परिवार में ही हुआ हलाला – पार्ट १
अगले दिन फ़र्दीन चाचा फिर आए, और इस बार उनके चेहरे पर एक अजीब सी उदासी और चिंता थी, जो उनकी आँखों के आस-पास की कालिख-सी छाया से साफ़ झलक रही थी। हम सब फिर उसी कमरे में जमा हुए। अब्बू ने पूछा, “क्या हुआ फ़र्दीन? मौलाना साहब ने क्या कहा?”
फ़र्दीन चाचा ने एक कठोर, डरावनी बात कही। “मौलाना साहब ने कहा… किसी ने सना और याक़ूब पर ‘सिफ़ली अमलियत’ करवाई है। इसीलिए उनमें हर रोज़ लड़ाई होती थी।”
यह सुनते ही अब्बू और सना के चेहरे का खून सूख गया। उनकी आँखें भय से फैल गईं। मेरी और आकिब की समझ में कुछ नहीं आया। यह कैसी बात थी?
“आप क्या कह रहे हैं चाचा?” सना ने घबराई आवाज़ में पूछा, उसका हाथ अनजाने में अपने गले तक पहुँच गया।
फ़र्दीन चाचा ने गंभीरता से समझाया। “मेरा मौलाना साहब से बहुत निजी संपर्क है… बहुत कम लोग जानते हैं कि वह हमारे समुदाय के
लोगों के लिए ये चीज़ें चुपके से करते हैं। कल यहाँ से जाते वक़्त ही उन्होंने सना में कुछ गड़बड़ महसूस की थी। उन्होंने कल रात
कब्रिस्तान में कुछ रस्में कीं, तब पता चला।”
“या अल्लाह मदद! इसीलिए तो हमारी निकाह नहीं चली!” सना रोने लगी, उसके आँसू अब डर और हैरानी के थे।
मैं और आकिब अभी भी कोशिश कर रहे थे समझने की। “इसका मतलब क्या है चाचा? यह ‘सिफ़ली अमलियत’ क्या है? और आप सब
इतना क्यों डर गए? मौलाना साहब ने कब्रिस्तान में क्या किया?” मैंने पूछा।
“यह काला जादू है बेटा,” फ़र्दीन चाचा ने कहा, उनकी आवाज़ धीमी और भयभीत थी। “जैसा मौलाना साहब ने कहा, किसी ने सना और
याक़ूब पर यह टोना डलवाया ताकि उनकी निकाह टूट जाए। और लगता है वह कामयाब भी हुए!”
“क्या?! यह कैसे मुमकिन है? मेरा मतलब, कोई किसी की निकाह तोड़ने के लिए ऐसा क्यों करेगा?” मैंने हैरानी से पूछा।
“तुम बहुत मासूम हो बेटा,” फ़र्दीन चाचा ने कहा। “ऐसी बहुत से परिवार हैं जिनकी हमारी सना जैसी खूबसूरत बेटियाँ हैं… सीधी बात
है। वे हमारी सना और याक़ूब की निकाह से जलते थे। इसलिए किसी ने यह टोना डलवाया ताकि निकाह टूट जाए और वे बाद में
अपनी बेटी का निकाह उस घर में कर सकें।”
सना ने रोना बंद कर दिया था। सिसकते हुए, उसे याद आने लगा। “अब समझ आया… क्यों याक़ूब पहले महीने बहुत अच्छा था और
फिर अचानक बदल गया। वह हमेशा मुझ पर गुस्सा रहता था, चाहे मैं कुछ भी करूँ…”
“पर अगर यह सच है, तो फिर वह तुम्हें वापस लेने क्यों लौटा?” मैंने फिर पूछा।
“क्योंकि जादू ने अपना काम कर दिया और इसलिए अब वह किसी तरह खत्म हो गया है, शायद,” पहली बार आकिब ने हमारी
बातचीत में तर्क के साथ हस्तक्षेप किया।
“हाँ आकिब बेटा, तुम सही कह रहे हो। यही कहिकत है,” फ़र्दीन चाचा ने कहा। “वैसे, ऐसे ही सवाल मेरे दिमाग में भी आए और मैंने
मौलाना साहब से पूछा। उन्होंने कहा कि जादू अपना काम करने के बाद खत्म नहीं होता। अगर हम हलाला करके भी सना का याक़ूब
से दोबारा निकाह करवाते हैं, तो वह फिर से सक्रिय हो जाएगा और एक बार फिर उनका निकाह तोड़ देगा।”
“नहीं नहीं नहीं… मैं अपना निकाह फिर से नहीं टूटते देखना चाहती चाचा,” सना ने दुखी और चिंतित चेहरे से पूछा। “क्या मौलाना
साहब ने आपको यह जादू तोड़ने का कोई तरीका नहीं बताया?”
“उन्होंने मुझे बताया कि… इस तरह के काले जादू को सिर्फ किसी और काले जादू से ही तोड़ा जा सकता है,” फ़र्दीन चाचा ने जवाब दिया।
“तो फिर हमें वही करना चाहिए फ़र्दीन, इसमें दिक्कत क्या है?” अब्बू ने कड़वी हकीकत का सामना करते हुए पूछा। “हमें यह सब करना पसंद नहीं, मगर किसी ने हमारी बेटी के सिर पर आफत डाल दी है। हमारे पास और क्या मुताब्दिल है?”
यह सुनकर सना फिर से रोने लगी। “हमने कभी किसी का बुरा नहीं किया… हम सबको प्यार और इज्ज़त से मिलते हैं। फिर भी कोई हमारे साथ ऐसा क्यों कर रहा है?” उसकी सिसकियाँ कमरे में गूँजने लगीं।
उसे देखकर फ़र्दीन चाचा बोले, “घबराओ मत बेटा, सब ठीक हो जाएगा। तब तक हम सबको मजबूत रहना है और मौलाना साहब जो सलाह दे रहे हैं, उस पर ध्यान देना है।”
“उन्होंने क्या सलाह दी है चाचा?” मैंने पूछा।
“उन्होंने सना को अमावस्या वाली रात, जो परसों है, उन्होंने सना को दुल्हन के तौर पर सज कर अकेले उनके घर आने के लिए कहा है… कुछ रस्म के लिए। उन्होंने तुम्हें अकेले बुलाया है,” फ़र्दीन चाचा ने कहा।
“यह क्या हो सकता है फ़र्दीन?” अब्बू ने पूछा, उनकी आवाज़ में एक पिता का डर साफ़ झलक रहा था।
“मैं मौलाना साहब से यह पूछने की हिम्मत नहीं कर पाया… मैं सिर्फ़ वही बता रहा हूँ जो उन्होंने मुझसे कहा,” चाचा ने जवाब दिया।
इसके बाद कमरे में एक कशीदगी छा गई। हम सब तनाव में थे, और मौलाना साहब के हिदायत का अमल करने का फैसला लिया।
सना ने अपनी आँखें पोंछीं और मज़बूती से कहा, “घबराइए मत अब्बू। मैं यह करूँगी, चाहे जो भी करना पड़े। हमारे परिवार पर पड़े
इस जादू को तोड़ने के लिए मैं कुछ भी करूँगी।”
उसके शब्दों में एक तिलिस्मी जुनून था, जैसे वह अब सिर्फ़ एक मजलूम नहीं, बल्कि एक सिपाही बन गई हो। फ़र्दीन चाचा ने सिर
हिलाया, एक आखिरी, गहरी नज़र सना पर डाली जिसमें चिंता के साथ-साथ कुछ और भी था—शायद शक, शायद लालच, शायद
दया—और फिर चले गए।
दरवाज़ा बंद हुआ। अब्बू ने अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया। आकिब चुपचाप कोने में सिकुड़ गया। मैंने सना की ओर देखा। वह
खिड़की से बाहर अँधेरे की ओर देख रही थी, जहाँ अमावस्या की काली रात इंतज़ार कर रही थी। उसकी आँखों में अब आँसू नहीं थे।
सिर्फ़ एक ठंडी, फैसलाकुन चमक थी, जैसे वह किसी पोशीदा दुश्मन को चुनौती दे रही हो।
हवा में अब सिर्फ़ पंखे की आवाज़ नहीं, बल्कि एक अनकही, खतरनाक इरादे की गूँज थी, जो परसों की रात के साथ और गहरा, और भयानक होती जा रही थी।
अगले दिन सना ने फज्र की नमाज़ के बाद घंटों सजदे में पड़ी रही, आँखों से बहते आँसू गलीचे को भिगोते रहे। “ऐ अल्लाह, मेरे घर को
बचा, मेरे निकाह को बचा। उस बुरी नज़र को दूर कर दे जिसने हमें जकड़ रखा है।” उसकी आवाज़ भरभराई हुई थी, भरोसा और डर
के बीच झूल रही थी। वह हर पीर-फ़कीर के दर पर गई , हर मज़ार पर चादर चढ़ाई। उस “गरीब सना” का यह हाल देख मेरा दिल
कचोट रहा था। वह इतनी मुत्तक़ी थी, अगर यह सब झूठा निकला, तो उसका ईमान, उसका जीने का भरोसा, सब चकनाचूर हो
जाएगा।
फिर वह रात आई। अमावस्या की काली रात। अब्बू ने मोटर साइकिल पर सना को मौलाना साहब के घर के सामने छोड़ा। “अल्लाह
हाफिज़, बेटा,” अब्बू की आवाज़ में एक कंपन था। सना ने सिर्फ़ सिर हिलाया, अपने बुर्के को और कसकर लपेटा। मैं चिंतित था। उसे
अकेले छोड़ना… मगर मैं जानता था अब्बू, चाचा, यहाँ तक कि सना भी मुझे साथ नहीं आने
देते। इसलिए मैं दिन ढलने से पहले ही, छिपकर, मौलाना साहब के कच्चे मकान के पीछे पहुँच गया था, झाड़ियों और कचरे के ढेर के
बीच छिपा बैठा था।
अँधेरा इतना गहरा था कि साँस लेने पर भी डर लगता था। मैंने सना को दरवाज़ा खोलते और अंदर जाते देखा। अब्बू की मोटर
साइकिल की आवाज़ दूर हो गई। मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
मैंने खिड़की के पास रेंगकर अपनी स्थिति बनाई। खिड़की थोड़ी-सी खुली थी, शायद गर्मी की वजह से। अंदर का मंज़र मुझे साफ़
दिख रहा था। कमरा छोटा था। एक मिट्टी का दीया कोने में जल रहा था, जिससे लंबी-लंबी परछाइयाँ दीवारों पर नाच रही थीं। हवा में
गंदे कपड़ों और सड़े हुए फूलों की बू आ रही थी। सना बुर्के में ही बैठी थी, सामने मौलाना साहब। उन्होंने पहले कुछ कहा, शायद दुआ
की। फिर उनकी आवाज़ साफ़ सुनाई दी।
“बेटा, मेरे हर हुक्म का पालन किया तुमने? जो मैंने फोन पर बताया था?”
सना की आवाज़, डरी हुई मगर मज़बूत, जवाब में आई। “जी, मौलाना साहब। मैं तैयार हूँ।”
और फिर उसने अपना बुर्का उतार दिया।
दीये की लौ ने उस पर ऐसा प्रकाश डाला मानो वह सचमुच दुल्हन हो। लाल रेशम का लेहेंगा, चमकदार ज़री का ब्लाउज, गहनों से लदे
हाथ। उसका चेहरा, जो आजकल हमेशा उदास रहता था, एक अजीब सी सुकून से भरा हुआ था। मौलाना साहब कुछ पल के लिए
सकते में आ गए। उनकी आँखें, जो आमतौर पर गुस्से से संकरी रहती थीं, अब फैल गई थीं।
उनका गला हल्का-सा हरकत कर गया। वह उसकी खूबसूरती पर महरूर हो गए थे, यह साफ़ था।
कुछ देर बाद, उन्होंने फर्श पर इशारा किया। “बैठ जाओ।”
सना फर्श पर बैठ गई। मौलाना साहब ने पास पड़े एक थैले को खींचा और उसमें से चीज़ें निकालनी शुरू कीं। एक पीली पड़ी खोपड़ी, एक तावीज़, कुछ अगरबत्तियाँ, एक लाल कपड़ा… और कुछ और चीज़ें जो मैं ठीक से पहचान नहीं पाया।
फिर उन्होंने हुक्म दिया। उनकी आवाज़ में अब कोई दुआ-दुरूद नहीं, सिर्फ़ एक रुखा, बेरहम हुक्म था।
“बेटा, सीधी लेट जा। अपना ब्लाउज खोल। अपनी लेहेंगे को कमर तक उठा ले। और नीचे जो भी पहना है, उतार दे।”
सना के शरीर में एक झटका-सा दौड़ गया। “क्या? मौलाना साहब, आप क्या कह रहे हैं?”
मौलाना साहब का चेहरा एकदम कठोर हो गया। “जो कह रहा हूँ वही कर, बेवकूफ औरत! तू क्या सोचती है, मैंने औरतों का बदन पहले नहीं देखा? यह जादू-टोना उतारने के लिए यही करना पड़ता है!”
यह सुनकर मेरे भीतर आग सी लग गई। मेरा खून खौल उठा। मैंने दरवाज़े की तरफ़ देखा, एक पल को लगा कि तोड़कर अंदर घुस जाऊँ, इस बूढ़े भेड़िए का गला दबा दूँ। मगर फिर मैंने देखा… सना।
वह एक लंबी, काँपती हुई साँस ले रही थी। उसकी आँखों में कश्मकश थी—शर्म की, डर की, लेकिन उससे भी बढ़कर उस मिशन की जिसके लिए वह यहाँ आई थी। उसने अपनी उँगलियाँ ब्लाउज के बटनों पर रखीं। एक-एक करके बटन खुलने लगे। मैंने एक पल को आँखें मूँद लीं, फिर खोल दीं। मुझे देखना था कि यह पाखंडी क्या करने वाला है।
ब्लाउज खुल गया। उसके स्तन, बाहर आ गए। उसके निप्पल गहरे गुलाबी और सख्त थे, ठंडी हवा या फिर इस जराहना स्थिति से उत्तेजित होकर। वह सीधी लेट गई। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं और सिर दूसरी तरफ़ घुमा लिया। फिर उसने अपने लहंगे की सिलवटें पकड़ीं, और धीरे-धीरे, काँपते हाथों से, उन्हें ऊपर की ओर,
अपनी कमर तक खींचना शुरू किया। और फिर वह नज़ारा सामने आया, जिसने मुझे और मौलाना साहब दोनों को ही स्तब्ध कर दिया।
सना ने कोई चड्डी नहीं पहनी थी। वह पूरी तरह नंगी थी। उसकी चूत बिल्कुल साफ़ मुंडी हुई थी, थोड़ी सी सूजी हुई, और उसके बीच के हिस्से में कुछ चमकदार तरल साफ़ दिख रहा था। उसकी जाँघें आपस में कसकर बंद थीं, जिससे उसकी चूत के होठों की तीन कोमल रेखाएँ और भी सुंदर और गहरी नज़र आ रही थीं। मेरा मुँह खुला का
खुला रह गया। मेरी लार टपकी। मेरे लंड ने अचानक कड़कपन ले लिया, खून का एक गर्म झोंका उसमें दौड़ गया। वह मेरी बहन थी… मगर फिर भी। यह मेरी गलती नहीं थी। वह सचमुच, एक अजीब और भयानक तरीके से, सुंदर लग रही थी।
मैंने अपने आपको समेटा और मौलाना साहब की ओर देखा। वह भी उसी तरफ़ देख रहे थे, उनकी आँखें फैली हुई थीं। उनका एक हाथ अपने लुंगी के ऊपर, अपनी जाँघ के पास था, और वह बहुत ही सावधानी से, लेकिन यक़ीनन वे, अपने लंड को रगड़ रहे थे। लुंगी के नीचे एक मोटी, उभरी हुई गाँठ साफ़ दिख रही थी। वह भी उत्तेजित हो गये थे।
मैंने फैसला किया। अगर सना थोड़ी-सी भी नाइत्तफ़ाकी दिखाएगी, रुकेगी, तो मैं तुरंत अंदर घुस जाऊँगा। यह मेरा विचार था।
मगर आगे जो हुआ, वह इसके ठीक उलट था।
मौलाना साहब ने एक छोटी थैली में हाथ डाला और कुछ रंग-बिरंगे, चिकने पत्थर निकाले। उनकी आँखों में एक अजीब चमक थी, जैसे
कोई कारीगर अपने औजारों को देख रहा हो। “अब शुरू करते हैं, बेटा।” उन्होंने कहा, मगर उनकी आवाज़ में कोई दया नहीं, सिर्फ़
एक ठंडी बेकरारी थी। पहला पत्थर, एक गहरा लाल रंग का, उन्होंने सना के दाएँ निप्पल पर रख दिया। पत्थर का ठंडा स्पर्श पड़ते ही
सना के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। उसके निप्पल और भी सख्त होकर उभर आए। दूसरा पत्थर, एक जामुनी रंग का, बाएँ निप्पल
पर। सना ने अपनी साँस रोक ली, उसकी पलकें ज़ोर से बंद थीं, मानो वह इस पल को अपनी याददाश्त से ही मिटा देना चाहती हो।
“अब अपनी टाँगें ऊपर उठा,” मौलाना साहब ने आदेश दिया।
सना ने धीरे से, अपने घुटनों को मोड़ा और अपनी टाँगें हवा में उठा लीं। यह हालात उसे और भी मजबूर, और भी उजागर बना रही थी।
मौलाना साहब करीब आए। उन्होंने अपने हाथों से उसकी टाँगों को और खोला, जबर्दस्ती फैलाया, ताकि उसकी पूरी चूत और उसके
गांड के छेद का नज़ारा साफ़ दिखे। सना ने अपने होंठों को इस कदर दबा लिया कि वे सफ़ेद पड़ गए।
मौलाना साहब ने एक छोटा, चमकदार पत्थर लिया जो किसी तेल से चिकनाया हुआ लग रहा था। बिना किसी चेतावनी के, उन्होंने
अपनी एक उँगली उसकी गांड के छेद पर रखी और धक्का दिया। पत्थर अंदर चला गया।
“ऊंह्फ!” सना के मुँह से एक दबी हुई, दर्द भरी आवाज़ निकली। उसका शरीर ऐंठ गया, मगर उसने अपनी टाँगें वहीं खुली रखीं। कोई
जवाब नहीं दिया। उसने उसे वही करने दिया जो वह चाहता था। उसकी आँखों से आँसू की दो धाराएँ गालों पर बह चलीं, मगर उसने
आवाज़ नहीं निकाली। मौलाना साहब ने संतुष्ट होकर उसकी टाँगें बंद कर दीं और फिर ज़मीन पर सीधा लेटा दिया। मैंने देखा, उनकी
लुंगी के नीचे उनका लंड अब पूरी तरह खड़ा हो चुका था, एक तम्बू की तरह उभरा हुआ। मगर वह इससे बेपरवाह थे, क्योंकि सना की
आँखें बंद थीं। फिर उन्होंने एक और पत्थर, हरे रंग का, सीधे सना की चूत के ऊपर, उसके उभरे हुए दाने पर रख दिया। उन्होंने सना
का सिर पकड़कर सीधा किया, उसे छत की ओर देखने को मजबूर किया, और एक सफ़ेद पत्थर उसके होंठों पर रख दिया।
सना अभी भी आँखें बंद किए हुए थी, नंगी, उसके शरीर पर पत्थरों का एक अजीब और जाराहाना गहना सजा हुआ था। मगर मैं
साफ़ देख सकता था, वह डरी हुई थी। उसकी साँसें अनियमित और तेज़ थीं।
इसके बाद, मौलाना साहब ने वह पुरानी, पीली पड़ी खोपड़ी उठाई। उस पर भी एक पत्थर रखा। फिर उन्होंने कुछ अगरबत्तियाँ जलाईं और खोपड़ी के आस-पास रख दीं। एक लाल कपड़ा अपने दोनों हाथों में लेकर वह ज़ोर-ज़ोर से कुछ बुदबुदाने लगे। वह भाषा मैं नहीं पहचान पा रहा था – न उर्दू, न अरबी, कुछ टूटी-फूटी, पुराणी सी लग रही थी। मगर
वह कुछ कर रहा था, यह तय था।
क्योंकि कुछ ही मिनटों में, अचानक, कमरे की हर चीज़ हिलने लगी। मेज पर रखा पानी का गिलास खड़खड़ाया, दीवार पर टंगी तस्वीर झूलने लगी। यह कोई हल्का झटका नहीं था, बल्कि ठीक वैसा ही था जैसे छोटा भूकंप आ गया हो। मैं यह देखकर सकते में आ गया। मेरा लंड, जो पल भर पहले तक कड़क था, एकदम ढीला पड़ गया। यह सच था… यह कोई ढोंग नहीं लग रहा था।
मगर आगे जो हुआ, उसने मेरा दिमाग़ ही झिंझोड़ कर रख दिया।
कमरे का हिलना अचानक बंद हो गया। और उस खोपड़ी से एक काला, घना धुआँ उठने लगा। यह कोई आम धुआँ नहीं था। यह ऐसे उठ रहा था जैसे कोई जिंदा चीज़ हो, घुमड़ता हुआ, हवा में तैरता हुआ। सना ने भी अपनी आँखें खोल दीं, और एक दहशत भरी चीख़ उसके गले में ही अटक गई। वह अभी भी नंगी पड़ी थी, पत्थर उसके शरीर पर रखे हुए।
कुछ ही सेकंड में वह अजीब धुआँ हवा में एकत्रित हो गया, एक तैरती हुई, अनिश्चित शक्ल बनाते हुए। और फिर वह बोला।
आवाज़ कर्कश, खुरदरी और बिल्कुल बेइंसानी थी। “क्यों बुलाया?”
तब मैंने मौलाना साहब की ओर देखा। उनकी आँखों की पुतलियाँ गायब हो चुकी थीं। पूरी आँखें सफ़ेद, बिल्कुल सफ़ेद हो गई थीं। वह खुद भी काँप रहे थे, जैसे कोई उन पर काबू कर रहा हो। और वह धुएँ की आकृति किसी अनजान भाषा में बातचीत करने लगे। आवाज़ें गुफ़ा की गूँज जैसी, फुसफुसाहट और गुर्राहट से भरी हुईं।
यह देखकर मैं सन्न रह गया। मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी ऐसी चीज़ों पर यकीन नहीं किया था। भूत-प्रेत, जिन्न… ये सब किस्से-कहानियाँ लगती थीं। मगर आज… यह मेरी आँखों के सामने हो रहा था।
कुछ मिनट तक वह अजीब गुफ़्तगू चली। फिर वह काला धुआँ वापस उसी खोपड़ी में समा गया। कमरे में सब कुछ शांत हो गया। हिलना बंद हो गया।
मौलाना साहब ने अपनी आँखें खोलीं, जो अब पहले जैसी हो चुकी थीं, मगर उनमें एक गहरी थकान और डर था। उन्होंने सना के शरीर से सारे पत्थर एक-एक करके उठा लिए। जब उनकी बारी उस पत्थर की आई जो सना की गांड में था, तो उन्होंने अपनी उँगली फिर से अंदर डाली और उसे बाहर निकाला।
“हम्म्फ…” सना ने एक अजीब सी हरकत की, मौलाना साहब के इस कार्य से। मगर वह चुप रही।
“अपनी आँखें खोल, और अपने कपड़े ठीक कर ले,” मौलाना साहब ने कहा, उनकी आवाज़ अब फिर से सामान्य थी, मगर कमज़ोर पड़ गई थी।
सना ने तुरंत उनका आदेश माना। उसने अपना लहंगा ठीक किया, चोली के बटन बंद किए, और शरीर को एक बार फिर से बुर्के से ढक लिया। फिर वह दोनों वापस कुर्सियों पर बैठ गए।
“क्या… क्या हुआ मौलाना साहब?” सना ने डरती हुई आवाज़ में पूछा। “मैंने देखा… कोई बात कर रहा था… और सब कुछ हिल रहा था… वह क्या था?”
सच कहूँ, तो वह वाकई बहुत डरावना था।
“हम्म…” मौलाना साहब ने एक लंबी साँस ली। “मैंने उस रूह से बात की, तेरी समस्या के बारे में, और मदद माँगी।”
“उस रूह ने क्या कहा?” सना ने बेताबी से पूछा।
“हम्म… इसकी तस्दीक हो गई है कि तेरे और तेरे परिवार की निजी ज़िंदगी खतरे में है,” मौलाना साहब ने फ़िक्र जताते हुए कहा। “उस रूह ने मुझे बताया… कि जिसने भी यह किया है, वह बहुत ताकतवर जादू है। सिर्फ़ तू ही इसके गिरफ्त में नहीं है, बेटा… तेरा पूरा परिवार पहले ही इससे घिर चुका है।”
“क्या?!” सना की आवाज़ में घबराहट फिर से लौट आई। “कुछ करिए मौलाना साहब… मैं कुछ भी करूँगी… मेहरबानी करें!” मेरी बहन ने लगभग गिड़गिड़ाते हुए कहा, उसकी आँखें फिर से पानी से भर गईं।
“हम्म… एक हल है, जो उस रूह ने मुझे बताया…” मौलाना साहब ने कहा। “मगर मैं वो फ़र्दीन और तेरे अब्बू से कल सुबह घर आकर बताऊंगा। अभी के लिए, तू अपने घर वापस चली जा।”
इसके बाद सना ने अब्बू को फोन किया। मैं एक बार फिर अँधेरे में छिप गया। कुछ मिनटों बाद मेरे अब्बू बाइक पर आए और सना को लेकर घर के लिए रवाना हो गए। कुछ देर बाद, मैंने भी वही किया।
अगले ही दिन सुबह, मौलाना साहब फ़र्दीन चाचा के साथ हमारे घर आए। हमारे छोटे से बैठकखाने में सब बैठे थे। चाय पीने के बाद अब्बू ने सवाल किया, “मौलाना साहब, क्या हुआ? सना ने मुझे कल रात की, उस रूह के बारे में सब कुछ बताया…”
“हम्म, यह सच है फ़ारूक मियाँ,” मौलाना साहब ने गंभीर स्वर में कहा। “किसी ने तुम्हारे पूरे परिवार पर बहुत गहरा काला जादू कर दिया है! अब बात सिर्फ़ सना की नहीं रही, जैसा हम सोच रहे थे। तुम्हारा पूरा परिवार मुसीबत में है, और जिस किसी से भी तुम्हारा संपर्क होगा, वह तुमसे नफ़रत करने लगेगा और जल्द ही तुम्हें छोड़ देगा।
मिसाल के तौर पर, अगर सादिक़ या आकिब की अब निकाह होता है, तो वे अपनी बीवी से झगड़ने लगेंगे। और यह सिर्फ़ हमसफ़र तक सीमित नहीं रहेगा, यह किसी भी रिश्ते को प्रभावित कर सकता है, जैसे दोस्त, सहकर्मी, वगैरह। और हाँ फ़र्दीन, मेरे ख़्याल से तुम भी खतरे में हो क्योंकि तुमने सना का निकाह करवाया था।”
“क्या?! मैं भी?!” फ़र्दीन चाचा ने हैरानी से पूछा।
“हाँ, तुम भी,” मौलाना साहब ने पुष्टि की।
“अब समझ आया… मेरे बॉस मुझ पर लगातार चिल्ला क्यों रहे हैं, चाहे मैं कितनी भी मेहनत कर लूँ,” अब्बू ने फैक्ट्री में अपना अनुभव साझा किया।
“हाल ही में मुझे भी लोगों से संपर्क बनाए रखने में दिक्कत हो रही है… ऐसे लगता है जैसे वे अचानक मुझसे दूर भागने लगे हैं,” फ़र्दीन चाचा ने भी अपना अनुभव बताया।
आकिब और मैंने भी अपनी ज़िंदगी में आई कुछ मुश्किलों के बारे में सबको बताया।
“यह संजीदा मामला है मौलाना साहब… मेहरबानी करके हम सबकी मदद करें… आख़िर हम सबके साथ ऐसा क्यों हो रहा है?” अब्बू ने पूछा।
“हम्म, सटीक वजह तो मैं नहीं जानता, मगर मुझे पता है कि यह कैसे शुरू हुआ होगा और इसका हल क्या है… इसलिए मैं सुझाव दूँगा कि तुम सब यह सोचने की बजाय कि यह किसने किया, उस हल पर ध्यान दो,” मौलाना साहब ने जवाब दिया।
“बहुत सही कहा मौलाना साहब… हमें बताइए कि यह जादू कैसे हटेगा,” फ़र्दीन चाचा ने पूछा।
“हम्म, मेरा अंदाज़ा है कि यह यक़ीनि तौर पर सना की याक़ूब से निकाह से शुरू हुआ होगा… तो जिसने यह जादू किया, वह तुमसे भी नफ़रत करता है फ़र्दीन… मगर उसने सारा जादू तुम्हारे पूरे परिवार पर कर दिया, तुम्हें भी शामिल करके। मगर रूह ने मुझे हल बताया… कि हमारे समाज के मुताबिक हम हलाला करने पर तो पहले ही सहमत हो चुके हैं…”सबने इस बात पर सिर हिलाया।
“मगर जादू हटाने के लिए हम सभी को हलाला करना होगा, मुझे भी शामिल करके, क्योंकि हलाला के दौरान दुआ की हैसियत से मेरी भी भागीदारी होगी…”उनका यह हल सुनकर हम सबके होश उड़ गए।
“क्या?! यह कितना अजीब और बेतुका है!” अब्बू गुस्से से खड़े हो गए।
“शांत हो जाओ फ़ारूक, मेरी बात पूरी सुनो,” मौलाना साहब ने रुखाई से कहा। “यह सिर्फ़ करना ही नहीं है… यह पंद्रह दिन की प्रक्रिया है… और यह चौदहवीं के चाँद से शुरू होकर अमावस्या तक चलेगी… और हम सभी को क्यों?… तो सुनो… रूह ने मुझे बताया कि यह सना की याक़ूब से निकाह से शुरू हुआ… निश्चित ही कोई इससे खुश नहीं था इसलिए उन्होंने
यह किया… मगर रूह ने बताया कि यह जादू तभी खत्म होगा जब इस घर के मर्दों के शरीर का वह हिस्सा, जो नई जान पैदा कर सकता है, इस घर की औरत द्वारा कुबूल किया जाए… इसलिए तुम सभी को सना के साथ हलाला करना होगा… और सिर्फ़ इतना ही नहीं… सना को हमारे शरीर के एक हिस्से को कुबूल करना होगा, तो साफ़ है कि सना को वीर्य निगलना होगा या फिर कहीं और लेना होगा… मगर योनि में नहीं, क्योंकि वह हामिला हो सकती है… यह जादू तुम सबके बीच के बंधन को तोड़ने के लिए किया गया था, ताकि तुम्हारा पूरा परिवार एक-एक करके बर्बाद हो जाए। मैं जानता हूँ यह सुनने में घिनौना लगता है… मगर काले जादू के अपने अजीब तरीके होते हैं।”
यह सब सुनकर हम सब सन्न रह गए। कुछ मिनटों तक कोई बोला तक नहीं। ऐसे लगा जैसे हमारी आवाज़ ही गायब हो गई हो। यह सुनना बहुत ही गंदा था और मौलाना हमें यह करने के लिए कह रहे थे!
“यह क्या बकवास है!” आकिब गुस्से में खड़ा हो गया। “आप ऐसी बात कैसे कह सकते है… यह घिनौना है!” उसने अपना गुस्सा ज़ाहिर किया।
“अपनी ज़बान पर काबू रख लड़के! बोलने से पहले सोच!” मौलाना साहब भी गुस्से में आ गए। “तुम्हारे परिवार की फ़िक्र करना मेरी ज़िम्मेदारी नहीं है! तुम लोग मेरे पास मदद माँगने आए थे… इसलिए मैंने वही पेशकश की जो मैं कर सकता हूँ! और क्यों नहीं पूछते अपनी बहन से! उसने कल रात क्या देखा? उन्हें बताओ सना!”
मौलाना साहब ने घर छोड़कर जाने की भी धमकी दी।
“नहीं नहीं नहीं… मौलाना साहब… ऐसा मत सोचिए… मेहरबानी से उसे माफ़ कर दीजिए… वह जवान है… उसे कुछ नहीं पता… और में हाथ जोडती हूँ मत जाइए, हम सबकी मदद कीजिए,” सना ने एक बार फिर गिड़गिड़ाते हुए विनती की।
सच कहूँ, मुझे भी घृणा हो रही थी मगर कल रात जो मैंने देखा था वह भी सच था… इसलिए मैं चुप रहा।
“मौलाना साहब रहम करे, हमारे लड़के को माफ़ कर दीजिए… वह जवान है… आप जानते हैं जवानी का खून कैसा गर्म होता है….” फ़र्दीन चाचा ने भी उनसे दरख़्वास्त की.
सना की गिड़गिड़ाहट और फ़र्दीन चाचा के दरख़्वास्त को सुनकर, मौलाना साहब एक बार फिर कुर्सी पर बैठ गए।
“मैं जानता हूँ यह गंदा है… और इसके लिए… मेरे पास हल भी है… एक मुरक्कब है जो मैं तुम सबके लिए बनाऊँगा ताकि हम… अपने दिमाग की असली होश की हालत के बिना इसे अंजाम दे सकें… मेरा मतलब, मैं तो नहीं लूँगा क्योंकि हलाला के दौरान मुझे दुआ भी करनी है, मगर तुम सभी को अपने दिमागी आराम के लिए इसे लेना होगा… और फ़िक्र मत करो… जागने के बाद तुम सब भूल जाओगे कि तुमने क्या किया था, इसलिए तुममें से कोई भी इससे घृणा या पछतावा महसूस नहीं करेगा,” मौलाना साहब ने समझाया कि चीज़ें कैसे चलेंगी।
“हम यह करेंगे मौलाना साहब, चाहे जो भी करना पड़े… मैं यह करूँगी, चाहे जो भी करना पड़े, सिर्फ़ अपने निकाह की ही नहीं, बल्कि अपने पूरे परिवार की हिफाज़त के लिए…” सना ने सख्त आवाज़ में सहमति दी।
उसे सुनकर हम सबने हैरानी और सहानुभूति से उसकी ओर देखा।
“ठीक है तो। हम यह करेंगे… पूर्णिमा की रात के लिए अभी तेरह दिन बचे हैं… हर कोई खुद को इसके लिए मानसिक रूप से तैयार कर ले,” अब्बू अंततः खड़े हुए और कहा।
“तो फिर मैं तैयारी शुरू करता हूँ,” मौलाना साहब कुर्सी से उठे और कहते हुए घर से निकल गए।
उनके पीछे-पीछे फ़र्दीन चाचा भी चले गए।