अस्सलाम वालेकुम। मेरा नाम सादिक़ कुरैशी है। हैदराबाद का रहने वाला हूँ। हमारा घर… घर कहना भी शायद गलत होगा। बस एक कमरा है, जिसमें एक छोटा सा अटैच्ड बाथरूम और किचन है। बाप, दो भाई, और एक बहन… पाँच जनों का परिवार इसी एक कमरे में सिमटा हुआ है। ये हालात हैं हमारे अब्बू फारुक़ कुरैशी की कमाई के। वो पास की एक कंपनी में वेल्डर का काम करते हैं। उम्र है उनकी कोई पचास साल के आसपास, मगर काम की मार ने साठ का बूढ़ा बना दिया है। उनके चेहरे पर हमेशा चिंता की लकीरें खिंची रहती हैं, खासकर तब से जब से मेरी बहन सना वापस आई है।
माँ को गुज़रे हुए बरसों हो गए। हम तीनों बहुत छोटे थे तब। मैं सबसे बड़ा हूँ, तीस साल का। मेरे बाद सना आती है, पच्चीस की। और सबसे छोटा है आकिब, बाईस साल का। माँ के जाने के बाद से, इस घर में औरत का साया सिर्फ सना ही थी। उसने ही बचपन से घर संभाला, खाना बनाया, बर्तन किए, कपड़े धोए। उसकी ज़िंदगी इसी एक कमरे और बाहर नल के पास सिमट कर रह गई थी, तब तक जब तक फ़र्दीन चाचा उसकी शादी का प्रस्ताव लेकर नहीं आए।
फ़र्दीन चाचा, अब्बू के छोटे भाई, पैंतालीस साल के हैं। उनका रहन-सहन, उनकी बातें… हमसे बिल्कुल अलग। वो किसी तरह याक़ूब सिद्दीकी से मिले, जो शहर के दूसरे छोर पर मुर्ग़ियों की दुकान चलाता है। अट्ठाइस साल का लड़का, कारोबारी। प्रस्ताव आया, बातचीत हुई, और सना का निकाह याक़ूब से हो गया। हम सबको लगा, अब बहन की ज़िंदगी सँवर जाएगी। मगर महज़ पाँच महीने बाद ही याक़ूब ने तलाक़ दे दिया। वजह? कोई ठोस वजह नहीं बताई। बस इतना कहा कि “बात नहीं बन रही।” सना, अपने सामान के साथ, उसी सादे सलवार-कमीज और सिर पर हिजाब में, वापस इसी एक कमरे में आ धमकी।
उस दिन से अब्बू और चिंतित हो गए। सना के लिए दूसरा रिश्ता ढूँढ़ने की कोशिशें शुरू हो गईं, मगर तलाकशुदा लड़की के साथ समाज का नज़रिया अलग होता है। रिश्ते आते भी तो ऐसे आते जैसे हम पर कोई एहसान कर रहे हों। सना चुपचाप सब सहती, दिन भर काम में लगी रहती, मगर रात को जब उसकी आँखें नम हो जातीं, तो समझ आता कि अंदर ही अंदर वो कितनी टूट चुकी है।
और फिर वो दिन आया। दोपहर का समय था, तेज़ धूप। हमारे एक कमरे के घर के बाहर, सड़क किनारे लगे नल के पास सना बर्तन माँज रही थी। उसने हल्के गुलाबी रंग की पुरानी सलवार-कमीज पहन रखी थी, और सिर पर सफेद हिजाब। झुकी हुई कमर, पानी में डूबे हाथ, और चेहरे पर एक सूनापन… वही दैनिक दिनचर्या। तभी उसने अपने सामने जमीन पर पड़ी एक लंबी परछाई देखी। उसने सोचा शायद कोई राहगीर पानी पीने रुका है। उसने बिना सिर उठाए कहा, “थोड़ा सा इंतज़ार कर लीजिए, बर्तन हटा लेती हूँ।”
परछाई हिली नहीं। एक अजीब सी खामोशी छा गई। सना ने धीरे से सिर उठाया, और आँखें ऊपर चली गईं। पहले उसने काले पॉलिश किए जूते देखे, फिर क्रीम रंग की फुल-पैंट, और फिर एक हल्के नीले रंग की शर्ट। चेहरा देखते ही उसकी साँसें अटक गईं। याक़ूब। वही याक़ूब, जिसने उसे महज़ पाँच महीने में बाहर निकाल फेंका था।
याक़ूब का चेहरा गंभीर था। उसकी नज़रें सना पर टिकी हुई थीं। उसने कोई ‘सलाम’ या ‘अदब’ नहीं कहा। सीधे बोला, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी बेपरवाही और दबंगपन था, “सना, चल मेरे साथ। घर चलते हैं।”
ये ‘घर’ शब्द सुनते ही सना के शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई। वो धीरे-से खड़ी हुई, अपने गीले हाथों को सलवार से पोंछते हुए। उसकी आँखों में पहले अचरज था, फिर वो अचरज धीरे-धीरे गुस्से में बदलने लगा। उसका चेहरा तमतमा गया। “कौन सा घर?” उसकी आवाज़ काँप रही थी, मगर आग उगल रही थी, “वो घर जहाँ से तुमने मुझे एक पल की भी सोच के बिना, बिना किसी वजह के निकाल फेंका? और वैसे भी… तुमने मुझे तलाक़ दे दिया है। मैं तुम्हारी कौन हूँ जो तुम्हारे साथ चलूँ?”
याक़ूब ने अपनी नज़रें नहीं हटाईं। “बातें मत बनाओ। तलाक़ हुआ था, हुआ। अब मैं तुझे वापस बुला रहा हूँ। चल।” उसने हाथ आगे बढ़ाने का इशारा किया।
सना ने एक कदम पीछे हटते हुए कहा, “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? तुम सोचते क्या हो कि मैं तुम्हारी रखैल हूँ, जो तुम जब चाहो बुला लो, जब चाहो निकाल दो? मेरी भी कुछ इज्ज़त है। मैं तुम्हारे साथ नहीं आऊँगी। जाओ, यहाँ से चले जाओ। और दोबारा मेरे सामने मत आना।”
उसकी आवाज़ इतनी तेज़ और तल्ख़ हो गई थी कि आस-पास के घरों के दरवाज़े खुलने लगे। पहले एक-दो, फिर चार-पांच। पड़ोस की औरतें, बच्चे, बूढ़े… सब बाहर निकल आए। कोई छज्जे पर खड़ा हो गया, कोई दरवाज़े की ओट से झाँकने लगा। फुसफुसाहट शुरू हो गई।
याक़ूब ने आस-पास नज़र दौड़ाई। उसके चेहरे पर अब वह दबंगपन नहीं रहा। भीड़ को देखकर उसमें एक बेचैनी सी दिखाई दी। उसने आवाज़ थोड़ी धीमी की, “सना, शोर मत मचाओ। अंदर चल, बात करते हैं।”
“अंदर?” सना ने हँसते हुए कहा, और उस हँसी में जलजलाहट थी, “यही मेरा घर है। तुम्हारे साथ जाने के लिए कोई और घर नहीं है। और तुमसे बात करने के लिए भी कुछ नहीं बचा। जाओ!”
भीड़ अब और बढ़ गई थी। लोग खुलकर देख रहे थे, कानाफूसी कर रहे थे। “देखो, वो है सना का पति… वही जिसने तलाक़ दिया था…” “अब वापस बुला रहा है… क्या ज़माना आ गया है…”
याक़ूब का चेहरा लाल हो गया। शर्म से, गुस्से से, या बेबसी से… पता नहीं। उसने सना की तरफ़ एक आखिरी नज़र देखी, जिसमें गुस्सा और फटकार दोनों थे। फिर वो बिना कुछ कहे, तेज़ कदमों से वहाँ से चला गया। उसकी पीठ देखते-देखते गली के मोड़ पर ओझल हो गई।
सना वहीं खड़ी रही, उस नल के पास। उसके हाथ अब भी गीले थे। उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं। आस-पास की नज़रें अब भी उस पर टिकी हुई थीं। धीरे-धीरे, लोग वापस अपने-अपने घरों में समा गए। दरवाज़े बंद होने की आवाज़ें आईं। मगर उस फुसफुसाहट का स्वर हवा में तैरता रह गया।
सना ने आखिरकार हिलने-डुलने की हिम्मत की। उसने एक लंबी, काँपती साँस ली, और फिर से बर्तनों की ओर देखा। पानी अब भी बह रहा था। उसने नल बंद किया, और बिना किसी से कुछ कहे, बिना किसी की ओर देखे, बचे हुए बर्तन उठाने लगी। उसकी पीठ अब भी सीधी थी, मगर उसके कंधों पर एक बोझ सा दिखाई दे रहा था… एक ऐसा बोझ जो शायद अब और भी भारी हो गया था।
कुछ दिन बीत गए। सना ने उस घटना का हम में से किसी से भी ज़िक्र नहीं किया। शायद उसे लगा कि सब ख़त्म हो गया, याक़ूब दोबारा नहीं दिखेगा, और इस बात को दबा देने से शायद घर में फिर से वही पुरानी चुप्पी और रोज़मर्रा की मजबूरियाँ लौट आएँगी। मगर उसने गलत सोचा था।
वो शाम थी। हम तीनों—अब्बू, आकिब और मैं—छोटे से कमरे के फर्श पर बैठे रात का खाना खा रहे थे। सना ने दाल-चावल बनाए थे। हवा में भारीपन था, बस चम्मचों की खनखनाहट और पंखे की घुरघुराहट सुनाई दे रही थी। तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। कोई ऐसा समय नहीं था कि कोई मेहमान आए। अब्बू ने मेरी तरफ़ देखा। मैं उठा और दरवाज़ा खोला।
बाहर फ़र्दीन चाचा खड़े थे। उन्होंने हल्के भूरे रंग का कुर्ता-पैजामा पहन रखा था, और चेहरे पर एक अजीब सी व्यस्तता और गंभीरता थी। “अस्सलाम वालेकुम,” उन्होंने घुसते ही कहा।
“वालेकुम अस्सलाम, चाचा,” मैंने कहा। अब्बू और आकिब ने भी सिर उठाकर अदब किया। सना, जो किचन के कोने में बर्तन सजा रही थी, वहाँ से ही झुककर सलाम किया।
“आइए, बैठिए। साथ में खाना खाइए,” मैंने कहा।
“अरे नहीं बेटा, मैं खा चुका हूँ। तुम लोग खाओ।” उन्होंने कहा और सीधे चारपाई के एक कोने पर बैठ गए। उनकी नज़रें सना पर टिक गईं। “सना, एक गिलास पानी तो दे।”
सना ने चुपचाप एक लोटा भरकर उनके सामने रख दिया। फ़र्दीन चाचा ने लंबा घूँट भरा, गिलास नीचे रखा, और एक गहरी साँस ली। कमरे का माहौल अचानक बदल सा गया था। उनकी मौजूदगी ने हवा में एक तनाव भर दिया था।
अब्बू ने, जो अब तक चुपचाप खा रहे थे, अपना चम्मच रखा। “क्या बात है फ़र्दीन? इतनी रात गए? कोई समस्या तो नहीं?”
फ़र्दीन चाचा ने सीधे सना की ओर इशारा किया। “इससे पूछो। ये बताएगी सब कुछ।”
सना का चेहरा हैरानी से खाली हो गया। उसकी आँखें फैल गईं। “मैं? मैं क्या बताऊँ? क्या हुआ है चाचा? मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा।”
“अरे, ऐसे मत बनो जैसे कुछ हुआ ही नहीं!” फ़र्दीन चाचा की आवाज़ अचानक तेज़ और कर्कश हो गई। उन्होंने मेज़ पर हल्का सा थपथपाया। “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?”
“रुको! एक मिनट रुको!” अब्बू ने अपनी आवाज़ दबंग बनाते हुए कहा। उनकी भौंहें तन गई थीं। “कोई तो बताएगा यहाँ क्या चल रहा है? पहले ये बताओ फ़र्दीन, मामला क्या है?”
फ़र्दीन चाचा ने अब्बू की ओर मुड़कर कहा, जैसे कोई बहुत बड़ी शिकायत सुना रहे हों। “मामला ये है भाई साहब, कि याक़ूब, तुम्हारे दामाद, वो इस लड़की को वापस लेने घर आया था। अपनी बीवी को समझाने। और हमारी ये राजकुमारी… इतनी टेढ़ी है … कि इसने न सिर्फ़ मना कर दिया, बल्कि पूरी मुहल्ले के सामने उसको बेईज्ज़त कर दिया! उसे भगा दिया! अब बताओ, आगे से कोई रिश्ता कैसे आएगा? लोग क्या कहेंगे कि कुरैशियों की लड़की की इतनी अकड़ है कि पति को ही लौटा देती है?”
उनके शब्द कमरे में गूँजे। मेरे कानों में एक सन्नाटा सा छा गया। फिर धीरे-धीरे, उन शब्दों का मतलब मेरे दिमाग़ में उतरा। याक़ूब आया था? और सना ने… उसे ठुकरा दिया?
मेरी नज़र तुरंत सना पर गई। एक तीखा, अनजाना गुस्सा मेरे सीने में उठा। “क्या?!” मेरी आवाज़ खुद ही चीख़ बनकर निकल गई। मैं खड़ा हो गया। “तुम्हारा दिमाग़ खराब हो गया है क्या सना? तुझे पता है हमारे घर की हालत क्या है? अब्बू का चेहरा देख! उनके हाथों के ज़ख़्म देख! ये घर देख! और तूने उसे रिजेक्ट कर दिया? तुझे क्या लगता है, कोई शहजादा चमकती घोड़ी पर आएगा तेरे लिए?”
मेरे शब्द जहरीले थे। आकिब ने अपना सिर नीचा कर लिया। अब्बू का चेहरा पत्थर जैसा सख़्त हो गया था, उनकी नज़रें जमीन पर गड़ी हुई थीं। सना पलभर के लिए स्तब्ध खड़ी रही, जैसे उस पर कोई प्रहार हुआ हो। उसकी आँखों में आँसूओं का चमकदार सा पानी भर आया, मगर वो टूटी नहीं। उसकी पलकें झपकीं, और फिर उसने जवाब दिया।
उसकी आवाज़ पहले काँप रही थी, फिर धीरे-धीरे लौह की तरह ठोस होती गई। “सुनो, पहले मेरी बात सुनो भाई-जान। मैं किसी शहजादे के बारे में सपने नहीं देख रही। और मुझे हमारे घर की हालत का पता है… शायद तुम सबसे ज़्यादा पता है। मैं जानती हूँ अब्बू रोज़ कितनी मेहनत करते हैं। मैं जानती हूँ तुम सब मेरी ज़िंदगी, मेरी शादी को लेकर कितने परेशान हो।”
उसने एक कदम आगे बढ़ाया। उसकी आँखों से अब आँसू गिरने लगे थे, मगर उसकी आवाज़ में रुलाई नहीं, एक जलता हुआ गुस्सा था। “मगर क्या तुम लोगों ने कभी सोचा कि याक़ूब ने मुझे सिर्फ़ तलाक़ नहीं दिया? उन पाँच महीनों में उसने हर दिन मेरा, हमारे घर की गरीबी का मज़ाक़ उड़ाया। कोई बात होती, तो झगड़ा होता। मेरे रंग-रूप पर टिप्पणी करता। मेरे कपड़ों पर हँसता। मैंने सब सहा… क्योंकि मुझे पता था हमारी मजबूरी क्या है। मैं ख़ुद ही उसके साथ एडजस्ट कर रही थी!”
उसका स्वर और भी ऊँचा हो गया। वो सिर्फ़ मुझसे नहीं, बल्कि अब्बू और फ़र्दीन चाचा से भी बात कर रही थी। “और आख़िरकार उसने क्या किया? उसने मुझे तलाक़ दे दिया! मुझे घर से बाहर निकाल फेंका… और साथ में इतने गंदे, ज़लालत भरे लब्ज़ दिए कि सुनकर रोंगटे खड़े हो जाएँ। क्या तुम्हें नहीं लगता कि ये तुम सबका भी अपमान है? मैं तुम्हारी बहन हूँ, तुम्हारी बेटी हूँ… इस घर की इकलौती औरत हूँ। मगर जब वो मुझे बेवजह कोस रहा था, तब तुम सबने एक शब्द भी उसके मुँह पर नहीं कहा। आज वो मुझे वापस बुलाने आया, तो मैंने ‘ना’ कह दिया, तो सारा गुस्सा मुझ पर उतर आया? मेरी गर्दन अकड़ गई? मेरी क्या गलती है? ये बताओ मुझे!”
उसने रुककर एक तेज़, टूटी हुई साँस ली। उसका पूरा बदन काँप रहा था। आँसू उसके गालों पर धाराओं में बह रहे थे, मगर उसकी नज़रें सीधी थीं, चुनौती भरी। वो हम सबको देख रही थी—मुझे, अब्बू को, हैरान से फ़र्दीन चाचा को, और डरे हुए आकिब को।
कमरे में उसके शब्दों की गूँज मरने में वक्त लगा। पंखे की आवाज़ फिर से सुनाई देने लगी, मगर वो अब एक भारी, दमघोंटू आवाज़ लग रही थी। फ़र्दीन चाचा का मुँह खुला का खुला रह गया था। उन्हें उम्मीद नहीं थी कि यह चुपचाप सहने वाली लड़की इतना कुछ कह डालेगी।
अब्बू ने धीरे से अपना चेहरा अपने हाथों में छुपा लिया। उनके कंधे हल्के से डोल रहे थे। मेरे सीने का गुस्सा अब एक ठंडे, भारी पत्थर में बदल चुका था। सना की आवाज़ में जो दर्द और सच्चाई थी, उसने मेरे सारे तर्कों को खोखला कर दिया था। मैं कुछ कह नहीं पा रहा था।
सर्द, असहज खामोशी ने पूरे कमरे को अपनी चपेट में ले लिया। सना वहीं खड़ी रही, अपने आँसुओं और अपने सच के साथ, जैसे एक टूटी हुई मूर्ति जिसने अचानक आवाज़ पा ली हो।
सना के ये शब्द सुनकर कमरे में एक भारी, शर्मिंदा सी ख़ामोशी छा गई। मेरा गुस्सा ऐसे उतर गया जैसे पानी की बाल्टी सिर पर उँडेल दी गई हो। मैंने अपनी नज़रें नीची कर लीं। अब्बू का सिर पहले ही झुका हुआ था। आकिब तो कोने में सिकुड़ सा गया था। और फ़र्दीन चाचा… उनके चेहरे पर अभी भी हैरानी थी, मगर अब उसके साथ एक साफ़
शर्मिंदगी भी तैर रही थी। सना सही थी। हम चारों मर्द, उस वक़्त जब याक़ूब उसे निकाल रहा था, एक शब्द भी नहीं बोले थे। हमने अपनी बेटी, अपनी बहन की इज्ज़त का साथ नहीं दिया था।
काफ़ी देर तक बस पंखे की आवाज़ ही सुनाई देती रही। आख़िरकार अब्बू ने एक गहरी, थकी हुई साँस ली और बोले। उनकी आवाज़ अब गुस्से में नहीं, बल्कि एक गहरी विवशता और चिंता से भरी हुई थी।
“देख बेटा… हम जानते हैं। हम तेरे साथ खड़े नहीं हुए, जब तुझे हमारी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी। ये बात हम सब समझते हैं।” उन्होंने अपना गला साफ़ किया। “मगर बेटा, हक़ीकत कुछ और है। तू औरत है। और औरत की ज़िंदगी… उसकी इज्ज़त… समाज की नज़र में उम्र के साथ-साथ घटती जाती है। तू अभी माँ भी नहीं बनी, इतनी छोटी उम्र में तलाक़ का ठप्पा लग जाना… ये आग में घी डालने के जैसा है। ये समझ बेटा। शादी-ब्याह ऐसे ही होते हैं। उतार-चढ़ाव आते-जाते रहते हैं। शौहर-बीवी दोनों को एक-दूसरे के साथ समझौता करना पड़ता है। और पाँच महीने… ये तो कुछ भी नहीं होता एक-दूसरे को जानने के लिए।”
अब्बू ने सना की ओर देखा, उनकी आँखों में विनती थी। “मुझे पूरा यकीन है कि याक़ूब को समझ आ गया है कि उसने क्या गलती की है। इसीलिए तो वो तुझे वापस लेने आया। अगर वो बुरा इंसान होता, तो आसानी से दूसरी शादी कर लेता। अमीर है वो, हम सब जानते हैं। मगर उसने फिर भी तुम दोनों के रिश्ते को एक और मौका देने का फैसला किया है। मेरी तुझसे गुज़ारिश है बेटा, तू भी यही कर।”
हम सबने, मैं, आकिब, और फ़र्दीन चाचा ने अब्बू की बात पर सिर हिला दिया। यह सहमति अब गुस्से से नहीं, बल्कि एक कड़वी हकीकत को स्वीकार करने से आई थी।
“देख बेटा, हम तेरे दुश्मन नहीं हैं। हम तेरा परिवार हैं, और हम सब सिर्फ़ तेरे भविष्य के बारे में सोच रहे हैं।” अब्बू ने फिर कहा। “अपनी अकड़ को अपनी समझ पर हावी मत होने दो। शांत और ठंडे दिमाग़ से सोचो बेटा। याक़ूब को एक और मौका दो।”
अब्बू के बाद, फ़र्दीन चाचा भी अपना रवैया नरम करते हुए बोले। उनकी आवाज़ अब आदेश देने वाली नहीं, बल्कि समझाने वाली थी। “सना बेटा, तेरे अब्बू सही कह रहे हैं। एक गलती सबसे हो जाती है। अगर वो सुधर गया है, तो दरवाज़ा बंद करना ठीक नहीं।”
मैं भी चुपचाप सहमति में सिर हिला रहा था। सना की बात ने मुझे झकझोर दिया था, मगर अब्बू के तर्कों ने मुझे उस कठोर सामाजिक वास्तविकता का एहसास दिला दिया था जिससे हम नहीं लड़ सकते थे।
सना ने हम सबकी बातें सुनीं। उसका चेहरा अभी भी आँसुओं से भीगा हुआ था, मगर अब उस पर क्रोध नहीं, बल्कि एक गहरी, थकी हुई सोच छाई हुई थी। वो लंबी देर तक चुप रही, अपनी उँगलियों से सलवार की सिलवटों को सीधा करती रही। आख़िरकार उसने सिर उठाया, और एक फीकी सी, समर्पण भरी आवाज़ में कहा, “मैं… सोचकर बताती हूँ। कल सुबह बताऊँगी मेरा फैसला।”
उस रात सब कुछ सामान्य सा लगा, मगर हवा में एक अनिश्चितता तैर रही थी। अगली सुबह, जब अब्बू नाश्ता करके तैयार हो रहे थे और मैं अपना झोला उठा रहा था, सना ने अब्बू का टिफिन देते हुए ही, बिना आँख मिलाए, धीरे से कहा, “मैं… मौका देने को तैयार हूँ, अब्बू।”
उन शब्दों ने कमरे में जैसे रोशनी भर दी। अब्बू के चेहरे पर महीनों बाद एक हल्की सी राहत की झलक दिखाई दी। उन्होंने सना के सिर पर हाथ फेरा, “अल्लाह तेरा भला करे बेटा।” मैं भी मन ही मन राहत की साँस लेता हुआ घर से निकल गया।
शाम को जब मैं और अब्बू काम से लौटे, तो फ़र्दीन चाचा पहले से ही हमारे घर आए हुए थे। अब्बू ने फोन पर ही उन्हें सना के फैसले के बारे में बता दिया था। चाय के प्याले हाथ में, हम सब छोटे से लिविंग एरिया में बैठे थे। एक अजीब सी खुशी का माहौल था, मगर वह गहराई से जड़े तनाव से पूरी तरह मुक्त नहीं था।
फ़र्दीन चाचा ने चाय का घूँट लिया और गंभीर होकर बोले, “सना बेटा, मैंने आज याक़ूब से फिर बात की।” सबकी नज़रें उन पर टिक गईं। “उसने कहा कि उसे अपने बुरे व्यवहार पर बहुत शर्मिंदगी है। और उसने तुझे माफ़ भी कर दिया है कल वाली बहस के लिए… कहा कि तेरा गुस्सा और नाराज़गी जायज़ थी, उसने जो किया उसके लिए। देख बेटा,
कितना बदल गया है वो। तुझे खोने का उसे पछतावा है। और उसने मुझसे कहा है कि वो तुझसे दोबारा निकाह करना चाहता है बेटा… और इस बार तुझे रानी की तरह रखेगा।”
ये शब्द सुनकर अब्बू के चेहरे पर एक सच्ची मुस्कान खिल आई। मेरे मन का बोझ भी हल्का हुआ सा लगा। सना की ओर देखा, तो उसकी आँखें फिर से नम हो गई थीं, मगर इस बार वो आँसू राहत के, एक अजीब सी आशा के लग रहे थे। शायद उसे लग रहा था कि आख़िरकार उसे उस सम्मान का वादा मिल गया है जिसकी वो हकदार थी।
मेरे भीतर एक भावुकता की लहर दौड़ गई। मैं उठा और उसके पास गया। “मत रो बहन… सब ठीक हो जाएगा। यही ज़िंदगी है। सब कुछ होता रहता है। अल्लाह हम पर नज़र रखे हुआ है। घबरा मत।” मैंने उसे गले से लगा लिया, एक गर्मजोशी भरा, सुरक्षा देने वाला आलिंगन।
और तभी, पल भर के लिए, मेरा ध्यान गया। उसके हल्के सूती कुर्ते के पतले कपड़े के पार, मेरी छाती पर दो नरम, उभरी हुई संरचनाओं का स्पर्श साफ़ महसूस हुआ। उसने अंदर कुछ नहीं पहना हुआ था। न ब्रा, न कोई अन्य अंडरगारमेंट। उसके निप्पल्स, कपड़े की पतली परत के बावजूद, स्पष्ट रूप से उभरे हुए थे और मेरे सीने से दब रहे थे।
एक सेकंड के लिए मेरा दिमाग सन्न रह गया। यह अनुभूति अचानक, अप्रत्याशित और अत्यंत व्यक्तिगत थी। फिर तुरंत ही एक तीखी शर्मिंदगी और अवाक् होने का भाव मन में उठा। मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई। न ही मैंने उसे धक्का देकर अलग किया, न ही मैंने अपनी पोज़ीशन बदली। मैंने बस उसी तरह से गले लगाए रखा, जैसे कुछ हुआ ही न
हो। मेरे चेहरे के भाव स्थिर रहे, हालाँकि मेरे दिल की धड़कन एक पल के लिए तेज़ हो गई थी। यह कोई कामुक अनुभूति नहीं थी; यह एक झटके जैसी, हैरान कर देने वाली खोज थी, जिसने उस पल की भावुकता के बीच एक अजीब सी ठंडक छोड़ दी। मैंने जल्दी से अपना ध्यान वापस उस आलिंगन के भावनात्मक पहलू पर केंद्रित किया – अपनी बहन
को सांत्वना देना। जब मैंने उसे छोड़ा, तो सब कुछ सामान्य लग रहा था। सना ने आँखें पोंछीं, और एक फीकी सी मुस्कान उसके होंठों पर तैर गई। फ़र्दीन चाचा अगले कदमों की योजना बता रहे थे। मगर मेरे मन के एक कोने में, वह स्पर्श… वह अप्रत्याशित खुलापन… एक धुंधली सी छाप छोड़ गया था।
चाय की चुस्कियाँ और भविष्य की योजनाओं की चर्चा के बाद फ़र्दीन चाचा चले गए। उस रात हम सबने शायद महीनों बाद चैन की नींद सोई। हम तीनों मर्द—अब्बू, आकिब और मैं—उसी छोटे से लिविंग एरिया में फर्श पर दरी बिछाकर सोए। और दस बाई दस का वह एकमात्र कमरा, जो घर का बेडरूम कहलाता था, उसमें सना सोई।
अगले दिन फ़र्दीन चाचा मुख़्तार मौलाना साहब को लेकर आए। वह इलाके के जाने-माने मौलाना थे, उनकी दाढ़ी सफ़ेद और लबादा साफ़-सुथरा था। हम सबने अदब से सलाम किया। अब्बू और फ़र्दीन चाचा ने उन्हें सना के याक़ूब से दोबारा निकाह की बात समझाई। मौलाना साहब ने सना की तरफ़ एक संक्षिप्त, तीखी नज़र डाली, और फिर वह बात
कही जिसने सब कुछ बदल कर रख दिया।
“क़ुरान और शरीयत के मुताबिक,” उन्होंने अपनी आवाज़ में एक अटल, पत्थर जैसा पन भरते हुए कहा, “जब से याक़ूब ने उसे तलाक़ दे दिया है, पहले हलाला करना होगा।”
यह शब्द सुनते ही अब्बू और फ़र्दीन चाचा ने तुरंत नज़रें झुका लीं। उनके चेहरे पर शर्मिंदगी और एक अजीब सी हिचकिचाहट थी। वह सना की ओर देख नहीं पा रहे थे। मेरी समझ में कुछ नहीं आया।
“इसका क्या मतलब है, मौलाना साहब?” मैंने पूछा।
तब फ़र्दीन चाचा ने, जबकि अब्बू ज़मीन की दरारें गिनते रहे, जानकारी दि। “सना को पहले किसी दूसरे मर्द से निकाह करना होगा। फिर वह उसे तलाक़ दे देगा। तब जाकर वह ‘पाक’ मानी जाएगी। उसके बाद ही याक़ूब से निकाह हो सकेगा।”
मुझे यह कोई मुश्किल बात नहीं लगी। हमारे समाज में तो यह एक सामान्य सी बात लगती थी। “बस इतनी सी बात? तो फिर मुश्किल क्या है? यह तो आसान है। मुझे यकीन है पैसे लेकर ऐसा करने वाले लोग मिल जाएँगे।”
मगर जब मैंने सना की ओर देखा, तो वह बहुत चुप थी। उसके चेहरे पर एक असहजता, एक अजीब सा संकोच था। वह भी कहीं और देख रही थी, नज़रें चुरा रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे उसे पहले से पता था कि मौलाना साहब अगला क्या समझाने वाले हैं।
“इतना आसान नहीं है, बेटा,” मौलाना साहब की आवाज़ ने कमरे की हवा जमा दी। “सिर्फ़ निकाह ही नहीं होगा। उसे उस दूसरे मर्द के साथ एक रात गुज़ारनी होगी। निकाह को पूरा करना होगा। केवल तभी वह निकाह सही माना जाएगा। उसके अगले दिन वह उसे तलाक़ दे सकता है।”
यह सुनकर मेरे मुँह से कोई आवाज़ नहीं निकली। मैं स्तब्ध रह गया। मगर हैरानी की बात यह थी कि फ़र्दीन चाचा, अब्बू, यहाँ तक कि सना भी… हैरान नहीं थे। अब्बू अब भी ज़मीन देख रहे थे, उनका सिर और नीचा हो गया था। फ़र्दीन चाचा भी उनकी नकल कर रहे थे। सना असहज ज़रूर थी, मगर उसके चेहरे पर एक समझौते की, एक कड़वी तैयारी
की झलक साफ़ दिख रही थी। लगता था उसे यह सब मालूम था और वह इन नियमों का पालन करने को तैयार थी।
“मौलाना साहब, आप क्या कह रहे हैं?” मेरी आवाज़ में घबराहट थी।
मेरी बात सुनकर मौलाना साहब का चेहरा तमतमा गया। उन्होंने मेरी ओर एक ऐसी तीखी नज़र से देखा जैसे मैंने कोई अपराध कर दिया हो। “बेवकूफ! हिम्मत कैसे हुई तुम्हें हमारे समुदाय के नियम पर सवाल उठाने की? वह नियम जो खुदा ने लिखा है! क्या तुम्हें लगता है तुम्हारा इल्म हमसे बढ़कर है?”
उनका डरावना, गुस्से से भरा जवाब देखकर सना खुद हमारे बीच कूद पड़ी। वह हमेशा से बहुत धार्मिक रही थी। “नहीं-नहीं, मौलाना साहब… मेरे भाईजान का ऐसा कोई मतलब नहीं था। उन्हें बस पता नहीं है चीज़ें कैसे चलती हैं। माफ़ कर दीजिए उन्हें। मैं इसे करने को तैयार हूँ। मैं शरीयत की हर एक रस्म का पालन करूँगी।”
मैं दोहरे झटके में था। एक तरफ वही सना जो याक़ूब के सामने अपनी इज्ज़त के लिए लड़ रही थी, आज उसी याक़ूब से दोबारा शादी करने के लिए इतनी बड़ी, इतनी अपमानजनक सी लगने वाली शर्त मंज़ूर कर रही थी।
“पर… क्या याक़ूब को इसके बारे में पता है?” मैंने कसकर पूछा।
फ़र्दीन चाचा ने समझाया। “याक़ूब को इस सबकी पूरी जानकारी है। मगर उसने ज़ोर दिया है कि उसे यह नहीं पता चलना चाहिए कि हलाला कौन करेगा। ताकि… इस रस्म को लेकर उसे उस शख्स से कोई बैर या गिला न रहे।”
मेरी हैरानी अब सदमे में बदल चुकी थी। याक़ूब जानता था? और वह इसके लिए तैयार था? उसने सिर्फ़ यही शर्त रखी थी कि वह ‘चेहरा’ न जाने?
“तुमने एक बहुत समझदार और परिपक्व लड़का ढूँढ़ लिया है, फारुक मियाँ, अपने दामाद के तौर पर। कम से कम वो तुम्हारे बेटे से तो बेहतर ही समझता है हमारे समाज के नियम।” मौलाना साहब ने मेरी तरफ़ घृणा भरी नज़र से देखते हुए कहा, और फिर उठकर चले गए।
दरवाज़ा बंद हुआ। उनकी उपस्थिति का दबाव हट गया, मगर उनके छोड़े गए शब्द हवा में लटक रहे थे, जहरीली बेलों की तरह हमारे आस-पास लिपटे हुए। कमरे में एक भयानक, दम घोंटू सन्नाटा पसर गया। चाय के प्याले ठंडे पड़े थे। फ़र्दीन चाचा ने एक लंबी साँस ली, मगर कुछ नहीं बोले। अब्बू अब भी ज़मीन की ओर देख रहे थे, उनके कंधे एक
अदृश्य बोझ से दबे हुए लग रहे थे।
मेरी नज़र सना पर थी। वह वहीं खड़ी थी, उसकी आँखें सूखी थीं, मगर चेहरा एकदम सफेद, जैसे खून ही न बचा हो। उसने किसी की ओर नहीं देखा। वह उस हकीकत को पचा रही थी जिसे उसने हाँ कर दी थी। मेरे मन में सवालों का तूफान था। यह ‘हलाला’ कौन करेगा? कौन सा मर्द? कैसा होगा वह? और सना… वह कैसे सह पाएगी यह सब? वह जो
कल तक अपने निप्पलों के उभरने को लेकर भी बेपरवाह नहीं थी… आज एक अजनबी के साथ एक रात गुज़ारने को राजी हो गई थी।
मौलाना साहब के जाने के बाद कमरे में वही भारी सन्नाटा लौट आया, जिसमें अब एक नया, भयानक सवाल तैर रहा था। अब्बू ने आख़िरकार सिर उठाया और फ़र्दीन चाचा की ओर देखा। उनकी आवाज़ टूटी हुई थी। “फ़र्दीन… अब क्या करें? हम जानते थे यह होगा… मगर कैसे? मैं जानता हूँ ऐसे बहुत लोग हैं जो हमारी मजबूरी का फ़ायदा उठाना
चाहेंगे।” उनकी नज़रें सना पर थीं, जैसे उसकी सुरक्षा का सवाल उनके दिमाग में घूम रहा हो।
सना ने स्वयं ही जवाब दिया। उसकी आवाज़ में अब रुलाई नहीं, एक अटल, लौह जैसा निश्चय था। “मैं जानती हूँ, अब्बू। मगर मैं इसे करने को तैयार हूँ। बिना हलाले के मैं याक़ूब से दोबारा नहीं निभा सकती। यह होना ही है।”
“हम जानते हैं बेटा, तू हमारे नियमों की सच्ची मानने वाली है, और उन्हें तोड़ना नहीं चाहती। इसके लिए हमें तुझ पर गर्व है,” फ़र्दीन चाचा बोले, मगर उनकी आवाज़ में चिंता थी। “मगर यह हमारे परिवार की इज्ज़त का भी सवाल है… तुझे पता है बातें कैसे जंगल की आग की तरह फैलती हैं।”
मैं भी गहरी सोच में डूब गया। यह गंभीर मामला था। रस्म के अनुसार यह करना ही था, और मेरे परिवार के लोग समाज के कानून के बहुत सख्त पाबंद थे। “अगर दिक्कत किसी दूसरे आदमी को इसमें शामिल करने की है… तो हमें अपने ही रिश्तेदारों पर ध्यान देना चाहिए,” मैंने एक विकल्प सुझाया।
“बिल्कुल नहीं!” सना ने तुरंत, एक तीखे स्वर में मेरा सुझाव काट दिया। “रिश्तेदार बाहर के अजनबियों से भी बदतर होते हैं। फिर तो पूरे खानदान में बदनामी हो जाएगी।”
“तो फिर क्या करें बेटा?” अब्बू ने हताशा से पूछा, अपने हाथों को बेतरतीब से मलते हुए।
सना कुछ पल चुप रही। उसने एक गहरी साँस ली, जैसे खुद को ताक़त दे रही हो। फिर वह बोली, उसकी आवाज़ में हिचकिचाहट थी, मगर एक अजीब सी दृढ़ता भी। “क्यों न हम… क्यों न हम… यह… खुद ही कर लें।”
“क्या?! तुम्हारा दिमाग़ खराब हो गया है क्या?” मैं चौंककर बोला।
“यह सही कह रही है!” फ़र्दीन चाचा ने अचानक हस्तक्षेप किया। वह चारपाई पर बैठे थे, और उनकी नज़रें सना के पूरे बदन पर, सिर से पाँव तक, एक ऐसे अंदाज़ में घूम रही थीं जिसमें मैंने एक साफ़ लालसा देखी। वह उसकी ओर देख रहे थे जैसे कोई चीज़ नाप-तोल रहे हों। “देखो… यही एक विकल्प बचता है अगर हम चाहते हैं कि यह बात इस घर की दीवारों से बाहर न जाए…। हलाला इसी घर में, हमारे द्वारा ही हो जाएगा और किसी को कभी पता नहीं चलेगा।”
“क्या बकवास है! कोई भी पूछेगा जब सना याक़ूब से दोबारा शादी करेगी… तब हम क्या करेंगे? कौन सा नाम देंगे उन्हें?” मैंने फ़र्दीन चाचा से पूछा, मेरी आवाज़ में घृणा और विद्रोह का भाव था।
“तो हम कहेंगे कि हो गया है और हम नाम उजागर नहीं करना चाहते, बस।” अब्बू ने मेरी चिंता का जवाब देते हुए कहा, और वह फर्श पर खड़े हो गए। उनके चेहरे पर एक निर्णय ले चुके आदमी की थकान थी। उन्होंने फ़र्दीन चाचा की ओर मुड़कर पूछा, “फ़र्दीन… क्या तुम यह करोगे?”
मैंने देखा कि फ़र्दीन चाचा भी बातचीत के लिए खड़े हुए। मगर उनके उठने का अंदाज़… उन्होंने अपनी जांघ के पास, अपने पैजामे के ढीले हिस्से पर हल्का सा खुजलाते हुए, एक अजीब सी हरकत की। और उनकी नज़रें, जो सना पर टिकी हुई थीं, उनमें वह लालसा और भी साफ़ हो गई थी। “बिल्कुल भाई! जो कुछ भी परिवार के लिए! मैं यह करूँगा।”
“ठीक है, तो मौलाना साहब से इस बारे में बात करो और कल यह कर लें।” अब्बू ने कहा, जैसे कोई कार्यसूची तय कर रहे हों।
“ठीक है।” फ़र्दीन चाचा ने सिर हिलाया, एक आखिरी, लंबी नज़र सना पर डाली, और फिर दरवाज़े से बाहर निकल गए।
दरवाज़ा बंद हुआ। अब कमरे में सिर्फ़ मैं, सना और अब्बू खड़े थे। एक दूसरे को देख रहे थे। एक भारी, असहज खामोशी थी। अब्बू का चेहरा शर्म और विवशता से भरा हुआ था। मेरे भीतर एक तूफान था—घृणा, गुस्सा, बेबसी और एक अजीब सी डरावनी हैरानी।
मगर सना के चेहरे का भाव सबसे अलग था। वह विचित्र था। उस पर न तो शर्म थी, न डर। उसकी आँखों में एक ठंडी, कठोर चमक थी। उसके होंठ पतले होकर दबे हुए थे। उसकी मुद्रा में एक ऐसा गुस्सा और दृढ़ संकल्प था, जैसे वह कोई मिशन पर निकली हुई हो। कोई ऐसा मिशन जिसके बारे में हममें से किसी को कुछ पता नहीं था। वह हमें देख रही थी, मगर ऐसे लग रहा था जैसे हम उसकी नज़रों में नहीं, बल्कि उसके पीछे, कहीं दूर, किसी और लक्ष्य पर टिकी हुई थीं। हवा में अब सिर्फ़ पंखे की आवाज़ नहीं, बल्कि एक अनकही, विषैली प्रतिज्ञा की गूँज थी।