थर पर लिखी लकीर की तरह।
रमेश कोने में खड़ा, अपने दाँत पीसता हुआ, देख रहा था। उसकी आँखों में पानी था, लेकिन उसकी मुट्ठियाँ बंधी हुई थीं, और उसकी पैंट में वही अजीब उभार अब भी मौजूद था।
“मेरी मीरा… मेरी जान… यह सूअर तुझे कुचल रहा है… और मैं… मैं सिर्फ देख रहा हूँ… पर तू जानती है ना? तू जानती है कि यह देखना भी… एक तरह की मदद है… एक तरह का साथ है…”
कल्याण ने अपनी पतलून खोली। उसका लंड छोटा था—बस पाँच इंच—लेकिन बेहद मोटा, लगभग चार इंच चौड़ा, एक गुस्सैल, सूजा हुआ गाँठ जैसा, एक पके हुए आलू की तरह। उसने इसे हाथ में लेकर मीरा के चेहरे पर टिका दिया, उसके होठों को उसकी गर्मी से दबाया।
वह आगे बढ़ा, अपना भारी शरीर मीरा के ऊपर ले जाते हुए, और फिर उसके चेहरे पर बैठ गया। उसने अपना पूरा वजन नहीं डाला—वह इतना मूर्ख नहीं था कि उसे मार ही डाले—लेकिन पर्याप्त डाला।
यह एक अविश्वसनीय, दम घोंटने वाला भार था। मीरा की गर्दन एक तरफ मुड़ गई, उसका कान फर्श से दब गया। उसकी दृष्टि धुंधला गई, काले और सुनहरे धब्बे नाचने लगे। उसके सिर की हड्डियाँ ठंडे फर्श के खिलाफ दब गईं। कल्याण ने अपने कूल्हे हिलाए, अपने मोटे लंड को मीरा के होंठों के खिलाफ रगड़ा, फिर एक ज़ोरदार, भारी धक्के से अंदर धंसा दिया।
“चर्रर्रर्र!!!!!”
आवाज़ किसी चीज़ के फटने जैसी थी, एक मोटे कपड़े के चीथड़ों में फटने जैसी। मीरा का मुँह अप्राकृतिक रूप से चौड़ा हुआ, एक ऐसी चौड़ाई जो मानवीय सीमाओं को लांघ रही थी, एक गुफा का मुँह बन गया।
कल्याण का वजन लगातार नीचे दबाव डाल रहा था। मीरा की साँस घुटने लगी। उसके फेफड़े हवा के लिए तड़प रहे थे, लेकिन उसका मुँह तो बंद था, एक मोटे डाट से बंद। उसके नथुने फड़फड़ा रहे थे, हवा के लिए छोटे-छोटे छेद।
उसकी आँखें बाहर निकल आई थीं, लाल नसों से भरी हुई, और वे सीधे खिड़की की ओर थीं।
“देखो… देखो इस सूअर को… जो तुम्हारा ‘महान’ ज़मींदार है… यही है इसकी हकीकत… एक पशु… और मैं… मैं इस पशु को नचा रही हूँ!…”
“चूस, गाँव की रंडी!”
कल्याण चिल्लाया, उसकी आवाज़ कमरे में गूँजती हुई खिड़कियों से बाहर निकल गई, बाहर छिपे लोगों के कानों में जा घुसी। उसने अपने भारी कूल्हों को घुमाया, एक अजीब, चक्की जैसी गति में, एक मोटा पहिया जो मसलता हुआ घूम रहा हो।
“तेरे पति की जली फसल का स्वाद याद दिलाऊँ? वो धुआँ? वो राख? ये ले! यही है वो राख! मेरे अंदर की आग की राख!”
उसकी गति तेज और अराजक हो गई, एक जानवर की तरह जो अपने शिकार को कुचल रहा हो, लेकिन अपने आप में ही फंसा हुआ हो।
“गाक्क!.गाक्क!..गाक्क!.गाक्क!!..गाक्क!!..”
हर धक्के के साथ, मीरा का सिर फर्श से टकराता, एक गूँजती हुई थप-थप की आवाज़ करता। उसकी आँखें रोल होने लगीं, चेतना डगमगाने लगी, लेकिन उसने अपना एक हाथ उठाया और कल्याण की जाँघ को अपने नाखूनों से दबोच लिया।
यह आक्रमण नहीं था, बल्कि एक पकड़ थी, एक सहारा था, एक तरह से कह रही थी—
“और जोर से… हाँ… यही तो चाहिए था मुझे… अब देखते हैं कितना दे सकता है!…”
कल्याण ने एक लंबी, कर्कश गुर्राहट भरी, उसकी आँखें पीछे की ओर घूम गईं, और वह ऐंठ गया। उसने अपना वीर्य उड़ेला। यह गाढ़ा और भरपूर था, गर्म और चिपचिपा, मीरा के मुँह के हर कोने में भरता चला गया, उसकी जीभ को डूबोता हुआ, गले तक बहता हुआ।
इतना कि वह उबकाई लेने लगी, उसका पेट ऐंठा, एक गहरी, दर्दनाक मितली जो उसके गले से निकलने को आतुर थी।
“उल्ल्ल्ग्ह्ह.!!!..”
लेकिन कल्याण ने उसे रोका। उसने अपना पैर मीरा के सीने से हटाया, जिससे उसे एक ज़ोरदार साँस भरने का अवसर मिला, और तुरंत अपना भारी हाथ उठाकर उसके चेहरे पर जोरदार थप्पड़ जड़ दिया।
“चटाक!!!…”
आवाज़ तीखी और कठोर थी, जैसे मांस पर मांस टकराया हो। मीरा का सिर दूसरी तरफ घूम गया, उसके गाल पर एक उज्ज्वल लाल हथेली का निशान उभर आया। दर्द तीखा और तात्कालिक था, लेकिन उससे भी तेज थी उसकी आँखों में वह चिंगारी—वह चुनौती जो अब भी बुझी नहीं थी।
“निगल!”
कल्याण गरजा, उसका चेहरा लाल और पसीने से तर था, उसकी साँसें शराब और जंगली उत्तेजना से फूल रही थीं।
“इसे निगल! यही तेरी सिंचाई है, रांड! मेरी ज़मीन का पानी! निगल!! तेरे खेत की प्यास बुझा! निगल!!!”
मजबूरन, घुटती हुई, आधी बेहोश मीरा ने अपना गला हिलाया। उसने अपनी आँखें खोलीं, उनमें वीर्य और आँसू और दर्द का एक धुंधला मिश्रण था, और वे सीधे रमेश से जा मिलीं। एक पल की नज़रें मिलीं। और फिर उसने निगला।
“गुल्प… गुल्प… गुल्प…”
आवाज़ भारी और दर्दनाक थी, जैसे कोई पत्थर निगल रही हो। उसने निगल लिया। सब कुछ!।
कल्याण उठ खड़ा हुआ, अपनी पतलून समेटते हुए, उसके हाथ काँप रहे थे। वह हाँफ रहा था, उस पर पसीने की नदियाँ बह रही थीं, उसकी शर्ट चिपक गई थी। उसने मीरा को फर्श पर पड़ा हुआ छोड़ दिया, जो अब सिर्फ एक टूटी हुई गुड़िया थी, जिसके मुँह से सफेद तरल बह रहा था और आँखें अर्थहीन होकर छत की तरफ ताक रही थीं। लेकिन उसके होंठों के कोने पर, सफेद वीर्य के बीच, एक सूक्ष्म, विजयी मोड़ था।
“हाँ…अब बस!…” कल्याण ने खुद से कहा, एक शराबी संतुष्टि के साथ, अपने माथे का पसीना पोंछते हुए।
“ज़मीन का हिसाब… चुकता।”
उसकी जगह लेने के लिए पाँचवाँ आदमी पहले ही खड़ा था, उसके हाथ में एक चमकीला, स्टेनलेस स्टील का छोटा गिलास था जिसमें से वह घूँट भर रहा था। बाहर, खिड़कियों के पीछे, साँसें अब सिसकारियों और दबी हुई फुसफुसाहटों में बदल चुकी थीं—गाँव वाले अब सिर्फ देख नहीं रहे थे, वे इस नरक के साक्षी बन रहे थे, और उनकी आत्माएँ इस दृश्य में बँधी जा रही थीं।
भोला आगे आया। वह दसों में सबसे कम उम्र का था— पास के गाँव के सरपंच का बेटा, जिसके चेहरे पर शहरी कॉलेज की पढ़ाई का घमंड और गाँव के दादागिरी का अहंकार एक साथ रच-बस गया था, एक विषैला मिश्रण।
वह तेजी से, उछलता हुआ आगे बढ़ा, जैसे कोई लड़का नया खिलौना पाकर बेताब हो, उसकी आँखों में एक चमकती हुई, बचकानी क्रूरता थी।
“मेरी बारी!”
उसने चीखकर कहा, उसकी आवाज़ में एक ऐसी उत्तेजना थी जो अनुभवहीनता से उपजी थी।
“मैं इसे याद दिलाऊँगा कि यहाँ कौन सरपंच है! कौन राज करता है! और राज करने का मतलब क्या होता है!”
उसने अपनी डिज़ाइनर जीन्स उतार फेंकी। उसका लंड एक अजीब दृश्य था। लंबाई आठ इंच से भी अधिक थी, लेकिन बेहद पतला—डेढ़ इंच से भी कम मोटाई लिए हुए—एक लंबी, पीली, नसदार सुई की तरह, एक सर्जिकल टूल जैसा।
यह एक ऐसा हथियार था जो चौड़ाई से नहीं, बल्कि गहराई से घाव करने, चीरने, भेदने के लिए बना था। उसने इसे गर्व से देखा, जैसे कोई अपनी तलवार की धार चेक कर रहा हो।
उसने मीरा को पकड़ा, जो अब भी फर्श पर अर्ध-बेहोश पड़ी थी, उसकी साँसें घुटती हुई और अनियमित थीं, और उसे बलपूर्वक पलट दिया। भोला उसके ऊपर सवार हो गया, घुटनों के बल, उसकी जाँघों ने मीरा के सिर को अपने बीच कैद कर लिया, जैसे कोई वाइस या स्टैंड जो एक नाजुक वस्तु को स्थिर करता हो। उसने अपने पतले लंड को हाथ में लिया, उसे मीरा के भरे हुए, होंठों के बीच रखा, और फिर एक सीधी, निशाना लगाकर धकेल दिया—कोई पूर्व तैयारी नहीं, कोई दया नहीं।
“श्र्र्र्र्र्र्र्र…इइइन!”
आवाज़ एक सिलाई मशीन की सुई के मोटे कपड़े में घुसने जैसी थी, एक तीखी, चीरती हुई आवाज। यह चौड़ा करने की बजाय चीरने वाला धक्का था। वह पतला लंड एक सीध में गले के पिछले हिस्से तक चुभ गया, एक ऐसी गहराई को छूता हुआ जो पहले के मोटे लंडों से भी नहीं छुई गई थी—गले की पिछली दीवार, नाजुक ऊतकों का वह स्थान जो सीधे दर्द को मस्तिष्क तक पहुँचाता है।
मीरा का पूरा शरीर एकदम से तन गया, एक सुन्न, गहरी पीड़ा से, एक ऐंठन जो उसकी उँगलियों से लेकर पैर की उँगलियों तक गई। उसकी आँखों में तुरंत पानी भर आया, जो उसकी गंदगी से सने गालों पर गर्म धाराओं में बह निकला, लार और वीर्य के निशानों को धोती हुई।
“तेरे पति… रमेश… ने पिछले साल मुझसे पैसे लिए थे! मेरे पिता के पैसे नहीं… मेरे अपने पैसे!”
भोला चिल्लाया, उसकी आवाज़ ऊँची और फटी हुई थी, एक बच्चे के गुस्से जैसी।
“छोटा कर्ज़ा था! बीस हज़ार! लेकिन ब्याज में देरी की थी! एक हफ्ते की देरी! मेरे सामने हाथ जोड़े थे ना? ‘भोला भाई, थोड़ा और समय…’ आज तू समय चुकाएगी! तेरा गला… यही मेरी घड़ी है!”
उसकी गति लालची, अनियमित और बेतहाशा तेज थी। वह तेजी से धकेलता,
“अउम्फ-अउम्फ-अउम्फ!”
फिर थोड़ा रुकता, जैसे दर्द का असर देखना चाहता हो, फिर और भी तेज, और भी गहरा धकेलता। हर बार वह पतला लंड गले के उसी संवेदनशील, गहरे स्थान पर वार करता, एक हथौड़े की तरह जो कील को और गाड़ रहा हो।
“आज तू ब्याज चुकाएगी! बिना ब्याज के! सिर्फ मूलधन! मेरा मूलधन तेरा गला है! और मैं इसे वापस ले रहा हूँ!”
उसने मीरा के बालों की लटें पकड़ीं, जो पसीने, लार और वीर्य से चिपचिपी हो चुकी थीं, और उसके सिर को जबरदस्ती आगे-पीछे झटका दिया, उसे अपने लंड पर स्वयं चलने के लिए मजबूर करते हुए, एक कठपुतली की तरह नचाते हुए।
बाहर, खिड़कियों के पीछे, गाँव वालों में हलचल हुई, एक दबी हुई लहर दौड़ गई। ये भोला के पिता के चापलूस, उसके साथ शहर में पढ़ने गए नौजवान, वे लोग जो उसे ‘भोला भाई’ कहकर पुकारते थे।
उनमें से एक दबी हुई कराह, फिर एक फुसफुसाहट सुनाई दी—
“अरे यार… ये तो…”
यह दर्शक अब सिर्फ दर्शक नहीं रहे थे; उनमें से एक के दोस्त ने यह नाटक शुरू किया था, और अब वही उनकी आँखों के सामने इस क्रूरता में सबसे आगे था, और वे बाध्य थे, उलझे हुए थे, इसके साक्षी बनने के लिए।
भोला जल्दी करने वाला था। उसका युवा, अधीर शरीर, अभूतपूर्व उत्तेजना से भरा हुआ, जल्दी चरम पर पहुँच गया। उसने एक तीखी, लड़कपन भरी चीख भरी—
“आह्ह्ह!!!…”
और ऐंठ गया, उसका पतला शरीर एक धनुष की तरह तन गया। उसका वीर्य, पतला और पानी जैसा, एक लगातार, ठंडी धार में मीरा के गले में गिरा। यह पिछले गाढ़े तरलों के मुकाबले हल्का था, लेकिन मात्रा में भरपूर था, जैसे एक ओवरफ्लो हो रहा हो।
वह झट से खड़ा हुआ, अपना लंड बाहर खींचा—एक चिपचिपी, हल्की आवाज़ के साथ—और मीरा को वहीं छोड़ दिया, जो अब खाँसते हुए, गला साफ करने की कोशिश कर रही थी, उसका शरीर हर खाँसी के साथ ऐंठ रहा था।
“ब्याज चुक गया,”
भोला ने घोषणा की, अपनी जीन्स पहनते हुए, उसके चेहरे पर एक अजीब, विजयी मुस्कान थी, जो शर्म और गर्व के मिश्रण से उपजी थी।
“मूलधन… अगली बार। जब फिर देरी करेगा तब।”
कमरे में एक भारी, थकी हुई खामोशी छा गई, जिसे केवल मीरा के घुटते हुए श्वास और उसके गले से आती हल्की सी सी-सी ने तोड़ा। अगला आदमी, एक लंबा, दुबला-पतला व्यक्ति जिसकी आँखों में एक गहरी, शांत ख़तरनाकी चश्मे के पीछे से झाँक रही थी, धीरे-धीरे आगे बढ़ा। उसके हाथ में एक चमकदार कलम थी जिसे वह अपनी उँगलियों के बीच घुमा रहा था।
समीर आगे बढ़ा। उन दस में वह अलग दिखता था—दुबला-पतला, चश्मा पहने, एक स्कूली शिक्षक की तरह जिसका चेहरा नैतिकता के पाठ पढ़ाते-पढ़ाते झुर्रियों से भर गया हो।
उसने अपना चश्मा उतारा, श्वेत रूमाल से साफ किया, और वापस लगा लिया। यह एक अनुष्ठान जैसा था, पाठ शुरू करने से पहले का संस्कार। उसकी नज़रें मीरा पर टिक गईं, जैसे कोई प्रयोगशाला में कोई नमूना देख रहा हो।
“उठो,”
उसने कहा, उसकी आवाज़ में कोई गुस्सा नहीं, कोई हवस भरी गर्मी नहीं, बल्कि एक ठंडी, अधिकारपूर्ण स्पष्टता थी, जैसे क्लास में पहला निर्देश।
“और उस मेज़ की तरफ मुँह करके खड़ी रहो। जो लकड़ी की है। आज का पाठ है: मूल्य और मूल्यह्रास का सिद्धांत। तुम्हारे शरीर का अवमूल्यन।”
मीरा को उठाने के लिए किसी दूसरे की जरूरत नहीं पड़ी। वह स्वयं, एक टूटी हुई कठपुतली की तरह, अपने हाथों से फर्श पर टेक लगाते हुए उठी। उसके पैर लड़खड़ा रहे थे, शरीर हर जगह से दर्द कर रहा था, लेकिन उसकी आँखों में वही दृढ़ चमक अब भी थी।
वह उस लकड़ी की मेज़ के सामने जाकर खड़ी हो गई, जिस पर बोतलों और गिलासों के निशान थे। उसकी पीठ दर्शकों की तरफ थी, और उसका सामना खिड़की की ओर था, जहाँ से वह जानती थी कि आँखें देख रही हैं।
समीर उसके पीछे आया। उसने अपनी पतलून की जिप खोली। उसका लंड लगभग छह इंच लंबा था—न ज्यादा लंबा, न ज्यादा मोटा—एक संतुलित, ‘सैम्पल’ जैसा, एक ऐसा औज़ार जो दिखावे के लिए नहीं, बल्कि काम के लिए बना हो।
उसने इसे हाथ में लिया, और मीरा के सिर को एक तेज़ झटके से पीछे की ओर खींचा, उसकी गर्दन को एक अप्राकृतिक कोण पर मोड़ दिया। फिर, उसने अपने लंड को मीरा के खुले, सूजे होंठों पर रखा, और एक धीमे, सटीक दबाव से अंदर प्रवेश कराया।
“स्लूप!!!…”
आवाज़ गीली थी, लेकिन कोई फटने या चीखने वाली नहीं। वह पूरी लंबाई से अंदर गया, उसका पतला लंड मीरा के गले में एक सीधी रेखा की तरह घुस गया, और फिर रुक गया। बिल्कुल रुक गया, जैसे वाक्य के बीच में पूर्ण विराम लगा दिया गया हो।
“प्रथम सिद्धांत,”
उसने कहा, उसकी आवाज़ कमरे में एक डस्टी क्लासरूम की तरह गूंजी, शांत और निर्मम। फिर उसने एक तेज, झटकेदार धक्का दिया, अपने कूल्हे आगे बढ़ाए।
“अउम्फ!”,
“स्त्री का शरीर… जब बाजार में एक वस्तु बन जाता है…”
वह पूरी तरह बाहर आया, लगभग पूरा निकल आया, फिर दूसरा धक्का दिया, और पहले से ज्यादा तेज, ज्यादा गहरा।
“अउम्फ! “…उसका मूल्य… उसकी कीमत नहीं, उसकी गरिमा… गिरने लगती है।”
तीसरा धक्का। यह सबसे जोरदार था, उसने अपने पूरे कूल्हे का वजन डाल दिया, मीरा का सिर मेज़ के किनारे से टकराया।
“थड! “…और यह गिरावट… एक स्थायी मूल्यह्रास है। बिक्री के बाद सेवा नहीं। कोई वारंटी नहीं।”
हर धक्के के साथ एक सिद्धांत। हर वाक्य के साथ एक मार। यह सेक्स नहीं था, यह एक नैतिक व्याख्यान था जो उसके गले के जरिए दिया जा रहा था। मीरा की आँखें खुली थीं, और वह सीधे खिड़की की ओर देख रही थी।
“सुनो… सुनो इस शिक्षक को… जो तुम्हें नैतिकता पढ़ाता है… देखो उसके हाथ कहाँ हैं… देखो उसका पाठ क्या है… यही है तुम्हारा नैतिक पाठ… और मैं… मैं इसकी जीती-जागती किताब हूँ…”
रमेश कोने में खड़ा, अपने नाखून हथेली में गड़ाते हुए, देख रहा था। उसकी साँसें रुक-रुक कर चल रही थीं।
“यह… यह किताबी कीड़ा… यह भी… मेरी मीरा को… एक पाठ की तरह पढ़ रहा है… पर मीरा… तू किताब नहीं है… तू तो… तू तो इन सब की मास्टर है… तू इन्हें पढ़ा रही है… यह सबक…”
उसकी आँखों में पानी था, लेकिन उसके नीचे, उसकी पैंट में, वही अजीब सख्तन थी जो दर्द और गर्व और एक गहरे विकृत प्रेम में मिली-जुली थी।
समीर ने अपना मुँह मीरा के कान के पास ले जाया, उसके बालों में फँसी गंदगी और पसीने की बू आ रही थी। उसकी आवाज़ एक फुसफुसाहट में बदल गई, एक गुप्त रहस्य बताते हुए, एक शिक्षक जो विद्यार्थी को अकेले में डाँट रहा हो।
“तुम… एक प्रैक्टिकल उदाहरण हो, मीरा। जीवंत केस स्टडी। और तुम… साबित कर रही हो कि मूल्यह्रास की दर… भावनाओं से नहीं, लेन-देन से तय होती है। तुमने अपनी गरिमा… हमारे आगे… एक मोलभाव करके गिरवी रख दी। और अब… हम उसका मूल्य चुका रहे हैं। तुम्हारा मुँह… यही हमारी कैश काउंटर है।”
उसकी गति फिर शुरू हुई, अब लयबद्ध और निरंतर, लेकिन उतनी ही ठंडी, उतनी ही निर्मम।
“गाक्क!……गाक्क!!……..गाक्क!……गाक्क!!……गाक्क!!..”
वह एक मशीन की तरह चल रहा था जो किसी निष्कर्ष पर पहुँच चुकी हो, डेटा एंट्री कर रही हो।
“अउम्फ… अउम्फ… अउम्फ…”
हर धक्का एक ही गहराई का, एक ही लय में। उसकी साँसें भारी नहीं हुईं, कोई गुर्राहट नहीं निकली। उसका चेहरा एकदम शांत था, सिवाय उसकी आँखों के, जो चश्मे के पीछे से एक संतुष्ट, निर्लज्ज चमक से चमक रही थीं।
जब वह चरम पर पहुँचा, तो उसने अपना लंड बाहर खींचा, मीरा के सिर को एक और झटके से मेज़ से ऊपर खींचा, और अपना गाढ़ा, ठंडा वीर्य सीधे उसके खुले मुँह में, जीभ के ठीक ऊपर गिराया।
यह एक सटीक, मापा हुआ धारा थी, जैसे कोई केमिकल ड्रॉपर से तरल डाल रहा हो। मीरा ने स्वाद के लिए एक सहज उबकाई ली, गला घोंटा, लेकिन फिर, अपनी आँखें बाहर की ओर टिकाए हुए, उसने निगल लिया।
“गुल्प।” एक साफ, स्पष्ट आवाज।
फिर समीर ने एक अंतिम कृत्य किया। उसने मीरा से कहा,
“मुड़ो। अपने शिक्षक की तरफ देखो। और उस निर्णय को स्वीकार करो जो तुमने स्वयं चुना है।”
मीरा ने धीरे से सिर घुमाया। उसका चेहरा एक टूटी हुई मूर्ति जैसा था, जिस पर अपराध और शर्म का इतिहास नहीं, बल्कि एक गहरी, थकी हुई विजय लिखी हुई थी। उसके होंठों के कोने पर वीर्य की एक बूँद लटक रही थी।
समीर ने अपना मुँह भरकर, एक गहरी, घृणा से भरी आह्ट के साथ, सीधे मीरा के चेहरे पर, उसकी आँख और गाल के बीच में थूक दिया।
“क्ह्यक..थू..!!!”
गाढ़ा थूक एक सफेद, चिपचिपी बूँद की तरह उसकी त्वचा पर जा लगा, और फिर धीरे-धीरे नीचे की ओर टपकने लगा।
“ये है तुम्हारी फाइनल ग्रेड,” उसने घोषणा की, अपनी पतलून की जिप बंद करते हुए, उसकी आवाज़ में कोई भावना नहीं थी।
“एफ। पूर्णतः असफल। इसे अपने पति को दिखाओ। उसे बताओ कि अर्थशास्त्र की इस परीक्षा में, तुम्हारे शरीर ने क्या मूल्य खोया। और हमने… क्या मूल्य प्राप्त किया।”
वह पीछे हट गया, अपने चश्मे को एक बार फिर ठीक करते हुए, जैसे किसी प्रयोग को समाप्त करके वह अपने वास्तविक रूप में लौट आया हो। कमरे में सन्नाटा और गहरा हो गया था, जिसे केवल बाहर से आती दबी हुई सिसकारियों और एक दमित रोने की आवाज़ ने तोड़ा—शायद किसी दर्शक की, जिसने अभी-अभी नैतिकता का अपना पाठ याद किया हो।
अगला आदमी, एक चौड़े कंधों वाला, चेहरे पर गहरे दाग़ों और धूल के निशान वाला व्यक्ति, पहले से ही अपनी मोटी चमड़े की बेल्ट को अपने हाथों से खींच रहा था, उस पर जमी धूल झड़ रही थी। उसकी नज़र मीरा के चेहरे पर टिकी थी, जो अब समीर के थूक और वीर्य से सनी एक शिकार नहीं, बल्कि एक लक्ष्य लग रही थी।
जगन आगे बढ़ा। वह एक ठेकेदार था—चौड़े कंधे, मोटी गर्दन जिस पर नसें उभरी थीं, और चेहरे पर ईंट-गारे, धूप और संघर्ष के पड़े हुए काले दाग़। उसकी उपस्थिति में एक भौतिक, अक्खड़ क्रूरता थी, जैसे कोई बुलडोजर जो रास्ते में आए सबको रौंद दे। उसने अपनी चौड़ी चमड़े की बेल्ट पूरी तरह खोल ली और उसे एक तरफ फेंक दिया, जो जमीन पर एक भारी धप्पे के साथ गिरी।
“तेरे पति… रमेश… ने पिछले महीने मेरे ठेके पर काम माँगा था,”
जगन ने कहा, उसकी आवाज़ गिट्टी और सूखे सीमेंट की तरह खुरदरी और भारी, हर शब्द एक ईंट की तरह गिरता हुआ।
“सीमेंट के बोरे ढोने का काम। मैंने हँसकर मना कर दिया था। कहा था—’तेरे हाथों में हड्डियाँ नहीं, चमड़ा है, पर चमड़ा भी पतला है। काम नहीं कर सकता। मेरा काम तेरे बूते का नहीं।’ आज… आज मैं उसकी बीवी पर काम करूँगा। मेरा काम। असली काम।”
उसका लंड साढ़े सात इंच लंबा था और आक्रामक रूप से सख्त, नसों से उभरा हुआ, एक ड्रिलिंग रॉड या जैकहैमर का हैंडल जैसा। उसने मीरा को, जो अब भी समीर के थूक से सनी, मेज़ के सहारे खड़ी थी, बलपूर्वक घुटनों के बल नीचे बैठाया। फिर वह स्वयं एक मजबूत प्लास्टिक की कुर्सी पर विराजमान हुआ, सिंहासन पर बैठे राजा की तरह, उसने अपनी जाँघें फैला दीं।
“तेरा यह मुँह…”
जगन ने अपना लंड उठाकर मीरा के होठों पर मारा, थपथपाया, जैसे कोई मशीन का बटन दबा रहा हो।
“…मेरा सीमेंट मिक्सर है। छोटा, पर काम का। देखते हैं कितना मिक्स कर पाता है। कितनी देर चलता है बिना गर्म हुए।”
बिना किसी और चेतावनी के, उसने मीरा के सिर को अपने हाथों से जकड़ा और एक जोरदार, आक्रमणकारी खिंचाव दिया, उसे अपनी ओर खींचते हुए, उसके लंड पर ठूँस दिया।
“क्रंच!” आवाज़ हड्डी और मांस के दबाव, और गले के गीलेपन के मिलन जैसी थी।
मीरा का सिर पीछे को हुआ, उसकी गर्दन की नसें तनीं, एक दर्दनाक कोण बना। जगन की गति तुरंत शुरू हो गई—कठोर, लयबद्ध, और निर्दय, जैसे कोई पंप मशीन या कंक्रीट मिक्सर चल रहा हो। हर धक्का पूरी ताकत से था, उसकी जाँघों की मोटी मांसपेशियाँ फड़क रही थीं, उसका पूरा ऊपरी धड़ आगे-पीछे हिल रहा था।
औम्फ़..ह्फ्फ्म…औफ्म…हां..मम्म..”
“यह आवाज़… यह आवाज़ तो वही है… जब वह बुलडोजर चलाता है गाँव के पास… सब कंप जाते हैं… आज यह आवाज़ मेरे गले से निकल रही है… और सब सुन रहे हैं…” मीरा के दिमाग में यह विचार चक्कर काट गया, दर्द के बीच एक विचित्र संतुष्टि के साथ।
“रमेश!”
जगन गरजा, उसकी आवाज़ कमरे में गूँजती हुई दरवाज़े-खिड़कियों से बाहर निकल गई, बाहर छिपे लोगों के कानों में जोर से चोट करती हुई।
“सुन रहा है ना? तेरी बीवी का गला… मेरे मजदूरों के झोपड़ों से बेहतर है! ज्यादा गर्म है! ज्यादा मज़बूत है! और काम करता है बिना रुके! बिना हड़ताल के!”
रमेश कोने में खड़ा, अपने दाँत इस कदर पीस रहा था कि उसके जबड़े में दर्द होने लगा। उसकी आँखें मीरा पर थीं, जिसका चेहरा हर धक्के से विरूपित हो रहा था।
“मेरी मीरा… मेरी जान… यह जानवर तुझे एक मशीन समझ रहा है… और तू… तू साबित कर रही है कि तू किसी मशीन से कम नहीं… बल्कि ज्यादा है… तू सब सह लेगी… और मैं… मैं यहाँ हूँ… तेरे साथ… हर धक्के में…” उसकी भावनाओं का गुबार उसकी पैंट में खड़े लंड को और दर्द दे गया।
जगन की गति और तेज हुई, वह अब एक यंत्र की तरह चल रहा था, आँखें कील-गाड़ने वाली मशीन की तरह स्थिर और संकेंद्रित।
“गाक्क!..गाक्क!!.गाक्क!..गाक्क!!..गाक्क!!..”
मीरा का शरीर हर धक्के से हिलता, उसका गला भर जाता, साँस घुटती, उसकी आँखों से आँसू बहने लगे थे जो पहले से मौजूद गंदगी के निशानों को और धो रहे थे। तभी, जगन ने अचानक रुककर अपना दायाँ हाथ उठाया और मीरा के दाहिने गाल पर एक जोरदार, चपटा तमाचा जड़ दिया।
“चटाक्क्क्क…!!!!”
आवाज़ तीखी और साफ थी, जैसे किसी नम सतह पर हथेली पड़ी हो। मीरा का सिर बाईं ओर घूम गया। उसकी आँखें चकराईं, दृष्टि धुँधली हो गई। दूसरा तमाचा तुरंत आया, बाएँ गाल पर।
“चटाक्क्क्क!”
यह और जोरदार था, उसके सिर को दूसरी दिशा में घुमा दिया। मीरा के मुँह से लार और वीर्य का छींटा निकलकर हवा में छिटक गया, कुछ बूँदें जगन के घुटनों पर गिरीं।
“ये ले… काम के दौरान अनुशासनहीनता की सजा,” जगन ने हाँफते हुए कहा, उसकी साँसें अब तेज होने लगी थीं।
“तेरी आँखें… बहुत बोल रही थीं। मेरे काम में आँखें नहीं, हाथ चलते हैं।”
फिर वह फिर से चल पड़ा, अब और भी उग्र गति से, जैसे कोई ड्रिल जिद्दी चट्टान में घुस रही हो। उसकी साँसें छोटी और तेज हो गई थीं, गर्दन की नसें और उभरीं।
“गाक्क!..गाक्क!!.गाक्क!..गाक्क!!..गाक्क!!..”
कुछ ही क्षणों में, वह एक लंबी, गहरी, भारी गुर्राहट के साथ ऐंठा, उसका पूरा शरीर कड़ा हो गया। उसने मीरा के सिर को और जोर से पकड़ा, उसे अपनी ओर खींचा, और अपना गाढ़ा, गर्म वीर्य सीधे उसके गले के गहरे हिस्से में, एक सटीक, दबाव वाली धार में उड़ेला।
“स्प्लैट… स्प्लटर… गुल्ग्ग्…” आवाज़ गले के भीतर ही दब गई।
मीरा ने आँखें मूंद लीं। वीर्य की गर्मी उसके गले के अंदर फैल गई, एक अजीब, आंतरिक स्नान की तरह। उसने निगलने का प्रयास किया, लेकिन मात्रा अधिक थी; कुछ बाहर निकल आया, उसके होठों के कोने से बहता हुआ।
जगन ने अपना लंड बाहर खींचा, एक चिपचिपी, हल्की फिसलन भरी आवाज़ के साथ। उसने मीरा का सिर पीछे धकेल दिया, उसे अपनी पकड़ से मुक्त करते हुए। वह हाँफ रहा था, पसीने से तर, उसकी टी-शर्ट पीठ से चिपक गई थी।
“ये ले,” उसने कहा, अपनी पतलून समेटते हुए, उसकी आवाज़ अब एक ठेकेदार की व्यावसायिक निर्ममता और संतुष्टि में बदल गई थी।
“तेरी दिहाड़ी। काम पूरा हुआ। ठेका पूरा हुआ। अब अच्छे से साफ कर इसको। नहीं तो… अगले काम के लिए बिल कट जाएगा। और अगला काम… जल्दी आएगा।”
दीपक आगे बढ़ा। वह दस में सबसे साफ-सुथरा, सबसे ‘सिविलाइज्ड’ दिखने वाला था—क्रिस्प सफेद शर्ट, डिज़ाइनर स्पेक्स जो उसकी भावनाहीन आँखों को और भी ठंडा बना रहे थे, और एक ऐसा चेहरा जो एंटीसेप्टिक और गहरी जिज्ञासा से भरा था।
“मैं रिसर्च करता हूँ,” उसने कहा, उसकी आवाज़ बिल्कुल फ्लैट, क्लिनिकल, जैसे कोई कम्प्यूटर बोल रहा हो।
“ह्यूमन फिज़ियोलॉजी पर। विशेष रूप से… एक्सट्रीम स्ट्रेस में शारीरिक प्रतिक्रियाएँ। दर्द के प्रति सहनशीलता का मापन। आज… तुम मेरा लाइव सब्जेक्ट हो। मेरा प्राइमरी डेटा।”
उसका लंड सात इंच लंबा था, बिल्कुल सीधा, और एक अजीब तरह से पीला, लगभग क्लिनिकल सफेद, बिना किसी स्पष्ट नस के। यह एक मेडिकल डमी या एनाटॉमी मॉडल की तरह लग रहा था।
उसने मीरा को, जो अब भी सोफे पर लुढ़की हुई थी, उसकी बाँहों के नीचे से पकड़कर संभालकर उठाया और उसे एक लकड़ी के स्टूल पर बिठाया। फिर वह स्वयं उसके सामने घुटनों के बल बैठ गया, जैसे कोई डॉक्टर मरीज़ की जाँच करने से पहले अपने टूल्स सेट कर रहा हो।
“सबसे पहले, प्री-प्रोसीजरल असेसमेंट,” दीपक ने कहा।
उसने अपने हाथों से मीरा के गाल को हल्का सा दबाया, फिर उसके सूजे होंठों के किनारे को।
“एपिडर्मिस… अब्रेडेड। म्यूकस मेंबरेन… हाइपरट्रॉफाइड। यह सब… बेसलाइन डेटा है। रिकॉर्ड करो।” वह खुद से बोल रहा था।
उसने धीरे से, एक सर्जन की सटीकता और बेरुखी के साथ, अपने लंड को मीरा के मुँह में रखा। यह एक प्रोसीजरल टच था, कोई जुनून नहीं, कोई क्रूरता का आनंद नहीं—बस एक प्रयोग। वह धीरे-धीरे अंदर गया, एक सेंटीमीटर, फिर दो, फिर तीन। और रुक गया, जैसे गहराई माप रहा हो।
“रमेश,” दीपक ने कहा, उसकी आवाज़ बिना किसी लहजे के, एक रिपोर्ट पढ़ते हुए, उसकी नज़रें सीधे कोने में खड़े रमेश पर टिकी हुईं।
“तुम्हारी पत्नी का गले का मार्ग… इस समय… लगभग 75% क्षमता पर काम कर रहा है। श्वसन मार्ग संकुचित है, लेकिन अभी भी कार्यात्मक है। देखते हैं… स्ट्रेस टेस्ट के बाद यह कार्यक्षमता घटकर कितनी रह जाती है। क्या यह ऑब्जेक्ट… ठीक हो पाता है।”
उसने एक अचानक, तेज और गहरा धक्का दिया।
“गक्क्खह्ह्ह!!!” आवाज़ साफ और कर्कश थी, एक सटीक प्रहार की तरह। मीरा का शरीर ऐंठ गया, उसकी पीठ धनुष की तरह तन गई।
“प्रतिक्रिया: तीव्र। पल्स रेट अचानक बढ़ी। पुतलियाँ फैलीं। स्वैच्छिक मांसपेशियों में ऐंठन। डेटा पॉइंट वन रिकॉर्डेड।”
वह पूरा बाहर आया, फिर दूसरा धक्का दिया, और पहले से ज्यादा तेज, ज्यादा गहरा, ज्यादा सटीक।
“गक्क्खह्ह्ह!!!”
“प्रतिक्रिया: अधिक तीव्र। शारीरिक ऐंठन बढ़ी। लैक्रिमल ग्रंथि सक्रिय—आँसू। डेटा पॉइंट टू।”
तीसरा धक्का। यह सबसे तेज और गहरा था, उसने मीरा के सिर को स्टूल के पीछे लगी दीवार से जोर से दबा दिया।
“थड!” एक सुस्त धमाके की आवाज़।
“प्रतिक्रिया: चरम। स्वैच्छिक नियंत्रण का ह्रास। गैग रिफ्लेक्स दबा हुआ। डेटा पॉइंट थ्री। सहन सीमा का पहला बिंदु निकट।”
“यह… यह पागल है… यह मुझे एक मरीज़ की तरह देख रहा है… एक मरा हुआ शरीर, जिस पर प्रयोग हो रहा है… पर यही तो बात है… सब देख रहे हैं… कि मैं जिंदा हूँ… मैं वह हूँ जिस पर ये सब प्रयोग करने आए हैं… मैं इतनी कीमती हूँ कि इन्हें मेरे डेटा चाहिए…” मीरा के मन में यह विचार दर्द के धुंधले समंदर में एक टिमटिमाती रोशनी की तरह था।
उसकी गति अब एक लय में पड़ गई, हर धक्का एक नया ‘डेटा पॉइंट’ बनाता हुआ।
“चार… पाँच… छह…”
वह जोर से गिनता गया, उसकी आवाज़ एक रोबोटिक मोनोटोन में, उसकी आँखें मीरा के चेहरे के भावों को नोट कर रही थीं। मीरा का शरीर हर गिनती के साथ हिलता, उसकी आँखें रोल हो रही थीं, लेकिन दीपक का ध्यान केवल उसके गले के संकुचन और विस्तार, उसकी साँसों के रुकने और चलने के पैटर्न पर था, जैसे कोई पल्स ऑक्सीमीटर लगा हो।
रमेश की साँसें रुक-रुक कर चल रही थीं।
“यह… यह क्या है? यह तो… जिंदा इंसान को… लाश समझ रहा है… पर मीरा… मेरी मीरा… तू कोई लाश नहीं… तू… तू तो सबको दिखा रही है कि तू कितना सह सकती है… कितना झेल सकती है!”
दीपक की निर्विकार गिनती अचानक टूटी। उसने “छह…” कहा था, और फिर अगला धक्का देते हुए उसकी आवाज़ में एक खुरदरापन आ गया। उसका शरीर, जो अब तक एक कैलिब्रेटेड मशीन की तरह चल रहा था, अचानक एक झटके के साथ आगे बढ़ा। उसकी साँसें, जो अब तक नियमित थीं, अचानक छोटी और तेज़ हो गईं—एक फुसफुसाहट से एक हाँफते हुए विस्फोट में बदल गईं।
“सात…” उसने कहा, लेकिन यह संख्या उसके गले में फंस सी गई। उसकी आँखें, जो अब तक डेटा रिकॉर्ड करने वाले दो कैमरों की तरह थीं, अचानक चौड़ी हो गईं। उनमें वह ठंडी जिज्ञासा नहीं, बल्कि एक गहरी, आकस्मिक भावना उभर आई—एक तीखी, व्यक्तिगत लालसा, जो उसके सारे प्रयोग के ढाँचे को चकनाचूर कर रही थी। उसने मीरा के बालों को अपनी उँगलियों में जकड़ लिया, अब स्पैचुला की पकड़ नहीं, बल्कि एक आक्रामक, स्वामित्व भरी पकड़।
“यह… यह सिर्फ डेटा नहीं है,”
उसने फुसफुसाया, उसकी आवाज़ अब उस क्लिनिकल स्वर में नहीं, बल्कि एक धड़कते हुए, उत्तेजित स्वर में थी।
“यह… यह अनुमान से परे है। तुम्हारा गला… यह सिर्फ एक टिशू नहीं है… यह… यह एक भट्ठी है। एक ज्वालामुखी का मुहाना।”
उसकी गति अब लयबद्ध नहीं रही। वह तेज, अनियमित धक्के देने लगा,
“गाक्क!..गाक्क!!.गाक्क!..गाक्क!!..गाक्क!!..”
हर बार मीरा के सिर को पीछे की ओर, लकड़ी के स्टूल और दीवार के बीच के कोण में दबाते हुए।
“अउम्फ-अउम्फ-थड-अउम्फ!”
आवाज़ें अब संख्याओं में नहीं, बल्कि एक जानवर की हाँफने और धक्कों के समिश्रण में बदल गईं।
“रमेश!” दीपक चिल्लाया, उसकी आवाज़ अब गर्जना में बदल चुकी थी, उसका चेहरा विरूपित हो गया था।
“तुम देख रहे हो? यह तुम्हारी पत्नी है! यह कोई सब्जेक्ट नंबर नहीं है! यह… यह एक चमत्कार है! दर्द की सीमा को नया अर्थ देने वाला एक जीवित चमत्कार! और यह चमत्कार… मेरे अंदर है!”
उसने एक अंतिम, पूरी ताकत वाला धक्का दिया, अपने कूल्हों को हवा में उठाते हुए और फिर सारे वजन के साथ नीचे गिराते हुए। मीरा का गला पूरी तरह भर गया, उसकी साँस एकदम बंद हो गई। उसकी आँखें पलक झपकाना भूल गईं, सीधे छत की ओर ताकती हुईं, लेकिन उनमें एक अजीब सी स्पष्टता थी।
‘यही… यही वह पल है… जब यह पढ़ा-लिखा पागल… अपने आप को भूल गया… मेरे आगे… मेरी ताकत के आगे… और सब देख रहे हैं… कि यह मेरे आगे कैसे पिघल रहा है…’ मीरा ने अपने मन में फिर से जित पा ली,
रमेश ने अपनी हथेली को दीवार पर इतना दबाया कि उसकी उँगलियों के पोर सफेद पड़ गए। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन उसके नीचे, उसकी पैंट में, एक अनियंत्रित, दर्दनाक स्खलन हो गया था—शर्म, गर्व, विकृत प्रेम और एक अथाह पीड़ा का मूक विस्फोट।
“मेरी जान… ओ मेरी जान… यह तुझे चमत्कार कह रहा है… और तू है कि सह रही है… मैं कायर हूँ… मैं यहाँ खड़ा देख रहा हूँ… पर तू… तू राज़ी है… तू लड़ रही है… हमारे लिए…’
दीपक एक लंबी, कंपकंपाती गुर्राहट के साथ चरम पर पहुँचा। यह कोई नियंत्रित निष्कर्ष नहीं था; यह एक ज्वालामुखी का फटना था। उसने मीरा के सिर को और जोर से पकड़ा, उसे अपने पास खींचा, और अपना वीर्य—ठंडा नहीं, बल्कि जलन भरा गर्म—उसके गले की सबसे गहरी थैली में उड़ेल दिया, एक लगातार, ऐंठन भरी धार में।
“फ्फ्फ्फ्फ-हा-आआह!”
आवाज़ उसके गले से निकली, एक आदिम चीख।
उसने वह पूरी लंबाई बाहर खींची, उसका लंड अब वह क्लिनिकल सफेद नहीं रहा था। वह हाँफ रहा था, उसका शरीर काँप रहा था, उसका चश्मा उसकी नाक से लटक रहा था। उसने मीरा को स्टूल पर पड़ा छोड़ दिया, जो अब एक बार फिर खाँस रही थी और हाँफ रही थी।
फिर वह रमेश की तरफ मुड़ा। उसकी आँखों में अब वह व्यावसायिक तिरस्कार या ठंडी घृणा नहीं थी। उनमें एक असमंजस था, एक भ्रम, जैसे कोई वैज्ञानिक जिसने अपनी ही परिकल्पना को गलत साबित होते देख लिया हो।
“यह… यह डेटा दूषित हो गया है,”
उसने हाँफते हुए कहा, उसकी आवाज़ फिर से फ्लैट होने की कोशिश कर रही थी, लेकिन उसमें एक कंपकंपी थी।
“सब्जेक्ट ने… प्रयोगकर्ता को प्रभावित कर दिया। रिसर्च मेथडॉलजी फेल हो गई। यह… यह अब शुद्ध विज्ञान नहीं रहा।”
वह पीछे हट गया, अपने स्पैचुला को उठाते हुए और उसे अपने सिल्वर केस में वापस रखते हुए, एक ऐसे कलाकार की तरह जिसने अपना सबसे अच्छा टूल तोड़ लिया हो।
गोलू आगे बढ़ा। उसकी चाल एक तेज, दर्दनाक लंगड़ाहट से भरी थी—दायाँ पैर जमीन पर पूरा पड़ता, बायाँ पैर एक छोटे, तेज झटके के साथ घसीटता हुआ चलता, जैसे कोई टूटी हुई मशीन का पुर्जा।
यह वह लंगड़ाहट थी जिसने उसकी ज़िंदगी को बचपन से ही तोड़कर रख दिया था, और अब उसके चेहरे पर उसी टूटन की जलती हुई आग, एक ठंडी, गणितीय क्रूरता में बदल चुकी थी। उसकी आँखें छोटी और गहरी थीं, जिनमें एक संचित, कड़वा क्रोध और एक तीखी बुद्धिमत्ता उबल रही थी।
“सबने मेरी इस टाँग को देखा,”
उसने एक सपाट, गणना करते हुए स्वर में कहा, अपने दुर्बल पैर की ओर इशारा करते हुए, जैसे कोई प्रमेय का प्रस्तावना दे रहा हो।
“गाँव के चौपाल पर। स्कूल के रास्ते में। हँसी उड़ाई। ‘लंगड़ा गोलू’। एक बीजगणित का मज़ाक। आज… आज तेरा यह मुँह मेरा बदला लेगा। मेरी हँसी का चक्रवृद्धि ब्याज चुकाएगा। ब्याज दर… असीमित है।”
उसका लंड आठ इंच से भी लंबा और मोटाई में औसत से अधिक था—एक मजबूत, नसदार मांसपेशी जो उसके शक्तिशाली ऊपरी धड़ से मेल खाती थी, उसकी निचली कमजोरी के विपरीत, एक जीवित प्रमाण कि प्रकृति ने उसे एक जगह लूटा तो दूसरी जगह लाड़ किया।
उसने मीरा को, जो अब भी सोफे पर अर्ध-बेहोश पड़ी थी, उसकी कलाई से पकड़ा। उसकी पकड़ में एक अप्रत्याशित, लोहे जैसी ताकत थी, एक ऐसी ताकत जो उसकी टेढ़ी चाल को झुठलाती थी।
उसने उसे सोफे से खींचकर कमरे के बीचोबीच, उस जगह पर ले जाया जहाँ फर्श पर एक पुराना, फीका हुआ गलीचा बिछा था, और उसे उस पर पीठ के बल लिटा दिया।
“धड़ाम!” मीरा की पीठ और सिर जमीन से टकराए, एक मंद ध्वनि के साथ।
फिर, गोलू ने अपने स्वस्थ, मजबूत दाहिने पैर को उठाया और उसे मीरा के सीने के पास, उसकी कोलार्बोन के ठीक ऊपर रख दिया, उसे नीचे की ओर दबाया। उसके जूते का नीचे का हिस्सा, गंदगी और धूल से सना हुआ, उसके स्तनों के बीच की नाजुक त्वचा को दबोच रहा था, उसकी साँसों को रोकते हुए।
मीरा ने अपनी आँखें खोलीं, एक पल के लिए दहशत से भरीं, जब उसने अपने ऊपर खड़े आदमी की विकृत टाँग और उसके चेहरे पर केन्द्रित नफरत को देखा।
“यह… यह लंगड़ा… यह भी… आजा तुभी!….आज में किसीको नहीं छोडूंगी!.. सब को तो निचोड़ ही लिया है लगबघ… जिन्होंने कभी मुझे पर हँसा था… आज वही मेरे सामने खड़े हैं… और मैं… मैं यहाँ लेटी हूँ… उनके नीचे… लेकिन…आखिर में ही सब को ठंडा कर दूंगी!! …”
“तेरे पति रमेश ने भी कभी मेरी टाँग की ओर इशारा करके मुँह बनाया था,”
गोलू ने कहा, उसकी आवाज़ एक जहरीली, शांत फुसफुसाहट थी, जिसमें कोई भावना नहीं थी, सिर्फ तथ्य थे।
“दो साल पहले। हलवाई की दुकान पर। उसने कहा था—’गोलू, तेरी चाल देखकर मेरा पैर सुन्न हो जाता है।’ एक अतिशयोक्ति। आज… आज मैं एक प्रमेय सिद्ध करूँगा। तेरा पैर नहीं, तेरा मुँह सुन्न होगा। क्योंकि एक लंगड़ा आदमी… दूसरे के मुँह में… अपनी पूरी ऊर्जा केन्द्रित कर सकता है। यह भौतिकी है।”
उसने अपने कूल्हे आगे किए, अपने स्वस्थ पैर का दबाव बनाए रखते हुए। उसका लंड हिंसक रूप से, बिना किसी कोमलता या तैयारी के, मीरा के खुले मुँह में घुसा।
“र्र्र्रैक!”
एक अप्राकृतिक, फटने जैसी आवाज़ आई, जैसे कपड़ा चीरा जा रहा हो। मीरा की गर्दन की नसें तनीं, उसका जबड़ा और भी चौड़ा हुआ, उसके होंठ उस मोटे लंड के चारों ओर खिंच गए।
गोलू की गति तुरंत शुरू हो गई—और इसमें एक विक्षिप्त, गणितीय सटीकता थी। यह केवल सेक्स नहीं था, यह एक प्रतिशोध का प्रयोग था। हर धक्का उसकी सारी लाचारी, सारे अपमान का एक समीकरण था। वह अपने स्वस्थ पैर से मीरा के सीने को दबोचे हुए था, उसे स्थिर रखते हुए, और अपने कूल्हों को एक अराजक, फिर भी लयबद्ध गति से घुमा रहा था, जैसे कोई पेंडुलम।
“ले साली!”
वह चिल्लाया, उसकी आवाज़ अचानक भीषण और टूटी हुई हो गई, उसकी शांत विद्वत्ता टूट गई।
“एक लंगड़े की ताकत महसूस कर! देख! मैं कितना मजबूत हूँ यहाँ! कितना सीधा हूँ! यह है मेरा प्रमाण! मेरा ज्यामितीय प्रमाण!”
रमेश कोने में खड़ा था, उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन उसके नीचे, एक सुन्न, दर्दनाक उत्तेजना थी।
“गोलू… यह लंगड़ा गोलू… जिसे मैंने हँसी में टोका था… आज वह… मेरी मीरा को… एक प्रमाण की तरह इस्तेमाल कर रहा है… और मीरा… ओ मेरी मीरा… तू सह रही है… तू साबित कर रही है कि तू किसी भी समीकरण से बड़ी है…” उसकी साँसें एक हिचकी में फँस गईं, दर्द और विकृत गर्व के मिश्रण से।
गोलू ने मीरा के बाल पकड़े, जो अब पसीने और वीर्य से चिपचिपे हो चुके थे, और उसके सिर को जबरदस्ती आगे-पीछे झटका दिया, उसे अपने लंड पर और भी गहराई तक चलने के लिए मजबूर करते हुए, एक मानवीय स्लाइड रूल की तरह इस्तेमाल करते हुए।
फिर उसने अपना दायाँ हाथ उठाया, और मीरा के दाहिने गाल पर एक ठोस, गणितीय सटीकता से प्रहार किया।
“चटाक!!” आवाज़ गूँजती हुई, एक स्पष्ट बिंदु की तरह।
मीरा की आँखें पलक झपकाते हुए पीछे की ओर लुढ़क गईं, उसके सिर का संतुलन बिगड़ गया। दूसरा थप्पड़ बाएँ गाल पर।
“चटाक!!”
उसके होंठ और भी चौड़े हो गए, ताजा लार ने पुराने सूखे वीर्य के साथ मिलकर एक गंदा रंग बनाया।
फिर गोलू ने अपना मुँह भरकर, एक गहरी, घृणा से भरी आह्ट के साथ, सीधे मीरा के पूरे चेहरे पर, उसकी आँखों और नाक के बीच के खुले मैदान पर थूक दिया।
“त्त्ठ्हू..!!!!!”
गाढ़ा थूक एक सफेद, चिपचिपी परत की तरह उसकी त्वचा पर फैल गया, उसकी एक आँख के कोने को ढँकते हुए।
“अब देख!”
वह गरजा, अपनी गति को और भी उग्र बनाते हुए, “गाक्क!..गाक्क!!.गाक्क!..गाक्क!!..गाक्क!!..”
उसकी साँसें सीटी की तरह निकल रही थीं, उसका पागलपन अब पूरी तरह से उजागर हो चुका था।
“अब तू भी वैसी ही टेढ़ी है! जैसा मैं हूँ! तेरा चेहरा टेढ़ा हो गया! तेरा मुँह टेढ़ा हो गया!, रमेश! तेरी बीवी की कीमत अब और गिर गई! लंगड़ी औरत के मुँह की क्या क़ीमत? बताएगा कोई? यह एक अंतिम, अपूर्णांक समीकरण है!”
“गाक्क!..गाक्क!!.गाक्क!..गाक्क!!..गाक्क!!..”
वह एक अंतिम, हिंसक धक्के के साथ चरम पर पहुँचा, अपना वीर्य मीरा के गले में उड़ेलते हुए एक लंबी, कर्कश चीख के साथ, जैसे कोई प्रमेय का अंतिम निष्कर्ष निकल रहा हो।
“आआअह्ह्ह्ह……!!!!!!”
फिर वह लड़खड़ाता हुआ पीछे हटा, अपने लंगड़े पैर को घसीटता हुआ, पसीने और एक विचित्र, विकृत संतुष्टि से चमकता हुआ। उसने अपनी डायरी उठाई, उसमें कुछ लिखा—शायद एक समीकरण, एक सिद्ध प्रमेय—और फिर लपकते हुए कमरे के कोने में चला गया, जैसे कोई छात्र परीक्षा देकर लौट रहा हो।
मीरा फर्श पर पड़ी रही, उसका चेहरा अब थूक, वीर्य और गंदगी का एक अव्यवस्थित मास्क था—एक ऐसा मास्क जो उसकी पहचान को ढँक देता था, लेकिन उसकी आँखों की चमक को नहीं। वह हिलने-डुलने की कोशिश भी नहीं कर रही थी।
उसके शरीर में एक गहरी, सुन्न कर देने वाली थकान थी, जैसे हर मांसपेशी, हर हड्डी ने अपनी सीमा से परे काम किया हो। वह सिर्फ साँस ले रही थी—छोटी, कंपकंपाती हुई साँसें जो उसके फूलते हुए सीने को थोड़ा-थोड़ा उठाती थीं। हर साँस के साथ, उसके गले में एक जलन उठती, एक खुरदुरा दर्द जो उसे याद दिलाता कि अभी क्या हुआ था।
‘सब… सब देख रहे हैं… खिड़की से… उनकी साँसें रुकी होंगी… उनकी आँखें फैली होंगी… यह गोलू… यह लंगड़ा… जिसे कोई नहीं पूछता था… आज उसने भी मुझ पर राज किया… और मैं… मैं यहीं पड़ी रही… सहती रही… यही तो मेरी ताकत है… मैं नहीं टूटी… मेरा मुँह… मेरा गला… सब कुछ सहा है… और अब भी साँस ले रहा है… यही दिखाना था मुझे… कि मैं किसी से कम नहीं… बल्कि उन सबसे ज्यादा हूँ… जिनकी नज़रें अभी खिड़की पर चिपकी हैं…’
उसकी एक आँख, जो थूक और वीर्य से अटी नहीं थी, धीरे-धीरे खिड़की की ओर मुड़ी। अंधेरे में, उसे कई जोड़ी चमकती आँखों के सिल्हूट दिखाई दिए—चौंधियाती, हैरान, कुछ में भूख थी, कुछ में भय। वह जानती थी। वह हमेशा से जानती थी। और इस जानकारी ने उसे एक अजीब सी शक्ति दी, एक गर्माहट जो उसके टूटे हुए शरीर में भी बची थी।
रमेश कोने में खड़ा, अपने आप को दीवार से सहारा दिए हुए था। उसकी आँखों से आँसू बह चुके थे, अब सिर्फ खालीपान था, एक गहरी, दर्दनाक सुन्नता। उसकी नज़र मीरा पर टिकी थी, उसके उस विकृत चेहरे पर, जो अब भी सुंदर था—उसकी नज़र में।
“मेरी मीरा… मेरी मीरा… तू फर्श पर पड़ी है… मैं तुझे उठाना चाहता हूँ… गले लगाना चाहता हूँ… पर मैं हिल नहीं सकता… मेरे पैर जम गए हैं… और मेरे दिल में… एक अजीब सी गर्मी है… एक शर्मनाक गर्मी… क्योंकि तू वहीं पड़ी है जहाँ मैं चाहता था… नहीं… नहीं… मैं यह नहीं चाहता था… पर तू… तू चाहती थी… तू लड़ रही थी… और मैं… मैं तेरे साथ था… हर धक्के में… हर थूक में… हर थप्पड़ में …हर वीर्य की बूँद में… मैं वहीं था… और अब भी हूँ…’
उसने अपनी मुट्ठी खोली। उसकी हथेलियों पर नाखूनों के गहरे निशान थे, लगभग खून तक। उसकी पैंट अब भी नम थी, उसकी अपनी विकृत उत्तेजना का सबूत। वह एक पल के लिए आँखें मूंदना चाहता था, लेकिन नहीं मूंद पाया। उसे देखना था। उसे यह सब याद रखना था। क्योंकि यह उसकी मीरा का बलिदान था, उसकी जीत थी, और उसका… उसका प्यार था—टेढ़ा, गन्दा, विकृत, पर प्यार ही तो था।
कमरे में सन्नाटा गहरा हो गया, जिसे केवल मीरा की कंपकंपाती साँसों और बाहर से आती दबी हुई फुसफुसाहटों ने तोड़ा—शायद खिड़की के पीछे छिपे दर्शकों की, जो अब तक देख चुके थे, और अब भी देख रहे थे।
अंत में, राजू आगे बढ़ा।
उसके आगे बढ़ने में कोई जल्दी नहीं थी, कोई उत्तेजना नहीं थी। यह एक प्राकृतिक नियति का चलना था, जैसे कोई पहाड़ धीरे-धीरे खिसक रहा हो, अपने रास्ते में आने वाली हर चीज़ को कुचलता हुआ।
वह दसों में सबसे विशालकाय था—कंधे इतने चौड़े कि वह दरवाज़े से निकलते समय स्वयं को सिकोड़ता होगा, बाजूएँ ठोस लकड़ी के तख्तों जैसी, जिन पर नीली नसों का जाल साफ दिखाई देता था।
जब वह खड़ा हुआ, तो तेल के दीये की लौ उसकी छाया से काँप उठी, और उसकी विशालकाय परछाई ने फर्श पर पड़ी मीरा के टूटे-फूटे शरीर को पूरी तरह ढँक लिया, जैसे कोई बादल सूरज को निगल जाता है।
उसने एक शब्द नहीं कहा। शब्द उसके लिए फालतू थे, जैसे हल्के पत्थर एक दीवार के लिए। उसने आगे बढ़कर, अपने विशाल हाथों को फैलाया और मीरा को फर्श से उठा लिया, उसकी कमर के पास से पकड़कर।
यह एक इतनी सहज क्रिया थी जैसे कोई अनाज की बोरी उठा रहा हो—कोई भावना नहीं, कोई प्रतिरोध नहीं, बस एक काम। मीरा का शरीर उसकी बाँहों में लटक गया, निर्जीव-सा, उसकी टूटी पसलियाँ और कलाईयाँ एक दर्दनाक कोण पर झूल रही थीं, उसके सिर का भार पीछे की ओर लटक रहा था।
उसने उसे दीवार के सामने, एक मोटी लकड़ी के खंभे के पास ले जाकर खड़ा कर दिया, उसकी पीठ को अपनी चौड़ी, पत्थर जैसी छाती से दबा दिया, ताकि वह सीधी खड़ी रहे। उसकी गर्मी और पसीने की भारी, पशुवत गंध ने मीरा के घायल इंद्रियों पर हमला कर दिया। फिर उसने अपनी पतलून खोली।
उसका लंड दस इंच से अधिक लंबा और तीन इंच से ज़्यादा मोटा था—यह एक लंड नहीं, एक दंड था। एक मोटी, नीली नसों से ढँकी हुई, सिरे पर एक गहरे बैंगनी रंग की गाँठ लिए हुए, जो अब पूरी तरह से सख्त और धमनियों से फड़क रही थी। यह मानवीय सीमाओं से परे की चीज़ लग रही थी, एक प्रागैतिहासिक हथियार।
“यह आखिरी सीमा है,”
मीरा के मस्तिष्क में एक स्पष्ट, ठंडा विचार कौंधा, जब उसकी धुँधली आँखों ने उस राक्षसी आकार को देखा, जो अब उसके चेहरे के सामने लटक रहा था।
“यह राक्षस… इसके बाद कुछ नहीं बचेगा… कोई सीमा नहीं, कोई संदेह नहीं… और यही तो चाहिए था… गाँव वालों को दिखाने के लिए… खिड़की के पीछे से… कि एक रांड की हिम्मत क्या होती है… कि वह कितना सह सकती है… कि वह कितना ले सकती है… यही तो मेरी कीमत है… यही मेरी ताकत है…”
राजू ने अपना राक्षसी लंड मीरा के सूजे होंठों पर टिकाया। यह एक त्वरित, निश्चयपूर्ण स्पर्श था, जैसे कोई बन्दूक की नली को निशाने पर रख रहा हो। फिर, बिना किसी चेतावनी के, कोई पूर्व तैयारी या धीरे शुरुआत के, उसने अपने विशाल कूल्हों से पूरी ताकत से धकेल दिया, मीरा के सिर को अपने हाथों से जकड़े हुए, उसे लकड़ी के खंभे से सटाए रखते हुए।
“क्रंच-र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्रैक!!!!”
आवाज़ हड्डी के दबाव, उपास्थि के खिंचाव, और मांस के अप्राकृतिक रूप से फैलने की भयानक लय थी। मीरा का मुँह एकदम से चौड़ा हो गया। उसके जबड़े की हड्डियों ने एक ऐसी चौड़ाई हासिल कर ली जो प्रकृति के डिजाइन में कभी नहीं थी।
एक चीख निकलनी चाहिए थी, लेकिन उसका गला पहले ही रुंध चुका था, उसकी स्वर तंत्रियाँ पिछले नौ हमलों से सूजी और क्षतिग्रस्त हो चुकी थीं, केवल एक गूँजती हुई, दबी हुई घुरघुराहट निकल पाई।
दस इंच से ज़्यादा लंबा और तीन इंच मोटा लंड उसके मुँह की सारी सीमाएँ तोड़ता हुआ, एक रेलगाड़ी की तरह गले की गहराइयों में घुस गया। यह उसके टॉन्सिल्स को रौंदता हुआ, गले के पिछले हिस्से को धक्का देता हुआ, और अन्ननली के प्रवेश द्वार को दबाता हुआ सीधे उदर गुहा की ओर बढ़ रहा था।
मीरा का पूरा शरीर एक धनुष की तरह तन गया, उसकी एड़ियाँ फर्श से उठ गईं, केवल राजू की पकड़ और लकड़ी का खंभा ही उसे सीधा रखे हुए था।
राजू की गति अमानवीय थी—तेज, गहरी, और पूरी तरह विध्वंसक। उसने मीरा के सिर को पकड़ा और उसे लकड़ी के खंभे से जोर-जोर से टकराना शुरू कर दिया।
“धड़ाधड़! धड़ाधड़!”
हर टक्कर एक गूँजती हुई थप्पड़ की आवाज़ करती। मीरा के सिर के पीछे की त्वचा रगड़ से लाल हो गई, एक जलन भरी गर्मी फैल गई। उसने अपने एक विशाल हाथ से मीरा का जबड़ा पकड़ा—उसकी उँगलियाँ उसके गाल की हड्डी और ठुड्डी पर जम गईं—और उसे और जबरदस्ती चौड़ा खोल दिया, एक और भयानक कर्कश ध्वनि हुई। दूसरे हाथ से उसने उसके गालों पर जोरदार थप्पड़ मारे।
“चटाक!!-चटाक!!-चटाक!!!” यह आवाज़ नम मांस पर गोमांस के ताज़ा कटे टुकड़े गिरने जैसी थी।
“चूस, कुतिया!”
राजू की आवाज़ अब पहली बार सुनाई दी, एक गुफा के भीतर से आती गुर्राहट जैसी, गंदे शराब और क्रोध से भरी हुई।
“तेरे पति की हिम्मत नहीं थी मेरे सामने सीधे खड़े होने की! मेरी नज़र से डरता था! आज तू उसकी बेइज्जती करवा रही है! तू उसकी कायरता का मूल्य चुका रही है!”
“गाक्क!..गाक्क!!.गाक्क!..गाक्क!!..गाक्क!!..”
राजू का प्रहार लगातार जारी था, एक मशीन की निर्मम लय में। वह पूरा अंदर घुसाता, उसकी जाँघें मीरा के पीछे के हिस्से से जा टकरातीं, फिर वह आधा बाहर निकालकर तुरंत फिर से जोर से झटका देता। हर धक्के से मीरा का शरीर खंभे से टकराता। उसकी आँखें पलट रही थीं, केवल सफेद दिखाई दे रहा था, फिर वापस आकर खिड़कियों की ओर टिक जातीं, जहाँ गाँव वालों की साँसें रुकी हुई थीं।
उसका शरीर ऐंठन महसूस कर रहा था, एक अनैच्छिक, दर्दनाक कंपकंपी जो हर तंत्रिका अंत को जलाती हुई गुज़र रही थी। लेकिन उसकी आँखों की चमक, जो गहराई में जल रही थी, मद्धम नहीं पड़ी थी।
रमेश कोने में सिकुड़ा हुआ खड़ा था, उसका हाथ अब भी गिलास पकड़े हुए था जो बहुत पहले खाली हो चुका था। उसके मस्तिष्क में विचारों का एक तूफान चल रहा था, एक दूसरे से टकराते हुए:
“हे भगवान… यह तोड़ देगा उसे… यह उसकी गर्दन तोड़ देगा… यह उसे मार डालेगा… पर… पर देखो… सारा गाँव देख रहा है… खिड़कियों के शीशों पर चिपके हुए… वे सब जान जाएँगे… वे सब देख लेंगे कि मेरी मीरा किस लायक है… वह कितना सह सकती है… वे सब जलेंगे… उनकी पत्नियाँ कभी ऐसा नहीं कर सकतीं… वे सब घुटेंगे इस जलन में…”
और फिर, सबसे अंधेरे, सबसे गहरे कोने में: रमेश की जाँघों के बीच उसका अपना लंड सख्त होकर धड़क रहा था, उसकी पतलून के अंदर एक दर्दनाक, शर्मनाक स्पंदन। शर्म, डर, और एक विकृत, विषैला गर्व का मिश्रण उसके भीतर एक जहरीला रसायन बना रहा था जो उसे पागल कर रहा था।
राजू ने अचानक मीरा को खंभे से खींचा, उसे घुमाया, और फर्श पर पटक दिया।
“धडाम!!!”
उसकी पीठ और कंधे ठंडे कंक्रीट से टकराए। फिर वह उस पर झुक गया, अपने विशाल हाथों से उसके सिर को जमीन से उठाया और फिर से अपने लंड पर ठूँस दिया।
अब वह उसे नीचे की ओर झुकाकर, ऊपर से नीचे की ओर धकेल रहा था। यह कोण और भी दर्दनाक था—लंड अब सीधा नीचे की ओर गले में धँस रहा था, गुरुत्वाकर्षण के साथ, एक दम घोंटने वाला दबाव बना रहा था।
“देख रहा है तेरा पति!” राजू ने फिर गुर्राया, उसकी आवाज़ अब और भी भारी, उसकी साँसें फुफकारती हुई।
“देख रहा है कि कैसे एक असली मर्द तेरी प्यास बुझाता है? वो तो बस एक किसान है… एक नामर्द… जो अपनी बीवी के जिस्म से अपना कर्ज़ उतारता है। मैं… मैं उसका कर्ज़ लेता हूँ। और तू… तू उसकी ब्याज है।”
“गाक्क!..गाक्क!!.गाक्क!..गाक्क!!..गाक्क!!..”
उसकी गति एक चरमोत्कर्ष पर पहुँच गई, अब एक अराजक, जानवरी लय में। और फिर वह आया—उसका स्खलन। यह एक बाढ़ की तरह था। पहले एक मोटी, गर्म धार, फिर एक लगातार, गाढ़ा प्रवाह।
यह मीरा के गले में भरता चला गया, उसकी क्षमता से अधिक, उसके मुँह से बाहर निकलकर उसकी ठुड्डी, गर्दन और छाती पर बहने लगा, पहले के सूखे और ताज़ा वीर्य के साथ मिलकर एक अश्लील, बहु-स्तरीय पेस्ट बनाने लगा।
राजू ने उसे निगलने के लिए मजबूर करते हुए, उसका सिर और दबाया, एक लंबी, गहरी गुर्राहट के साथ जो कमरे में गूँज गई। फिर, अचानक, उसने उसे ज़ोर से एक ओर फेंक दिया, जैसे कोई फल का छिलका उतारकर फेंकता है।
मीरा फर्श पर लुढ़क गई, खाँसती हुई, उबकाई लेते हुए, उसका पेट ऐंठ रहा था।
“उल्ल्ग्ह्ह… हक… हक…” आवाज़ें घुटी हुई और दर्द से भरी थीं।
उसका चेहरा अब वीर्य और लार का एक अव्यवस्थित मास्क था। उसकी आँखें लाल थीं, लेकिन जब वह आँखें खोलकर, सीधे रमेश की ओर देखी, तो उसके होंठों के कोने पर—उस टूटे, सूजे हुए मांस के बीच—एक टेढ़ी, विजयी मुस्कान उभर आई। एक ऐसी मुस्कान जो कहती थी:
“देखा मैंने कहा था न में कर लुंगी? अब बोलो?”
राजू ने अपना लंड साफ किया, एक साधारण, व्यावहारिक हरकत में, फिर रमेश की तरफ एक घृणा भरी, तिरस्कारपूर्ण नज़र फेंकी जिसमें सभी शब्द समाहित थे, और बिना एक शब्द कहे वापस अपनी जगह पर जा बैठा।
कमरे में सन्नाटा था, एक भारी, शारीरिक सन्नाटा जिसे केवल मीरा की घरघराहट भरी, टूटी हुई साँसें तोड़ रही थीं। दस मर्द अपने-अपने लंड साफ कर रहे थे, कपड़ों के टुकड़ों से, अपनी शर्ट के छोर से। उनके चेहरे पर संतुष्टि थी, लेकिन एक गहरी, शारीरिक थकावट भी, जैसे किसी कठिन मजदूरी के बाद—एक ऐसी मजदूरी जिसमें शरीर का हर रस निचुड़ गया हो।
रमेश की नज़र खिड़की के उस पार, बाहर के गहरे अंधेरे में पड़ी एक असामान्य, सामूहिक हलचल पर टिक गई और फिर वहीं अटक गई। एक नहीं, दो नहीं… कई आकृतियाँ थीं, जो उस खिड़की के शीशे से चिपकी हुईं, एक-दूसरे से घिसटती हुईं, आगे-पीछे हिल रही थीं। आँखों की चमक… दबी हुई फुसफुसाहटें… उसका दिल एक जोरदार धक्के से धड़क उठा, जैसे कोई लट्ठा सीने पर जड़ दिया गया हो। वो धीरे से पीछे मुड़ा और पीछे की दरवाज़े की और सरक गया, उन आँखों से आखे मिलाने के लिए जो संकरो की दुहाई देते थे!…
To be continued . . .
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