मामी को किया गर्भवती – भाग ३

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मामी को किया गर्भवती – भाग २

दरवाज़ा बंद होते ही घर की हवा बदल गई। रिशभ की मौजूदगी का जो हल्का सा दबाव अभी तक था, वह गायब हो गया। अब सिर्फ़ दो लोग थे – एक भूखा नौजवान और वह औरत जो अब उसकी इच्छा की पूर्ति का साधन थी।

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निखिल, जिसका हाथ पहले से ही तन्वी की कमर पर था, उसके कान के पास अपने होठ ले गया। उसकी साँसें गर्म और भारी थीं। “चलो मामी, अब करते हैं,” उसने एक गहरी, कर्कश फुसफुसाहट में कहा, “मेरा लंड पत्थर की तरह खड़ा है… इसे बर्बाद मत होने दो।”

तन्वी सिर से पैर तक काँप गई। निखिल की साँसें उसकी गर्दन पर पड़ रही थीं और उसका हाथ उसकी कमर को जलाता हुआ सा लग रहा था। वह शर्म और डर से सिमट सी गई, फिर भी उसके भीतर एक अजीब सी सिहरन भी दौड़ गई। उसने लड़खड़ाती आवाज़ में पूछा, “तुम… तुम तो पहले दिन से यही चाहते थे ना? मैंने तुम्हें कई बार देखा… तुम मुझे घूर रहे थे।”

निखिल ने उसकी गर्दन को हल्के से चूमा, उसकी त्वचा का स्वाद चखते हुए। “हाँ मामी… तुम इतनी खूबसूरत, इतनी जलन पैदा करने वाली और इतनी कामुक हो कि मैं खुद पर काबू नहीं रख पाया। पर मैंने अपने दिमाग को तुरंत साफ़ कर लिया था कि तुम्हारे बारे में ऐसा नहीं सोचना। पर अब… अब तुम्हारे पति और तुम खुद ही मेरे अंदर की उन भावनाओं को जगा रहे हो। अब बस करो मामी, बातें करना बंद करो… चलो बेडरूम में चलते हैं।”

इतना कहकर निखिल ने उसका हाथ पकड़ा और उसे खींचते हुए सीधे बेडरूम की ओर ले गया। वही बेडरूम जहाँ उसके मामा ने उसकी मामी के साथ पति-पत्नी का रिश्ता निभाया था। दरवाज़ा बंद करते ही निखिल ने तन्वी को अपनी ओर खींचकर ज़ोर से भींच लिया। उसकी बाँहें उसके चारों ओर कस गईं।

और फिर शुरू हुआ एक तूफ़ान।

निखिल का मुँह तन्वी की गर्दन पर जा लगा, चूमता हुआ, चाटता हुआ, कभी हल्का सा काटता हुआ। “आह…” तन्वी की साँस में एक हल्की सी कराह निकली। उसके हाथ तन्वी की पीठ पर उन्मत्त गति से घूमने लगे – ऊपर से नीचे तक, उसके कोमल मांस को रगड़ते हुए, उसकी रीढ़ की हड्डी को महसूस करते हुए। फिर वे हाथ नीचे उतरे और उसकी गांड पर जा पहुँचे। निखिल ने उसके दोनों नितंबों को अपने हाथों में लिया, धीरे से दबाया, फिर ज़ोर से भींचा, मानो उसका मांस गूँथ रहा हो।

“म्म्म्फ्फ…” तन्वी की एक और कराह, इस बार ज़्यादा गहरी।

फिर निखिल के हाथ अचानक आगे की ओर फिसले, उसके सीने तक पहुँचे। उसने तन्वी के भरे हुए दूधों को अपनी हथेलियों में कैद किया और ज़ोर से निचोड़ा। साड़ी का ब्लाउज और अंदर का ब्रा उसके आड़े आ रहे थे, पर निखिल के हाथों का दबाव साफ़ महसूस हो रहा था।

“ओह… निखिल…” तन्वी की आँखें बंद हो गईं। उसके होठ काँप रहे थे।

निखिल ने उसके चेहरे को अपनी ओर घुमाया और उसके होठों पर जबरदस्ती अपने होठ थोप दिए। यह कोमल चुंबन नहीं था। यह एक जानवरों जैसी, सारी भूख लिए हुए टकराव था। उसने तन्वी के होठों को अपने बीच दबाया, अपनी जीभ उसके मुँह में घुसेड़ दी। “स्लर्प… स्लूप…” चूमने की आवाज़ें, जीभों के टकराने की आवाज़ें, और तन्वी की बढ़ती हुई कराहों ने बेडरूम की हवा में एक गर्म, गीला संगीत भर दिया।

तन्वी के होठ मुलायम और रसीले थे, शहद जैसे मीठे। निखिल उन्हें चूसता, कभी हल्का सा दाँतों से काटता। उसके एक हाथ ने उसकी गांड को मसलना जारी रखा, दूसरा हाथ उसके दूधों को नचा रहा था, उसके निप्पलों को उँगलियों के बीच दबा-दबाकर सख़्त कर रहा था।

फिर निखिल ने चुंबन तोड़ा। उसकी आँखों में एक अँधेरी चमक थी। “इस साड़ी को उतारो… नहीं तो मैं फाड़ दूँगा।”

उसने तन्वी के साड़ी के पल्लू को ज़ोर से खींचा। कपड़ा उधड़ने लगा। तन्वी ने स्वयं ही अपने ब्लाउज के बटन खोलने शुरू कर दिए, उसके हाथ काँप रहे थे। निखिल ने मदद की, और कुछ ही सेकंड में ब्लाउज खुल गया। उसके सामने एक हल्के रंग का ब्रा था, जिसके अंदर से उसके दूध बाहर निकलने को बेताब लग रहे थे।

निखिल ने ब्रा के कप को नीचे खींचा। और फिर वे प्रकट हुए – सैंतीस साइज़ के, गेहुँए रंग के, मुलायम और भारी दूध। वे थोड़े से लटक रहे थे, उन पर नीले रंग की नसें साफ़ दिख रही थीं। और उनके ऊपर, गहरे गुलाबी, सख़्त हो चुके निप्पल बटन की तरह उभरे हुए थे।

“आह… क्या दूध हैं मामी के…” निखिल ने कहा और अपना मुँह उनके बीच घुसा दिया। वह उनके बीच की गहरी खाई में चूमता रहा, फिर अपना मुँह एक निप्पल पर ले गया। उसने उस निप्पल को अपने होठों से घेर लिया और ज़ोर से चूसना शुरू कर दिया। “चूूप… स्लूप… चप…” आवाज़ें आने लगीं। उसने अपनी जीभ से निप्पल को घुमाया, फिर हल्के से दाँतों से काटा।

“आआहहह! हाँ… ऐसे ही…” तन्वी का सिर पीछे को झटका। उसने अपनी उँगलियाँ निखिल के बालों में फँसा दीं, उसे और ज़ोर से अपने सीने पर दबाया।

निखिल ने दूसरे निप्पल को भी उसी तरह चूसा, नचाया, दबाया। तन्वी के दूधों पर लाल निशान बनते जा रहे थे – चूमने के, काटने के, निचोड़ने के। उसके निप्पल अब लाल और सूजे हुए थे, पत्थर की तरह सख़्त।

“अब बिस्तर पर,” निखिल ने हाँफते हुए कहा और तन्वी को धक्का देकर बड़े डबल बेड पर गिरा दिया। वह उसके ऊपर सवार हो गया। उसने तेजी से तन्वी की साड़ी की चुन्नट खोली और उसे नीचे से खींचकर उतार फेंका। उसके नीचे सिर्फ़ एक हल्की सी कॉटन की पेटीकोट और उसके शरीर के ऊपरी हिस्से से उतरा हुआ ब्रा बचा था। निखिल की आँखें उसके शरीर के हर वक्र पर भटक रही थीं, उसकी साँसें और तेज हो गई थीं। वह जानता था कि अगला कदम उस पेटीकोट को हटाना और उस चूत को देखना होगा, जिसके लिए उसका लंड पागलों की तरह धड़क रहा था।

निखिल का हाथ तन्वी के कमरबंद पर गया। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं, पर उत्सुकता से भरी हुईं। उसने पेटीकोट के फीते को खोला और फिर धीरे-धीरे, एक इंच-इंच करके, उसे तन्वी के नितंबों और जाँघों से नीचे की ओर खींचा। कपड़ा उसकी त्वचा से रगड़ खाता हुआ नीचे सरकने लगा।

पहले उसकी जाँघें प्रकट हुईं – मुलायम, गोल, हल्के बादामी रंग की। फिर उसकी कमर का वक्र, जो पेटीकोट के ढीले होने के साथ और भी साफ़ उभरने लगा। आखिरकार, पेटीकोट उसके पैरों से होता हुआ पूरी तरह उतर गया और बिस्तर पर गिर पड़ा।

अब तन्वी के नीचे सिर्फ़ एक फीते वाली, हल्के गुलाबी रंग की चड्डी बची थी। निखिल ने अपनी उँगलियाँ उसके कमरबंद में डालीं और उसे भी उसी धीमी, जानबूझकर धीमी गति से नीचे खींचा। चड्डी उसकी जाँघों से फिसली, उसके घुटनों से, और फिर उसके टखनों से, जहाँ एक सुनहरी पायल चमक रही थी।

और फिर वह पल आया।

तन्वी पूरी तरह नंगी थी। बिस्तर पर पसरी हुई, उसका शरीर एक कविता की तरह था। वह बहुत पतली नहीं थी, न ही मोटी। एक सही, भरा हुआ, मादक आकार था उसका। उसके दूध, जिन पर निखिल के दाँतों और होठों के लाल निशान थे, अब और भी भारी लग रहे थे, उन पर पड़ा मंगलसूत्र का लॉकेट उनकी खूबसूरती में एक अजीब सा पवित्रता का भाव जोड़ रहा था। निप्पल गहरे गुलाबी और सूजे हुए थे, अभी भी निखिल की जीभ और दाँतों की गर्माहट से चुभ रहे होंगे।

उसके दूधों के नीचे उसका पेट था – एक कोमल, हल्का सा उभार लिए हुए, जो साँस लेने के साथ उठता-गिरता था। और उसके बिल्कुल बीचोंबीच, एक गहरी, सुडौल नाभि बनी हुई थी, जैसे उसके शरीर का केंद्र बिंदु।

और फिर नीचे… वह जगह जिसे देखने, छूने, महसूस करने, चखने और अपने लंड से रौंदने के लिए निखिल का मन बेचैन हो रहा था।

तन्वी की चूत।

वह बंद थी, पर उसके होठों के बीच से एक चमकदार नमी झलक रही थी जो उसके उत्तेजित होने की गवाही दे रही थी। रंग गुलाबी था, एक ऐसा गुलाबी जो अक्सर भारतीय महिलाओं में नहीं देखने को मिलता। तन्वी अपवाद थी। उसकी चूत सुंदर थी – थोड़ी सी फूली हुई, कोमल। उसके लंबे, सुडौल पैर, जिनके टखनों में वह चांदी की पायल थी, थोडे से फैले हुए थे।

तन्वी ने शर्म से अपना चेहरा हाथों से ढक लिया। उसकी उँगलियों के बीच से उसकी आँखें दिख रही थीं, जो निखिल की ओर देख रही थीं, जो सिर्फ़ अपनी आँखों से ही उसके नंगे शरीर को निगल रहा था। बिना कपड़ों के, पर सारे गहनों के साथ – मंगलसूत्र, कानों के झुमके, गले का हार, कलाई की चूड़ियाँ, टखनों की पायल – यह दृश्य निखिल के लिए मंत्रमुग्ध कर देने वाला था।

“स्लर्प…” निखिल ने अपनी जीभ अपने होठों पर घुमाई, एक भूखे जानवर की तरह। उसकी आँखों में एक जंगली चमक थी।

उसने अपने हाथ अपनी पैंट के बटन पर रखे। एक झटके में बटन खुल गया। ज़िप नीचे चली। उसने पैंट और अंडरवियर एक साथ नीचे खींचे। उसकी कमीज़ उसने ऊपर से खींचकर उतार फेंकी।

और अब वह भी पूरी तरह नंगा था।

उसका शरीर युवा और ताकतवर था। छाती चौड़ी, पेट सपाट। और उसकी जाँघों के बीच, उसका लंड सख्त और गुस्से में खड़ा था। लगभग सात इंच लंबा, मोटा, नसों से भरा हुआ, जिसका सिर गहरे लाल रंग का था और एक बूंद पारदर्शी तरल से चमक रहा था। उसने अपना हाथ अपने लंड पर रखा और इसे धीरे-धीरे आगे-पीछे करने लगा, अपनी हथेली से उसकी लंबाई को महसूस करते हुए।

उसकी नज़रें तन्वी के शरीर पर गड़ी हुई थीं, हर वक्र, हर रेखा को नाप रही थीं, जैसे कोई योद्धा युद्ध के मैदान का नक्शा बना रहा हो। उसके चेहरे पर एक ऐसी लालसा थी जो अब नियंत्रण से बाहर थी। वह जानता था कि अब कोई रुकावट नहीं है। यह औरत, उसकी मामी, अब पल भर में उसकी होने वाली थी। उसका लंड उसकी हथेली में एक और ऐंठन के साथ फड़का, जैसे उस चूत में घुसने की जल्दी में हो।

निखिल ने आगे झुककर अपने घुटने बिस्तर पर टिकाए, अपनी मामी की जाँघों के बीच में आकर बैठ गया। उसका एक हाथ अपने लंड पर था, जिसे वह धीरे-धीरे, लगभग ध्यान से आगे-पीछे कर रहा था, उसकी गर्मी और कड़कपन का आनंद लेते हुए। उसकी दूसरी हथेली तन्वी के अंदरूनी जाँघ पर पड़ी, उसके कोमल मांस को सहलाते हुए।

फिर, बिना किसी चेतावनी के, उसने अपने दोनों हाथों से तन्वी के घुटनों को पकड़ा और उन्हें धीरे से अलग करना शुरू किया। तन्वी की चूत के बाहरी होंठ, जो आपस में चिपके हुए थे, धीरे-धीरे अलग होने लगे, एक गुलाबी रंग की झलक दिखाते हुए।

तन्वी ने शर्म से अपनी जाँघें सिकोड़ने की कोशिश की, उसके हाथ अब भी उसके चेहरे पर थे।

पर निखिल के लिए यह विरोध सिर्फ़ उसकी भूख को और बढ़ाने वाला था। उसने ज़ोर लगाकर उसकी जाँघों को और फैला दिया, उन्हें बिस्तर पर दबाकर रखा। उसकी पकड़ मजबूत, लोहे जैसी थी।

अब तन्वी की स्थिति लगभग पूरी तरह विभक्त हो चुकी थी, उसके पैर ऊपर की ओर उठे हुए। और इस स्थिति के कारण, उसकी चूत अब पूरी तरह से खुल गई थी, बिना किसी शर्म के सामने प्रकट हुई। वह दृश्य मनमोहक था – गहरे गुलाबी, चमकदार और गीली। उसके अंदर से एक साफ़, चिपचिपा रस टपक रहा था, जो उसके गांड के छेद तक एक चमकदार रेखा बना रहा था। उसकी चूत का छेद हल्के से फड़क रहा था, जैसे अपने आक्रमणकारी का स्वागत करने के लिए बुला रहा हो।

इस दृश्य को देखकर निखिल का मुँह पानी से भर गया। वह और नीचे झुका, उसकी चूत के बिल्कुल करीब आ गया। उसने अपनी नाक उसके चूत के पास लगाई और एक गहरी साँस ली।

“औह… फ्फ्फह…” उसने आँखें बंद कर लीं। उसकी गंध मादक थी – मीठी, थोड़ी तीखी, पूरी तरह से स्त्रील और पूरी तरह से उत्तेजक। यह वह गंध थी जिसने उसके दिमाग में दिन भर भूख पैदा की थी।

तन्वी, जो पहले से ही शर्म से जल रही थी, अब और भी सिकुड़ गई। निखिल ने उसे इस तरह फैलाकर रखा था कि उसकी सबसे पवित्र, सबसे निजी जगह – उसकी स्त्रीत्व की निशानी – पूरी तरह से उसके सामने उजागर हो गई थी। पर उसकी चूत झूठ नहीं बोल रही थी। वह रस से लबालब थी, निखिल के लिए पहले से ही तैयार। और उसकी चूत पर निखिल की साँसों का गर्म स्पर्श… वह आखिरी कील थी ताबूत में।

अब उसे एहसास हो रहा था। अब से, वह दो मर्दों की सेवा करेगी, जीवन भर। हालाँकि उन सबने यह तय किया था कि यह सिर्फ़ उसके गर्भवती होने के लिए है, पर एक औरत होने के नाते वह जानती थी… मर्द कैसे होते हैं। निखिल अब जीवन भर उसे चोदेगा, उसके पति रिशभ की तरह ही। क्योंकि उसके बच्चे के पिता का सच हमेशा उन तीनों के बीच एक रहस्य रहेगा… और निखिल का उस बच्चे पर अधिकार होगा। भले ही दुनिया को पता न चले, पर वे जानते हैं। इसलिए उसके लिए यह स्पष्ट था कि वह अब जल्द ही निखिल की अनौपचारिक पत्नी, उसकी रखैल बन जाएगी, हमेशा के लिए।

और यह सब जानते हुए भी… कहीं न कहीं, वह भी यही चाहती थी।

उसके नीचे, उसकी चूत एक और गहरी, गर्म पल्स के साथ सिकुड़ी, और अधिक रस छोड़ते हुए। उसने अपने हाथ चेहरे से हटाए और उन्हें बिस्तर के चादरों में जकड़ लिया, तैयार होकर। उसकी साँसें तेज और अनियमित थीं।

निखिल ने आँखें खोलीं। उसकी आँखों में अब कोई संदेह नहीं था, सिर्फ़ एक अंधेरा, स्वामित्व वाला निश्चय। उसने अपना लंड छोड़ा, जो अब बिना किसी सहारे के सीधा खड़ा था, उसकी जाँघ से टकराता हुआ। वह तन्वी के ऊपर और झुका, अपने हाथों को उसके सिर के दोनों ओर बिस्तर पर टिकाते हुए, उसे अपने नीचे कैद कर लिया।

“माफ़ करना मेरी रंडी,” उसने हाँफते हुए कहा, उसकी साँसें तन्वी के चेहरे पर गर्माहट फैला रही थीं, “मैं तुझे चाटना चाहता था… तेरी चूत का रस पीना चाहता था… पर यह लंड…” उसने अपनी नज़रें नीचे की ओर घुमाई, जहाँ उसका सात इंच का गर्म, नसों से भरा लंड तन्वी की नाभि के पास खड़ा था, एक बूंद पारदर्शी वीर्य उसके सिर से टपक रही थी, “…यह फटने को हो रहा है। और रिशभ मामा ने सख्त हुक्म दिया है कि मेरे वीर्य की एक बूंद भी बर्बाद न हो। इसलिए अब तुझे चोदे बिना चारा नहीं है।”

इतना कहकर उसने अपनी जाँघों को और चौड़ा किया और अपने लंड को तन्वी की चूत के खिलाफ रगड़ना शुरू किया। वह इसे ऊपर-नीचे करता, उसके बाहरी होंठों के कोमल, गीले मांस से अपने डंडे को चिकनाई देता। “स्लर्प… स्लिश…” गीलेपन की आवाज़ आई।

सिर्फ़ इस रगड़ से ही तन्वी के मुँह से एक लंबी, काँपती हुई कराह निकल गई। “ओह्ह… हाँ…” उसकी आँखें झपक गईं। उसका शरीर एक सिहरन के साथ ऐंठ गया। उसकी चूत और भी गीली हो गई, जैसे उसका अपना शरीर भी इस हमले का स्वागत कर रहा हो। निखिल ने यह देखा और उसके होंठों पर एक दुष्ट मुस्कान खेल गई। उसकी मामी चाहे जितना विरोध करे, उसका शरीर तो सच बोल रहा था।

उसने अपने लंड के सिर को तन्वी की चूत के छेद पर टिका दिया। वह गर्म, नम और काँप रहा था। तन्वी ने अपनी आँखें खोलीं, एक पल के लिए उसकी नज़रें निखिल की आँखों से मिलीं – उसमें डर था, समर्पण था, और एक गहरी, निषिद्ध इच्छा थी।

और फिर, बिना किसी चेतावनी के, निखिल ने अपने कूल्हे जोर से आगे किए, एक जोर का धक्का।

“आआआहहहहह!! नहीईईई!”

एक ही बेरहम, जानवरों जैसे धक्के में उसका पूरा लंड तन्वी की चूत के अंदर घुस गया, उसकी गहराई तक जाते हुए, लगभग उसकी कोख की दीवार से टकराते हुए। आवाज़ गीली, चिपचिपी और ज़ोरदार थी – “स्लर्प-स्क्विश!”

तन्वी की आँखें चौंधिया गईं, उसका मुँह खुला रह गया। एक तीखा, चीरने वाला दर्द उसकी रीढ़ से होता हुआ उसके मस्तिष्क तक पहुँचा। वह बिस्तर पर ऐंठ गई, उसने बाहर निकलने के लिए जोरदार संघर्ष किया, अपने कूल्हे ऊपर उठाए। “छोड़ो! बाहर निकालो! उह्हहह… यह मुझे फाड़ रहा है… यह बहुत गर्म है… बहुत गर्म!”

और सचमुच, यह बहुत गर्म था। निखिल का लंड न सिर्फ़ बड़ा और मोटा था, बल्कि अंदर से एक जलन भरी गर्मी फैला रहा था। तन्वी की चूत, जो सालों से केवल रिशभ के औसत आकार के लिंग के आदी थी, अचानक एक नए, बड़े आयाम में खिंच गई थी। उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उसकी चूत में गर्म लोहे की एक मोटी सलिया घुसा दी हो, उसे अंदर से जलाते हुए, फैलाते हुए।

पर निखिल ने उसे छोड़ा नहीं। उसने उसकी कलाइयों को और भी ज़ोर से बिस्तर में दबा दिया, उसके ऊपर अपना पूरा वजन डाल दिया। “चुप रहो,” उसने दाँत पीसते हुए कहा, “लंड को एडजस्ट होने दो।” वह अपने लंड को उसकी गहराई में धकेले रहा था, हिलाया नहीं, बस उसे वहीं अंदर रोके रखा, ताकि तन्वी की चूत की मांसपेशियाँ उसकी मोटाई के लिए ढल सकें।

एक तरफ तन्वी दर्द और आतंक से तड़प रही थी, उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। दूसरी तरफ, निखिल के लिए यह स्वर्ग था। उसकी चूत का अंदरूनी हिस्सा अविश्वसनीय रूप से गर्म और तंग था, उसके लंड को हर तरफ से निचोड़ रहा था। उसके लंड पर उसके रस की चिकनाई एक मादक गर्माहट फैला रही थी। और जब उसने अंदर धक्का दिया था, तो वह आवाज़ – “स्क्विश” – उसके कानों में संगीत की तरह गूँज रही थी। सबसे बढ़कर, इस औरत पर, अपनी मामी पर, इस तरह कब्ज़ा करने की भावना, उसे जीतने की भावना… यह अकथनीय थी।

लंबे, तनावपूर्ण सेकंड्स बीते। धीरे-धीरे, तन्वी का संघर्ष कम होने लगा। उसकी साँसें अभी भी तेज़ थीं, पर ऐंठन कम हो गई। उसकी चूत की मांसपेशियाँ, जो पहले दर्द से सख्त हो गई थीं, अब ढीली पड़ने लगीं, निखिल के लंड को अपने अंदर समेटने लगीं। उसकी कराह में दर्द के स्थान पर एक नई, गहरी गूँज आने लगी।

निखिल ने यह परिवर्तन महसूस किया। उसने धीरे से, इंच-इंच करके, अपना लंड बाहर खींचना शुरू किया। “ओहह… म्म्म्फ…” तन्वी ने कराहा। यह अब दर्द की कराह नहीं थी। यह एक ऐसी आवाज़ थी जो उसकी चूत की दीवारों के उसके लंड से रगड़ खाने पर निकली थी। हर नस, हर झुर्री का स्पर्श उसे बिजली के झटके जैसा लग रहा था।

जब वह लगभग पूरी तरह बाहर आ गया, सिर्फ़ उसका सिर अंदर रह गया, तो उसने रुका। फिर, बिना किसी दया के, उसने उतनी ही तेजी से, उतने ही जोर से फिर से अंदर धकेल दिया।

“आहहहह! हाँ!” तन्वी की चीख इस बार स्पष्ट रूप से आनंद से भरी थी। उसकी आँखें चौंधिया गईं, उसकी उँगलियाँ चादर में कस गईं।

निखिल ने मुस्कुराया। उसने अपना सिर झुकाया, उसके कान के पास अपने होठ ले गया। “अब… अब मज़ा आ रहा है ना, मेरी रंडी मामी?”

“ह…हाँ…” तन्वी ने हाँफते हुए जवाब दिया, उसकी आवाज़ भारी और कामुक थी।

“मैं तुझे रंडी कहता हूँ, तो तुझे बुरा क्यों नहीं लगता?”

तन्वी ने अपनी आँखें बंद कर लीं, शर्म और उत्तेजना से उसका चेहरा लाल हो गया। “क्योंकि… तुम्हारे मामा… रिशभ भी… जब मुझे चोदते हैं… तो रंडी… कुतिया… वैसी ही गालियाँ देते हैं। मैं… आदी हो गई हूँ। बुरा नहीं लगता। असल में…” उसने एक गहरी साँस ली, “…ये शब्द मेरे अंदर कुछ जगा देते हैं।”

निखिल की एक गहरी, गर्जनापूर्ण हँसी कमरे में गूँज उठी। “अच्छा, तो ठीक है मेरी रंडी! तू तैयार है। अब… मैं तुझे कुत्ते की तरह चोदूँगा! ठीक है न कुतिया! जैसे तुझे तेरे पति ने कभी नहीं चोदा होगा!”

और फिर वह तूफ़ान शुरू हुआ।

निखिल ने तन्वी के होंठों पर जबरदस्ती अपना मुँह थोप दिया, उसे चूमा, उसकी जीभ उसके मुँह में घुसेड़ दी, उसके होठों को दाँतों से काटा। “म्म्म्फ… स्लर्प…” उनकी जीभें लड़ने लगीं। उसका लंड एक लयबद्ध गति से अंदर-बाहर होने लगा। “थप-थप-थप!” उनकी जाँघों के टकराने की आवाज़ गूँजने लगी, जो हर धक्के के साथ तेज होती जा रही थी।

लेकिन उससे भी ज़ोर से आवाज़ आ रही थी उसकी चूत की – “चप-चप-स्क्विश-स्क्वेल्च!” एक गीली, चिपचिपी, अश्लील आवाज़ जो हर बार जब वह पूरी तरह अंदर जाता या बाहर निकलता, गूँज उठती। निखिल के अंडकोष, तन्वी की चूत के नीचे, उसकी गुदा के पास, हर धक्के के साथ जोर से थपथपा रहे थे, उन दोनों के रस से पूरी तरह गीले हो चुके थे।

“आआहहह! आहा! आहहह! आह! आह! धीरे… धीरे करो निखिल… प्लीज… आहहह! बहुत तेज है… आहह!” तन्वी चिल्ला रही थी, उसकी कराहें अब नियंत्रण से बाहर हो चुकी थीं, एक लय में उठती-गिरती।

पर निखिल नहीं रुका। वह एक मशीन की तरह था। वह हर बार पूरा बाहर निकलता, फिर पूरी ताकत से, बिजली की गति से अंदर घुस जाता। “पॉप!” जब वह बाहर निकलता। “स्लर्प!” जब वह अंदर जाता।

उसका एक हाथ अभी भी तन्वी की कलाई को बिस्तर में दबाए हुए था। दूसरा हाथ उसके नरम, लटकते हुए दूधों पर था, उन्हें ज़ोर से मसल रहा था, उसके सख़्त निप्पलों को उँगलियों के बीच दबा-दबाकर लाल कर रहा था। तन्वी की चूड़ियाँ “झन-झन” कर रही थीं, उसकी पायल “झंकार” कर रही थी, ये आवाज़ें “थप-थप-थप” और “चप-स्क्विश” की लय के साथ मिलकर एक विकृत संगीत रच रही थीं।

तन्वी के पैर, जो हवा में लहरा रहे थे, हर धक्के के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। वह पूरी तरह से निखिल के नियंत्रण में थी, एक ऐसी स्थिति में जहाँ प्रतिरोध असंभव था। और निखिल अब रुकने वाला नहीं था। वह एक जानवर था, जो अपने शिकार को निगल रहा था, अपने मालिकाना हक को स्थापित कर रहा था। उसकी मामी की चूत अब उसकी थी, और वह उसे तब तक चोदता रहेगा जब तक कि वह उसमें अपने वीर्य की हर बूंद न उड़ेल दे।

दस-पंद्रह मिनट बीत चुके थे, पर निखिल का प्रहार जारी था। वह उसी जानवरों वाली गति से अपनी मामी की चूत को रौंदे जा रहा था। पर अब तन्वी के शरीर में बदलाव आ चुका था। उसका संघर्ष, उसकी पीड़ा धीरे-धीरे एक गहरी, अंधेरी कामुकता में बदल गई थी। उसकी कराहें अब विरोध की नहीं, बल्कि प्रोत्साहन की थीं।

“आहहह… आह… आह… हाँ… हाँ… ऐसे ही चोदो मुझे… हाँ… हम्म्म… हाँ… आहहह… स्स्स्स… चोदो… और चोदो…” उसकी आवाज़ लहरदार थी, हर धक्के के साथ ऊपर-नीचे होती हुई।

यह आवाज़ निखिल के आत्मविश्वास को और भी बढ़ा रही थी। उसने अपनी गति और तेज कर दी, उसकी जाँघें तन्वी की जाँघों से जोर से टकरा रही थीं, “थप-थप-थप” की आवाज़ एक लयबद्ध गड़गड़ाहट में बदल गई। तन्वी के शरीर से निकलने वाला पसीना और उनके जननांगों से मिलने वाला रस चादर को गीला कर रहा था।

तभी अचानक, बिस्तर पर पड़े तन्वी के मोबाइल फोन की घंटी बज उठी। “डरिंग-डरिंग-डरिंग!”

आवाज़ ने दोनों का ध्यान खींचा। निखिल ने एक पल के लिए अपनी गति धीमी की, उसकी नज़र फोन की ओर गई जो तन्वी के सिर के पास वाइब्रेट हो रहा था। पर वह रुका नहीं। उसकी कमर का लयबद्ध घूमना जारी रहा, “चप-चप-स्क्विश” की आवाज़ अब भी गूँज रही थी।

“थप-थप-थप…” उसके धक्के जारी रहे। उसने एक हाथ आगे बढ़ाया, फोन उठाया, और तन्वी के हाथ में थमा दिया। “लो,” उसने हाँफते हुए कहा, और फिर तुरंत अपने दोनों हाथों से तन्वी के दूधों को ज़ोर से मसलने लगा, उसके निप्पलों को घुमाते हुए।

“कौन है?” निखिल ने पूछा, उसकी साँसें फूली हुई थीं।

तन्वी ने फोन की स्क्रीन देखी, उसकी आँखें विस्फारित हो गईं। “आहहह… हह्ह… ये… आहह… ये तुम्हारे… आहहहह… मामा का कॉल हैं…” उसने हकलाते हुए कहा, निखिल का लंड उसकी चूत के अंदर एक और गहरा झटका देते हुए।

“लाउडस्पीकर पर रखो,” निखिल ने आदेश दिया, एक दुष्ट मुस्कान के साथ।

तन्वी ने हाँफते हुए, काँपते हाथों से कॉल रिसीव की और लाउडस्पीकर ऑन कर दिया। फोन से रिशभ की आवाज़ आई, जिसके पीछे बस स्टैंड के शोर की आवाज़ थी। “अरे… मैंने बस पकड़ ली। अब रवाना हो रहा हूँ। तुम लोग क्या कर रहे हो?”

“थप… थप… थप…” निखिल के धक्कों की आवाज़ फोन में साफ़ सुनाई दे रही थी।

तन्वी ने जवाब दिया, उसकी आवाज़ टूटी हुई, हर शब्द के बीच में एक कराह भरी हुई थी। “आहहह… हह्ह… ठी…ठीक है… फिर… हह्हहहआआहह… स्स्स… सुर…क्षित… आहह आह… यात्रा… आहह…करना…सस..और कॉल… कॉल करना… हह्हहआआ… स्स्स… जब… जब तुम… आह… पहुँच… स्स्स…”

रिशभ की आवाज़ में भ्रम और चिंता थी। “क्या हुआ? तुम ठीक से सुन रही हो? शायद सिग्नल कमजोर है। तुम्हारी आवाज़ टूट रही है। और पीछे क्या आवाज़ है?”

निखिल हँसा, एक जंगली, विजयी हँसी। उसने फोन तन्वी से वापस ले लिया, अपनी गति बनाए रखते हुए। “थप-थप-थप” की आवाज़ पृष्ठभूमि में जारी थी, तन्वी की चूत के गीलेपन की अश्लील आवाज़ और उसकी चूड़ियों व पायल की झनकार के साथ मिलकर।

“आहह नहीं मामा… मैं… मैं… चोद रहा हूँ… आहह… तुम्हारी… तुम्हारी बीवी को… हाँ… आहह… तुम्हारी बीवी को… तुम्हारे जाते ही… मामा… आहह… बिल्कुल वैसे ही जैसा… जैसा तुमने… हुक्म दिया था मामा… आहह…” उसने बेतहाशा हाँफते हुए कहा और फोन वापस तन्वी के हाथ में थमा दिया।

तन्वी ने फोन वापस लिया, उसकी आँखें बंद थीं, उसका सारा ध्यान अपनी चूत में घुसते-निकलते उस मोटे लंड पर केंद्रित था। “हाँ… जानू… तुम्हारा भांजा… आहहह… हाँ… कर… कर रहा है… आहह… वही… स्स्स… हाँ… वही जो हम… आशा कर रहे थे… आहहह… उससे… जानू… आहह… वह… हाँ… मुझे रौंद रहा है… ओह… हाँ… हे भगवान… हाँ… वह मुझे रौंद रहा है जानू… आहह हाँ… वह बहुत गहरा है…”

फोन के दूसरी ओर, रिशभ चुप था। उसके मन में गुस्से की एक लहर उठी, फिर एक अजीब सी कामुकता की झुरझुरी। उसकी अपनी पत्नी की यह आवाज़, उसके भांजे के साथ संभोग करते हुए… और वे उसके जाते ही शुरू हो गए थे। रात तक का इंतजार भी नहीं किया। उसकी अपनी पैंट में, उसका लंड सख्त होकर उभर आया, एक अप्रत्याशित, शर्मनाक ऐंठन के साथ।

निखिल ने फिर फोन छीन लिया। “अरे मामा… आहहह… एक बात मुझे… आहहह… हाँ… तुम्हें बतानी ही है… ओहhh… हह्हा… हाँ… मामी तो… आहह… मामी तो असली माल है… आहहह… ओह हाँ… क्या बदन है… आहह… क्या चूत है… हाँ मामा… मैं बहुत मजा ले रहा हूँ… हाँ…”

रिशभ ने एक गहरी, भारी साँस ली। उसे एक अजीब सा झटका लगा, एक मिली-जुली भावना जिसमें शर्म, क्रोध और एक गहरी विकृत उत्तेजना शामिल थी। उसका अपना लंड अब पूरी तरह खड़ा हो चुका था, इन आवाजों और कल्पनाओं से उकसाया हुआ। “ओह… ठीक है… हम्म्म… तुम… तुम लोग… हम्म्म… जारी रखो… फिर… मैंने सोचा था… मैंने सोचा था तुम… दोनों रात को… करोगे… पर कोई बात नहीं भांजे… यह तुम्हारी मर्जी है… ठीक है… मुझे अब फोन काटना चाहिए…”

निखिल ने एक आखिरी, विजयी कराह भरी, उसने तन्वी को और जोर से पकड़ा, उसकी चूत में एक final, गहरा धक्का दिया। “ओह… हाँ… ठीक है मामा… मैं आपकी बीवी को चोदूँगा… चिंता मत करो मामा… ओहhh हाँ… मैं चोदूँगा… आहह इस रंडी को गहराई तक मामा… आहह… चिंता मत करो… आआहह!”

और उसने फोन काट दिया।

फोन कटते ही, कमरे में एक नई तरह की उग्रता भर गई। रिशभ की आवाज़ के जाने से जो एक अदृश्य नैतिक बंधन टूटा था, उसकी ऊर्जा निखिल के शरीर में एक ज्वाला की तरह भभक उठी। उसने तन्वी को और जोर से पकड़ा, उसकी कलाइयाँ अब बिस्तर में धँसने लगी थीं, और अपने कूल्हों को एक अंतिम, अंधाधुंध गति से चलाने लगा।

“चप-चप-स्क्विश-स्क्वेल्च! थप-थप-थप!”

आवाज़ें और भी गीली, और भी अश्लील हो गईं। निखिल का सिर पीछे को झटका, उसकी गर्दन की नसें तन गईं। फोन पर अपने मामा से बात करते हुए, उसकी पत्नी को, अपनी मामी को चोदना… यह विचार, यह वास्तविकता उसके अंदर जमा हुई सारी ऊर्जा को एक विस्फोटक बिंदु पर ले आई। उसकी साँसें रुक सी गईं, उसकी आँखें चौंधिया गईं।

“आआआहहहहह! हाँ… ले ले मामी… ले ले… आआहहह!”

एक गहरी, गर्जनापूर्ण चीख के साथ, उसने अपने कूल्हे तन्वी की चूत की गहराई में ज़बर्दस्ती धकेल दिए और उसका वीर्य फूट पड़ा। गर्म, गाढ़ा तरल उसके लंड के सिर से निकलकर तन्वी की योनि के सबसे गहरे कोनों में जोरदार धाराओं में भरने लगा। हर धड़कन के साथ एक नया झटका, एक नया गर्म स्पर्श।

और ठीक उसी क्षण, तन्वी का शरीर भी एक उग्र ऐंठन में जकड़ गया। “हहहहआआआहह! ओह हाँ! ओह हाँ!” उसकी चीख निखिल की चीख में मिल गई। निखिल के वीर्य के गर्म स्पर्श ने उसकी अपनी चरमसीमा को और गहरा कर दिया, उसे एक ऐसी ऊँचाई पर पहुँचा दिया जहाँ दर्द और आनंद का अंतर लुप्त हो गया। उसका शरीर बिस्तर पर एक जंगली, अनियंत्रित रूप से झटके खाने लगा। उसकी चूत की मांसपेशियाँ निखिल के लंड को निचोड़ने लगीं, उसके वीर्य के हर जेट को अंदर सोखने के लिए एक लालची, स्पंदनशील गति के साथ।

उसकी नाभि के नीचे एक गहरी ऐंठन उठी और फैल गई। निखिल ने इसे अपने अंदर महसूस किया – यह उसकी मामी का शरीर था, जो उसके बीज को ग्रहण करने, उसे सुरक्षित रखने के लिए स्वयं को समर्पित कर रहा था। गर्भधारण की प्रक्रिया, उसका शारीरिक उद्देश्य, इस क्षण में पूरी नग्नता के साथ सामने था।

पर निखिल का वीर्य इतना प्रचुर मात्रा में था, इतना तेजी से भर रहा था कि तन्वी की चूत उसे पूरी तरह समा नहीं पा रही थी। उसके लंड के आधार से, उनके जघनों के बीच से, गाढ़े, सफेद रस की धाराएँ बाहर निकलकर तन्वी की गुदा और उसकी जाँघों पर बहने लगीं।

निखिल अभी भी उसके अंदर धँसा हुआ था, अपने लंड को उसकी गर्म, ऐंठती हुई चूत में अंतिम स्पंदन तक महसूस कर रहा था। उसकी साँसें भारी थीं, उसका सीना तन्वी के सीने से चिपका हुआ था, उनके पसीने मिल रहे थे। फिर, अचानक, उसने अपना लंड बाहर खींच लिया।

आवाज़ गीली और खिंचाव भरी थी – “पॉप-स्क्वेल्च!” उसके लंड के बाहर आते ही, वीर्य और योनि रस का एक मिश्रण बाहर निकला, तन्वी की गुलाबी, अब लालिमा लिए हुए चूत के होठों से टपकने लगा। उसकी चूत अब खुली हुई थी, थोड़ी सूजी हुई, निखिल के आक्रमण और उसके स्वयं के आनंद की गवाही देती हुई। उसके अंदर से सफेद रस की एक धीमी धार बह रही थी।

निखिल का लंड अब सिकुड़ रहा था, पर अभी भी कड़क था, और अंतिम कुछ ऐंठनों के साथ हल्के से फड़क रहा था, जैसे अपना काम पूरा करके संतुष्ट हो रहा हो। वह तन्वी के बगल में गिर गया, उसकी बाँह उसके सिर के नीचे फँस गई। उसका सारा शरीर भारी और शिथिल हो चुका था, मानो उसमें से हवा निकल गई हो।

तन्वी की टाँगें अभी भी फैली हुई थीं, मेंढक की मुद्रा में, उसकी चूत से रिसाव जारी था। बिस्तर की चादर उनके पसीने, उसके योनि रस और निखिल के वीर्य से पूरी तरह चिपचिपी और गीली हो चुकी थी। उस पर गन्दे, सफेद धब्बे थे। तन्वी की आँखें बंद थीं, पर उसकी पलकें हल्के से काँप रही थीं। उसका पूरा शरीर एक सूक्ष्म कंपकंपी से गुजर रहा था, ऐसा लग रहा था जैसे उसकी नसों में बिजली दौड़ रही हो। वह भी हाँफ रही थी, उसकी साँसें अनियमित और गहरी थीं।

दोनों के शरीर से पसीने की बूँदें निकल रही थीं, जो हवा के झोंके से ठंडी होकर चिपचिपाहट पैदा कर रही थीं। कमरे में सेक्स की गंध, पसीने की गंध और एक गहरी, पशुतापूर्ण सुगंध भरी हुई थी। कोई शब्द नहीं थे। सिर्फ़ भारी साँसें, और दिल की धड़कनों की गूँज।

थकान और संतुष्टि की एक सुस्त लहर ने दोनों को ढक लिया। निखिल की आँखें बंद होने लगीं। तन्वी ने भी, अपने शरीर के अंतिम झटके खत्म होने के बाद, अपने आप को आराम दे दिया। वे वैसे ही पड़े रहे – नंगे, गंदे, एक-दूसरे से सटे हुए, उस कार्य के बाद जिसने उनके रिश्ते को हमेशा के लिए बदल दिया था। और धीरे-धीरे, उनकी साँसें एक स्थिर, गहरी लय में आ गईं, और वे एक हल्की, गहरी नींद में सरक गए।

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