AdBlocker Detected!

हमारी website की कहानियाँ पढ़ने के लिए कृपया अपना AdBlocker disable करें. Disable करने के बाद site access करने के लिए refresh करें.

गरीबी का सौदा cuckold बन के किया – 3

गरीबी का सौदा cuckold बन के किया – 2

एक महीना भर बीत चुका था। गाँव के उस छोटे से कच्चे मकान की तस्वीर अब पूरी तरह बदल चुकी थी। पुरानी टिन की छत को उतारकर अब पक्की छत डालने का काम ज़ोरों पर चल रहा था। आँगन में ईंट, बालू और सीमेंट की तीखी महक फैली थी, जो पहले की गरीबी की दुर्गंध को ढक रही थी।

रमेश पसीने से तर-बतर होकर कारीगरों को निर्देश दे रहा था, उसकी आवाज़ में अब एक नया अधिकार था। घर में अब पैसों की कोई कमी नहीं थी; संदूक हमेशा भरा रहता था।

तभी अंदर से मीरा चाय की केतली और गिलास लेकर बाहर आई। उसके चेहरे पर अब एक ऐसा तेज़ और निखार था, जो पहले कभी नहीं दिखा था। नई और साफ सूती साड़ी में उसका गदराया हुआ बदन और भी खिल उठा था।

अच्छे खाने और शारीरिक संतुष्टि ने उसके गाल भर दिए थे, आँखों के नीचे के काले घेरे गायब हो चुके थे और उसके होंठों पर एक सुकून भरी, आज़ाद मुस्कान खेल रही थी। वह पहले से कहीं ज़्यादा खुश, संतुष्ट और ताकतवर लग रही थी।

बीते एक महीने में विक्रम के फार्महाउस जाना अब रमेश और मीरा के लिए कोई खौफनाक मजबूरी नहीं, बल्कि एक आम दिनचर्या बन चुका था। हर नई मुलाकात और हर रात के साथ मीरा का तजुर्बा और उसकी हवस बढ़ती ही जा रही थी।

विक्रम का वो मोटा और खुरदरा लंड अब मीरा के जिस्म की ज़रूरत बन चुका था। उसकी चूत और गांड के छेदों को अब विक्रम के उस दरिंदेपन, उसकी जंगली ताक़त और उस भारीपन की ऐसी आदत हो गई थी कि शुरुआत का वो छटपटाहट भरा दर्द अब पूरी तरह से एक गहरे, झकझोर देने वाले मज़े में बदल चुका था।

जब विक्रम उसके गले तक लंड को उतारता या उसकी गांड बेरहमी से खोलता, तो मीरा अब रोती नहीं थी, बल्कि कामुक आहें भरते हुए उसका पूरा मज़ा लेती थी, अपने शरीर को पूरी तरह समर्पित कर देती थी।

और रमेश? वो हर बार अपनी उसी कोने वाली कुर्सी पर बैठकर अपनी लुगाई को उस ज़मींदार के मोटे लौड़े से छिदते हुए देखता और अपनी पतलून में तंबू ताने उस नज़ारे का नशा करता। घर में खुशहाली थी और उनके दिमाग में एक अजीब सी, विकृत बेबाकी।

गर्मी की उस दोपहर जब कारीगर खाना खाने गए थे, तभी बाहर विक्रम की काली suv आकर रुकी। गाड़ी के दरवाज़े खुले, लेकिन आज विक्रम अकेला नहीं उतरा। दूसरी तरफ से एक और नौजवान बाहर निकला।

यह अमित था—विक्रम का चचेरा भाई। उम्र करीब चौबीस-पचीस साल, कद में विक्रम से थोड़ा छोटा लेकिन उससे भी ज़्यादा गठीला। उसका बदन जिम-साधा हुआ था, चौड़े सीने और तनी हुई बांहों की मांसपेशियाँ उसकी टाइट टी-शर्ट के नीचे उभरी हुई थीं।

आँखों पर महँगा विदेशी चश्मा था, गले में चाँदी की मोटी चेन लटक रही थी, और चेहरे पर एक अमीर, बिगड़े हुए रईसजादे वाली नंगी ढिठाई साफ झलक रही थी। उसकी नज़रें सीधे मीरा के निखरे हुए जिस्म पर जाकर ऐसे गड़ गईं, जैसे कोई भूखा भेड़िया ताज़े मांस को देख रहा हो।

उसकी आँखों में एक तीखी, बेक़ाबू ललक थी।

“क्या हाल है रमेश? छत डलवा रहा है?”

विक्रम ने अपनी अक्खड़ आवाज़ में कहा, उसकी नज़रें भी मीरा की छाती पर टिकी थीं, जो उसकी साड़ी के ब्लाउज के नीचे से स्पष्ट उभरी हुई थीं।

“हाँ छोटे ठाकुर, सब आपकी ही मेहरबानी है,”

रमेश ने हाथ जोड़ते हुए अपनी दब्बू आवाज़ में कहा, लेकिन उसकी नज़रें अमित के चौड़े सीने और फिर मीरा के चेहरे के बीच डोल रही थीं।

विक्रम ने एक भद्दी हँसी हँसी।

“मेहरबानी तो तेरी इस लुगाई की है रमेश।” उसने मीरा की तरफ इशारा किया।

“लेकिन सुन, आज मैं अकेला नहीं हूँ। ये मेरा चचेरा भाई अमित है, शहर से आया है। इसने तेरी घरवाली के हुस्न, उसके नखरों और उसकी गरमाहट के बहुत चर्चे सुने हैं मुझसे। आज ये भी इसका स्वाद चखना चाहता है।”

यह सुनते ही रमेश के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसके कानों में एक तेज़ सन्नाटा भर गया। एक मर्द तक तो ठीक था, जो अब उनकी आदत बन चुका था, लेकिन दो मर्द? एक ही साथ? उसकी आँखें फैल गईं, और उसके हाथों से पसीना टपकने लगा।

“छोटे ठाकुर… ये… ये क्या कह रहे हैं आप?”

रमेश की आवाज़ में एक गहरी घबराहट और डर हावी होने लगा। उसका गला सूख गया था।

“बात तो सिर्फ आपकी हुई थी। दो मर्द… नहीं ठाकुर, वो बर्दाश्त नहीं कर पाएगी। उसकी जान निकल जाएगी, ये ठीक नहीं है।”

रमेश ने कमज़ोर आवाज़ में एतराज़ जताया, लेकिन उसकी नज़रें अमित के चौड़े सीने और विक्रम के मुस्कुराते चेहरे के बीच डोल रही थीं। एक अजीब सी छटपटाहट उसके भीतर उठी—डर के साथ-साथ एक गहरी, वर्जित जिज्ञासा भी।

अमित आगे आया। उसकी चाल में एक ऐसा अहंकार था जो शहरी पैसे और हैसियत से आता है। उसने रमेश के कंधे पर ज़ोर से हाथ मारा, एक ऐसा थप्पड़ जो दोस्ती का नहीं बल्कि दबदबे का इशारा था।

“अरे ओ किसान! जब खेत खुला ही छोड़ दिया है, तो एक हल चले या दो, क्या फर्क पड़ता है?”

उसकी आवाज़ में एक कर्कश हँसी थी।

“और वैसे भी विक्रम भाई ने बताया है कि तेरी लुगाई अब बहुत गहरी जुताई माँगने लगी है। ठाकुरों का पैसा मिल रहा है तुझे, तो चुपचाप तमाशा देख। बोल, हाँ या ना?”

रमेश के माथे पर ठंडा पसीना आ गया। उसके अंदर का डर उसे पीछे खींच रहा था, उसे चीखने को मजबूर कर रहा था। लेकिन उसी वक्त, उसके दिमाग के एक गहरे, विकृत कोने में एक अजीब सी उत्तेजना भी रेंगने लगी थी।

‘दो-दो रसूखदार मर्द… मेरी बीवी के लिए? एक साथ?’ यह विचार ही उसे स्तब्ध कर देने वाला था, लेकिन उसके नीचे, उसकी पतलून में एक गुदगुदी सी हलचल शुरू हो गई।

तभी मीरा आगे आई। उसने रमेश की आँखों में वो डर देखा, लेकिन उस डर के पीछे छुपी हुई वो भयानक प्यास भी पढ़ ली, जो अब उन दोनों का राज़ था। मीरा के चेहरे पर कोई लाचारी या घबराहट नहीं थी।

उसका जिस्म तो पहले से ही विक्रम की उस सख़्त ताक़त का आदी हो चुका था, अब एक नए, जवान मर्द की बात सुनकर उसके अंदर भी एक अजीब सी हलचल, एक नई तरह की भूख पैदा हो गई थी। उसकी चूत के होंठों में एक सूई सी चुभन हुई।

उसने अपना पल्लू कमर में कसकर खोंसा, एक ऐसी हरकत जो उसकी जांघों के वक्र को और उभार देती थी। फिर वह रमेश के पास गई और उसका हाथ पकड़कर धीमी,लेकिन बेहद मज़बूत आवाज़ में बोली,

“शांत हो जाओ जी। मैं संभाल लुंगी!।”

“मीरा! तू पागल हो गई है? दो लोग हैं वो! वो फाड़ कर रख देंगे तुझे!” रमेश ने फुसफुसाते हुए कहा, उसकी आँखों में असली भय था।

मीरा ने रमेश के हाथ को अपनी उँगलियों से सहलाया। उसकी आँखों में एक अजीब सी सत्ता और नियंत्रण था, जो पहले कभी नहीं दिखा था।

“आप मुझ पर भरोसा रखिये। मुझे पता है मेरा जिस्म अब क्या झेल सकता है। और अगर मुझे दर्द हुआ, या अगर मैं ना कहूँगी, तो हम उसी वक्त रुक जाएंगे।”

रमेश ने अपनी पत्नी की आँखों में वो जंगली आग देखी, जो अब डर से नहीं, बल्कि एक चुनौती से जल रही थी। उसका डर पिघलने लगा और उसकी जगह एक खौफनाक साहस, एक जोश ने ले ली। उसने धीरे से हामी भर दी।

एक घंटे बाद, वे सब फार्महाउस के उसी वातानुकूलित कमरे में थे। ठंडी हवा का झोंका उनके गर्म शरीरों से टकराया। रमेश अपनी उसी पुरानी जगह, कोने वाली कुर्सी पर बैठा था, उसकी मुट्ठियाँ बंधी हुई थीं, लेकिन उसकी नज़रें लालच से चमक रही थीं।

बिस्तर पर मीरा लेटी थी। आज वह कोई शिकार नहीं थी। उसकी साड़ी अब एक तरफ रखी हुई थी। विक्रम और अमित दोनों उसके सामने निर्वस्त्र खड़े थे। विक्रम का मोटा लंड पहले से ही सख्त और तैयार था।

अमित का लंड लंबा और सीधा था, उसकी गोटियाँ टाइट थीं। उसकी साँसें तेज़ थीं। वह जैसे ही मीरा पर झपटा और बेतरतीब तरीके से उसके स्तनों को नोचने लगा, मीरा ने अचानक उसके हाथ को कसकर पकड़ लिया।

“इतनी भी क्या जल्दी है छोटे ठाकुर?” मीरा की आवाज़ में एक मादक सत्ता थी, एक धीमा, नियंत्रित स्वर।

अमित चौंक गया। एक गाँव की औरत उसे रोक रही थी? लेकिन मीरा की आँखों की उस आग, उसके चेहरे के आत्मविश्वास ने उसे वहीं रोक दिया। मीरा अब कोई निष्क्रिय औरत नहीं थी। उसने खुद अमित का हाथ पकड़ा और उसे अपने बदन पर फेरते हुए फुसफुसाई,

“ऐसे नहीं… आराम से। मुझे पता है आपको क्या चाहिए, बस मेरे तरीके से चलिए।”

अमित हैरान रह गया। उसकी ज़िंदगी में आज तक किसी औरत ने, खासकर एक गाँव की औरत ने, उसे इस तरह निर्देश नहीं दिया था। उसके शहरी अनुभवों में औरतें या तो डरी-सहमी रहती थीं या फिर पैसे के लिए झुक जाती थीं।

लेकिन यह… यह तो एक साफ-साफ चुनौती थी। उसकी आँखों में हैरानी के साथ-साथ एक नई ललक भी जगी। वह मीरा के चेहरे पर ताकतवर औरत वाली उस ठसक को देख सकता था।

विक्रम एक तरफ खड़ा मुस्कुरा रहा था, उसे मीरा के इस नए रूप में मज़ा आ रहा था। उसने अमित की तरफ देखकर आँख मारी, जैसे कह रहा हो—

‘देख लिया ना? मेरी पालतू अब जंगली हो रही है।’

मीरा ने अमित का हाथ पकड़ा। उसकी उँगलियाँ नर्म थीं लेकिन इरादे फौलादी। उसने अमित का हाथ अपने भरे हुए स्तनों पर रखा। अमित की हथेली ने उसके निप्पल को, जो कपड़े के नीचे से सख्त और उभरा हुआ था, महसूस किया।

मीरा ने एक लम्हे के लिए आँखें मूंद लीं, उसके होठों पर एक सूक्ष्म कँपकँपी दौड़ गई। फिर उसने अमित का हाथ धीरे-धीरे अपने पेट पर फिराया, उसकी नाभि के ऊपर से होते हुए, और फिर नीचे ले गई।

वहाँ, उसकी जाँघों के बीच, उसकी साड़ी चूत गर्माहट छोड़ रही थी। मीरा ने अमित की उँगलियों को वहाँ हल्का सा दबाया।

“देखो… आराम से,” वह फुसफुसाई, उसकी साँसें गर्म और तेज़ थीं। “जल्दीबाजी में सब मज़ा ख़त्म हो जाता है।”

अमित का गला सूख गया। उसने एक निगल लिया।

‘ये क्या बला है? ये गाँव की औरत नहीं, कोई राक्षसनी लगती है।’

उसके दिमाग में विचार उमड़-घुमड़ रहे थे, लेकिन उसका लंड तो पहले ही सख्त होकर तना हुआ था, उसकी गोटियाँ टाइट हो चुकी थीं।

फिर मीरा ने विक्रम की ओर देखा। उसकी आँखों में एक चमक थी, एक ऐसी चुनौती जो आमंत्रण से ज़्यादा कुछ था।

“और आप, छोटे ठाकुर? इतने चुप? आओ ना। देखने में ही सारा मज़ा ले लोगे क्या?”

यह निमंत्रण था, आज्ञा नहीं, लेकिन उसमें एक दबाव था। विक्रम की मुस्कान और चौड़ी हो गई। वह आगे बढ़ा, उसके पैरों के पड़ने की आवाज़ कमरे की चुप्पी में गूंजी। उसका शरीर मीरा के सामने एक विशाल छाया की तरह खड़ा हो गया।

मीरा ने बिना किसी हिचकिचाहट के पहले विक्रम के सख्त, मोटे लंड को अपने हाथ में लिया। वह गर्म और भारी था, उसकी नसें धड़क रही थीं। मीरा ने उसे अपने गाल से सहलाया, एक कोमल, लगभग ममतापूर्ण स्पर्श।

फिर उसने अमित की तरफ मुड़कर उसके लंबे, तने हुए लौड़े को भी अपने दूसरे हाथ में ले लिया। अमित का लंड विक्रम के मुकाबले पतला था लेकिन लम्बा, और उसकी त्वचा चिकनी थी।

मीरा ने एक के बाद एक, दोनों को अपने होंठों से छुआ, पहले विक्रम के लंड के सिरे को एक हल्की चुंबन जैसी स्पर्श दी, फिर अमित के लंड को अपनी जीभ से नोचा।

कोने में बैठे रमेश की साँसें थम गईं। उसकी आँखें फैल गईं। उसकी पतलून के बटन के नीचे दर्द होने लगा था, एक तेज़, असहज दबाव।

‘मेरी बीवी… दो लंड एक साथ… हाथों में…’

उसके दिमाग में बस यही शब्द गूंज रहे थे। उसकी जीभ सूख गई थी। उसने अपने पैरों को कसकर बंद कर लिया, ताकि उसकी काँपती हुई जाँघें एक-दूसरे से टकराएँ।

उसकी नज़र मीरा के हाथों पर चिपकी हुई थी, जो दो अलग-अलग लंडों को एक साथ सहला रही थीं। एक अजीब सी गर्मी उसके पेट के निचले हिस्से में फैल गई। डर, शर्म, और एक अथाह, वर्जित उत्तेजना का मिश्रण उसे अंदर से खोखला कर रहा था।

फिर मीरा अपना मुँह विक्रम के लंड पर ले गई। उसने उसे गले की गहराई तक लिया, इतना कि उसकी नाक विक्रम के जँघा के काले बालों से छू गई। विक्रम की एक गहरी, संतुष्ट गुर्राहट निकली।

“वाह!… हाँ… ऐसे ही, रंडी!।”

मीरा ने अपने सिर को आगे-पीछे हिलाना शुरू किया, एक लयबद्ध गति में। उसके गले से गड़गड़ाहट की आवाज़ें आ रही थीं, लार के गीले होने की आवाज़ कमरे में साफ सुनाई दे रही थी।

“गाक…गाक..गाक…गाक..गाक…गाक..”

थोड़ी देर बाद उसने विक्रम को छोड़ा, उसके लंड से उसका मुँह अलग होते ही एक चपचप की आवाज़ हुई।

“श्रुल्पचपप्प्प!!!”

उसने तुरंत अमित को अपनी तरफ खींचा और बिना देर किए उसका लंड चूसना शुरू कर दिया। अमित ने एक तीखी साँस भरी।

“ओह! साली… क्या मुँह है तेरा!”

मीरा ने उसकी प्रतिक्रिया पर कोई ध्यान नहीं दिया। वह एक निष्णात संचालक की तरह थी, जो दो भूखे जानवरों को, बारी-बारी से खिला रही थी। वह विक्रम की ओर देखकर मुस्कुराई, उसकी आँखों में एक चुनौतीपूर्ण चमक थी, जैसे कह रही हो कि देखो, मैं तुम दोनों को नचा सकती हूँ।

रमेश ने अपनी कुर्सी पर बैठे-बैठे अपनी जाँघों को रगड़ा। उसकी हर साँस के साथ उसकी छाती फूल रही थी और पिचक रही थी।

‘ये मेरी मीरा है… मेरी साधारण सी बीवी… और आज ये… ये दो ठाकुरों को…’

उसके मन में अपनी पत्नी के प्रति गर्व का एक विकृत भाव उठा, जो तुरंत ही शर्म और अपराधबोध में डूब गया। लेकिन उसकी नज़रें वहीं चिपकी रहीं, उसके होंठ सूखे थे, और उसके नीचे एक जलन थी जो शर्मिंदगी को पीछे धकेल रही थी।

लेकिन यह नियंत्रण ज्यादा देर नहीं टिका। विक्रम का धैर्य जल्द ही खत्म हो गया। उसकी आँखों में वह जानवरी चमक लौट आई थी, जो नियंत्रण से ज्यादा तोड़-फोड़ में यकीन रखती थी।

“बस हो गया मज़ा, रंडी!,” उसने एक गहरी, गुर्राती हुई आवाज़ में कहा।

बात खत्म भी नहीं हुई थी कि उसने अपने बाएँ हाथ से मीरा के लंबे, घने बालों को जड़ से पकड़ा और अपनी मुट्ठी में कसकर जकड़ लिया। दाहिने हाथ से उसने मीरा की छाती पर एक जोरदार धक्का दिया।

“अभी तेरी अकड़ निकलता हूँ!”

मीरा का शरीर हवा में उछला और सीधे बिस्तर पर जा गिरा। उसके शरीर के टकराने से पुराने लकड़ी के पलंग की चारपाई में से एक तेज चरचराहट की आवाज़ निकली—

कर्र्र्र्र्र!

उसकी कलाइयों पर पहने हरे काँच की चूड़ियाँ आपस में टकराकर खनखनाने लगीं। वह चौंक गई थी, उसकी साँसें एक पल के लिए रुक गईं। ‘आ गया असली रूप!,’ उसके मन में एक सेकंड का डर कौंधा।

अमित भी उसके ऊपर झपटा, जैसे कोई शिकारी जो मौके का फायदा उठाना जानता हो। उसने मीरा की दोनों कलाइयाँ पकड़कर बिस्तर पर दबोच दीं। अब वह नियंत्रण वापस उनके हाथ में आ गया था, और वे उसे बेरहमी से इस्तेमाल करने लगे।

“ऐसे पकड़, साले!”

विक्रम ने अमित को आदेश दिया। फिर उसने मीरा को ज़ोर से पलटा। उसकी पीठ ऊपर की ओर आ गई। विक्रम ने अपने दोनों हाथों से मीरा की गांड को उठा दिया, उसे हवा में स्थिर रखा। मीरा का चेहरा अब तकिये की तरफ था, लेकिन विक्रम ने उसका सिर घुमाया।

“नहीं… ऐसे नहीं। इसकी सूरत दिखनी चाहिए उस कायर को।”

उसने मीरा को फिर से पलटा, इस बार उसकी पीठ बिस्तर पर। उसने मीरा की टाँगें उठाकर उसके शरीर से मोड़ दीं, ताकि उसके घुटने उसके कंधों के पास आ जाएँ। इस पोजीशन में मीरा का पूरा निचला हिस्सा, उसकी फैली हुई चूत और गांड का तंग छेद, साफ-साफ देखा जा सकता था—खासकर कोने में बैठे रमेश के लिए, जो सीधे उसकी तरफ देख रहा था। विक्रम ने जानबूझकर यह कोण बनाया था।

“अब, छोटे ठाकुर,” विक्रम ने अमित की तरफ देखकर कहा, उसकी आँखों में एक शैतानी मज़ाक था।

“आगे वाला रास्ता तेरा। पीछे वाला मेरा। एक साथ… पूरी ताकत से।” और उसने तुरंत मीरा को ऊपर उठाकर उसके निचे चला गया , लंड को उसकी गांड पर सेट करते हुए।

अमित की साँसें तेज़ हो गईं। उसने अपना लंबा लंड हाथ से पकड़ा और मीरा की चूत के गीले होंठों पर टिकाया। विक्रम ने अपने मोटे लंड का सिरा मीरा की गांड के छेद पर दबाया। वहाँ कोई चिकनाई नहीं थी, सिवाय उसकी लार के, जो पर्याप्त नहीं थी।

“रुको… ये… अभी तैयार नहीं हूँ…” मीरा ने हाँफते हुए कहा, उसकी आवाज़ में पहली बार असली डर झलक रहा था।

“तैयारी की ज़रूरत नहीं है रंडियों को!” विक्रम चिल्लाया।

एक साथ, एक संकेत पर, दोनों ने जोर लगाया।

“चिर्र्र्र्र्र…स्स्श्रुप्प्प!!!!!”

एक विदारक, सूखी आवाज़ हुई। विक्रम का मोटा लंड मीरा की गांड के तंग, अनिच्छुक छेद में घुसा। उसी पल, अमित का लंबा लंड उसकी चूत के भीतर तेजी से धँस गया, जो पहले से गीली थी लेकिन इतनी गहराई के लिए तैयार नहीं।

“आआआआआआ….हहहह!!!”

मीरा की चीख कमरे में गूँज गई। उसका शरीर एकदम से अकड़ गया, जैसे करंट लग गया हो। उसकी आँखें डर से इतनी फैल गईं कि उनमें चारों ओर का सफेद दिखने लगा। उसके मुँह से लार की एक लंबी धार निकलकर उसके गाल और गर्दन पर बह गई।

उसके हाथ, जो अमित ने पकड़ रखे थे, ऐंठ गए। उसकी उँगलियों के पोर सफेद पड़ गए। एक साथ दो जगह, दो अलग-अलग आकृतियों के लंडों से भर जाने का दर्द और भराव इतना तीव्र था कि उसका गला घोंटा सा गया। उसने हांफना शुरू कर दिया, हवा के लिए तड़पती हुई।

“उह… उह… नहीं… ये… बहुत है… रुको…!”

रमेश ने अपनी कुर्सी के हत्थे को इतना कसकर पकड़ लिया कि लकड़ी दरकने की आवाज़ आने लगी। उसकी उँगलियाँ सफेद पड़ गई थीं। उसकी साँसें सीटी की तरह निकल रही थीं—सीईईई… फुईईई… उसकी पत्नी का चेहरा, जो अमित के कंधे के ऊपर से साफ दिख रहा था, विकृति में बदल गया था।

शुद्ध, अनछुई पीड़ा। उसके होठों का रंग उड़ गया था। रमेश के दिल में एक तेज चोट लगी।

‘मेरी मीरा… हे भगवान!… ये मैंने क्या कर दिया!!…’ एक पल के लिए वह उठ खड़ा होना चाहता था, उन्हें रोकना चाहता था।

लेकिन वे नहीं रुके।

“चुप हो जा, कुतिया!”

विक्रम ने गुर्राते हुए कहा और अपनी गांड की मांसपेशियों में जोर डालकर अपने लंड को और अंदर धकेला।

“पच्च्च्च!!!!” एक गीली, भीतरी आवाज़ आई।

“अरे चुप कर कुतिया!!..तेरे छेद तो मोटे लौड़े मांगते है!”

अमित ने भी उसके बाल खींचते हुए जवाब दिया,

“हाँ साली! देख तेरी चूत कैसे चूस रही है मेरा लंड!?”

उसने अपनी एक हथेली उठाकर मीरा की जांघ के नर्म मांस पर जोर से पटकी।

“चाट!!!”

आवाज़ तीखी और स्पष्ट थी। मीरा का शरीर फिर से ऐंठ गया।

और फिर वे हिलने लगे। एक अमानवीय, बेरहम लय में। विक्रम ने अपना एक हाथ मीरा की गांड पर रखा, उसे और फैलाते हुए, और धक्का दिया।

“फप!” के छिद्र से गीली आवाज़ आई। अमित ने आगे से धक्का दिया।

“चप!” चूत के भीतर से चिकनाई भरी आवाज़। बिस्तर की चारपाई उनके वजन और जोर से लगातार चरचरा रही थी—

“करच-करच-करच!!”

उनकी जाँघों के मीरा की जाँघों और कूल्हों से टकराने की आवाज़—

“थप!थप!!थप!!!थप!!!!” एक तेज, निरंतर ताल बन गई थी।

पहले कुछ सेकंड तक मीरा का चेहरा पीड़ा से विकृत रहा। उसकी आँखें बंद थीं, भौंहें तन गई थीं, होठ दाँतों से दबे हुए थे। लेकिन फिर, धीरे-धीरे, कुछ बदलने लगा। विक्रम का मोटा लंड उसकी गांड के अंदरूनी हिस्सों को रगड़ रहा था, एक ऐसी जगह जो अब उत्तेजना के प्रति संवेदनशील हो चुकी थी।

अमित का लंड उसकी चूत की गहराई में वह जगह ढूँढ रहा था जहाँ से आनंद की लहर फूटती है।

मीरा की साँसें, जो हाँफ रही थीं, अचानक गहरी हो गईं। उसकी आँखें खुलीं। अब उनमें डर नहीं था। उनमें एक अविश्वसनीय रोमांच था, एक जंगली चमक। उसके होंठ खुले और उनसे एक लंबी, कामुक कराह निकली—

“आहह्हह… हाँ… ओह हो…स्स्स्स!!!”

उसने अपने कूल्हों को हल्का सा उठाया, उनके धक्कों के साथ तालमेल बिठाते हुए। वह अब विरोध नहीं कर रही थी, बल्कि सहयोग कर रही थी। उसकी चीखें दर्द भरी पुकारों से बदलकर गहरी, गला फाड़ देने वाली कराहों में तब्दील हो गई थीं।

“ओह!… हाँ… ऐसे ही… और जोर से!…अआह्ह्ह…स्स्स्स..उफ्फ्फ!!!…चोदो!..अआह्हह!”

रमेश यह सब देख रहा था। उसकी पत्नी का शरीर दो मर्दों के बीच कुचला जा रहा था, लेकिन अब उसके चेहरे पर दर्द नहीं, बल्कि एक अविश्वसनीय, अश्लील आनंद था। मीरा की आँखें रोमांच से चमक उठी थीं। और तब, अमित के कंधे के ऊपर से, मीरा की नज़र सीधी रमेश से मिली।

उसने आँख मारी। उसके होठों के कोने, जो लार से चमक रहे थे, ऊपर उठे और एक मामूली, लेकिन साफ समझ में आने वाली मुस्कान बन गई। उस मुस्कान में चुनौती थी, विजय थी, और एक क्रूर मज़ाक था।

“देख रहे हो ना? तुम्हारी पत्नी… दो और मर्दों से चुदवा रही है… और मज़े ले रही है।”

यह एक साफ-साफ बेइज्जती थी, और मीरा उसे सीधे रमेश के सामने, उसकी आँखों में देखते हुए कर रही थी, जबकि विक्रम और अमित उसके शरीर को बेरहमी से रौंद रहे थे।

रमेश के भीतर का डर, दया और अपराधबोध एक झटके में एक विकृत, तीखे आनंद में बदल गया। उसकी पतलून के अंदर उसका अपना लंड सख्त होकर धड़क रहा था। उसने एक नज़र मीरा के चहरे से हटाकर निचे की जहाँ मीरा के चूत और गांड में विक्रम और अमित के लंड बेरहमी से अन्दर बाहर हो रहे थे।
फिर उसने वापिस ऊपर देखा।

“हाँ… हाँ… देखो… वो मेरी ही औरत है… और आज… वो सबकी रंडी बन गई है… मेरे कारण…” उसने अपनी नज़रें मीरा की मुस्कुराती हुई, कराहती हुई शक्ल से मिलाई हुई रखी।

“थप!!…थप!!…थप!!…थप!!…थप!!…थप!!…थप!!…थप!!”

क्रूर आवाज़ और तेज़ी से गूंजने लगी। और लगातार लगबघ १० मिनिट तक चलती रही।

थोड़ी देर बाद, विक्रम का चेहरा गंभीर हो गया। उसकी साँसें भारी थीं, पसीने की मोटी बूँदें उसकी छाती पर से नीचे तक बह रही थीं। उसने अमित की तरफ देखा, जो अभी भी मीरा के ऊपर सवार था और उसकी चूत में अपना लंड धकेल रहा था।

“बस, साले,” विक्रम ने एक खुरदरी आवाज़ में कहा, उसकी आवाज़ में थकान और एक नई लालसा का मिश्रण था।

“अब इसका गला साफ कर। इसे पूरा निगलना सिखाएँगे।”

अमित ने मीरा के चेहरे की तरफ देखा, जो अभी भी आनंद और थकान से लरज रहा था। उसने एक तीखी मुस्कान बनाई।

“जैसा हुक्म, बड़े ठाकुर।” उसने मीरा के कंधों को पकड़कर उसे धक्का दिया, उसे बिस्तर पर पीठ के बल लिटा दिया।

विक्रम तुरंत आगे बढ़ा। उसने मीरा को पलट दिया और घुटनों और हाथों पर कुतिया बनाया, उसकी चूत का रास्ता फिर से अपने लिए खोल लिया। उसने अपना मोटा लंड अंदर धकेला—

“स्श्रुल्प!!!!” एक चिकनी आवाज़ आई!

“आह! ह्म्म्मम्म….!!” मीरा चिल्लाई, उसके शरीर ने एक झटका खाया।!!

लेकिन अमित का ध्यान अब ऊपर था। उसने अपने घुटनों के बल बैठकर मीरा का सिर पकड़ा, अपनी उँगलियाँ उसके गीले, उलझे हुए बालों में घुसा दीं।

“खोल अपना मुँह, रंडी,” उसने आदेश दिया, उसकी आवाज़ में कोई दया नहीं थी।

मीरा की आँखें चौंधिया गईं। एक पल के लिए उसके चेहरे पर फिर से वही डर लौट आया जो पहले था।

“गला!.. वो मेरा गला…!!”

उसका दिमाग चिल्लाया। लेकिन फिर उसने कोने में बैठे रमेश को देखा। उसकी नज़रें मिलीं। और उस डर ने फिर से एक चुनौती में बदलने का रास्ता खोज लिया। उसने अपना मुँह खोल दिया, अपनी जीभ बाहर निकाली।

“अरे वाह!…ज़रा देखो इस रांड को!.”

अमित ने विक्रम की तरफ मुस्कुराते हुए कहा। उसने अपना लंबा लंड पकड़ा, जो अभी भी मीरा की चूत के गीलेपन से चमक रहा था, और उसका सिरा मीरा के खुले मुँह के ऊपर ले आया। उसने जोर लगाया।

“स्सश्र्रूप्प!!!!….गाक्क!!!….”

यह आवाज़ थी मीरा के गले के पिछले हिस्से में लंड के टकराने की। अमित ने एक ही झटके में अपना पूरा लंड उसके गले की गहराई में धकेल दिया। मीरा का शरीर तनाव से अकड़ गया, उसकी पसलियाँ हवा के लिए तड़प उठीं।

उसकी आँखें तुरंत पानी से भर गईं, आँसू उसके कनपटियों से बहते हुए तकिये पर गिरे। और तुरंत ही अमित ने धक्के देने शुरू कर दिए!

एक मर्दी गुदगुदी की आवाज़—

“गाक्क..गाक्क..गाक्क..गाक्क..गाक्क..गाक्क..गाक्क..गाक्क..”

उसके गले से निकली जब उसने साँस लेने की कोशिश की। उसके हाथ, जो अब आज़ाद थे, बिस्तर की चादर को जकड़ने लगे।

“ओह! साली की गाँड तो देख!”

विक्रम चिल्लाया, जो पीछे से उसकी चूत को जमकर चोद रहा था। हर धक्के से मीरा का सिर आगे की ओर झटका खाता, जिससे अमित का लंड उसके गले में और गहरा धँस जाता। “थप-थप-थप!” विक्रम के कूल्हों की तेज़ थाप के साथ “गक-गक-गक!” मीरा के गले की गुदगुदी की आवाज़ एक विचित्र धुन बना रही थी।

अमित ने मीरा के सिर को और कसकर पकड़ लिया।

“हिल मत, कुतिया! पूरा निगल!” वह गुर्राया।

उसने अपने कूल्हों को हिलाना शुरू किया, अपना लंड उसके गले के नाजुक ऊतकों में आगे-पीछे करने लगा। हर अंदर जाने पर एक गीला, दम घुटने वाला स्वर—”हल्प!” और बाहर आने पर लार के साथ एक चूसने वाली आवाज़—”चुआप!”

मीरा ने अपनी आँखें बंद कर लीं। उसका दिमाग सफेद हो रहा था। दर्द था—गले में एक जलन, साँस न आने का एक सन्नाटा। लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने अपने गले की मांसपेशियों को जानबूझकर ढीला छोड़ दिया, उस विदेशी, कठोर वस्तु को निगलने की कोशिश करते हुए जो उसकी श्वासनली को भेद रही थी। उसने निगला। उसके गले का एक संकुचन अमित के लंड को नीचे की ओर खींच गया।

“साली! ये क्या कर रही है!” अमित हाँफा, उसकी आँखें खुली की खुली रह गईं। “इसका गला!. ये निगल रही है!”

विक्रम ने एक जोरदार हँसी हँसी, उसकी गति और तेज हो गई।

“थप..थप..थप..थप..थप..थप..थप..थप..!!” आवाज़ और तेज़ हो गयी..

“हाँ! बताया था ना! ये कोई साधारण रंडी नहीं है! ये एक नरभक्षी है!”

उसने मीरा की जाँघों को और चौड़ा किया और एक ज़ोरदार धक्का दिया।

रमेश कोने में बैठा यह सब देख रहा था। उसकी पत्नी का मुँह एक लंड से भरा हुआ था, उसकी ठुड्डी तक की त्वचा उभर आई थी। उसके गाल अंदर धँसे हुए थे, आँसू और लार का एक घिनौना मिश्रण उसके चेहरे पर बह रहा था।

और फिर भी, जब उसकी नज़र रमेश से मिली, उसकी आँखों के कोने में, आँसुओं के बीच, एक चमक थी। एक अद्भुत, विकृत संतुष्टि की चमक।

“देख रहे हो? मैं सब सह सकती हूँ। तुम्हारे लिए। तुम्हारे मनोरंजन के लिए।”

रमेश के हाथ अपनी जाँघों पर चले गए। उसने अपने लंड को, जो अब पतलून के अंदर से निकलकर सीधा खड़ा हो गया था, जकड़ लिया। उसने जोर से मुठी मारी।

‘हाँ… हाँ… लो मीरा!! और जोर से लो!!..तुम एक रांड हो!!!.उसकी हर साँस के साथ एक गहरी, गन्दी खुशी उसके भीतर फैल रही थी।

विक्रम ने लगातार धक्के देना जारी रखा, उसकी चूत से अब एक गीली, चिपचिपी आवाज़ आ रही थी—

“श्लूप-श्लूप-श्लूप!”

अमित का लंड मीरा के गले में आगे-पीछे हो रहा था, हर बार एक नई “गक-गक” आवाज़ पैदा करता। मीरा की चूड़ियाँ लगातार खनखना रही थीं, और एक जोरदार धक्के में एक चूड़ी टूटकर बिस्तर पर बिखर गई—”खन!”

मीरा ने अपनी आँखें खोल दीं। आँसू अब भी बह रहे थे, लेकिन उसने अमित की आँखों में देखा और फिर अपनी पलकें झपकाईं। एक स्पष्ट संकेत।

“‘और जोर से… मैं ले सकती हूँ!..'”

विक्रम का शरीर एकदम से तन गया। उसकी पीठ की मांसपेशियाँ खिंच गईं, उसकी गर्दन की नसें फूलकर बाहर निकल आईं। एक गहरी, जानवरी गुर्राहट उसके गले से निकली—

“ऊँऊऊऊहह…!”

अमित भी उसी कगार पर था। विक्रम ने अचानक अपना लंड मीरा की चूत से बाहर खींचा। एक चिपचिपी, गीली आवाज़ हुई—

“श्लूउउप!”

उसने मीरा के कंधों को जकड़ा और उसे बिस्तर से खींचकर घुटनों के बल बिठा दिया। मीरा का शरीर लड़खड़ा गया, वह थकावट से बिल्कुल टूट चुकी थी। उसकी टाँगें काँप रही थीं, उसकी बाँहें उसके शरीर का भार नहीं संभाल पा रही थीं।

“खुला मुँह रख, रांड!”

विक्रम गरजा, उसकी आवाज़ में एक अंतिम, निर्णायक आदेश का स्वर था।

“अपनी जीभ बाहर निकाल!”

मीरा ने धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलीं। उसकी साँसें फूल रही थीं, उसके सीने का उतार-चढ़ाव तेज था। उसने कोने में बैठे रमेश की तरफ देखा। रमेश की आँखें लाल थीं, उसका मुँह खुला हुआ था, और उसकी हथेली उसकी लंड पर तेजी से चल रही थी। यह देखकर मीरा के होठों पर एक क्षीण, टूटी हुई मुस्कान आई।

“‘अब देखना तुम्हारी ये पत्नी क्या करने वाली है…'”

थकी हुई, काँपती हुई, लेकिन पूरी तरह आज्ञाकारी, मीरा ने अपना मुँह खोल दिया। उसकी जीभ बाहर लटक आई, गुलाबी और लार से तर। उसने अपनी आँखें फिर से बंद कर लीं, अपने आपको तैयार किया।

विक्रम ने अपना मोटा लंड हाथ में लिया, जो अब बैंगनी रंग का होकर स्पंदित हो रहा था।

“ले! ये ले अपना इनाम!” वह चिल्लाया।

“फ्फ्फ्फ्फ्फ्फ्फ…”

एक गाढ़ा, सफेद फव्वारा मीरा के चेहरे पर पड़ा। पहली धार उसकी बंद पलकों पर लगी, गर्म और चिपचिपी। दूसरी धार उसकी नाक और होंठों पर। तीसरी, सबसे मोटी धार सीधे उसकी बाहर निकली जीभ पर आकर गिरी। वीर्य का गाढ़ापन, उसकी तीखी गंध, और उसका गर्म तापमान—मीरा के शरीर ने एक बार फिर झटका खाया। उसकी नाक के छेद फड़फड़ाए।

“अब तेरी बारी, अमित!” विक्रम हाँफता हुआ बोला।

अमित तुरंत आगे बढ़ा। उसने मीरा के सिर को अपने हाथों में लिया, उसके गाल दबोचे।

“मुँह खोल! और चौड़ा!”

उसने आदेश दिया। मीरा ने अपना जबड़ा और खोला। अमित ने अपना लंड उसके खुले मुँह के ठीक ऊपर ले जाकर, अपने अंडकोष की थैली को कसते हुए, अपना वीर्य उड़ेलना शुरू किया।

“प्फ्फ्फ्फ्फ… श्लूप…”

यह आवाज़ पतली और गर्म थी। गर्म तरल उसकी जीभ पर, गालों के अंदर, गले के पिछले हिस्से में गिरा। उसका मुँह तुरंत भरने लगा। स्वाद कड़वा और नमकीन था। उसकी आँखों के कोनों से फिर से आँसू निकल आए, लेकिन इस बार दर्द से नहीं, बल्कि उस विचित्र, अपमानजनक अनुभव से।

उसका मुँह लबालब भर गया। वीर्य उसके होंठों से बहकर ठुड्डी पर आ गया, जहाँ विक्रम का वीर्य पहले से सूख रहा था, दोनों मिलकर एक घिनौना, सफेद मुखौटा बना रहे थे।

“निगल!”

विक्रम ने गर्जना की, और उसने मीरा के बालों को जकड़कर उसका सिर पीछे की ओर खींचा।

“सारा कुछ! एक बूँद भी बाहर नहीं गिरनी चाहिए, छिनाल!”

मीरा ने आँखें मूंद लीं। उसके गले में एक पल की ठहराहट थी। उसका मन विद्रोह कर रहा था।

“नहीं… ये बहुत ज्यादा है… मैं नहीं निगल सकती…”

लेकिन फिर उसने रमेश के बारे में सोचा। उसकी वही दयनीय, लाचार मुद्रा। और उसने विक्रम और अमित के बारे में सोचा, जो अब भी उस पर हावी थे। यह उसकी अंतिम जीत का क्षण था। स्वीकृति का नहीं, आत्मसमर्पण का नहीं, बल्कि सहनशक्ति की विजय का।

उसने अपना गला हल्का सा हिलाया। एक दर्दनाक, जबरदस्ती की निगलन।

“गुल्प!”

आवाज़ साफ और गूंजती हुई थी। उसने एक बार नहीं, दो बार निगला, और अपनी जीभ मुह के अन्दर और होंठों पर घुमाई ताकि उसके मुँह का हर कोना साफ हो जाए। फिर उसने अपनी आँखें खोलीं।

उसके चेहरे पर वीर्य की सफेद धारियाँ थीं, जो अब टूट-फूट गई थीं। उसकी साँसें भारी और घरघराहट भरी थीं। उसके नीचे के दोनों छेद—चूत और गांड—लाल, सूजे हुए और दर्द से चुभन भरे थे, उनके आसपास की त्वचा पर नील और खरोंच के निशान थे। लेकिन उसके होंठों पर, वीर्य की सफेदी में दबी हुई, एक मामूली, निश्चित मुस्कान थी। यह विजय की मुस्कान थी। एक चुनौतीपूर्ण विजय।

धीरे-धीरे, उसने अपना सिर घुमाकर कोने में बैठे रमेश की तरफ किया। उसकी नज़र सीधे रमेश की आँखों से टकराई। उस नज़र में कोई शर्म नहीं, कोई माफी नहीं। सिर्फ एक स्पष्ट, बिना शब्दों का था—

“देखो। मैंने सब कुछ सह लिया। जो कुछ तुमने मेरे साथ होने दिया, जो कुछ इन्होंने मेरे साथ किया… मैंने सब निगल लिया। और मैं अभी भी यहीं हूँ। मैं जीत गई।”

रमेश उस नज़र को पढ़ लिया। पल भर के लिए उसके भीतर का सारा डर, सारी लज्जा, सारा अपराधबोध एक तेज, विद्युत-सी चिंगारी में बदल गया और फिर एक अजीब, विकृत गर्व में विस्फोटित हो गया।

उसकी साँस रुक गयी। उसकी पत्नी एक रंडी थी। एक छिनाल थी। उसके चेहरे पर दूसरे मर्दों का वीर्य लगा था, उसके शरीर में उनकी गंध समाई हुई थी।

लेकिन वह “उसकी” रंडी थी। यह सब उसकी मौजूदगी में हुआ था। उसकी अनुमति से हुआ था। और आखिरी नज़र में, उस विजयी मुस्कान में, उसने देखा कि उसकी पत्नी ने सिर्फ दो मर्दों का शरीर ही नहीं, बल्कि उनका अहंकार, उनकी हेकड़ी भी निगल ली थी।

उसने दो ठाकुरों को भी अपने आगे झुका दिया था। और यह सब… उसके, रमेश के, सामने।

रमेश अपनी कुर्सी से उठा। उसके घुटनों में अजीब सी कमजोरी थी, जैसे वह लंबी दूरी तय करके आया हो। उसने एक गहरी साँस ली, जिसमें कमरे की भारी हवा, पसीने, सेक्स और वीर्य की गंध भरी हुई थी।

विक्रम और अमित अब बिस्तर के किनारे बैठे सिगरेट पी रहे थे, उनके चेहरे पर एक थका हुआ, संतुष्ट भाव था। उन्होंने रमेश की तरफ देखा भी नहीं, जैसे वह कोई फर्नीचर का टुकड़ा हो।

मीरा धीरे-धीरे उठी। उसने फर्श पर पड़ी अपनी साड़ी उठाई और लड़खड़ाते कदमों से उसे लपेटने लगी। उसकी चूड़ियाँ अब टूटी हुई थीं, बस कुछ टुकड़े उसकी कलाई पर शोभा दे रहे थे। अमित ने उसकी तरफ देखा और एक मोटी हँसी हँसी।

“क्या रंडी है साली… अगली बार फिर बुलाना, रमेश।”

रमेश ने सिर्फ सिर हिलाया। वह कुछ बोल नहीं पा रहा था। मीरा ने अपना सिर झुकाए रखा, लेकिन जैसे ही वह दरवाजे की तरफ बढ़ी, उसने एक पल के लिए रुककर विक्रम और अमित की तरफ देखा।

उसकी आँखों में वही विजयी चमक थी, लेकिन अब उसमें एक धन्यवाद भी जुड़ गया था, एक अजीब सी कृतज्ञता। उसने कोई शब्द नहीं कहे, सिर्फ एक हल्की सी मुस्कान बिखेरी और बाहर निकल गई।

दोनों चुपचाप फार्महाउस से बाहर निकले। बाहर ठंडी रात की हवा ने उनके गर्म, पसीने से तर शरीरों को झिंझोड़ दिया। मीरा एक बार काँप गई। गाड़ी का ड्राइवर उनका इंतज़ार कर रहा था, उसकी आँखों में एक उत्सुक चमक थी, लेकिन उसने कुछ नहीं पूछा।

सफर पूरा खामोशी में गुज़रा। सिर्फ गाड़ी के इंजन की आवाज़ और रात के कीड़ों का सुरीला संगीत था।

अपने घर पहुँचकर, जब उन्होंने दरवाजा बंद किया, तो कमरे का अंधेरा और खामोशी उनके बीच फिर से लौट आई थी। लेकिन आज यह खामोशी अलग थी। यह शर्म की, डर की, या असहजता की खामोशी नहीं थी। यह एक नई, साँठ-गाँठ वाली खामोशी थी। एक ऐसी मौन सहमति जो शब्दों से ज़्यादा मुखर थी। एक नई जीत की खामोशी।

मीरा सीधे बाथरूम गई। रमेश लिविंग रूम में ही खड़ा रहा, उसके कानों में अभी भी वे आवाजें गूंज रही थीं—बिस्तर की चरचराहट, चूत और गांड के भीतर लंडों के घुसने की गीली आवाज़, और मीरा के गले से निकली वह अंतिम निगलने की आवाज़—”गुल्प!” उसने अपनी आँखें बंद कर लीं। उसकी जाँघों के बीच एक हल्की झनझनाहट बची हुई थी।

थोड़ी देर बाद बाथरूम का दरवाजा खुला। मीरा बाहर आई। उसने एक साधारण सी सूती नाइटी पहन रखी थी, जो उसके सूजे हुए, निशानों से भरे शरीर को ढकने की कोशिश कर रही थी।

उसके गीले बाल उसके कंधों पर चिपके हुए थे। वह आईने के सामने खड़ी हो गई और अपनी उँगलियों से अपने बिखरे बालों को सुलझाने लगी। उसकी हरकत में एक सामान्यता थी, जैसे वह रोज़ रात को यही करती हो। लेकिन उसकी आँखें, जो आईने में अपने प्रतिबिंब को देख रही थीं, में एक अलग ही कहानी लिखी हुई थी।

तभी रमेश ने पीछे से आकर उसे अपनी बाँहों में भर लिया। उसकी बाँहें पहले ढीली थीं, फिर अचानक कसती चली गईं, जैसे वह उसे फिर से खोने के डर से बचाना चाहता हो। उसने अपना चेहरा मीरा की गर्दन में छुपा लिया, अपनी नाक उसकी त्वचा पर दबा दी।

वहाँ अभी भी उन दोनों मर्दों के पसीने और तेज़ इत्र की महक आ रही थी, जो नहाने से भी नहीं उतरी थी। यह गंध रमेश के नथुनों में समा गई और उसके भीतर एक नई आग लगा दी।

मीरा ने अपने बाल सुलझाते हुए हाथों को रोका। वह ज़रा भी नहीं हिली। धीरे से, एक देवी की तरह शांत, वह पीछे मुड़ी। उसने रमेश की आँखों में देखा। उन आँखों में अब कोई झिझक नहीं थी, कोई शर्म नहीं थी, कोई पछतावा नहीं था।

उन आँखों की गहराई में अब एक गहरी, अन्धेरी हवस तैर रही थी। एक ऐसी भूख जो अब छुपाने की चीज़ नहीं, बल्कि प्रदर्शन की चीज़ बन गई थी।

मीरा ने अपने सूजे हुए, थोड़े से फटे होंठों को रमेश के काँपते होंठों पर रख दिया। यह कोमल चुंबन नहीं था। यह एक दावेदारी थी। एक लंबा, गहरा चुंबन, जिसमें उस रात की सारी गंध, सारा स्वाद, सारा दर्द और सारा आनंद समाहित था। रमेश ने आँखें बंद कर लीं और समर्पण कर दिया।

जब वह अलग हुई, तो उसने रमेश की आँखों में गहराई से देखा। उसकी अपनी आँखें अब शीशे की तरह साफ और निर्मम थीं। उसने एक बहुत ही धीमे, पर सीधे रमेश के कानों में उतर जाने वाले, उत्तेजक स्वर में पूछा,

“सच बताना जी… क्या आपको आज मुझे उन दोनों के साथ… देखना… मज़ा लेते हुए देखना पसंद आया?”

रमेश का शरीर एक बार फिर तेजी से काँप गया, जैसे कोई बिजली का झटका लगा हो। उसके अंदर की आखिरी शर्म, समाज की आखिरी दीवार, ‘अच्छे पति’ की आखिरी छवि… सब कुछ टूट कर बिखर चुका था।

उसने अपनी पत्नी की कमर को और कसकर भींचा, उसे अपने में समा लेने की कोशिश में। फिर उसने अपना मुँह मीरा के कान के पास ले जाकर, एक फुसफुसाहट में जवाब दिया, जिसमें हार और विजय दोनों का स्वर मिला हुआ था,

“हाँ… मुझे बहुत पसंद आया मीरा। तू… तू कमाल लग रही थी। सच में… एकदम गंदी रांड की तरह..!”

उस एक ‘हाँ’ ने, उस एक स्वीकारोक्ति ने, उनके बीच की हर दीवार को हमेशा के लिए गिरा दिया था।

To be continued . . .

नयी कहानियों की अपडेट सबसे पहले पाने के लिए हमारे Telegram चैनल से जुड़ें!

Join Telegram 🚀
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Scroll to Top