गरीबी का सौदा cuckold बन के किया – 5
कमरे के अंदर चल रहे उस खौफनाक तमाशे के बीच, जहाँ उसकी मीरा अभी भी फर्श पर पड़ी साँस ले रही थी, रमेश धीरे से, बिना आवाज़ किए, पीछे के दरवाज़े की ओर सरक गया, जो रसोई में खुलता था।
उसका शरीर उत्तेजना और थकान से काँप रहा था, पर अब एक नया, तीखा क्रोध उसमें घुल रहा था—एक ऐसा क्रोध जो उसकी सारी हताशा, सारी बेबसी को एक बिंदु पर केन्द्रित कर रहा था, जैसे सूरज की किरणें शीशे के टुकड़े से गुज़रकर एक जगह जमा हो जाती हैं और आग पैदा कर देती हैं।
बाहर की ठंडी हवा ने उसके गर्म, पसीने से तर चेहरे को झटका दिया, जैसे कोई थप्पड़ मार रहा हो। वह दीवार के सहारे छिपकर कोने से झाँका, अपनी साँस को रोके हुए। और वहाँ थे वे—गाँव के वे ही “सम्मानित” लोग। गजेंद्र काका, जिनकी सफ़ेद दाढ़ी आमतौर पर सभी धार्मिक कार्यक्रमों में आगे रहती थी और जिनकी आवाज़ में हमेशा नैतिकता का पाठ गूँजता था।
सरपंच, जो अपनी धोती-कुर्ते में पंचायत में बैठकर गाँव की ‘इज़्ज़त’ की दुहाई देते नहीं थकते थे। सरपंच का बड़ा बेटा, सावित्री का पति, और पंचायत के अन्य सदस्य—कुल मिलाकर लगभग पंद्रह लोग। वे खिड़की के शीशे से चिपके हुए थे, उनकी आँखें फैली हुईं, मुँह खुले हुए, एक-दूसरे से घिसटते हुए ताकि बेहतर नज़ारा देख सकें।
उनके हाथ अपनी-अपनी पतलूनों के अंदर तेजी से चल रहे थे, एक अश्लील, जानवरी लय में—ऊपर-नीचे, ऊपर-नीचे। उनकी साँसें भारी थीं, और उनके चेहरे पर वही विकृत भूख थी जो अंदर बैठे उन रईसों के चेहरों पर थी।
लेकिन आज उनकी साँसों की फुसफुसाहट में सिर्फ हवस नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी, उथल-पुथल चल रही थी।
“देख रहे हो सरपंच…” गजेंद्र काका की साँसें भारी थीं, उनका हाथ पतलून के अंदर तेजी से चल रहा था, पर आँखों में एक अजीब सी हैरत थी।
“ये जो विक्रम ठाकुर है… कल बाज़ार में मुझे कर्ज़ के लिए माँ-बहन की गालियाँ दे रहा था। और आज? आज देखो इसे। कैसे मीरा के पैरों में किसी पालतू कुत्ते की तरह लोट रहा है। ये औरत… ये कोई मामूली औरत नहीं है।”
सरपंच ने अपनी धोती सँभालते हुए, हाँफती हुई आवाज़ में जवाब दिया,
“सच कह रहे हो काका। हमने इसे रांड कहा, छिनाल कहा। पर ज़रा अंदर देखो। ये उन दस रईसों के नीचे दब नहीं रही है, ये उन्हें दबा रही है! एक औरत के जिस्म में इतनी ताक़त होती है, ये आज पता चला। ये दर्द से चीख नहीं रही, ये उनके घमंड को चीर कर उनसे पैसे उगलवा रही है।”
सावित्री का पति, जो कुछ देर पहले तक मीरा को सरेआम गालियाँ देता था, आज मंत्रमुग्ध सा फुसफुसाया,
“हम जिंदगी भर खेतों में मिट्टी फाँकते मरे। एक-एक पैसे के लिए इन लालाओं और ठाकुरों के आगे गिड़गिड़ाए। इन रईसों ने हमें हमेशा कीड़ा समझा। पर आज… आज मीरा ने इन कीड़ों को उनकी असली औकात दिखा दी है। पैसे की ताक़त देखो… ये पैसा सब खरीद सकता है, लेकिन आज मीरा ने अपने हुस्न से उस पैसे को ही गुलाम बना लिया है।”
अपनी इन अश्लील हरकतों के बीच, गाँव के उन मर्दों के दिमाग में एक भयंकर सत्य जन्म ले रहा था। उनका वो खोखला, सदियों पुराना पुरुषवादी अहंकार टूट रहा था, और उसकी जगह ले रहा था एक अजीब सा गर्व।
तभी, पास ही रसोई के पिछले दरवाज़े से रमेश बाहर निकला। उसका शरीर अंदर की उत्तेजना से काँप रहा था, लेकिन जब उसने इन गाँव वालों को खिड़की पर इस तरह देखा और उनकी फुसफुसाहटें सुनीं, तो उसके अंदर एक ज़हरीला, विजयी क्रोध उबल पड़ा। वह अंधेरे में दीवार के सहारे चलता हुआ उनके बिल्कुल पीछे आकर खड़ा हो गया।
गजेंद्र काका ने जैसे ही पीछे मुड़कर देखा, रमेश वहाँ एक प्रेत की तरह खड़ा था। रमेश की आँखों में जलता हुआ आक्रोश और एक भयानक सत्ता थी। गजेंद्र काका का हाथ एकदम रुक गया। उनकी साँस अटक गई। एक के बाद एक, लहर की तरह सारे लोगों ने सिर घुमाया। रमेश को वहाँ खड़े देखकर उनकी सारी हवा निकल गई। शर्म से उनकी नज़रें तुरंत जमीन पर गिर गईं। उनके हाथ बेबस होकर लटक गए और वे जल्दबाज़ी में अपनी पतलूनों के बटन बंद करने लगे।
रमेश आगे बढ़ा।
“शर्म आ रही है काका? या मज़ा आ रहा है?”
रमेश ने हर शब्द को ज़हर में डुबोकर, फुसफुसाते हुए कहा। उसकी आवाज़ किसी चाबुक की तरह उन पर पड़ रही थी।
“तुम सबने मिलकर मेरा खेत जलाया ना? मुझे बर्बाद करने चले थे? सोचा था कि दीवार पर ‘भड़वा’ लिख दोगे तो मैं टूट जाऊँगा?”
रमेश ने खिड़की की तरफ इशारा किया।
“अब आँखें फाड़ कर अंदर देखो! जिन ठाकुरों और रईसों के सामने तुम दिन में गिड़गिड़ाते हो, ज़मीन पर नाक रगड़ते हो… देखो वो आज किसके जिस्म के गुलाम हैं! मेरी मीरा उन्हें अपनी उँगलियों पर नचा रही है। तुम कौड़ियों के लिए उनकी गालियाँ खाते हो, और मेरी बीवी एक रात में उनसे हजारों रुपये निचोड़ रही है!”
सरपंच और गजेंद्र काका ने नज़रें और नीचे कर लीं। लेकिन रमेश अभी रुका नहीं था। उसने गजेन्द्र काका के कंधे पर उँगली चुभोते हुए, एक खौफनाक और घमंडी लहज़े में उन्हें चैलेंज किया।
“और आप सोच रहे हो कि आपने सब देख लिया? ये तो बस शुरुआत है, गजेन्द्र काका!”
रमेश की आँखों में एक पागलपन वाली चमक थी।
“पूरी रात बाकी है! मेरी मीरा की असली ताक़त तो तुमने अभी देखी ही नहीं है! वो इन दसों को निचोड़ कर रख देगी, इनकी रगों का पानी सूखा देगी! तुम लोग सारी रात यहीं, इसी खिड़की के बाहर खड़े रहो। और देखो कि एक औरत कैसे उस पैसे को चूसती है जिसके लिए तुम लोग ज़िंदगी भर रोते हो। आज मेरी औरत तुम्हें बताएगी कि असली ताक़त क्या होती है!”
रमेश उन्हें उसी हालत में, शर्म और हैरत के दलदल में छोड़कर वापस अंदर चला गया।
दरवाज़ा बंद होने के बाद, बाहर एक भारी, कुचल देने वाली चुप्पी छा गई। पंद्रहों सिर नीचे झुके थे। लेकिन जब उन्होंने झिझकते हुए दोबारा खिड़की से अंदर झाँका, तो उनका नज़रिया पूरी तरह से बदल चुका था। अंदर मीरा कोई बेचारी, मजबूर औरत नहीं लग रही थी। वह उन ताकतवर मर्दों को हुक्म दे रही थी।
“रमेश सही कह रहा है,”
गजेंद्र काका की आवाज़ भर्रा गई, लेकिन उसमें अब एक अजीब सा गर्व था।
“हम कितने अंधे थे। हमने अपनी इज़्ज़त को अपनी ही बेड़ियों में बाँध रखा था। कल ही लाला ने मेरी ज़मीन गिरवी रख ली और मैं कुछ नहीं कर पाया। और ये औरत… ये उसी लाला जैसे रईसों की तिजोरियां खाली कर रही है। हम इसे पाप समझ रहे थे… पर ये तो एक क्रांति है।”
सरपंच ने अपनी आँखें मूँद लीं।
“काका, हमने अपनी औरतों के साथ क्या किया? हमने हमेशा उनकी इच्छाओं को कुचला, उन्हें जलील किया, पर्दे में रखा… यह सोचकर कि इज़्ज़त इसी में है। लेकिन बदले में हमें क्या मिला? सिर्फ गरीबी, फाके और इन ठाकुरों की जूतियाँ! हमने कभी अपनी औरतों की ज़रूरतों और उनकी असली ताक़त को नहीं समझा। लेकिन रमेश ने… रमेश ने अपनी पत्नी की उस आग को समझा, और आज देखो… वो दोनों मिलकर इन रईसों से अपना हक़ छीन रहे हैं।”
सावित्री का पति, जो कुछ देर पहले हवस से काँप रहा था, अब एक गहरी श्रद्धा और गर्व से भर गया।
“देखो उसे…” उसने खिड़की की तरफ इशारा करते हुए कहा।
“वो हमारी गाँव की बेटी है। और उसने शहर के इन मगरमच्छों को घुटनों पर ला दिया है। ये अमीर लोग, जो हमें कीड़े-मकोड़े समझते हैं, आज मीरा के आगे कुत्तों की तरह रेंग रहे हैं। वो इनका सारा पैसा चूस रही है। रमेश और मीरा ने वो कर दिखाया है जो हम सौ जन्मों में नहीं कर सकते।”
सरपंच के बेटे की आँखों में एक नई चमक थी।
“पिताजी, हम गलत थे। मीरा कोई रांड नहीं, वो एक नेता है। वो जानती है कि इस ज़ालिम दुनिया से कैसे लड़ना है, कैसे अपना हक और पैसा छीनना है। वो एक घर चलाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है, और आज उसने हमें दिखा दिया है कि पैसे की ताक़त ही इस दुनिया का इकलौता सच है।”
गाँव के उन पंद्रह मर्दों के बीच उस ठंडी रात में एक अजीब सी, खामोश और सामाजिक क्रांति जन्म ले रही थी।
“हम कल सुबह जाएँगे,” गजेंद्र काका ने एक दृढ़ निश्चय के साथ कहा।
उनकी आवाज़ में अब कोई शर्म नहीं, बल्कि एक नया संकल्प था।
“हम पूरे गाँव के सामने रमेश और मीरा से माफ़ी माँगेंगे। सिर्फ खेत जलाने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें गलत समझने के लिए।”
“हाँ,” सरपंच ने हामी भरी।
“और हम मीरा से कहेंगे कि वो हमारा भी मार्गदर्शन करे। हम अपनी औरतों, अपनी बेटियों को इस पुरानी, सड़ी हुई सोच की बेड़ियों से आज़ाद करेंगे। हम उन्हें बताएंगे कि अपनी इच्छाओं को मारना नहीं है, बल्कि उन्हें अपनी ताक़त बनाना है। अगर इन रईसों का गुरूर तोड़कर, इनका पैसा इस तरह हमारे गाँव में आ सकता है, तो हम भी यही रास्ता चुनेंगे। अब हमारे गाँव की औरतें इन ठाकुरों के पैरों तले नहीं दबेंगी, बल्कि उन पर राज करेंगी।”
“पर अभी?” पंचायत के एक अन्य सदस्य ने घबराते हुए पूछा।
“अभी ये लोग अंदर हैं। दस लोग। और वो सब अमीर और बदमाश हैं। अगर बात हाथ से निकल गई? अगर उन्होंने हद पार कर दी और मीरा की जान को खतरा हुआ तो?”
गजेंद्र काका ने अपना सिर उठाया। उनकी आँखों में अब वो शर्म नहीं थी, बल्कि एक ठोस, रक्षक वाली ढिठाई थी, जो उनकी उम्र को पार कर गई थी।
“हम यहीं रहेंगे,” गजेंद्र काका ने अपनी लाठी ज़मीन पर टिकाते हुए कहा,
“देखते रहेंगे। खिड़की से। हम सब। लेकिन अब तमाशबीन या लुच्चे बनकर नहीं, बल्कि इस घर के पहरेदार बनकर। अगर… अगर सचमुच ज़्यादती हुई, अगर रमेश और मीरा की जान को रत्ती भर भर खतरा हुआ… तो हम पंद्रह लोग दरवाज़ा तोड़कर अंदर घुसेंगे। हम इन अमीर कुत्तों की लाशें बिछा देंगे! हमारी वजह से ये सब शुरू हुआ है, तो इसकी हिफ़ाज़त भी हम ही करेंगे। ये हमारा फर्ज़ बनता है!”
पंद्रहों ने एक-दूसरे की ओर देखा। कोई और शब्द नहीं, बस एक मौन, सामूहिक समझौता। उनकी आँखों में अब वह शर्म या हवस नहीं थी जो कुछ देर पहले तक धधक रही थी। उसकी जगह एक ठोस, संकल्पित चमक ने ले ली थी—एक ऐसी चमक जो केवल तब आती है जब कोई भटका हुआ आदमी अपना सही रास्ता ढूंढ लेता है।
वे फिर से खिड़की के पास गए, पर अब उनकी मुद्रा बिल्कुल अलग थी। उनके कंधे सीधे थे, सिर ऊँचे थे। उनकी नज़रें अब भी अंदर टिकी थीं, उनमें अब भी वो हवस थी, और एक सजग, खौफनाक चौकसी थी—उस औरत की रक्षा करने की तैयारी, जिसे उन्होंने अब अपनी नई देवी और नेता मान लिया था। वे अब दर्शक नहीं, उस घर के, उस मंदिर के खामोश रक्षक बन चुके थे। और अंदर, रमेश की चुनौती के मुताबिक, मीरा की असली ताक़त का तमाशा अभी बस शुरू ही हुआ था।
कमरे की भारी और धुएँ से भरी हवा में एक अजीब सी खामोशी छा गई थी। दसों मर्दों की भारी साँसें और पसीने की गंध के बीच, मीरा का शरीर फर्श पर पड़ा था—एक जीवित मूर्ति की तरह, जिस पर अभी-अभी एक क्रूर पूजा संपन्न हुई थी। उसके साँवले, गदराये हुए बदन पर खरोंचें, दांतों के निशान और वीर्य के सफेद दाग बेतरतीब बिखरे हुए थे। उसकी गांड पर राजू के थपेड़ों के निशान साफ़ दिख रहे थे।
अमित ने अपने महँगे कपड़ों को ठीक करते हुए, अपनी आँखों में एक भूखे भेड़िये जैसी चमक लिए मीरा की तरफ देखा। वह और बाकी आठ मर्द अगले दौर के लिए खुद को तैयार कर रहे थे। कुछ अपने लंड को हाथ में लेकर धीरे-धीरे सहला रहे थे, उनकी निगाहें मीरा के टूटे-फूटे लेकिन अदम्य शरीर पर गड़ी हुई थीं।
एक दूसरे की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए, वे अपनी गोटियाँ दबोच रहे थे, उत्तेजना को फिर से जगाने की कोशिश में। कमरे में एक सामूहिक, शारीरिक तैयारी का अजीब सा माहौल था—जैसे कोई खिलाड़ी मैच के अगले हाफ़ से पहले खुद को गरमा रहा हो।
विक्रम अपनी कुर्सी पर बैठा, अपनी जांघ हिला-हिलाकर अपने लौड़े को उभार रहा था। अमित खड़ा होकर अपनी पतलून का बटन खोल चुका था, और अपने लंड की नसों पर अँगुलियाँ फेर रहा था। हर एक की साँस तेज़ थी, हर एक की नज़र मीरा के उस निढाल शरीर पर टिकी थी, जैसे वो कोई नया शिकार हो जिसे फिर से जीवित करके तोड़ना है।
“उठो मीरा,” अमित की आवाज़ में एक सर्द, हुक्म चलाने वाला अंदाज़ था।
“जाकर खुद को साफ कर लो। अभी रात बहुत बाकी है और बाकी लोग इंतज़ार कर रहे हैं।”
रमेश, जो अब तक खामोशी से सब देख रहा था, अपनी जगह से उठा। वह धीरे से मीरा के पास आया और उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया। मीरा का शरीर थक चुका था, लेकिन उसकी आँखों की आग अभी बुझी नहीं थी। रमेश ने बेहद नरमी से उसे सहारा दिया और बाथरूम की तरफ ले गया।
बाथरूम का दरवाज़ा बंद होते ही बाहर का शोर और वो भारीपन एकदम से कट गया। पानी की फुहार के नीचे मीरा खुद को साफ कर रही थी, और रमेश उसके पास खड़ा, तौलिया लिए इंतज़ार कर रहा था। उसके सीने में एक अजीब सा तूफान चल रहा था।
“मीरा…” रमेश ने अपनी आवाज़ को धीमा रखते हुए कहा,
“बाहर… खिड़की के पास गाँव वाले खड़े हैं। गजेन्द्र काका, सरपंच, सब के सब छुपकर झाँक रहे हैं।”
मीरा ने पानी बंद किया। उसने अपने गीले बालों को पीछे झटके से किया और रमेश की तरफ देखा। पानी की धाराएँ उसके चेहरे से गिर रही थीं, उसकी आँखों में एक साफ़, बिना डर की चमक थी।
“मैंने उन्हें रंगे हाथों पकड़ा है,”
रमेश की आँखों में एक अजीब सा गुरूर और गुस्सा था।
“मैंने उनसे कह दिया है कि आँखें फाड़ कर देखो। उन्हें बता दिया है कि हम दोनों को कोई तोड़ नहीं सकता, और मेरी पत्नी अपना घर बचाने के लिए, इन रईसों से अपना हक छीनने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है।”
मीरा के होंठों पर एक हल्की, लेकिन गहरी मुस्कान तैर गई।
“मुझे पता था जी,” उसने बड़ी शांति से कहा।
रमेश चौंका। “तुझे पता था? शुरुआत से?”
“हाँ,” मीरा ने तौलिया लेते हुए कहा।
“मुझे शुरुआत से ही वो आँखें उन दरारों से घूरती हुई महसूस हो रही थीं। और सच कहूँ… तो मैं यही चाहती थी। मैं जानबूझकर चुप रही। मैं उन्हें दिखाना चाहती थी कि मेरी ताक़त क्या है। मैं चाहती थी कि वो जलें, घुटें और मेरी इस ताक़त को देखें।”
यह सुनकर रमेश सन्न रह गया। उसकी आँखों में आँसू छलक आए। वह सोच रहा था कि उसकी पत्नी ने इतनी बड़ी बात, इतना बड़ा मानसिक दबाव सिर्फ अपने तक रखा, ताकि रमेश कमज़ोर न पड़े। उसने गाँव वालों का वो अपमान, वो घूरती हुई आँखें खुद अकेले सहीं और रमेश पर आँच नहीं आने दी।
“तू कितनी पागल है मीरा,” रमेश की आवाज़ रुंध गई। उसने आगे बढ़कर मीरा को कसकर अपने सीने से लगा लिया।
मीरा ने भी अपनी आँखें बंद कर लीं और एक छोटी बच्ची की तरह रमेश की बाहों में सिमट गई। उस खौफनाक रात, उन दरिंदों और उस ज़हरीले गाँव के बीच, यह छोटा सा बाथरूम उनके लिए एक महफूज़ पनाहगाह बन गया था।
“मैं पागल नहीं हूँ जी,” मीरा ने रमेश के सीने पर सिर रखे हुए ही कहा।
“मैं बहुत खुशनसीब हूँ कि मुझे आप जैसा पति मिला। आप अकेले थे जिसने मुझ पर भरोसा किया, जिसने मुझे रंडी या छिनाल नहीं कहा। समाज की इन पुरानी, सड़ी हुई बेड़ियों को तोड़ने की हिम्मत मुझे सिर्फ आपसे मिली है।”
रमेश ने प्यार से मीरा का चेहरा ऊपर उठाया और उसके धुले हुए, निखरे माथे पर एक गहरा चूम लिया। मीरा की एक हल्की सी, मीठी हँसी गूँज उठी। उनका प्यार और उनका रिश्ता अब दुनिया की हर समझ और हर हद से बहुत आगे निकल चुका था।
“तो फिर…” रमेश ने मीरा की आँखों में देखते हुए, एक शैतानी मुस्कान के साथ पूछा,
“क्या मेरी रानी तैयार है बाहर बैठे उन मगरमच्छों का गुरूर एक बार फिर से तोड़ने के लिए?”
मीरा ने पूरे आत्मविश्वास के साथ सिर हिलाया।
“हाँ। और अब मैं उन गाँव वालों को वो तमाशा दिखाऊँगी, जिसे वो ज़िंदगी भर भूल नहीं पाएंगे।”
कुछ पलों बाद, बाथरूम का दरवाज़ा खुला।
मीरा वापस हॉल के बीचों-बीच आकर खड़ी हो गई। वह एकदम नंगी थी, उसके बदन से ताज़े पानी की बूँदें टपक रही थीं और उसकी त्वचा साबुन की हल्की खुशबू से महक रही थी। नहाने के बाद उसका शरीर और भी निखर कर सामने आया था। उसके सीने पर उभरे हुए, भरपूर स्तन ऊपर की ओर उठे हुए थे, जिनके ऊपर गहरे गुलाबी निप्पल अब भी ठंडे पानी के असर से सख्त और खड़े थे।
उसका पेट चिकना और थोड़ा सा अंदर की ओर धंसा हुआ था, जो एकदम सपाट नहीं, बल्कि कोमल मांसपेशियों के हल्के उभार लिए हुए था। उसकी कमर पतली और मज़बूत थी, जो नीचे जाकर उसकी चिकनी, सफ़ेदी लिए हुए जांघों में खुलती थी।
और उसके नीचे, उसकी चूत बिल्कुल साफ़ सुथरी, चमकदार और बिना किसी बाल के थी—नहाने के बाद की गई सफ़ाई ने उसे एक गुलाब की कली जैसा कोमल और गीला बना दिया था, जिसके गहरे गुलाबी होंठ अब भी पिछले दौर की मार से थोड़े फूले हुए थे।
विक्रम, अमित और बाकी के आठों मर्द उसे ऐसे देख रहे थे जैसे कोई शिकारी अपने शिकार को देखता है। उनकी आँखें मीरा के उस निखरे हुए शरीर के हर हिस्से पर चिपकी हुई थीं। वे अपनी सीटों पर बैठे-बैठे अपने शरीर हिला रहे थे, कुछ अपनी जांघें फैला रहे थे, तो कुछ अपने कंधे झटक रहे थे—एक अधीर, पशुवत उत्तेजना में। उनके हाथ फिर से अपनी-अपनी पतलूनों के अंदर चले गए थे, और वे मीरा को निहारते हुए अपने-अपने लंड सहलाने लगे थे। कमरे में फिर से वही भारी, गर्म सन्नाटा छा गया, जिसे केवल हाँफने और हाथों के चलने की आवाज़ें तोड़ रही थीं।
लेकिन मीरा की नज़र उन दस मर्दों पर नहीं थी। वह सीधे हॉल की उस खिड़की की दरारों की तरफ देख रही थी। उसकी आँखों में एक सीधी, नंगी और बेशर्म चुनौती थी। वह जानती थी कि उस पार कौन खड़ा है, और वह जानबूझकर उन्हें चिढ़ा रही थी।
खिड़की के बाहर खड़े गाँव वालों की साँसें तेज़ हो गईं। गजेन्द्र काका और सरपंच के हाथ, जो खिड़की की चौखट को कसकर पकड़े हुए थे, पसीने से भीग चुके थे। मीरा का वह निखरा हुआ, चमकदार शरीर देखकर उन सबके भीतर की हवस फिर से सुलग उठी थी। एक के बाद एक, उन सभी पंद्रहों के हाथ भी अपनी-अपनी धोतियों और पतलूनों के अंदर सरक गए। वे भी अब अपने-अपने लंड जोर-जोर से सहलाने लगे, उनकी आँखें मीरा के उस जादुई रूप से चिपकी हुई थीं।
“काका…” सरपंच के बेटे ने काँपती हुई फुसफुसाहट में कहा, उसका हाथ अपनी पतलून के अंदर तेजी से चल रहा था। “वो सीधा हमें देख रही है। उसे पता चल गया है कि हम यहाँ हैं। रमेश ने पक्का उसे बता दिया है। वो… वो जानबूझकर हमें जलील करने के लिए ये सब कर रही है!”
गजेन्द्र काका की आँखें मीरा के उस निडर रूप पर टिकी थीं, उनका बायाँ हाथ खिड़की के फ्रेम पर था और दायाँ अपनी धोती के अंदर, अपने पुराने, झुर्रीदार लंड को मुट्ठी में कसकर पकड़े हुए था। उनके सीने में भारी उथल-पुथल मची थी।
“करने दो उसे,” गजेन्द्र काका की आवाज़ में अब नफरत नहीं, बल्कि एक हारी हुई, गहरी स्वीकृति थी, उनका हाथ रुका नहीं। “हम इसी लायक हैं। हमने ही उसे इस आग में धकेला है। अगर हमने ईर्ष्या में आकर उसका खेत न जलाया होता, तो शायद आज ये सब न होता।”
सरपंच ने भी एक गहरी साँस ली, उसकी उँगलियाँ अपने लौड़े की नसों पर फिसल रही थीं। “काका सही कह रहे हैं। हमने उसे रांड कहा, पर असल में उसने हमारी सोई हुई आत्मा को झकझोर कर जगा दिया है। उसने हमें इस ज़ालिम समाज की, इन अमीरों की असली सच्चाई दिखा दी है। हम उसे गालियाँ दे रहे थे, और वो हमारी ही लड़ाई लड़ रही थी, अपने तरीके से।”
बाहर की उस सर्द और अंधेरी रात में, गाँव के उन पंद्रह मर्दों का नज़रिया हमेशा के लिए बदल गया। उन्होंने मीरा को जलील करने की कोशिश की थी, लेकिन मीरा ने उन्हें उनके ही पाखंड का आईना दिखा दिया था।
“वो कोई मामूली औरत नहीं है,” गजेन्द्र काका ने एक अजीब सी श्रद्धा के साथ कहा, उनकी आँखें अभी भी मीरा के उस जादुई, सम्मोहक रूप से बँधी थीं। “वो इस गरीबी और लाचारी की देवी है। वो हमें हमारे पापों की सज़ा दे रही है। गुस्सा मत करो, बल्कि ये देखो कि वो कितनी बड़ी बात कर रही है।”
और फिर, उस अंधेरे में एक ऐसा नज़ारा दिखा जो किसी ने सोचा भी नहीं था। गजेन्द्र काका ने अपने लंड को छोड़ दिया और अपने हाथ जोड़े। सरपंच और बाकी लोगों ने भी बिना कुछ कहे, एक गहरे मानसिक सम्मोहन में अपने हाथ जोड़ लिए। उन्होंने अपनी आँखें झुकाईं और उस खिड़की के बाहर से ही मीरा को नमन किया, मानो वो कोई देवी हो जो उनके पापों का प्रायश्चित कर रही हो। उन्होंने मन ही मन माफ़ी माँगी। यह प्रणाम केवल कुछ पलों के लिए था।
प्रणाम खत्म होते ही, सन्नाटा टूटा। गजेन्द्र काका की हथेली फिर से अपनी धोती के अंदर दब गई। सरपंच ने अपनी पतलून का बटन खोला। सावित्री का पति अपनी पीठ दीवार से टिकाकर, अपने लंड पर जोरदार झटके देने लगा। उनका यह आध्यात्मिक बदलाव उनकी उस हवस को खत्म नहीं कर पाया था। माफ़ी माँगने के तुरंत बाद, उनकी नज़रें फिर से उसी दरार से अंदर टिक गईं, और वे भारी साँसों के साथ, अपने हाथों को फिर से तेजी से चलाते हुए, उस खौफनाक और उत्तेजक रात के अगले पहर के गवाह बनने के लिए वहीं जमे रहे। उनकी उँगलियाँ गीली हो चुकी थीं, उनकी साँसें फिर से फुफकारने लगी थीं। देवी अब फिर से वह शिकार थी, जिसे देखकर उनका खून खौल रहा था।
विक्रम और अमित एक बार फिर आगे बढ़े, उन्होंने अपनी शर्टें उतारकर फर्श पर फेंक दीं और अपने लंडों को हाथ में लेकर धीरे-धीरे सहलाने लगे। विक्रम की नज़रें मीरा के टूटे हुए लेकिन अदम्य शरीर पर गड़ी हुई थीं, उसकी आँखों में वही घमंडी, शिकारी चमक लौट आई थी, मानो वह किसी जंगली जानवर को अपना शिकार बनाने जा रहा हो।
“देखो सब,” विक्रम ने अपनी गहरी, दबंग आवाज़ में कहा, अपना लंड तेजी से हाथ में रगड़ते हुए। उसकी उँगलियाँ लंड के सिरे पर जमा चिपचिपे तरल को फैला रही थीं। “आज हम सबको दिखाएँगे कि ये कुतिया कैसे हमारे लंड को अपनी दोनों छेदों में लेती है। एक के बाद एक। इसकी चूत और इसकी गांड… दोनों !। ये हमारी निजी वेश्या है, और आज इसका पूरा शरीर हमारी जागीर है।”
यह सुनकर खिड़की के बाहर खड़े गाँव वालों के हाथ एक पल के लिए रुक गए। उनकी आँखें आपस में मिलीं—भ्रम, हैरानी और एक अजीब सी जिज्ञासा से भरी हुई। उनके दिमाग में तूफान चल रहा था “एक साथ दो लंड?”।
एक तरफ वो अब मीरा को देवी मानने लगे थे, उसके साहस और त्याग के प्रति श्रद्धा से भरे हुए थे। दूसरी तरफ विक्रम का ये क्रूर, अपमानजनक प्रस्ताव सुनकर उनके भीतर का पुरुष अभी भी उत्तेजित हो उठा था।
वे फिर से अपने-अपने लंड सहलाने लगे, लेकिन अब उनके चेहरे पर शर्म और कुतूहल का मिला-जुला भाव था। एक ने दूसरे से फुसफुसाकर कहा, “साले… ये तो जानवरों जैसा व्यवहार कर रहे हैं, भला वो एकसाथ दो लंड कैसे लेगी बेचारी!…” लेकिन उसकी नज़रें अंदर से हट नहीं रही थीं। गजेन्द्र काका ने आँखें मूंद लीं, उनके होठ हिल रहे थे, शायद कोई प्रार्थना, लेकिन उनकी कलाई की हलचल बताती थी कि उनका शरीर अभी भी इस दृश्य से बंधा हुआ था।
अंदर, रमेश ने विक्रम का प्रस्ताव सुना तो उसके होंठों पर एक विचित्र, तीखी मुस्कान फैल गई। उसने खिड़की की ओर देखा, उन पंद्रह आँखों की ओर जो अंधेरे में चमक रही थीं, और एक चिढ़ाने वाली, शैतानी मुस्कान उसके चेहरे पर आ गई। उसने सोचा—’अब देखो तुम सब। अब देखो मेरी मीरा की असली ताक़त। तुम्हारी गंदी नज़रें ही तो इस युद्ध का हथियार हैं।’ उसका अपमान अब एक ईंधन में बदल रहा था।
मीरा ने विक्रम और अमित की ओर चुनौती भरी, उकसाने वाली नज़र से देखा। उसने अपना सिर एक तरफ झुकाया, उसकी आँखों में कोई डर नहीं, बल्कि एक खेलने वाली, विडम्बनापूर्ण चमक थी।
“तो फिर आ जाओ,” उसने अपनी आवाज़ को मधुर और ललकार भरा बनाते हुए कहा, उसकी गर्दन की नसें तनी हुई थीं।
“दिखाओ ना अपना हुनर। मैं तैयार हूँ। तुम्हारे लंड इतने बड़े हैं, तो हुनर भी उतना ही बड़ा होना ही चाहिए क्यों?”
विक्रम और अमित करीब आए, उनके नंगे पैरों के तलवे फर्श पर चिपचिपी हवा में चलते हुए आवाज़ कर रहे थे। मीरा एक बार फिर घुटनों के बल नीचे झुकने लगी, उसका मुँह अमित के उभरे हुए लंड की ओर बढ़ा, उसके होंठ पहले से ही थोड़े खुले हुए थे। लेकिन अमित ने उसे रोक दिया। उसने अपना हाथ उठाया, एक ऐसा इशारा जो रुकने का नहीं, बल्कि और अधिक अपमानजनक निर्देश देने का था, और रमेश की ओर मुड़ा।
“रुको,” अमित ने कहा, उसकी नज़रें रमेश पर जमी हुई थीं, उसके चेहरे पर एक नीरस, प्रयोगकर्ता जैसा भाव था।
“इसके भड़वे पति को भी कुछ काम दो। रमेश, आ जाओ यहाँ। तेरे हाथों से हमारे लंड को चिकना कर। ताकि तेरी बीवी हमारे राक्षसी लंड आसानी से अपने छेदों में ले सके। तेरे हाथों की गर्माहट भी इसमें शामिल होगी… और तू भी इस मज़े का एक हिस्सा बन जाएगा।”
कमरे में एक गहरा, दमघोंटू सन्नाटा छा गया। बाकी आठ मर्द ठहाका लगाकर हँसने लगे, उनकी नज़रें अब रमेश पर टिक गईं, यह देखने के लिए कि वह क्या करता है—क्या वह विद्रोह करेगा, क्या रोएगा, या फिर इस अंतिम अपमान को भी सह लेगा? रमेश ने अपने दाँत भींच लिए।
उसके जबड़े की नसें तार की तरह तन गईं। उसकी आँखों की कोरों में आँसूओं का ज्वार उमड़ा, लेकिन उसने उन्हें बहने नहीं दिया। फिर, धीरे-धीरे, जैसे कोई भारी बोझ उठा रहा हो, उसने सिर हिलाया। वह चुपचाप, एक रोबोट की तरह रसोई की ओर मुड़ा और कुछ देर बाद सरसों के तेल की एक पुरानी शीशी लेकर लौटा।
विक्रम जोर से, एक कर्कश हँसी हँसा, अपनी भारी गोटियाँ थपथपाते हुए।
“देखो इस आदमी को,” उसने बाकी लोगों से कहा, अपना लंड आगे बढ़ाते हुए, उसका सिर लाल और चमकदार था।
“कैसे अपने हाथों से हमारे लंड तैयार कर रहा है अपनी ही बीवी के लिए। सच्चा पति है… एक सच्चा भड़वा! इसकी बीवी हमारे लिए मज़ा दे रही है, और ये हमारी सेवा में लगा है। कहो तो इसके नाम का बैनर लगाव दें सड़क पे?”
दूसरे मर्दों ने फिर से ठहाके लगाके हसने लगे, उनकी हँसी कमरे की दीवारों से टकराकर वापस लौट रही थी, एक विषैली, शोरभरी गूँज बनकर।
एक ने कहा, “अरे विक्रम भाई, इससे पूछो… तेरा लंड चूसने का मन करता है क्या?”
रमेश ने अपने दाँत और भी ज्यादा कसकर भींच लिए, उसने अपनी नज़रें जमीन पर गड़ा दीं, लेकिन कुछ नहीं बोला। उसने तेल की शीशी का ढक्कन खोला और पहले अमित के लंड पर धार बनाकर तेल डालना शुरू किया।
चिपचिपा, सुनहरा तेल अमित के लंड की लंबाई पर फैलने लगा, उसकी उभरी हुई नसों पर चमकने लगा, नीचे गोटियों तक गिरता हुआ। अमित ने एक ठंडी सी आह भरी, “अच्छा… ठंडा है… जल्दी कर।” फिर रमेश ने विक्रम के लंड पर भी वही किया। उसके हाथ ठंडे और स्थिर थे, लेकिन उसकी आँखों की गहराई में एक जलता हुआ अपमान छुपा था, एक ऐसी आग जो शायद कभी नहीं बुझेगी।
खिड़की के बाहर, गाँव वाले इस नज़ारे को देखकर एक पल के लिए क्रोध से भर उठे। सरपंच के बेटे ने अपनी मुट्ठी दीवार पर जोर से मारी और फुसफुसाया,
“साले मादरचोद… इन अमीर कुत्तों की हिम्मत देखो… रमेश का इतना अपमान!”
लेकिन उसका दूसरा हाथ अपनी पतलून के अंदर लगातार चल रहा था, उसकी साँसें तेज़ थीं। गजेन्द्र काका ने आँखें मूंद लीं, एक गहरी साँस ली, लेकिन उनकी उँगलियाँ भी रुकी नहीं, वे अपने पुराने लंड को एक ऐसे जोश से सहला रहे थे जो शर्म और क्रोध से परे था।
एक अन्य पंच ने कहा, “ये सब देखकर लगता है… हम भी उतने ही गुनहगार हैं… हम भी तमाशबीन बने हुए हैं…”
“जल्दी कर रमेश!” अमित ने गुर्राते हुए कहा,
अपना तैलिये लंड हवा में हिलाते हुए, तेल की कुछ बूँदें दूर जाकर फर्श पर गिरीं।
“तेरी बीवी हमारे लंड का इंतज़ार कर रही है। उसकी चूत पानी निकाल रही है, और तू यहाँ देरी कर रहा है। देख उधर!”
रमेश ने मीरा की ओर देखा। वह अपनी जगह पर खड़ी थी, और अपनी चूत के गुलाबी, फूले हुए होंठों को जोर-जोर से रगड़ रही थी, अपने आप को और गीला करने के लिए। उसकी उँगलियाँ तेजी से चल रही थीं, उसकी कोहनियाँ हिल रही थीं। उसने भी रमेश की ओर देखा। उनकी नज़रें मिलीं। उस नज़र में कोई शब्द नहीं था, कोई संवाद नहीं था—बस एक गहरी, अटूट समझ थी, एक ऐसा बंधन जो इस गन्दगी और हिंसा के बीच भी अक्षुण्ण था। वह खुद को आने वाले तूफान के लिए तैयार कर रही थी, और वह रमेश को यही बता रही थी बिना कुछ कहे—’मैं तैयार हूँ। तुम चिंता मत करो। ये सब हमारी जीत के लिए है।’
रमेश ने अपना काम पूरा किया और हमेशा की तरह कमरे के कोने में अपनी जगह पर वापस खड़ा हो गया, उसकी पीठ दीवार से टिकी हुई थी, उसका सिर झुका हुआ था, लेकिन उसकी आँखें अब ऊपर थीं, और वे सीधे खिड़की पर टिकी हुई थीं, जहाँ गाँव वालों की शर्म और उत्तेजना का मिश्रण छुपा था।
अमित फर्श पर पीठ के बल लेट गया, उसने अपने सिर के नीचे अपनी फेंकी हुई शर्ट का गठान लगा लिया। उसका चिकना, चमकदार लंड हवा में खड़ा था, एक घातक हथियार की तरह।
“आ जा मीरा,” उसने आदेश दिया, उसकी आवाज़ में अधीरता थी।
“इस पर बैठ। पीठ मेरी तरफ करके। मुझे तेरी गांड को चोदना है, और इन बाकि सब को भी दिखाना है कि कैसे तेरी गांड फैलती है।”
मीरा ने धीरे से अपने शरीर को सम्भाला। उसने अमित की कमर के दोनों ओर अपने पैर रखे, उसकी जांघों की मांसपेशियाँ तन गईं। वह अपने शरीर को संतुलित करते हुए, धीरे-धीरे अपना वजन नीचे ले जाने लगी। यह नज़ारा सीधे उस खिड़की की ओर था, जहाँ गाँव वाले खड़े थे—उसकी सुंदर, गुलाबी छेद पूरी तरह से उजागर हो रही थी।
उसकी चूत के होंठ अभी भी गीले और थोड़े खुले हुए थे, और उसकी गांड का छोटा सा गहरा गुलाबी छिद्र, जो अभी तक बंद था, अब सबके सामने था। गाँव वालों के मुँह हैरानी से खुल गए, मुह से पानी टपक रहा था। उनकी साँसें रुक सी गईं। एक ने अपना हाथ अपने मुँह पर रख लिया, मानो चीख रोक रहा हो। एक दूसरे की तरफ देखा—उनकी आँखों में अब साफ़ था: यह कोई साधारण देह-व्यापार नहीं था, यह एक युद्ध-क्षेत्र था, और मीरा एक योद्धा थी जो अपने ही शरीर को शस्त्र बना रही थी।
मीरा ने अपने एक हाथ से अमित के लंड को पकड़ा। उसकी उँगलियाँ उस चिकने, गर्म लंड के चारों ओर कस गईं। उसने उसे अपनी गांड के छिद्र पर टिकाया। ठंडे तेल और उसके शरीर की गर्माहट के बीच का विरोधाभास उसे एक सिहरन दे गया। वह धीरे-धीरे, साँस रोके, अपना वजन नीचे डालने लगी, ताकि वह लंड आराम से, बिना चीर-फाड़ के अंदर सरक सके। उसकी मांसपेशियाँ काँप रही थीं, उसका पूरा ध्यान उस एक छिद्र पर केंद्रित था जो धीरे-धीरे खुलने को मजबूर था।
लेकिन अमित को धैर्य नहीं था। उसकी उत्तेजना चरम पर थी। उसने मीरा की पतली कमर को अपने दोनों हाथों से जोर से पकड़ा—उसकी उँगलियाँ उसकी त्वचा में धंस गईं—और एक ही झटके में, अपनी पूरी ताकत से, उसे नीचे की ओर खींच लिया।
“श्ल्लुरूप्प्प!!!! फछ!!”
एक तेज, चिपचिपी, फटने जैसी आवाज़ कमरे में गूंज उठी। तेल के कारण अमित का लंबा, मोटा लंड एक ही झटके में पूरा का पूरा अंदर समा गया, उसकी गोटियाँ मीरा की गांड से जा टकराईं। यह प्रवेश इतना अचानक और पूर्ण था कि हवा ही रुक सी गई।
“आआआआहहहहहह… हह… हाए मर गयी!!!!!!”
मीरा का जोरदार, दर्द से भरी चीख कमरे में फैल गया, दीवारों से टकराई और खिड़की के शीशे तक को हिला दिया। उसके चेहरे के हाव-भाव में तीव्र पीड़ा झलक रही थी—उसकी आँखें फटी हुई, भौंहें तनी हुई, मुँह से लार की एक धार गिरी। उसकी टाँगें कुछ पलों के लिए ऐंठ गईं और जोर से काँपने लगीं, जैसे बिजली का झटका लगा हो। उसके स्तनों के गहरे गुलाबी निप्पल और भी सख्त होकर पत्थर की तरह खड़े हो गए। और उसकी गांड का छिद्र अब पूरी तरह से फैल चुका था, अमित के लंड के मोटे आधार को चौंधिया देने वाली तंगी से घेरे हुए, उसकी त्वचा लाल होकर खिंच गई थी।
खिड़की के बाहर, गाँव वालों ने अपने लंड सहलाना एक बार फिर रोक दिया। उनकी आँखें फैल गईं, मुँह खुले के खुले रह गए। उनके चेहरे पर हैरानी का भाव नहीं, बल्कि एक गहरी आतंकित श्रद्धा थी। इतना दर्द सहने की क्षमता, इतना साहस… यह साधारण सहनशीलता नहीं थी, यह तपस्या थी। उनकी नई देवी के प्रति भावना और गहऋ हो गयी। गजेन्द्र काका ने फिर से अपने हाथ जोड़े, उनकी आँखें बंद हो गईं और उनके होठों पर एक मौन प्रार्थना फड़फड़ाने लगी। सरपंच ने भी ऐसा ही किया। वे सब, उस अंधेरे में, एक क्षण के लिए अपनी हवस भूलकर, उस स्त्री की अलौकिक इच्छाशक्ति के सामने नतमस्तक हो गए।
लेकिन कमरे के अंदर बैठे दूसरे मर्द एक बार फिर जोर से हँसने और तालियाँ बजाने लगे। वे मीरा के दर्द से उत्तेजित हो रहे थे। उसकी चीख ने उनके खून में आग लगा दी थी। एक ने अपना लंड और तेजी से सहलाते हुए कहा,
“अरे वाह! देखो कैसे चिल्लाई! कमाल है!”
दूसरा बोला, “हाँ भई, दर्द में ही तो मजा है! देखो उसकी गांड को, कैसे फैल गई!”
वे इस बात से उत्तेजना महसूस कर रहे थे कि कैसे मीरा की गांड फैल रही थी, कैसे उसका शरीर उनकी इच्छा के आगे झुक रहा था।
अमित ने हाँफते हुए, अपनी कमर ऊपर की ओर एक और जोरदार झटका दिया, और मीरा फिर से एक दबी हुई चीख के साथ झटके में आगे को झुक गई।
“वाह मीरा,” अमित ने कहा, उसकी आवाज़ भारी और संतुष्ट थी।
“तू कितनी टाइट है… जैसे तूने कभी गांड मरवाई ही नहीं हो। तू ये कैसे कर लेती है? कोई भी वेश्या, कोई भी रंडी के पास ये हुनर नहीं है… नाही ऐसा शरीर। तेरी गांड तो, अभी भी किसी कुंवारी लड़की जैसी टाईट है… ” उसने एक और झटका दिया।
“थाप्पप!!!!!…”
विक्रम अब घुटनों के बल नीचे झुक गया, उसकी आँखें मीरा के सामने की ओर, उसकी फैली हुई, चमकदार चूत पर टिकी हुई थीं, जो अभी भी गीली और उसके अपने हाथों के रगड़ से सूजी हुई थी। उसने अपना खुद का तैलिया हुआ, मोटा लंड हाथ में लिया, उसके सिरे से एक बूंद तरल टपकी।
“अब देखते हैं,” उसने एक शैतानी, उत्सुक मुस्कान के साथ कहा, अपना लंड मीरा की चूत के होंठों पर टिकाते हुए।
“कैसे इसकी चूत फैलती है। एक ही समय में दोनों छेद भरने का मजा ही कुछ और है।”
विक्रम का मोटा, तैलिया हुआ लंड मीरा की गीली चूत के होंठों पर रगड़ खा रहा था। अमित का लंड उसकी गांड में गहराई तक धँसा हुआ था, और हर हल्की हरकत से मीरा का शरीर एक सिहरन से भर जाता था। दर्द की लहरें अभी भी उसकी रीढ़ को झंझोड़ रही थीं, लेकिन उसने अपने आप को संभाल लिया था। उसकी साँसे गहरी और नियंत्रित थीं, उसकी आँखों में वही निडर चुनौती बची हुई थी। वह अपने आप को तैयार कर रही थी—इस बार उसकी छोटी, गुलाबी, पहले से ही सूजी हुई चूत को एक और विशाल लंड को समाना था।
खिड़की के बाहर, गाँव वालों ने अपनी साँसें रोक ली थीं। उनकी आँखें उस चमत्कार पर टिकी थीं जो होने वाला था। क्या कोई औरत, चाहे वह कितनी भी साहसी क्यों न हो, एक साथ दोनों छेदों में इतने बड़े-बड़े लंड सह सकती है? उनकी जिज्ञासा उनके भय और श्रद्धा पर भारी पड़ रही थी। गजेन्द्र काका की उँगलियाँ मुड़ी हुई थीं, सरपंच का मुँह खुला था—वे एक ऐतिहासिक क्षण के गवाह बनने को तैयार थे।
विक्रम अपना लंड मीरा की चूत के होंठों पर घुमाता रहा, उसके सिरे से निकला चिपचिपा तरल उसकी गुलाबी त्वचा पर मिल रहा था।
“आहहम्म्म… स्स्स्स…!!” मीरा ने अपने होंठों को दाँतों के नीचे दबाते हुए एक दबी हुई, गहरी कराह निकाली। यह आवाज़ दर्द और उत्तेजना के बीच की एक पतली रेखा पर चल रही थी।
विक्रम ने मुड़कर कमरे में बैठे उन आठ मर्दों की ओर देखा, जो अपने-अपने लंड तेजी से सहला रहे थे, उनकी आँखें मीरा के फैले हुए शरीर पर लटकी हुई थीं।
“देखो,” विक्रम हँसा, उसकी आवाज़ में गर्व और उपहास का मिश्रण था।
“कुछ लोग तो शर्तें लगा रहे हैं कि ये गाँव की अनपढ़ रंडी ये काम नहीं कर पाएगी।”
एक मर्द बोला, “हाँ भई विक्रम भाई, इतना टाइट शरीर है इसका… दोनों एक साथ? नामुमकिन लगता है!”
दूसरा चिल्लाया, ” १००० रुपए मैं लगाता हूँ कि चीखते-चीखते बेहोश हो जाएगी!”
विक्रम की हँसी और जोरदार हुई।
“देखो, ये कराह रही है… इसका मतलब है ये तैयार है। अब देखना, कैसे ये गरीब गाँव की छिनाल हमारे दोनों लंड आसानी से ले लेगी।”
इतना कहकर उसने अचानक अपना खुला हाथ उठाया और मीरा के गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया।
‘चटाक!!!’ की आवाज़ कमरे में गूँज गई।
मीरा का सिर हिंसक झटके से एक तरफ घूम गया, उसके गाल पर तुरंत लालिमा छा गई। लेकिन उसकी आँखें नीची नहीं हुईं। धीरे-धीरे, दर्द से भरी हुई, वह अपना सिर वापस मोड़कर विक्रम की आँखों में देखने लगी। उसकी नज़र में चुनौती थी, आत्मसमर्पण नहीं। कोई आँसू नहीं, कोई दया की भीख नहीं—बस एक जलता हुआ इरादा।
रमेश, जो कोने में खड़ा सब कुछ सह रहा था, उसने फिर से अपने जबड़े की नसें तन गईं। उसकी मुट्ठियाँ जोर से भिंचीं। उसकी छाती में एक जंगली जानवर दहाड़ने लगा था, लेकिन उसने खुद को रोक लिया। उसने खिड़की की ओर देखा—उन गाँव वालों की ओर, जिनकी आँखों में अब साफ दिख रहा था कि यह सिर्फ शारीरिक यातना नहीं, बल्कि एक वर्ग संघर्ष था, एक युद्ध।
खिड़की के बाहर, गाँव वालों में एक खलबली मच गई। सरपंच के बेटे ने दीवार पर मुक्का मारा,
“साले…हरामखोर!”
गजेन्द्र काका ने आँखें मूँद लीं। विक्रम का ये तमाचा उन सबके अपमान का तमाचा था। यह गरीब गाँव वालों और शहर के अमीर शिकारियों के बीच की खाई को और गहरा कर रहा था। और इस युद्ध में मीरा एकमात्र योद्धा थी, जो अपने सारे छेदों और अपने पूरे शरीर से, अपने अनोखे तरीके से लड़ रही थी।
और फिर, बिना किसी चेतावनी के, विक्रम ने जोरदार धक्का दिया।
“स्स्स्श्र्र्रुल्ल्प्प्प!!!!!”
एक फिसलन भरी, भीषण आवाज़ के साथ, उसका पूरा नौ इंच लंबा, मोटा लंड एक ही झटके में मीरा की चूत के अंदर समा गया, उसकी गर्भाशय की दीवार तक जा टकराया। यह प्रवेश इतना गहरा और पूर्ण था कि मीरा का शरीर एकदम स्तब्ध हो गया।
“आआ……..!!!”
एक तीक्ष्ण चीख उसके गले से निकलनी चाहिए थी, लेकिन आघात और आश्चर्य से उसकी आवाज़, निकलते ही गायब हो गई। उसकी आँखें डरावनी चौड़ाई से फैल गईं, उसका मुँह खुला का खुला रह गया लेकिन कोई आवाज़ नहीं निकली। उसका पूरा शरीर एक सेकंड के लिए ऐंठ गया, फिर जोर से काँपने लगा—एक अनियंत्रित, सदमे भरी कंपकंपी। उसकी चूत अब अपनी सीमा तक खिंच चुकी थी, दो विशाल लंडों के बीच कसी हुई।
“आह्ह्स्स्स्स्स्स… हम्म्म…!!!!”
विक्रम ने आँखें बंद करके एक गहरी, संतुष्ट कराह भरी, उसने अपनी कमर को और दबाया, महसूस किया कि कैसे मीरा की चूत की गर्म, तंग मांसपेशियाँ उसके लंड को चारों ओर से जकड़ रही थीं।
रमेश की आँखों में आँसू आ गए। उसने अपने होठों को काट लिया, ताकि वह रो न सके। उसने खिड़की की ओर देखा—उन गाँव वालों की ओर—और उसकी नज़र में एक मूक प्रश्न था, एक मूक घोषणा: ‘देखो… देखो मेरी मीरा का बलिदान। ये सब तुम्हारी वजह से है।’
और गाँव वालों ने देखा। उन्होंने अपने लंड सहलाना बंद कर दिया। उन्होंने अपने हाथ अपने मुँह पर रख लिए, हैरानी से, एक अविश्वसनीय श्रद्धा से। औरतों की शक्ति और सीमा का यह पहला प्रत्यक्ष दर्शन उन्हें मौन कर गया था। खिड़की से साफ दिख रहा था—अमित का लंड उसकी गांड में, और विक्रम का लंड उसकी चूत में। उसकी गांड का छिद्र और चूत बिच की पतली सी परत इतने करीब आ गए थे, कि वो त्वचा लाल होकर खिंच गई थी, जो इस बात का प्रमाण था कि उसके शरीर की सीमाएँ कहाँ तक जाती हैं।
गजेन्द्र काका ने फुसफुसाते हुए कहा, “जय हो… मीरा मैया की…”
और अचानक, सभी पंद्रहों ने एक साथ अपने हाथ जोड़ लिए। उन्होंने मीरा को प्रणाम किया। उनकी आवाज़ें काँप रही थीं।
“उसने ले लिया… दोनों लंड अंदर तक… ये चमत्कार कोई मामूली औरत नहीं कर सकती, ये वासना की देवी है !…”
वे आपस में बात करने लगे, अपने विस्मय को शब्द देते हुए। “हमने कभी सोचा भी नहीं था… हमारी औरतों में… इतनी ताकत होगी…”
एक बूढ़ा बोला। “मेरी बीवी तो रो देती है अगर उसे थोड़ा दर्द हो जाए… पर ये… ये तो लोहे की बनी है…”
दूसरे ने कहा। “अरे लोहे का तो जिगर है उसका, पर शरीर तो हाड़-मांस का ही है न!,..बेचारी..!!”
उनकी चिंता बढ़ रही थी। ऐसा लग रहा था मानो दो तलवारें मीरा के शरीर में घुसा दी गई हों, उसे बेरहमी से भेद रही हों। फिर भी वह सह रही थी, उसका सामना कर रही थी। उस पर थप्पड़ पड़े, उस पर थूका गया… वे सोच रहे थे कि मीरा इस तरह के अपमान का सामना कैसे कर रही है? इस साहस का रहस्य क्या है?
गजेन्द्र काका ने एक निर्णय की आवाज़ में कहा,
“हमें अपनी औरतों और बेटियों को मीरा जैसा बनाना होगा। हमें इससे विनती करनी होगी… विनती करनी होगी कि वो हमारी औरतों को भी अपने जैसा शक्तिशाली बना दे।”
और फिर, सम्मान से भरकर, उन सभी ने एक बार फिर अपने हाथ जोड़े, मीरा की असाधारण कामुक शक्ति का सम्मान करते हुए। और फिर, फिर से, उनके हाथ फिर से अपनी-अपनी धोतियों और पतलूनों के अंदर चले गए, और वे उसी श्रद्धा भाव से, अब और भी तेजी से, अपने-अपने लंड सहलाने लगे, उस देवी को निहारते हुए जो उनके सामने युद्ध लड़ रही थी।
विक्रम का शरीर एक तनावपूर्ण धनुष की तरह था, उसकी पीठ की मांसपेशियाँ खिंची हुईं, पसीने की बूँदें उसकी रीढ़ की हड्डी से नीचे गिर रही थीं। उसका लंड, जो नौ इंच से अधिक लंबा और ढाई इंच से थोडा ज्यादा मोटा था, अब मीरा की चूत में पूरी तरह से समाया हुआ था। उसके लंड की नसें धड़क रही थीं, उसका सिरा लाल और गर्म था।
“आह्ह्ह…स्स्स्स..!!!…इसकी चूत कमाल की है!…आआ..स्स्स।”
विक्रम ने आँखें बंद करके कराह भरी, उसके चेहरे पर एक गहरी, पशुवत संतुष्टि थी। उसे महसूस हो रहा था कि कैसे मीरा की चूत की गर्म, कोमल दीवारें उसके लंड के हर इंच को एक जीवित, स्पंदनशील आलिंगन में लपेटे हुए हैं। यह अनुभव सिर्फ तंगी का नहीं था, बल्कि एक सिकुड़ने वाली, चिपचिपी गर्माहट का था जो उसे चारों ओर से निचोड़ रही थी, जैसे कोई गर्म, नम मिट्टी।
मीरा अभी भी उस पहले झटके के सदमे में थी, उसकी साँसें छोटी और तेज़ थीं। उसकी चूत, जो आम तौर पर एक तंग, गुलाबी कली जैसी होती थी, अब दो विशाल लंडों के बीच फैलकर एक लाल, तपती हुई भट्टी जैसी हो गई थी। लेकिन धीरे-धीरे, वह शिथिल होने लगी, जैसे वह हमेशा करती थी—कुछ मिनटों के बाद।
उसके शरीर में एक अद्भुत दैवीय क्षमता थी अपने आप को ढालने की। उसकी गांड का छेद और चूत का व्यास, अब अमित और विक्रम के लंडों के आकार में ढलने लगे थे, उनकी नसों और मोड़ों को समेटते हुए। दर्द की तीखी सुइयाँ धीरे-धीरे एक गहरी, भारी संवेदना में बदल रही थीं—एक ऐसी जलन जो उत्तेजना की कगार पर थी।
फिर धीरे-धीरे, विक्रम ने अपनी कमर पीछे की ओर खींची।
“च्ल्लुर्रुप…”
एक गीली, फिसलन भरी आवाज़ हुई क्योंकि उसका लंड आधा बाहर आया, चमकदार और गीला। अमित ने भी उसकी गांड से अपना लंड थोड़ा बाहर खींचा। फिर, एक लय में, दोनों ने आगे धक्का दिया।
“श्र्रुप… च्छ्र्रुरुप्प…”
“आआह्ह्ह…स्स्स्स..म्म्म्म्म…हम्म्म्स्स,,स्स्स.आआआ…ह्ह्ह।”
मीरा की कराह निकली, यह आवाज़ अब दर्द और एक विचित्र आनंद के बीच झूल रही थी। उसकी आँखें अर्ध-बंद थीं, होठों पर दाँतों के निशान थे। उसने अपने हाथों से अपने स्तनों को पकड़ लिया था, उसके गहरे भूरे निप्पल अब पत्थर की तरह सख्त होकर खड़े थे।
खिड़की के बाहर, गाँव वाले देख रहे थे कि कैसे लंड धीरे-धीरे अंदर बाहर हो रहे हैं। वे अपने लंड तेज़ी से सहला रहे थे, यह कल्पना करते हुए कि वे स्वयं अपनी नई नेता, अपनी देवी को चोद रहे हैं—एक विचित्र, सम्मान और श्रद्धा के भाव से, जैसे यही उस देवी को पूजने का तरीका हो। सरपंच के बेटे ने फुसफुसाते हुए कहा,
“देखो… कैसे उसकी चूत और गांड फैल रही है!… ये… ये असंभव है!…”
लेकिन उसकी कलाई की हरकत बंद नहीं हुई। गजेन्द्र काका की आँखों में आँसू थे, लेकिन उनकी उँगलियाँ भी अपने पुराने, झुर्रीदार लंड पर तेजी से चल रही थीं।
“श्र्रुप…च्छ्र्रुरुप्प…श्श्र्रुप्प….च्छ्ह्रुरप्प..”
अजीब, चिपचिपी, फिसलन भरी आवाज़ें—लंड के अंदर-बाहर सरकने की, हवा के उसके छेदों में फँसने और छूटने की—कमरे में गूँजने लगीं, जैसे कोई गीला, अश्लील संगीत चल रहा हो। यह आवाज़ दीवारों से टकराकर वापस लौट रही थी, उस कमरे में जहाँ हवा अब सेक्स, पसीने और तेल की भारी गंध से भरी हुई थी।
जैसे ही विक्रम और अमित मीरा को तेज़ी से चोदने लगे, कमरे में बैठे बाकी आठ मर्दों ने भी अपने लंड तेज़ी से सहलाना शुरू कर दिया। राजन,अपने लंड को रगड़ते हुए बोला,
“अरे बाप रे… ये औरत तो डायन है!… दोनों एक साथ, आसानी से ले रही है!…”
उसकी आँखों में ईर्ष्या और उत्तेजना का मिश्रण था। मीरा की दो लंड एक साथ लेने की क्षमता देखकर उनकी उत्तेजना चरम पर पहुँच गई थी। वे तुरंत विक्रम और अमित के खत्म होने का इंतज़ार करने लगे, ताकि वे भी उसे वैसे ही चोद सकें। उनकी आँखों में भूख थी, और एक प्रतिस्पर्धा का भाव भी।
“तेज़!!!…विक्रम!!!..तेज़ चोद इस रांड को!!”
राजन ने विक्रम का उत्साह बढ़ाते हुए चिल्लाया, जैसे वे दोनों घुड़सवार हों और वह उन्हें प्रोत्साहन दे रहा हो। उसके पास बैठा गोलू, हँसते हुए बोला,
“हाँ भाई! दिखा दो इस गाँव की चुड़ैल को कि असली मर्द कैसे चोदते हैं!”
विक्रम और अमित ने उसकी बात सुनी। एक दूसरे की आँखों में देखा, और एक अश्लील प्रतिस्पर्धा के भाव से, उन्होंने रफ़्तार बढ़ा दी।
“थप..थप …थप..थप…थप…थप..”
विक्रम की जाँघों के मीरा की जाँघों से, और अमित की जाँघों के मीरा की गांड से टकराने की आवाज़ें गूँजने लगीं। यह एक लयबद्ध, क्रूर ताल थी। उनके अंडकोष, भारी और झूलते हुए, एक-दूसरे से टकरा रहे थे,
“चप… चप…”
की आवाज़ करते हुए, क्योंकि वे उसके छेदों को चीर रहे थे। मीरा का शरीर दोनों ओर के झटकों से हिल रहा था, आगे-पीछे और ऊपर-नीचे डोल रहा था। उसके स्तन जोर से हिल रहे थे, उसकी कमर एक असंभव कोण पर मुड़ रही थी।
गाँव वाले देख रहे थे कि कैसे मीरा का नाजुक शरीर दो पुरुषों के विशाल, मांसल शरीरों के बीच पिस रहा था। विक्रम का पसीने से तर बदन उसकी पीठ पर चिपक रहा था, जबकि अमित उसकी गांड को अपने दोनों हाथों से पकड़कर, उसे अपनी ओर खींच रहा था। वे उसे दोनों ओर से रौंद रहे थे, एक जंगली जानवर की तरह।
“आआआह्ह्ह…आआआह्ह्ह………आआआआआ…..ह्ह्हआह्ह..”
मीरा जोर-जोर से कराह उठी। यह कराह अब केवल दर्द की नहीं थी, बल्कि एक प्रतिरोध की, एक चुनौती की थी। उसने अपना सिर पीछे की ओर फेंका, उसकी लटें पसीने से चिपकी हुई थीं।
रमेश और गाँव वाले साँस रोके देख रहे थे।
“चिल्ला!!..कुतिया!..चिल्ला!!..जोर से चिल्ला!!”
अमित चीखा, उसकी गांड को तेज़ी से चोदते हुए, उसका चेहरा विकृत हो गया था उत्तेजना और क्रोध से।
“थप…थप…थप…थप…थप…थप…” आवाज़ें और तेज़ हो गईं।
गाँव वाले आपस में बात करने लगे इस जंगली कामुक युद्ध के बारे में जो मीरा और उन मर्दों के बीच चल रहा था।
“ये तो… उसे मार डालेंगे…” एक ने डरते हुए कहा।
“नहीं… देखो उसकी आँखें… वो हार नहीं मानेगी…” दूसरे ने जवाब दिया।
ऐसा लग रहा था कि मीरा युद्ध हार रही है… कि वह इन जानवरों के आगे घुटने टेक देगी।
लेकिन अचानक… जब विक्रम का लंड एक विशेष कोण पर उसकी चूत की गहराई में घुसा, मीरा ने अपनी आँखें खोलीं और सीधे विक्रम की आँखों में देखते हुए कहा—
“बस इतना ही दम है छोटे ठाकुर?…आआह्ह…स्स्स्स…आआह्ह…म्म्म..” उसकी आवाज़ में कराह थी, लेकिन उसके स्वर में एक स्पष्ट उपहास था।
यह सुनकर रमेश के चेहरे पर एक खिंची हुई, गर्व से भरी मुस्कान फैल गई और गाँव वालों ने खुशी से, चुपचाप जयकार किया, अपने लंड सहलाते हुए। उनकी नेता, उनकी देवी हार नहीं रही थी… बल्कि अपने दोनों छेदों से उन जानवरों से लड़ रही थी।
विक्रम का चेहरा क्रोध से लाल हो गया।
“ओह्ह्ह…..आआह्ह… और चाहिए क्या?..थप थप थप थप…और?” वह गुर्राया, उसे और जोर से चोदते हुए…
और फिर दोनों ने अपनी रफ़्तार और बढ़ा दी।
“थप थप थप थप थप थप थप थप थप थप थप थप”
वे दोनों और जंगली हो गए, जैसे उन पर कोई बावलेपन का दौरा पड़ गया हो। विक्रम और मीरा की नज़रें कराह के बीच मिलीं—एक में क्रोध और उत्तेजना थी, दूसरी में अडिग चुनौती और एक गहरी, अदृश्य जीत का भाव।
गाँव वाले रमेश के साथ, यह देखने को उत्सुक थे कि अंत में कौन हारेगा। और अचानक… अमित के शरीर में एक तेज ऐंठन दौड़ गई।
“आआह्ह्ह!!!!!!……..आआह्ह्ह!!!!!!…..आआह्ह्ह!!!!!!”
वह चीखने लगा, उसका शरीर झटके खाने और काँपने लगा। उसने मीरा की गांड को अपने दोनों हाथों से जकड़ लिया, अपने नाखून उसकी त्वचा में घुसा दिए, और आखिरी, गहरा धक्का देते हुए अपना गाढ़ा, गर्म वीर्य उसकी गांड की गहराई में उड़ेल दिया।
“थप!!….आआआह्ह्ह….थप!!…..आआआह्ह्ह….थप!….आआआह्ह्हआआ”
उसका शरीर सिर से पैर तक काँपा, और फिर वह भारी साँसें लेते हुए मीरा के निचे ही सोया रहा।
गाँव वाले और रमेश… उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई। सरपंच और गजेन्द्र ने आपस में बात करते हुए मीरा की जयकार की।
“देखा!… एक तो गया!… अब बस एक बचा है!…” गजेन्द्र काका ने फुसफुसाकर कहा।
वे अपना सब लंड हिलाते रहे, उनकी उत्तेजना अब एक सामूहिक उन्माद में बदल रही थी।
घर के अंदर विक्रम अभी भी मीरा की चूत को तेज़ी से चोद रहा था…
“थप थप थप थप थप…”
वह बुरी तरह पसीने से तर था.. उसकी साँसें घरघराहट भरी थीं, और छोटी-छोटी साँसें ले रहा था। लेकिन किसी तरह मीरा की उग्र आँखों में देखने की कोशिश कर रहा था, जैसे वह उसकी आत्मा को अपने क्रोध से जीतना चाहता हो। मीरा नीचे नहीं देख रही थी। वह आत्मविश्वासी और मजबूत थी, उसके होठों पर एक तीखी मुस्कान थी।
“थप थप थप थप…आआह्ह्ह…अस्स्स..आआह्ह..ठाकुर…थप थप थप…आपका साथी…थप थप थप थप…छोटे ठाकुर..आआह्ह..जल्दी ख़तम कर दिए!..आह..हह..आह्ह…सस..मम्म…मुझे तो …आह्ह्ह..सस..कुछ महसूस ही …आआह्ह..नहीं….आआअह्ह्ह्ह…हुआ…आह्ह..मम्”
उसने विक्रम का उपहास उड़ाते हुए कहा, जबकि वह चोदी जा रही थी, उसकी आवाज़ हर धक्के के साथ काँप रही थी।
कमरे में बैठे दूसरे मर्द भी यह उत्सुकता से देख रहे थे। राजन ने कहा,
“अरे… विक्रम भाई थक गए लगते हैं…” एक और बोला,
“हाँ… इस कुतिया ने इनको ही चूस लिया!…” वे भी अब स्वयं को चुनौतीपूर्ण स्थिति में पा रहे थे।
अब हर कोई उस पल का इंतज़ार कर रहा था… कौन आखिरी तक टिकेगा। लेकिन प्रकृति को कौन हरा सकता था? मीरा का शरीर, हालाँकि दर्द में था, अभी भी लड़ रहा था। विक्रम की आँखों में एक पागलपन सा आ गया था। उसने अपनी आखिरी ताकत जुटाई, अपनी कमर को और तेज, और हिंसक झटके देने के लिए।
“थप-थप-थप-थप-थप!!” आवाज़ें एक दूसरे में मिलकर एक निरंतर गड़गड़ाहट बन गईं।
उसका पूरा शरीर तनाव से कांप रहा था, उसकी गर्दन की नसें रस्सियों की तरह उभरी हुई थीं। वह जानता था कि वह हारने के कगार पर है—न सिर्फ इस शारीरिक लड़ाई में, बल्कि उस इच्छाशक्ति के युद्ध में भी जो मीरा की जलती हुई नज़रों से लड़ा जा रहा था।
“आह्ह… स्स्स… ये… ये नहीं हारेगी…” वह अपने आप से बुदबुदाया, उसकी साँसें टूट रही थीं।
उसने मीरा की जांघों को और जोर से पकड़ लिया, जैसे उसे कुचल देना चाहता हो। लेकिन मीरा की चूत, जो अब पूरी तरह से उसके लंड के आकार में ढल चुकी थी, उसे निचोड़ रही थी, उससे उसकी आखिरी ऊर्जा चूस रही थी। यह एक जीवित, सांस लेती हुई नली थी जो उसे अंदर की ओर खींच रही थी।
अमित पहले से ही मीरा के निचे लेटा हुआ था, हाँफता हुआ, उसकी गांड से उसका निकला हुआ लंड अभी भी चिपचिपा और सूजा हुआ था। उसने विक्रम की ओर देखा, उसकी आँखों में एक खालीपान था, जैसे उसकी सारी ताक़त निकल चुकी हो।
“विक्रम… यार…” वह फुसफुसाया, लेकिन विक्रम सुन नहीं पा रहा था। वह अपनी हार के कगार पर था, और यह जानता था।
गाँव वालों की निगाहें अब सिर्फ विक्रम और मीरा पर टिकी थीं। उन्होंने अपने हाथों की हरकत धीमी कर दी थी, मानो इस निर्णायक क्षण को भंग न करना चाहते हों। सरपंच के बेटे ने अपना मुँह हाथ से ढक लिया, उसकी आँखें फैली हुईं। गजेन्द्र काका की फुसफुसाहट सुनाई दी,
“अब… अब पता चलेगा इन कुत्तो को.!!… प्रकृति का नियम!!…”
और फिर वही हुआ। विक्रम के शरीर में एक अंतिम, हिंसक ऐंठन दौड़ गई। उसकी आँखें पलक झपकाए बिना मीरा में घुस गईं, उसका मुँह एक मूक चीख के लिए खुल गया।
“आआआह्ह्ह्ह!!!!!” उसकी एक लम्बी, फटी हुई चीख ने हवा को चीर दिया। उसने मीरा को अपनी ओर खींचा, उसकी कमर एक अंतिम, ऐंठन भरे धक्के में अकड़ गई।
“थप!!…आआह्ह्ह्ह्ह्ह……थप!!.आआआह्ह्ह…थप!……आआआह्ह्ह…..थप!!…आआआआह्ह्ह्ह्ह.”
हर धक्के के साथ, उसका गाढ़ा, गर्म वीर्य मीरा की चूत की गहराई में उड़ेल दिया गया, उसके गर्भाशय के द्वार तक जा पहुँचा। उसका शरीर एक झटके में ढीला पड़ गया, और वह मीरा के ऊपर इस तरह गिरा जैसे कोई काटा हुआ पेड़। उसकी साँसें भारी और अनियमित थीं, पसीना उसके चेहरे से नदी की तरह बह रहा था।
विक्रम और अमित युद्ध हार गए थे।
खिड़की के बाहर, एक सामूहिक, दबी हुई साँस छोड़ने की आवाज़ आई। गाँव वालों ने एक-दूसरे की ओर देखा। उनके चेहरों पर विजय का भाव था। उन्होंने कुछ ऐसा देखा था जो प्रकृति के नियमों को चुनौती देता था। एक ने दूसरे के कंधे पर हाथ रखा, आँखें नम थीं। उन्होंने अपना वीर्य दीवारों पर, जमीन पर फेंका, लेकिन उन्हें हारे हुए की तरह नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की तरह लगा जिसकी सेना ने एक असंभव लड़ाई जीत ली हो। उनकी नेता जीत गई थी।
कमरे के अंदर, विक्रम और अमित ने किसी तरह अपने बचे-खुचे बल से मीरा को अपने शरीरों से अलग करके एक तरफ धकेल दिया। वे फर्श पर पड़े हुए थे, छाती जोर-जोर से उठ रही थी, आँखें छत की ओर ताक रही थीं। तेज़, तीव्र चोदाई और भावनात्मक हार ने उन्हें लगभग बेहोश कर दिया था। उनकी ऊर्जा का हर कण समाप्त हो चुका था।
लेकिन मीरा को अभी तक संतुष्टि नहीं मिली थी। वह अपने घुटनों और हाथों के बल पर रेंगकर थोड़ी दूर गई, उसका शरीर काँप रहा था, उसकी चूत और गांड से वीर्य और तेल की मिली-जुली धार बह रही थी। लेकिन उसकी आँखों में कोई शिथिलता नहीं थी, कोई समर्पण नहीं था। वह सिर उठाकर बैठ गई, उसकी पीठ सीधी थी।
दूसरे मर्दों का आत्मविश्वास भी कुछ हद तक डगमगा गया था जो हुआ उसे देखकर। राजन ने अपना लंड सहलाना बंद कर दिया था। उसने विक्रम और अमित की ओर देखा, फिर मीरा की ओर। उसके चेहरे पर अविश्वास और एक नई, गहरी चिंता थी।
अमित ने, अपनी साँस फूलते हुए, विक्रम की ओर मुड़कर कहा,
“ये कुतिया है…ह्ह्हआआआ..छिनाल…दिन-ब-दिन मजबूत होती जा रही है…ह्ह्हआआ…”
उसकी आवाज़ में थकान और एक अदम्य हैरानी थी। यह स्वीकारोक्ति थी, एक हारे हुए योद्धा की।
मीरा ने रमेश की ओर देखा, जो अभी भी कोने में खड़ा था, उसका चेहरा आँसुओं और गर्व से चमक रहा था। उसने एक चिढ़ाने वाली, विजयी मुस्कान बिखेरी। उसकी आँखों ने एक स्पष्ट संदेश दिया—दो को निपटा दिया, आठ बाकी हैं। लड़ाई खत्म नहीं हुई थी। यह सिर्फ एक दौर का अंत था।
To be continued . . .
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