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गरीबी का सौदा cuckold बन के किया – 2

गरीबी का सौदा cuckold बन के किया – 1

उस एक रात की कीमत ने ज़मीन के कागज़ तो छुड़ा लिए थे, लेकिन उन दोनों की नसों में एक ऐसा धीमा ज़हर घोल दिया था जिसका असर अब धीरे-धीरे उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर हावी होने लगा था।

कर्ज़ उतरने की खुशी मुश्किल से दो दिन भी नहीं टिक पाई। तीसरे दिन से ही घर के खाली डिब्बों और फटे हुए कपड़ों ने फिर से उनका मुँह चिढ़ाना शुरू कर दिया था।

चिलचिलाती दोपहर में मीरा घर के पिछवाड़े में गोबर के उपले थाप रही थी। पसीने और गोबर की गंध से उसका सिर चकरा रहा था। उसके नाज़ुक हाथों में खुरदरापन आ गया था और सूती साड़ी जगह-जगह से कीचड़ में सन गई थी।

उसने अपने पसीने से भीगे माथे को अपनी कलाई से पोंछा और एक पल के लिए रुक कर अपनी ही हालत को देखने लगी।

“क्या ज़िंदगी है ये?” मीरा के अंदर एक थकी हुई, कुंठित आवाज़ गूँजी।

उसे अचानक विक्रम के फार्महाउस का वो कमरा याद आ गया। गोबर की इस बदबू के बीच उसे अचानक विक्रम के जिस्म से आती हुई महँगी शराब और इत्र की वो तेज़, जंगली महक महसूस होने लगी।

मीरा ने अपनी आँखें बंद कर लीं। उसका शरीर इस धूप से ज़्यादा किसी और ही तपिश से सुलगने लगा। उसे याद आया कि कैसे विक्रम के मोटे, गठीले हाथों ने उसकी कमर को जकड़ा था।

यहाँ वो गोबर और मिट्टी से सनी हुई थी, और वहाँ… वहाँ वो मखमली बिस्तर पर लेटी थी, जहाँ उसे कुछ काम नहीं करना था, बस एक ताकतवर मर्द की हवस का स्वागत करना था। पहले जो चीज़ उसे एक खौफनाक दर्द और मजबूरी लग रही थी, आज इस फालतू के और अंतहीन संघर्ष के बीच, वही रात उसे एक बहुत आसान और उत्तेजक सौदा लगने लगी थी।

“वो जानवर है… उसने मुझे नोचा था,” मीरा ने खुद को एक संस्कारी पत्नी की तरह समझाने की कोशिश की।

“मैं रमेश की पत्नी हूँ।”

लेकिन उसका अपना ही जिस्म उसकी दलीलों को झुठला रहा था। उसे याद आ रहा था कि विक्रम की उन बेरहम चोटों और झटकों ने उसे कैसे उस चरम सुख तक पहुँचाया था, जो उसने ज़िंदगी में कभी महसूस नहीं किया था।

रमेश के साथ बिस्तर पर वो सिर्फ एक कर्त्तव्य निभाती थी, लेकिन विक्रम के नीचे… वो एक भूखी औरत बन गई थी। मीरा की जांघों के बीच एक अजीब सी गर्माहट फैल गई।

उसने जल्दी से आँखें खोलीं और फिर से उपले थापने लगी, लेकिन अब उसे इस गरीबी और ईमानदारी से सख्त चिढ़ होने लगी थी। उसे लगने लगा था कि जब उसका शरीर इतनी आसानी से उसकी सारी ज़रूरतें पूरी कर सकता है, तो वो क्यों इस नर्क में सड़ रही है?

उधर, गाँव से कुछ दूर शहर की अनाज मंडी में रमेश बोरियाँ ढो रहा था। उसकी पीठ दर्द से टूट रही थी और नंगे पैरों में छाले पड़ गए थे।

“अरे ओ सुस्त मुर्गे! जल्दी हाथ चला, दिन भर का पैसा मुफ्त में नहीं दूँगा!”

ठेकेदार ने गंदी सी गाली देते हुए रमेश पर चिल्लाया। रमेश ने खून का घूँट पी लिया। उसने 50 किलो की बोरी अपनी पीठ पर लादी और ट्रक की तरफ बढ़ने लगा। पसीने से लथपथ रमेश के दिमाग में ठेकेदार की गाली गूँज रही थी।

“सौ रुपये… सौ रुपये के लिए मुझे ये कुत्ता गालियाँ दे रहा है,” रमेश के अंदर का आक्रोश उबलने लगा।

लेकिन अगले ही पल, उसका दिमाग एक झटके से विक्रम के फार्महाउस की तरफ खिसक गया।

“उस रात मैंने सिर्फ कुर्सी पर बैठकर अपनी लुगाई को देखा था… और दो लाख रुपये मिल गए थे।”

यह विचार रमेश के दिमाग में किसी मीठे ज़हर की तरह फैल गया। उसे याद आया कि कैसे विक्रम ने उसकी आँखों के सामने मीरा के जिस्म को बेपर्दा किया था। वो नज़ारा, वो बेबसी, वो ताकत का मुज़ाहिरा—रमेश की पीठ का दर्द अचानक एक अजीब सी कामुक उत्तेजना में बदल गया।

उसे खुद पर शर्म आनी चाहिए थी, लेकिन बोरी ढोते हुए उसे अपने पतलून में एक ज़बरदस्त कड़ापन महसूस होने लगा। उसे वो रात दोबारा जीने की, वो ‘तमाशा’ दोबारा देखने की एक गंदी, लेकिन नशीली लत लग रही थी।

उसे मज़ा आने लगा था यह सोचकर कि विक्रम जैसा रसूखदार इंसान उसकी बीवी के लिए किस कदर पागल था।

“ये ईमानदारी, ये मज़दूरी… सब बकवास है,” रमेश ने मन ही मन सोचा।

शाम को जब रमेश घर लौटा, तो उसके हाथ में सिर्फ सौ रुपये थे। उसका शरीर थकान से चूर था। आँगन में मीरा ने उसको पानी का लोटा दिया। दोनों खटिया पर अगल-बगल बैठे थे। रात का अंधेरा घिर आया था और दोनों एक-दूसरे से अपना-अपना असली रूप छुपाते हुए एक आदर्श पति-पत्नी का नाटक कर रहे थे।

“आज ठेकेदार ने सिर्फ सौ रुपये दिए। कह रहा था कल पूरा हिसाब करेगा,”

रमेश ने अपनी नज़रें चुराते हुए, एक लाचार और मेहनती पति की तरह कहा। मीरा ने रमेश के थके हुए पैरों को दबाना शुरू किया।

“कोई बात नहीं जी। आप इतनी मेहनत करते हैं, भगवान सब देख रहा है। हम ईमानदारी की सूखी रोटी खा लेंगे, पर किसी के आगे हाथ नहीं फैलाएंगे।”

मीरा के मुँह से ‘ईमानदारी’ शब्द सुनकर रमेश को अंदर ही अंदर खीझ हुई, लेकिन उसने बाहर से मुस्कुरा दिया।

“तू बहुत अच्छी है मीरा। तेरी किस्मत खराब है जो तुझे ये दिन देखने पड़ रहे हैं, मेरी वजह से।”

रमेश ने मीरा के कंधे पर हाथ रखा और उसे अपनी तरफ खींचा। वह चाहता था कि उस रात फार्महाउस वाली आग उसे यहाँ अपने बिस्तर पर मिले। उसने मीरा के होंठों को चूमना चाहा। लेकिन मीरा का मन कहीं और था।

रमेश की कमज़ोर, थकी हुई बाँहों में उसे वो रोमांच, वो जंगलीपन महसूस ही नहीं हो रहा था जिसकी उसे अब भूख लग चुकी थी। मीरा ने धीरे से रमेश को खुद से दूर कर दिया।

“जी, आप बहुत थके हुए हैं। आज आराम कर लीजिए। कल फिर से आपको मंडी जाना है न।”

मीरा ने बहुत प्यार से यह बात कही थी, लेकिन दोनों के अंदर एक खामोश चीख थी। रमेश को महसूस हुआ कि उसकी अपनी पत्नी अब उसके छुअन से सुलग नहीं रही है। और मीरा को महसूस हो रहा था कि रमेश का यह दब्बू और लाचार रूप उसे अब बिल्कुल नहीं सुहाता।

“हाँ… ठीक कह रही है तू,” रमेश ने दूसरी तरफ करवट लेते हुए कहा।

अंधेरे कमरे में दोनों खुली आँखों से छत को घूर रहे थे। दोनों साथ थे, लेकिन मीलों दूर थे। मीरा सोच रही थी कि कैसे विक्रम के पास जाने का कोई बहाना मिले, और रमेश सोच रहा था कि कब फिर से विक्रम का बुलावा आए और वो अपनी ही आँखों के सामने वो खौफनाक और उत्तेजक तमाशा देख सके।

दोनों इस रोज़मर्रा की मज़दूरी और ईमानदारी की दमघोंटू ज़िंदगी से ऊब चुके थे, लेकिन समाज और एक-दूसरे की नज़रों में शरीफ बने रहने का नाटक उन्हें मजबूर किए हुए था।

एक दिन दोपहर का वक्त था। मीरा गाँव के लाला की परचून की दुकान पर खड़ी थी। चिलचिलाती धूप में उसका पसीने से भीगा सूती ब्लाउज़ उसके बदन से चिपका हुआ था।

“लाला जी, बस दो किलो आटा और थोड़ी सी दाल दे दो। रमेश को जैसे ही सड़क वाले काम की दिहाड़ी मिलेगी, मैं पाई-पाई चुका दूँगी,”

मीरा ने अपनी नज़रें झुकाते हुए, पल्लू को सँभालते हुए कहा। लाला गल्ले पर बैठा अपने पीले दाँत चबा रहा था। उसकी गिद्ध जैसी नज़रें मीरा की पसीने से भीगी, गहरी होती छाती की दरार पर टिकी थीं।

“अरे मीरा बहू, पिछला खाता तो अभी नील हुआ नहीं, नया उधार कैसे लिख दूँ? तेरा वो नकारा पति तो एक धेला नहीं कमाता।”

लाला ने अपना हाथ गल्ले से निकालकर मीरा की तरफ बढ़ाया, जैसे उसे छूना चाहता हो।

“हाँ, अगर तू चाहे तो… मेरे पीछे वाले गोदाम में आ जा, आटा-दाल क्या, तुझे घी के पीपे दे दूँ।”

मीरा ने झटके से अपने कदम पीछे खींच लिए। उसकी आँखें गुस्से और अपमान से लाल हो गईं।

“ज़बान सँभाल कर बोल लाला! गरीब हूँ, कोई बाज़ारू औरत नहीं जो तेरे जैसे…”

“अरे जा जा! बड़ी आई सती सावित्री!” लाला ने बीच में ही मुँह बनाते हुए कहा।

“सब पता है गाँव में कि ज़मींदार का कर्ज़ कैसे उतारा है तेरे नामर्द पति ने। जब बड़े ठाकुर के बिस्तर की शोभा बढ़ा सकती है, तो यहाँ मुफ्त का नखरा क्यों?”

यह ताना सुनते ही मीरा के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह बिना कुछ बोले, खाली हाथ वहाँ से लौट पड़ी। तेज़ धूप में गाँव की धूल भरी पगडंडी पर चलते हुए उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन ये आँसू सिर्फ अपमान के नहीं थे।

लाला की बातों ने उसके अंदर एक ऐसा घाव कुरेद दिया था जिसके नीचे एक भयानक आग सुलग रही थी।

“इज़्ज़त?”

मीरा ने मन ही मन खुद से सवाल किया।

“किस बात की इज़्ज़त? इस फटे हुए ब्लाउज़ में रोज़ गाँव के लुच्चों की नज़रें बर्दाश्त करने की इज़्ज़त? या खाली पेट ज़मीन पर भूखे सोने की इज़्ज़त?”

उसी शाम, घर में मीरा ने रोटी बनाई। रमेश ने चुपचाप खाना खाया।

“जी, खाना खा लीजिए। सूखी रोटी और थोड़ा सा गुड़ है,”

मीरा ने अपनी नज़रें ज़मीन पर गड़ाए हुए कहा। उसने अपना पल्लू सिर पर सलीके से रख लिया था, जैसे गाँव की कोई आम, संस्कारी बहू हो।

“हाँ, ला दे। कल मैं शहर जाकर ठेकेदार से बात करूँगा। मज़दूरी मिल जाएगी तो आटा ले आऊँगा,”

रमेश ने भी अपनी दब्बू, लाचार पति वाली छवि ओढ़ते हुए जवाब दिया। उसने मीरा से आँखें मिलाने की कोशिश तक नहीं की। दोनों एक-दूसरे से और खुद से भी यह झूठ बोल रहे थे कि वे उस रात को भूल चुके हैं। लेकिन हकीकत यह थी कि उनके मन के अंदर एक बिल्कुल अलग, खौफनाक और उत्तेजक दुनिया चल रही थी।

चूल्हे के पास बैठी मीरा जब गीली लकड़ियों में फूँक मारती, तो धुएं की घुटन में भी उसे विक्रम के उस एसी वाले कमरे की महक आने लगती। उसकी साँसें भारी हो जातीं। वह खुद को एक पतिव्रता औरत दिखाने का ढोंग कर रही थी, लेकिन उसके अंदर का वो शिकारी जानवर अब खून चख चुका था।

उसे याद आ रहा था कि कैसे उस रात दर्द की उन भयानक चीखों के बीच, विक्रम की उस बेतहाशा ताकत और जंगली मर्दानगी ने उसे वो चरम सुख दिए थे, जिसकी उसने रमेश के साथ बिताए इन सात सालों में कभी कल्पना भी नहीं की थी।

मीरा के बदन में सिहरन दौड़ गई जब उसे विक्रम का वो खुरदरा फरमान याद आया। विक्रम ने उसके बाल अपनी मुट्ठी में जकड़े थे और उसका चेहरा उस अंधेरे कोने की तरफ मोड़ दिया था जहाँ रमेश बैठा था।

“देख… आँखें खोल कर देख उधर!” विक्रम की गुर्राती हुई आवाज़ उसके कानों में गूँजी थी।

“देख अपने उस नामर्द पति को! वो बस बैठकर तमाशा देख सकता है रांड, तेरी इस गर्मी को शांत करना उसके बस का नहीं है!”

उस वक्त मीरा शर्म से मर जाना चाहती थी, लेकिन आज… आज उसे महसूस हो रहा था कि विक्रम के उस नंगेपन और आक्रामकता के बिना उसका अपना जिस्म सूखा जा रहा है।

उधर आँगन में बैठा रमेश खटिया की रस्सी बुनने का नाटक कर रहा था। लेकिन उसका दिमाग भी उसी फार्महाउस के बिस्तर के चक्कर काट रहा था। रमेश के अंदर एक अजीब सा, विकृत मानसिक बदलाव आ चुका था। उसे अपनी गरीबी पर रोना नहीं, बल्कि उस रात के तमाशे को याद करके एक भयानक उत्तेजना आ रही थी।

“विक्रम जैसा रसूखदार ज़मींदार… जो मुझे कीड़े-मकोड़े की तरह समझता है, वो मेरी औरत के लिए जानवर बन गया था,”

रमेश ने एक गहरी साँस खींचते हुए सोचा। उसकी आँखों में एक हवस भरी चमक आ गई।

“पूरे गाँव की सबसे खूबसूरत औरत मेरी बीवी है। बड़े-बड़े पैसे वाले उसके लिए पागल हैं… और मैं, मैं वहाँ बैठकर अपनी औरत को उनके मजे लेते हुए देख सकता हूँ।”

अपनी ही पत्नी को, सरेआम, किसी और मर्द के बिस्तर पर इस्तेमाल होते देखने की उस याद में रमेश को अब घिन नहीं, बल्कि एक अजीब सा नशा मिल रहा था। वह आज भी मीरा से उतना ही प्यार करता था, लेकिन अब उस प्यार में एक विकृत गर्व जुड़ गया था।

अचानक बाहर कच्ची सड़क पर एक बुलेट के रुकने की आवाज़ आई। दोनों अपने-अपने ख्यालों से झटके से बाहर आए। रमेश ने उठकर दरवाज़ा खोला। सामने विक्रम का खास आदमी, रंगा, खड़ा था।

मुँह में पान चबाते हुए उसने रमेश को हिकारत से देखा। मीरा भी चूल्हे से उठकर दरवाज़े के पास आ गई, लेकिन उसने खुद को दरवाज़े की आड़ में रखा।

“क्या बात है रंगा भाई?” रमेश ने अपनी आवाज़ में हल्की सी घबराहट लाते हुए पूछा।

“बात क्या होनी है बे?” रंगा ने पान की पीक आँगन के बाहर थूकते हुए कहा।

उसकी नज़रें दरवाजे की ओट में खड़ी मीरा पर टिक गईं।

“छोटे ठाकुर ने याद किया है। कर्ज़ तो उतर गया, लेकिन घर में तुम्हारे चूल्हा नहीं जल रहा, ये पूरे गाँव को पता है। आज रात फार्महाउस पर इंतज़ाम है। तीन हज़ार रुपये देंगे। भेज देना अपनी घरवाली को।”

तीन हज़ार का नाम सुनते ही रमेश के अंदर का वो विकृत मन खुशी से उछल पड़ा—’आज रात फिर से वो नज़ारा!’ लेकिन उसने फौरन एक इज़्ज़तदार, स्वाभिमानी पति का मुखौटा पहन लिया।

“ज़बान सँभाल कर बात कर रंगा!” रमेश ने अपनी आवाज़ को ऊँचा करते हुए कहा, मानो उसे बहुत गुस्सा आ रहा हो।

“निकल जा मेरे दरवाज़े से! कर्ज़ चुकता हो गया है। हम गरीब हैं, लेकिन मेरी बीवी कोई बाज़ार की चीज़ नहीं है कि जब ठाकुर का मन किया, पैसे फेंक दिए। मैं भूखा मर जाऊँगा, मज़दूरी कर लूँगा, लेकिन अपनी घरवाली को उस नर्क में दोबारा नहीं भेजूँगा!”

रमेश की इस ‘शेर जैसी’ दहाड़ को सुनकर रंगा एक पल के लिए चौंका। रमेश मन ही मन डर भी रहा था कि कहीं रंगा सच में वापस न चला जाए।

“ठीक है बे नामर्द, सड़ा अपनी लुगाई को इसी झोपड़े में,” रंगा ने मुँह बनाते हुए कहा और अपनी बुलेट स्टार्ट करने लगा।

तभी मीरा दरवाज़े से बाहर निकल आई।

“रुक जाओ रंगा भाई!” रमेश ने चौंक कर मीरा की तरफ देखा।

“मीरा? तू अंदर जा!”

लेकिन मीरा ने रमेश की बात को अनसुना कर दिया। उसने भी एक लाचार, लेकिन मजबूर औरत का बेहतरीन नाटक शुरू कर दिया।

“इनकी बातों पर मत जाइए, ये इनका स्वाभिमान बोल रहा है,”

मीरा ने अपनी नज़रें झुकाते हुए, एक दुखी आवाज़ में कहा, जबकि अंदर ही अंदर उसका बदन विक्रम के पास जाने के लिए मचल रहा था।

“घर में एक दाना नहीं है। कल लाला ने उधार देने से मना कर दिया। लेकिन… तीन हज़ार में अब घर नहीं चलता।”

रंगा ने अपनी बुलेट बंद कर दी।

“तो क्या ठाकुर की जायदाद नाम कर दे तेरे?”

“मुझे जायदाद नहीं चाहिए। लेकिन तुम्हारे छोटे ठाकुर को मेरी ज़रूरत है,”

मीरा ने अचानक अपनी आँखें रंगा पर गड़ा दीं। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी खनक थी।

“जाकर कह दो, आठ हज़ार से एक रुपया कम नहीं लूँगी।”

रमेश का मुँह खुला का खुला रह गया। उसने मीरा का हाथ पकड़ लिया।

“मीरा, तू पागल हो गई है? क्या बक रही है? तू नहीं जाएगी वहाँ, मैं कह रहा हूँ न!”

रमेश पूरी शिद्दत से उसे रोकने का नाटक कर रहा था, लेकिन उसकी उँगलियों की छुअन में मीरा के लिए एक अजीब सी तारीफ और उत्तेजना थी।

“मुझे रोकने की कोशिश मत करो जी,” मीरा ने रमेश का हाथ झटकते हुए, रोने का नाटक किया।

“अगर ये पैसे नहीं आए, तो हम भूखे मर जाएंगे। मुझे पता है मैं गंदी हो रही हूँ, लेकिन यह सब हमारे लिए ही तो है!”

रंगा का चेहरा गुस्से से लाल हो गया।

“तेरा दिमाग खराब हो गया है छिनाल! आठ हज़ार? इससे कम में तो शहर की रंडियां…”

“जाकर पूछ ले अपने ठाकुर से,” मीरा ने अपने आँसू पोंछते हुए रंगा को बिच में ही रोक दिया।

“अगर मंज़ूर हो तो शाम को गाड़ी भेज देना, वरना मत आना।”

रंगा दाँत पीसता हुआ अपनी बुलेट पर बैठा और उसने वहीं से विक्रम को फोन लगाया। कुछ देर बाद वह वापस मुड़ा।

“पाँच हज़ार,” रंगा ने चिढ़ते हुए कहा।

“छोटे ठाकुर ने कहा है पाँच हज़ार मिलेंगे। शाम को गाड़ी आ जाएगी। तैयार रहना।” रंगा वहाँ से धूल उड़ाता हुआ चला गया।

आँगन में भारी सन्नाटा छा गया। रमेश ने दरवाज़ा बंद किया और ज़मीन पर बैठ गया, अपने दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ लिया।

“तूने ये क्या किया मीरा?” रमेश ने सिसकते हुए, एक हारे हुए पति का नाटक जारी रखा।

“तुझे क्या लगता है मुझे अच्छा लगता है तुझे वहाँ भेजना? मैं उस ज़मींदार का खून पी जाना चाहता हूँ! मैं बहुत अभागा हूँ कि तुझे मेरी वजह से ये सब दोबारा सहना पड़ेगा। उस जानवर ने तुझे उस रात कैसे नोचा था… मुझे सब याद है।”

मीरा भी रमेश के पास ज़मीन पर बैठ गई। उसने अपने हाथ रमेश के कंधों पर रखे और एक सती-सावित्री की तरह बोली।

“मुझे भी वो रात याद है जी। मुझे पता है वो जानवर है, मुझे दर्द होगा… बहुत घिन आएगी,”

मीरा ने झूठ बोलते हुए कहा, जबकि उसका जिस्म उस ‘जानवर’ की जंगली हवस को याद करके अंदर से सुलग रहा था।

“लेकिन हम क्या करें? हमारे पास कोई रास्ता नहीं है। मैं सिर्फ आपके लिए और इस घर के लिए अपनी आबरू का घूंट पी रही हूँ। पाँच हज़ार से हमारी ज़िंदगी पटरी पर आ जाएगी। बस… बस यह आखिरी बार है।”

“हाँ मीरा… बस इस बार। मैं कसम खाता हूँ,” रमेश ने उसे गले लगाते हुए कहा।

वे दोनों एक-दूसरे की बाँहों में थे। दोनों रोने और मजबूरी का बेहतरीन नाटक कर रहे थे। लेकिन इस झूठे आँसुओं और ढोंग के बीच, दोनों के दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहे थे।

रमेश अपने दिमाग में आज रात मिलने वाले उस कामुक नज़ारे की कल्पना करके उत्तेजित हो रहा था, और मीरा इस ‘मजबूरी’ की आड़ में विक्रम के उस मखमली बिस्तर और उन झटकों को दोबारा महसूस करने की आग में जल रही थी।

शाम का धुंधलका गाँव के कच्चे रास्तों पर उतरने लगा था। रमेश और मीरा के कच्चे घर में आज कोई लालटेन नहीं जलाई गई थी। अंधेरे में सिर्फ उनकी भारी साँसें और एक अनकही, खौफनाक बेचैनी महसूस की जा सकती थी।

मीरा चूल्हे के पास बैठी थी, उसकी उँगलियाँ अपनी साड़ी के पल्लू को बेतरतीब ढंग से मसल रही थीं। रमेश दरवाज़े के पास खड़ा था, कभी अंदर की तरफ देखता, कभी बाहर के गहराते अँधेरे को।

कुछ ही देर में, बाहर कच्ची सड़क पर विक्रम की उसी काली suv की तेज़ हेडलाइट ने उनके घर के छप्पर को रोशन कर दिया। इंजन की गुर्राहट ने आसपास के कुत्तों के भौंकने की आवाज़ को दबा दिया।

रोशनी की लकीरें दरारों से होकर कमरे के अंदर तक आईं, जिससे मीरा का पसीने से चिपका चेहरा और रमेश की बेचैन आँखें एक पल के लिए साफ़ नज़र आए।

“गाड़ी आ गई है,”

रमेश ने अपनी आवाज़ में उसी ‘लाचार पति’ वाले नाटक को बरकरार रखते हुए कहा। उसने गहरी साँस ली, मानो कोई भारी बोझ उठा रहा हो। लेकिन उसका दिल किसी इंजन की तरह धड़क रहा था – तेज़, अनियंत्रित, और एक अजीब सी उत्तेजना से भरा हुआ।

मीरा ने धीरे से उठकर अपना सूती पल्लू सँभाला। आज उसने अपनी साड़ी को थोड़ा अलग ढंग से लपेटा था। पल्लू को कंधे पर रखने के बजाय, उसने उसे कमर के पीछे से लपेटकर सामने लाया था, जिससे उसकी गदराई हुई कमर का एक हिस्सा और जांघों का घुमाव साफ झलक रहा था।

उसने रमेश की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक झूठा आँसू लाने की कोशिश की, पलकें झपकाईं, और फुसफुसाकर बोली,

“भगवान हमें इस पाप के लिए माफ करे जी।”

रमेश ने हामी में सिर हिलाया, उसकी आवाज़ अटकी हुई थी।

“हाँ… भगवान हमारी मजबूरी देख रहा है।”

लेकिन जब मीरा दरवाज़े की तरफ मुड़ी, तो रमेश की नज़रें उसकी मटकती हुई कमर पर ऐसे गड़ गईं जैसे वो भी विक्रम की तरह एक भूखा शिकारी हो। उसने देखा कि कैसे साड़ी का पतला कपड़ा उसके भरवां गांड के उभारों पर टिका हुआ है, और हर कदम के साथ वह उभार एक लय में हिलता है।

उसके मन में एक विचित्र गर्व की लहर दौड़ गई – ‘मेरी बीवी… पूरे गाँव की औरतों में सबसे ज्यादा गरम है।’

ड्राइविंग सीट पर विक्रम खुद बैठा था। वह अपने लंबे, गठीले हाथ स्टीयरिंग पर रखे था। उसके काले घने बाल पसीने से चिपके हुए थे। उसने एक साधारण सफेद बनियान पहन रखी थी, जिससे उसकी चौड़ी छाती और पेट पर जमी मांसपेशियाँ साफ़ उभर रही थीं।

बनियान के नीचे उसके सीने के काले घने बाल दिख रहे थे। उसने अपना सिगार होठों में दबा रखा था और उसकी आँखों में मीरा को देखते ही एक जंगली चमक आ गई, जैसे कोई शेर अपने शिकार को निहार रहा हो।

रमेश बिना कुछ बोले पीछे की सीट पर सरक गया। उसकी हरकत में एक अजीब सी विनम्रता थी, जैसे वह अपनी ही जगह जानता हो। मीरा ने आगे की सीट का दरवाज़ा खोला और विक्रम के बगल में बैठ गई।

उसने अपनी साँस को रोके रखने की कोशिश की, लेकिन विक्रम के शरीर से आ रही महँगी इत्र और पुराने पसीने की मिली-जुली गंध ने उसके नथुनों को भर दिया। उस गंध ने उसे सीधे उस रात में पहुँचा दिया – मखमली चादरों, दर्द, और उस अथाह सुख की याद दिला दी।

गाड़ी जैसे ही कच्चे रास्तों से पक्की सड़क पर आई, विक्रम ने स्टीयरिंग से बायाँ हाथ हटाया और सीधे मीरा की जांघ पर रख दिया। उसका हाथ भारी, गर्म और खुरदरा था।

पिछली बार जब ऐसा हुआ था, तो मीरा का शरीर पत्थर हो गया था और उसके मुँह से एक दर्द भरी सिसकी निकली थी। लेकिन आज… आज मीरा ने कोई विरोध नहीं किया। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।

उसके होठों पर एक हल्की सी कंपकंपी दौड़ गई। फिर, जैसे कोई फैसला कर लिया हो, उसने अपने पैरों को हल्का सा ढीला छोड़ दिया।

उसकी जांघों के मांसपेशियों का तनाव कम हुआ, जिससे विक्रम का भारी हाथ उसकी साड़ी के ऊपर से उसकी जांघों के मांस को और गहराई से, और दबाव के साथ टटोलने लगा। उसकी उँगलियाँ धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढ़ीं, उसकी भीतरी जांघ के नर्म हिस्से को दबाने लगीं।

पीछे बैठे रमेश ने यह सब देखा। गाड़ी का अंदरूनी लाइट बंद था, लेकिन बाहर से आती स्ट्रीट लाइट्स की रोशनी में वह साफ देख सकता था। उसने देखा कि कैसे मीरा ने अपने होंठों को हल्के से काट रखा है, उसके नथुने फड़क रहे हैं और उसकी साँसें तेज़ और उखड़ी हुई हो गई हैं।

रमेश की मुट्ठियाँ भिंच गईं, लेकिन इस बार लाचारी या अपमान से नहीं। उसकी पतलून के अंदर एक ज़बरदस्त कड़ापन आ गया था, उसका लंड तन कर सख्त हो गया था और उसके अंडकोष में एक गहरी, खिंचाव वाली उत्तेजना महसूस हो रही थी।

अपनी ही पत्नी को किसी और मर्द के छुअन पर सुलगते हुए, उसकी हर साँस के साथ उत्तेजित होते हुए देखने का यह विकृत नशा रमेश के दिमाग में किसी मीठे ज़हर की तरह फैलने लगा था।

उसने अपनी जेब में हाथ डाला और वहाँ दबे पाँच हज़ार रुपयों के नोटों को छुआ। यह पैसा उसकी इस विकृति की कीमत था, और आज यह कीमत उसे और भी मीठी लग रही थी।

फार्महाउस के बाहरवाले लोहे के गेट के सामने गाड़ी रुकी। विक्रम ने बिना कुछ कहे गेट खोला और गाड़ी अंदर ले गया। बंगला पहले जैसा ही था – बड़ा, सुनसान, और अंधेरे में डूबा हुआ।

वह सीधे मुख्य दरवाज़े के सामने रुका। हॉल में एक मंद लाइट जल रही थी। विक्रम ने गाड़ी का इंजन बंद किया और तुरंत बाहर निकला। मीरा ने धीरे से दरवाज़ा खोला, उसके पैर जमीन पर पड़ते ही काँप गए।

पाँच हज़ार रुपये के नोटों का गड्डा टेबल पर पड़ा था, जैसे कोई शिकार का इनाम। विक्रम ने उन्हें एक तिरछे झटके के साथ रमेश की ओर फेंका, नोट हवा में बिखर गए।

उसकी नज़रें नोटों पर नहीं, सीधी मीरा पर गड़ी थीं, जो दरवाज़े के पास खड़ी सहमी हुई मुद्रा में थी। उसकी आँखों में एक जानवरी चमक थी, जैसे कोई शेर शिकार को निहार रहा हो।

“पाँच हज़ार…” विक्रम का स्वर भारी और गर्द से भरा था, जो कमरे की नम हवा में कंपन पैदा कर रहा था।

“तेरी इस रांड की चूत का भाव बढ़ गया है, रमेश।” उसने एक ठंडी, बेरहम हँसी हँसी।

“पर आज तो मैं उसकी चूत को छोड़कर… दूसरे हिस्से का इस्तेमाल करने वाला हूँ।”

रमेश ने जमीन पर बिखरे नोटों को एकत्र करने के लिए झुकते हुए अपना चेहरा छिपा लिया। उसके हाथ काँप रहे थे। उसने नोटों को जेब में ठूँसा, उसकी आवाज़ में एक नाटकीय, झूठा आक्रोश था।

“ठाकुर साहब, ये… ये ज़्यादती है। मीरा की इज्ज़त का ख्याल कीजिए। हम गरीब हैं, लेकिन इज्ज़त…”

“इज्ज़त?”

विक्रम ने उसकी बात काट दी, उसकी आवाज़ अचानक चाकू की धार जैसी तीखी हो गई। उसने मीरा की ओर इशारा किया, जो अब भी दरवाज़े के पास जमी हुई सी खड़ी थी।

“तेरी बीवी की इज्ज़त उसकी गांड में बंद है, रमेश। और आज… मैं उसे वहीं से निकालने वाला हूँ।”

शब्दों का यह हमला मीरा पर एक थप्पड़ की तरह पड़ा।

गांड? मेरी गांड? उसका दिमाग एकदम सुन्न हो गया। उसकी रीढ़ की हड्डी में एक सिहरन दौड़ गई, डर और एक अबूझ, गहरी उत्तेजना का अजीब मिश्रण। उसकी आँखें अपने आप ही रमेश की ओर मुड़ गईं, मदद की एक मूक गुहार लिए।

“कुछ तो बोलो… रुक जाने को कहो…”

रमेश ने अपनी मुट्ठियाँ भिंचीं, उसकी नसें गर्दन पर उभर आईं। उसका चेहरा शर्म और क्रोध के मिश्रण से लाल हो गया।

“नहीं… छोटे ठाकुर, ऐसा नहीं हो सकता!”

उसकी आवाज़ बैठी हुई थी।

“यह तो… पाप है!”

लेकिन उसके शरीर ने एक अलग कहानी कही। उसकी पतलून के अंदर, एक गहरी, शर्मनाक उत्तेजना जाग उठी। उसका लंड सख्त होकर उठने लगा।

“मेरी मीरा… उसकी कुवारीं गांड… किसी और के हाथों…” यह विचार ही उसे रोमांच से भर देने वाला था।

“चुप रह, कायर!”

विक्रम ने गुर्राते हुए कहा, उसकी नज़रों में रमेश के लिए सिर्फ तिरस्कार था। उसने तेजी से आगे बढ़कर मीरा की पतली बाँह को अपने मजबूत हाथों में जकड़ लिया।

“तेरे जैसे नामर्द के लिए यही बचता है… देखना।”

मीरा ने प्रतिरोध करने की कोशिश की, उसके पैर जमीन से चिपक गए।

“नहीं… जी…” उसकी आवाज़ एक फुसफुसाहट थी।

लेकिन विक्रम के लिए यह सब मात्र एक औपचारिकता थी। उसने उसे आसानी से खींचकर बिस्तर वाले कमरे में ले गया। कमरे में प्रवेश करते ही उसने मीरा को अपने ऊपर ऐसे सटा दिया कि उसकी पीठ उसके सीने से चिपक गई।

उसके शरीर की गर्मी, उसकी मांसपेशियों की कड़काहट मीरा को एक झटके की तरह लगी। विक्रम ने रमेश की ओर देखा, जो दहलीज पर डरा-सा खड़ा था।

“आज का नज़ारा तुम्हारे लिए नया होगा, रमेश,” उसने कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी शिक्षक वाली ठंडक थी।

“देखना मत भूलना। तुम्हारी पत्नी को ‘सही’ तरीके से लेने का पाठ।”

इससे पहले कि मीरा कुछ समझ पाती, विक्रम ने उसे जोर से पलट दिया, उसका मुंह बिस्तर की चादर की ओर हो गया। उसने एक ही झटके में उसकी साड़ी को निचे से उठा दिया। ठंडी हवा उसकी नंगी त्वचा से टकराई।

उसकी गांड सफेद चादर के बीच एक नर्म, गोल निशान की तरह उभर आई। चिकनी, बिल्कुल साफ मुंडी हुई। और बीच में, एक गहरे गुलाबी रंग का छोटा सा छेद, जो डर और उत्तेजना से थोड़ा सिकुड़ा हुआ था, टिमटिमा रहा था।

“भेनचोद! क्या नज़ारा है!,”

विक्रम ने कहा, उसकी आवाज़ में विस्मय और स्वामित्व का भाव मिला हुआ था। उसने अपना हाथ उस पर रखा, उसके नर्म गोले को दबाया।

“तैयार हो जा, रंडी। तेरी कुवारीं गांड की आखिरी रात है।”

मीरा आगे की ओर झटका खा गई। उसके हाथों ने चादर को जकड़ लिया, उसके पोर सफेद हो गए।

“ठाकुर साहब…” उसकी आवाज़ घुटी हुई थी, आँसूओं से भरी। “यह… गलत…”

“ढीला छोड़,”

विक्रम ने उसके कान में फुसफुसाया, उसकी साँस गर्म और भारी थी।

“तू जानती है कि तुझे यह चाहिए। तेरा शरीर… रमेश के लिए कभी नहीं चिल्लाया जैसे मेरे लिए चिल्लाता है।”

उसने लुब्रिकेंट का ट्यूब निकाला। जेल की ठंडक मीरा की गर्म त्वचा पर एक और झटका थी। विक्रम ने अपनी उँगलियों पर उदारता से जेल लगाया, बिना किसी और चेतावनी के, उसने अपनी चिकनाई वाली उँगली सीधे उसके गांड के छेद के तंग छल्ले पर दबा दी।

“आहह्ह्ह्ह!”

मीरा की चीख कमरे में गूंज गई। यह दर्दनाक नहीं था, ठीक ठीक नहीं, लेकिन यह एक अभूतपूर्व, गहरी भराव की अनुभूति थी। एक ऐसी जगह जहाँ कभी कुछ नहीं गया था, अचानक आक्रमण कर दिया गया था।

उसकी आँखें फैल गईं, उसकी पुतलियाँ डर और आश्चर्य से फैल गईं। उसकी साँस रुक सी गई, फिर एक हिचकी भरी सिसकी के साथ छूटी।

उसका शरीर सहज रूप से जकड़ गया, एक किले का दरवाज़ा बंद होने की तरह। लेकिन विक्रम धैर्यवान था। एक शिकारी जो अपने शिकार के घबराने का इंतज़ार कर रहा हो। वह दबाव बनाए रहा, धीरे-धीरे, लगातार, उसकी मांसपेशियों को आदेश देता रहा, अपनी उपस्थिति के आगे झुकने के लिए।

रमेश दहलीज पर जड़ होकर खड़ा देखता रहा, उसका मुँह खुला हुआ था। उसने देखा कि कैसे उसकी पत्नी की पीठ एक सुंदर मेहराब की तरह उभर आई, उसकी रीढ़ की हड्डी के नीचे का उभार तनाव से काँप रहा था।

उसकी छाती पर एक गुलाबी लालिमा फैल रही थी, उसकी साँसें उथली और तेज़ हो गई थीं। यह मंत्रमुग्ध कर देने वाला था। यह वह मीरा नहीं थी जिसे वह जानता था। यह एक कच्ची, जंगली शारीरिकता थी, जो दर्द और आनंद के कगार पर डगमगा रही थी। उसे खोला जा रहा था, और वह… ले रही थी।

विक्रम ने एक और उँगली जोड़ी, उसे और खींचते हुए। मीरा का सिर पीछे की ओर गिर गया, उसकी गर्दन का नाजुक घुमाव ठंडी हवा के लिए उजागर हो गया। उसके होठों से एक नीची, दबी हुई कराह निकली। यह दर्द की नहीं थी।

यह एक तीव्र, अत्यधिक संवेदना की आवाज़ थी। तंगी असहज थी, लेकिन उत्तम भी। यह एक गहरा, लंगर डालने वाला दबाव था जो उसे एक ऐसा भराव दे रहा था जो उसकी चूत ने कभी नहीं दिया था।

“इसे देख, रमेश!”

विक्रम ने कहा, उसकी आवाज़ अब पूरी तरह से स्थिर और नियंत्रण में थी, एक गुरु अपने शिष्य को निर्देश देते हुए।

“यह रांड ले रही है। सीख रही है। अपने असली रूप के बारे में।”

रमेश ने अपनी बीवी के चेहरे को देखा। उसकी आँखें अर्ध-बंद थीं, पलकें काँप रही थीं। उसके होठ खुले हुए थे, और अधिक की एक मूक, शर्मिंदा याचना लिए। उसे गर्व की एक विषम लहर महसूस हुई।

हाँ, लेकिन एक अजीब, अंधेरा वर्चस्व भी। इजाज़त देकर, देखकर, वह इसका हिस्सा था। वह घर का मालिक था, इस अजनबी को अपनी बीवी को जीतने की अनुमति दे रहा था, और ऐसा करके, वह उस शक्ति को फिर से हासिल कर रहा था जो उसने खो दी थी। उसकी पतलून तंग हो गई थी।

विक्रम ने अपनी उँगलियाँ वापस खींच लीं। मीरा हाँफने लगी, उसका शरीर खिंचाव के बाद के झटकों से काँप रहा था। वह पसीने से चमक रही थी, उसकी त्वचा गुलाबी हो गई थी। उसने पीछे मुड़कर उसे देखा, उसकी आँखें धुंधली, उलझी हुई लेकिन एक अदम्य उत्सुकता से भरी हुई।

उसकी नज़रें पूछ रही थीं: अब क्या?

विक्रम ने अपना लंड बाहर निकाला। यह मोटा, भारी और पहले से ही पत्थर जैसा सख्त था, नौ इंच लंबा, ढाई इंच मोटा, एक तना हुआ स्तंभ। उसने लंड को बचे हुए लुब्रिकेंट में डुबोया, जेल के लंड पर फिसलने की आवाज़ शांत कमरे में स्पष्ट सुनाई दे रही थी।

उसने उसे मीरा के गुलाबी गांड की छेद के ठीक ऊपर टिकाया। उसकी निगाहें रमेश पर गड़ी थीं, एक शिक्षक जैसी अद्भुत शांति से।

“अब… गहरी साँस ले,” उसने आदेश दिया, उसकी आवाज़ में कोई जल्दबाजी नहीं थी।

और फिर उसने धक्का दिया।

“आआआहह्ह्ह्हहईईई!!!!! नहींहीहीईई!!! ये क्या कर रहे हैं!”

मीरा की चीख एक तीखी, फटती हुई ध्वनि थी जो कमरे की दीवारों से टकराकर लौट आई। एक चीरने वाला, जलता हुआ दर्द उसकी रीढ़ की हड्डी में ऊपर चढ़ा, जैसे कोई लाल-गरम सलाख उसे भीतर से छील रही हो।

उसकी आँखों से आँसू बह निकले, उसका शरीर एकदम से अकड़ गया, हर मांसपेशी विरोध में तनी हुई।

“आआआआ!!!!..स्स्स्स!!!….बहुत दर्द हो रहा है!..मर गयीईईईई!!!!!!… बस करो!!!..स्सस्सस्सस!!!!!!…!..उफ्फ्फ!!!!!..आआआहह्हह…!! निकालो इसे!”

रमेश ने यह सब देखा। उसका सीना जोर-जोर से धड़क रहा था। हे भगवान!… उसकी तकलीफ़… उसके चेहरे पर पीड़ा… लेकिन उसकी नज़रें उस जगह से हट नहीं पा रही थीं जहाँ विक्रम का मोटा लंड धीरे-धीरे, लगातार, मीरा के अविश्वसनीय रूप से तंग छेद में समा रहा था।

यह एक क्रूर, मोहक नज़ारा था। उसने अपनी पतलून पर हाथ रखा और जाने-अनजाने दबाव दिया, उसके अंदर एक गहरी, शर्मनाक रोमांच की लहर उठ रही थी।

“ढीला छोड़, कुतिया!,”

विक्रम ने गुर्राते हुए कहा, उसकी मुट्ठियाँ मीरा की कमर पर कसी हुई थीं।

“तू आराम से ले लेगी इसे। तेरा शरीर मेरा है आज।” और वह धीरे से, बिना रुके, आगे बढ़ता रहा।

दर्द, जो एक सफेद-गरम विस्फोट था, धीरे-धीरे एक गहरी, असहज भराव में बदलने लगा। मीरा की तीखी चीखें दबी हुई कराहों में तब्दील होने लगीं। उसकी साँसें भारी और अनियमित हो गईं।

“उफ्फ… हाँ… ऐसे ही…”

शब्द उसके मुँह से खुद-ब-खुद निकले, और वह स्वयं भी हैरान रह गई।

“यह दर्द है… लेकिन यह भराव… ऐसा लग रहा है जैसे मैं पूरी तरह भर गई हूँ… जैसे कोई खालीपन अब भर गया हो…”

विक्रम ने गति पकड़नी शुरू की।

“थप!-थप!!-थप!!!-थप!!!!-थप!!!!!-थप!!!!!!”

उसके मांसल कूल्हे मीरा की गांड से जोर से टकराने लगे, एक गीली, तेज़ थाप की लय बनाते हुए जो कमरे में गूंजने लगी।

“आहहह!!… आहह्हह!!!… हाँ… ठाकुर साहब…स्स्स्स!!!” मीरा कराह उठी।

अब यह दर्द और सुख का एक विचित्र, नशीला मिश्रण था। हर धक्के के साथ एक जलन, फिर एक गहरा, संतुष्टिदायक भराव। उसने महसूस किया कि उसकी अपनी चूत से गर्म पानी टपकने लगा था, उसकी अपनी देह इस अपमानजनक कृत्य का जवाब दे रही थी।

उसने मुश्किल से अपना सिर घुमाया और रमेश की तरफ देखा, अपने चेहरे पर पीड़ा और बलिदान का एक नाटकीय भाव लाने की कोशिश की।

“यह… यह हमारे लिए है, जी…” उसने चहरे के हावभाव से बताने की कोशिश की।

रमेश ने देखा कि कैसे उसकी पत्नी की आँखें ‘ना’ कह रही थीं लेकिन उसका शरीर ‘हाँ’ का जवाब दे रहा था। उसकी अपनी साँस फूल गई, उसकी नज़रें उस जगह चिपकी हुई थीं जहाँ से थोड़ा खून भी रिस रहा था।

वह इसे पसंद कर रही है… मेरी पतिव्रता पत्नी… किसी और के लिए ऐसे कराह रही है… किसी और के लिए अपनी गांड पेश कर रही है… उसे एक अभूतपूर्व, अमानवीय उत्तेजना महसूस हुई।

विक्रम का पसीना मीरा की पीठ पर टपक रहा था, उनके शरीर चिपचिपे हो रहे थे।

“तेरी गांड तो कमाल की है, रंडी!” वह चिल्लाया, हर धक्के के साथ उसकी आवाज़ भारी होती जा रही थी।

“रमेश, देख रहा है? तेरी बीवी की कुँवारी गांड अब मेरी है! मैंने इसे खोल दिया! इसे अपना बना लिया!”

कुछ देर तक, लगभग दस मिनट तक यही चलता रहा – विक्रम की गुर्राहट और शिक्षाप्रद टिप्पणियाँ, मीरा की दबी हुई चीखों से लेकिन बढ़ती हुई मुक्त कराहों तक की यात्रा, और रमेश की भारी, उत्तेजित साँसें जो कमरे की हवा में मिल रही थीं। फिर, एक विशेष रूप से जोरदार धक्के के बाद, विक्रम ने अचानक अपना लंड बाहर खींच लिया।

“पूप्प्प्प!!!!” की आवाज़ आई.

मीरा तुरंत आगे की ओर झुक गई, हाँफते हुए, उसका शरीर अब एक अजीब खालीपन महसूस कर रहा था। ठंडी हवा उसके नए खुले, चोटिल छेद पर लगी, और वह एक सिहरन के साथ ऐंठ गई।

उसकी नज़रें धुंधली थीं, दिमाग चकरा रहा था। उसने पीछे मुड़कर विक्रम की ओर देखा, उसकी आँखों में एक भ्रमित प्रश्न था।

“खत्म… हो गया?”

विक्रम ने उसके बाल जोर से पकड़े, उसकी उँगलियाँ मीरा के पसीने से गीले घुँघराले स्तरों में चिपक गईं। उसने उसका सिर एक तेज़, दर्दनाक झटके से घुमाकर अपनी ओर खींच लिया।

“अभी नहीं,” उसने कहा, उसकी आवाज़ अब एक थकी हुई, लेकिन अडिग आदेश की थी।

“मुँह खोल।”

“क्या…?”

मीरा की आँखें फैल गईं, उसके भीतर एक नए डर का जन्म हुआ। उसकी नज़रें नीची हुईं और विक्रम के लंड पर टिक गईं, जो अभी भी उभरा हुआ, चमकदार और उसके अपने रिसाव और लुब्रिकेंट से गीला था।

उसने अपना गीला, चमकदार लंड उसके चेहरे के करीब लाया। हवा में एक तीखी, अजनबी गंध तैर गई – उसकी अपनी गांड से आने वाली मादक, घिनौनी गंध और विक्रम के पसीने की कठोर, पुरुषोचित बू का मिश्रण।

यह वह गंध थी जिसने अभी-अभी उसके शरीर को भर दिया था। मीरा का मुँह भर आया, उसका पेट मिचलाने लगा।

“उफ्… यह गंद…” शब्द उसके होठों से निकले, एक कमजोर विरोध।

“चुपचाप ले!”

विक्रम ने दहाड़ लगाई, उसकी आँखों में एक अंतिम, निर्णायक चमक। उसने संकोच नहीं किया। उसने अपने लंड को सीधे मीरा के होंठों पर जबरन धकेल दिया, नम, नर्म मांस उसकी कठोरता से दब गया।

मीरा ने घुटन में आँखें मूँद लीं। स्वाद उसकी जीभ पर फैल गया – नमकीन, धातु जैसा, अपरिचित। गंध उसके नथुनों में भर गई, उसे मिचली सी आने लगी। लेकिन तभी, उसके धुंधले दिमाग में एक विचार कौंधा, एक अजीब सी शांति के साथ:

“यह भी तो मेरा ही हिस्सा है… मेरी ही गांड का स्वाद… और यही वह लंड है जिसने अभी मुझे इतना सुख दिया… इतना भराव दिया…”

उसने अपनी जीभ हिलाई, स्वाद को महसूस किया। यह परिचित लगने लगा, विदेशी नहीं। यह उसकी अपनी देह का एक विस्तार था।

“अच्छा… अब चूस,” विक्रम ने आदेश दिया, उसकी आवाज़ अब थोड़ी नरम, लेकिन उतनी ही अडिग थी।

मीरा ने धीरे-धीरे चूसना शुरू किया। पहले अनिच्छा से, उसके जबड़े दर्द में थे। फिर, एक लय पकड़ते हुए। उसने अपने होठों को उसके शाफ्ट के चारों ओर कस लिया, उसकी जीभ नीचे की नसों को महसूस करती हुई। विक्रम ने एक गहरी साँस छोड़ी, उसकी मुट्ठियाँ थोड़ी ढीली पड़ीं।

“हाँ… ऐसे ही…”

फिर उसने जोर पकड़ा।

“गले तक ले जा, कुतिया! सारा ले!”

उसने मीरा के मुँह में अपना लंड जोर-जोर से धकेलना शुरू कर दिया, हर धक्का पहले से ज़्यादा गहरा। मीरा की आँखें फिर से फैल गईं जब विक्रम ने खुद को पंक्तिबद्ध किया और एक जोरदार, कड़क धक्के के साथ उसके गले की ओर बढ़ा। वह उसकी जीभ के पार, नरम तालू के पार, सीधे उसके गले के संकीर्ण मार्ग में घुस गया।

“ग्लककक्क!!!!” मीरा का गला अवरुद्ध हो गया, उसका शरीर एक सहज प्रतिवर्त के साथ आगे की ओर झटका खा गया। आँसू तुरंत उसकी आँखों में उभर आए। लेकिन विक्रम ने उसके बालों को और कसकर पकड़ लिया, उसका सिर अपनी जांघों से दबा दिया। उसने उसे साँस नहीं लेने दी।

“ग्लक.. ग्लक.. ग्लक.. ग्लक.. ग्लक.. ग्लक!!!”

वह उसके गले में धकेलता रहा, उसके घुटन के प्रतिवर्त को नज़रअंदाज़ करते हुए। वह गहरे, और गहरे, तब तक धकेलता रहा जब तक कि उसका सिर उसके गले के पीछे नहीं टकरा गया। मीरा की साँसें छोटी, तेज़ खर्राटों में उसकी नाक से निकल रही थीं। उसकी आँखें लाल हो गईं, आँसू उसके गालों पर नम रास्ते बना रहे थे।

रमेश बेबस होकर देख रहा था, उसका मुँह खुला हुआ था। उसकी पत्नी का चेहरा विक्रम के जांघों से इस तरह दबा हुआ था कि उसकी नाक चिपक सी गई थी। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन वह रुकी नहीं। उसके गाल अंदर की ओर धँस रहे थे, हर धक्के के साथ और गहरे होते जा रहे थे।

यह दृश्य रमेश के दिमाग में एक अमिट छाप की तरह जल रहा था – अपमान, वर्चस्व, और एक गहरी, विकृत कामुकता का मिश्रण। उसकी अपनी पतलून में, उसका लिंग एक दर्दनाक सख्ती से धड़क रहा था।

विक्रम की साँसें तेज़ और भारी हो गईं, उसके पेट की मांसपेशियाँ तन गईं।

“ग्लक!..ग्लक!..ग्लक!..ग्लक!..ग्लक!..ग्लक!..”

“हाँ… अब… अब निकलने वाला हूँ…” उसकी आवाज़ एक गुर्राहट थी। उसने मीरा के बालों को और भी कसकर पकड़ लिया, उसका सिर अपने लंड के ऊपर से निकल लिया।

“ये ले, रंडी! सब का सब!..आआआ!!!!!….आआआ!!!!…आआआ!!!!..”

एक ठंडी, गाढ़ी धार उछली और मीरा के पूरे चेहरे पर फैल गई—उसकी बंद पलकों पर, नाक पर, होंठों पर, गालों पर, यहाँ तक कि उसके माथे और बालों की जड़ों तक।

विक्रम ने एक लम्बी, गहरी कराह निकाली, उसका शरीर एक लंबे झटके में काँप गया। फिर उसने अपना लंड ढीला छोड़ दिया, मीरा को एकदम से छोड़ते हुए।
मीरा सिर झुकाए, खाँसते और हाँफते हुए वहीं बैठी रही।

उसके चेहरे पर सफेद तरल की मोटी परत बह रही थी, उसकी ठोड़ी से टपकती हुई। वह खाँसी, उसका गला जल रहा था, आँसू और वीर्य का मिश्रण उसकी त्वचा पर चिपचिपा महसूस हो रहा था। धीरे-धीरे, उसने आँखें खोलीं। उसकी नज़र सीधी रमेश पर पड़ी, जो अभी भी दहलीज पर खड़ा था।

उसकी नज़रों में कोई आँसू नहीं थे, कोई गुहार नहीं थी। सिर्फ एक सपाट, थकी हुई पूछताछ थी।

“क्या अब तुम्हे पसंद आया? क्या अब तुम संतुष्ट हो?”

रमेश ने जवाब में सिर्फ एक बेचैन साँस भरी, उसकी आँखें इस अपमानजनक दृश्य से हट नहीं पा रही थीं। उसकी भूख शांत नहीं हुई थी। बस और बढ़ गई थी।

विक्रम ने अपनी पैंट सँभाली, ज़िप बंद की। उसने रमेश की तरफ मुड़कर देखा, उसके चेहरे पर एक संतुष्ट, थकी हुई मुस्कान थी, जैसे कोई शिक्षक जिसने एक कठिन पाठ पूरा कर दिया हो।

“देखा?”

उसने कहा, उसकी आवाज़ में एक गुर्राहट थी, लेकिन उसमें एक अजीब सी शांति भी थी।

“इस तरह एक औरत को लिया जाता है। इसी तरह से उसे चोदा जाता है!”

To be continued . . .

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